मुहम्मद

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मुह़म्मद
[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम]
محمد صلی اللہ علیہ و آلہ و سلم
Al-Masjid AL-Nabawi Door.jpg
अरबी सुलेख में मुहम्मद का नाम
जन्म मुह़म्मद इब्न अ़ब्दुल्लाह अल हाशिम
५७०
मक्का (शहर), मक्का प्रदेश, अरब
(अब सऊदी अरब)
मृत्यु 8 जून 632(632-06-08) (उम्र 62)
यस्रिब, अरब (अब मदीना, हेजाज़, सऊदी अरब)
मृत्यु का कारण बुख़ार
स्मारक समाधि मस्जिद ए नबवी, मदीना, हेजाज़, सऊ़दी अ़रब
अन्य नाम मुसतफ़ा, अह़मद, ह़ामिद मुहम्मद के नाम
प्रसिद्धि कारण इस्लाम के पैगंबर
धार्मिक मान्यता इस्लाम
जीवनसाथी पत्नी: खदीजा बिन्त खुवायलद (५९५–६१९)
सोदा बिन्त ज़मआ (६१९–६३२)
आयशा बिन्त अबी बक्र (६१९–६३२)
हफ्सा बिन्त उमर (६२४–६३२)
ज़ैनब बिन्त खुज़ैमा (६२५–६२७)
हिन्द बिन्त अवि उमय्या (६२९–६३२)
ज़ैनब बिन्त जहाश (६२७–६३२)
जुवय्रिआ बिन्त अल-हरिथ (६२८–६३२)
राम्लाह बिन्त अवि सुफ्याँ (६२८–६३२)
रय्हना बिन्त ज़यड (६२९–६३१)
सफिय्या बिन्त हुयाय्य (६२९–६३२)
मयुमा बिन्त अल-हरिथ (६३०–६३२)
मरिया अल-क़ीब्टिय्या (६३०–६३२)
बच्चे बेटे अल-क़ासिम, `अब्द-अल्लाह, इब्राहिम
बेटियाँ: जैनाब, रुक़य्याह, कुलसुम , फ़ातिमः ज़हरा
माता-पिता पिता अब्दुल्लह इब्न अब्दुल मुत्तलिब
माता आमिना बिन्त वहब
संबंधी अहल अल-बैत
अंतिम स्थान मस्जिद ए नबवी, मदीना, हेजाज़, सऊ़दी अ़रब

हज़रत मुहम्मद (محمد صلی اللہ علیہ و آلہ و سلم) - "मुहम्मद इब्न अब्दुल्लाह इब्न अब्दुल मुत्तलिब" का जन्म सन ५७० ईसवी में हुआ था। इन्होंने इस्लाम धर्म का प्रवर्तन किया। ये इस्लाम के सबसे महान नबी और आख़िरी सन्देशवाहक (अरबी: नबी या रसूल, फ़ारसी : पैग़म्बर) माने जाते हैं जिन को अल्लाह ने फ़रिश्ते जिब्रईल द्वारा क़ुरआन का सन्देश' दिया था। मुसलमान इनके लिये परम आदर भाव रखते हैं।

मुहम्मद इब्न अब्दुल्लाह इब्न अब्दुल मुत्तलिब इब्न हाशिम (अरबी: مُـحَـمَّـد ابْـن عَـبْـد الله ابْـن عَـبْـد الْـمُـطَّـلِـب ابْـن هَـاشِـم, अंग्रेजी: Muḥammad ibn ʿAbdullāh ibn ʿAbdul-Muṭṭalib ibn Hāshim) (जन्म: सोमवार, १२ रबी अल-अव्वल, ५७० ई० - देहांत: 8 जून, ६३२ ई०) (इब्न का अर्थ: "son of"), संक्षेप में मुहम्मद, इस्लाम के अंतिम पैगम्बर, और पुन: संस्थापक थे | इस्लामिक सिद्धांतो के मुताबिक, वह एक भविष्यवक्ता और अल्लाह के संदेशवाहक थे, जो आदम, अब्राहम, मूसा, ईसा और अन्य नबियों [1][2][3] द्वारा प्रचारित एकेश्वरवादी शिक्षाओं को प्रस्तुत करने और पुष्टि करने के लिए भेजे गए थे | इस्लाम की सभी मुख्य शाखाओं (सुन्नी, शिया, वहावी, आदि) में उन्हें अल्लाह के अंतिम पैगम्बर के रूप में देखा जाता है | मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ने अरब राज्य को अल-कुरआन, सुन्नत और हदीसों के आधार पर राजनैतिक और धार्मिक तोर पर एकजुट किया था | [4] इस्लाम की केन्द्रीय धार्मिक पुस्तक "अल-क़ुरआन" अल्लाह ने फ़रिश्ते जिब्रील द्वारा हज़रत मुहम्मद को सन् 610 से सन् ६३२ तक सुनवाई थी, जिसे हज़रत के निधन के बाद पहली बार लिखा गया था | मुसलमान अक्सर मुहम्मद को पैगम्बर मुहम्मद, या सिर्फ पैगम्बर या रसूल अल्लाह के रूप में संदर्भित करते हैं, और उन्हें सभी नबियों में सर्वश्रेष्ठ मानते हैं |[5][6] वह मुसलमनों द्वारा सभी गुणों के मालिक के रूप में देखे जाते हैं |[7] मुहम्मद साहब का उल्लेख करते समय, मुस्लिम लोगों द्वारा सल्लल्लाहु अलैैहि वसल्लम (अरबी: صلى الله عليه وسلم) (अंग्रेजी: Peace be upon him) का उपयोग किया जाता हैं[8], हलांकि इसके बजाय " उन पर शांति हो " या " उन पर अमन कायम रहे " भी इस्तेमाल किए जाते हैं, अरबी वाक्यांश को संक्षेप में स.अ.व भी लिखा जाता हैं |

मुहम्मद साहब के प्रवचन, शिक्षा, मार्गदर्शन- जिन्हें सुन्नह् के नाम से जाना जाता है, सारे मुस्लिम जगत में इन्हें जीवन शैली के तोर पर अपनाया जाता है, मुस्लिम व्यक्ति सुन्नह् का पालन करने के लिए बाध्य माने जाते है |[9] मुहम्मद को अल्लाह के अंतिम संदेशवाहक के रूप में स्वीकार करना इस्लाम की केंद्रीय मान्यताओ में से एक है | शहादा (अरबी: الشهادة‎; अर्थ: गवाही देना), एक बुनयादी इस्लामिक प्रथा हैं, जिसमें यह एलान किया जाता हैं कि अल्लाह एक हैं, और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम अल्लाह के भेजे गए प्रेषित (पैगम्बर) हैं| यह एलान सूक्ष्म रूप से इस तरह है: "ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुन रसूलुल्लाह " (अरबी: لَا إِلٰهَ إِلَّا الله مُحَمَّدٌ رَسُولُ الله) अर्थ "कोई भी माबूद नहीं हैं, अल्लाह के सिवा और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं "| कुरान में 3: 132 , 48:29 और 66: 1 जैसे गद्यांशो में मुहम्मद को रसूल, पैगम्बर कहा गया हैं, और कुरान लोगों से उनका अनुसरण करने के लिए कहता है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति हयात (जीवन काल) और आखिरत (मृत्यु के पच्छात का जीवन) में सफ़ल प्राप्त कर सकता हैं |

मक्का के सम्मानित कुरैशी परिवार में लगभग 570 ई० में पैदा हुए, हज़रत मुहम्मद को स्थानीय लोगों ने "अल-अमीन" ( الامين , जिसका अर्थ है "भरोसेमंद") का शीर्षक दिया था |[10] 40 साल की उम्र में, मुहम्मद को हिरा नामक गुफ़ा में क़ुरान का पहला मौखिक प्रकाशन प्राप्त हुआ था | इसके बाद, उन्हें २३ वर्षो की अवधि में पूरा कुरआन का खुलासा हुआ था | मुस्लिमों का मानना ​​है कि मुहम्मद से अल्लाह ने एकेश्वरवाद का प्रचार करने और मूर्ति पूजा को मुद्रित करने के लिए कहा था, जिसका अभ्यास पूर्वी अरब में किया जाता था [11] मक्का में नए परिवर्तित मुसलमानों के उत्पीड़न और मदीना (जिसे यथ्रिब के नाम से जाना जाता था) प्रतिनिधिमंडल के निमंत्रण पर, मुहम्मद और उनके अनुयायी ६२२ ई० में मदीना चले गए थे, इस घटना को हिजरत कहा जाता हैं |[12][13] हज़रत मुहम्मद के जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ हिजरत , इस्लामिक कैलेंडर हिजरी की शुरुआत को चिह्नित करता है । मदीना में, हज़रत मुहम्मद ने विभिन्न मौजूदा समुदायों के बीच के संबंधों को सुधारा था |सामुदायिक संबंधों को निर्दिष्ट करने वाले मदीना के संविधान को हज़रत मुहम्मद की सलह से पुन: लिखा गया था, जिससे एक स्वतंत्र समुदाय का गठन हुआ, और पहला इस्लामिक राज्य स्थापित हुआ था |[14] ६३० ई० में मुहम्मद स० ने अपने अनुयायियों के साथ मक्का पर चढाई कर दी, युद्ध में मक्का के लोगों की पराजय हुई और मक्का मुसलामनों के अधीन आ गया था | [15] काबा शरीफ को इस्लाम का पवित्र स्थल घोषित कर दिया गया | बाद के वर्षों में , मुहम्मद ने इस्लाम के तहत अरब की विभिन्न जनजाँतियों को एकजुट करते हुए,कई  सामाजिक और धार्मिक सुधार किए थे | हज़रत का निधन ६३२ ई० में हुआ था, परन्तु तब तक अरब प्रायद्वीप की लगभग सभी जनजाँति इस्लाम में परिवर्तित हो चुकी थी |[16]

क़ुरआन में[संपादित करें]

इन्हें भी देखें: क़ुरआन

क़ुरआन मुहम्मद स० की नैतिक उत्कृष्टता और उनके पैगंबरी (भविष्यसूचक) लक्ष्य को वर्णित करता हैं, और जबकि मुहम्मद के प्रारंभिक जीवन या अन्य जीवनी विवरणो के बारे में बहुत कम बताता हैं | कुरआन के अनुसार, मुहम्मद अल्लाह द्वारा भेजे गए पैगम्बरो की शृंखला में अंतिम (३३:४०) नबी हैं | कुरआन मुहम्मद को "नबी", "अल्लाह का संदेशवाहक " , "पैगंबर" के रूप में संदर्भित करता हैं | कुरआन के 2:101, 2:143, 2:151, 3:32, 3:81, 3:144, 3:164, 4:79-80, 5:15, 5:41, 7:157, 8:01, 9:3, 33:40, 48:29, और 66:09 छंंदो में मुहम्मद को विभिन्न नामों से पुकारा गया हैं, जिसमें अच्छे समाचारों के वाहक (अल-मुबशिर ) , सावधान करने वाला (नधिर) और "जो लोगों को एक मात्र ईश्वर की तरफ आमंत्रित करता हैं, शामिल हैं | कुरआन कहता है की, अल्लाह ने मुहम्मद को सच्चाई ( अल्लाह का मानवता को सन्देश) और दुनिया के लिए प्यार (या दया या करुणा) "रहमत उल लील आलमीन ( अरबी : رحمة للعالمين)" के रूप में भेजा था |

क़ुरआन में मुहम्मद का ज़िक्र "प्रेशित", "वार्ताहर", "ईश्वर दूत", "ईश्वर दास", "एलान करने वाला" [क़ुरआन 2:119], "गवाह" (शाहिद), [क़ुरआन 33:45] "सुवार्ता सुनाने वाला", "चेतावनी देने वाला" [क़ुरआन 11:2] "याद दिलाने वाला" [क़ुरआन 88:21] "ईश्वर की तरफ़ बुलाने वाला" (दाई),[क़ुरआन 12:108] "तेजस्वी" (नूर)[क़ुरआन 05:15], और "कांती (रौशनी) देने वाला (सिराज मुनीर) [क़ुरआन 33:46] जैसे नामों से होता है। क़ुरान में मुहम्मद स० को "अहमद" (ज़्यादा प्रशंसनीय) के नाम से भी संभोदित किया है (अरबी: أحمد‎, सूरा "अस-सफ़" 61:6)| सार्वभौमिक भईचारे का नियम और मानव-समानता का सिद्धान्त, जिसका एलान आपने किया, वह उस महान योगदान का परिचायक है जो हज़रत मुहम्मद ने मानवता के सामाजिक उत्थान के लिए दिया।क़ुरआन मुहम्मद स० के संबंध में कुछ धार्मिक मुद्दों को भी वर्गीकृत करता हैं | उनमे से सबसे महत्वपूर्ण मुहम्मद की शिक्षाओं का पालन करने का आदेश है, कुरआन बार-बार लोगों को आज्ञा देता हैं कि वे "अल्लाह और उसके नबी का अनुसरण करे" (३:३१-३२, ३:१३२, ४:५९)[17] | कुरआन में मुहम्मद (/mʊˈhæmədˌ-ˈhɑːməd/)[18] (अर्थात "जिसकी प्रशंसा की गई हो") नाम चार बार प्रकट हुआ  हैं |

पारंपरिक मुस्लिम विचार[संपादित करें]

जन्म[संपादित करें]

अरब प्रायद्वीप के रेगिस्तानी शहर मक्का में हज़रत अब्दुल्लाह और हज़रत बीबी आमिना के पुत्र मुहम्मद स० का जन्म ५७० ईस्वी में हुआ था[19]| बचपन में वह दो नामों से पुकारे जाते थे, उनकी माता उन्हें मुहम्मद कहती थी और दादा अब्दुल मुत्तलिब उन्हें अहमद नाम से पुकारते थे | वह प्रतिष्टित और प्रभावशाली कुरैशी जनजाति की एक सम्मानित शाखा बनू हाशिम कबीले के सदस्य थे | इस्लामिक पुस्तकों के अनुसार, मुहम्मद स० के जन्म से पहले उनकी माता ने कई स्पन देखे थे, जिनमे उनके ईश्वरदूत होने और अध्यात्मिक महत्व के बारे में कहा गया था | उनमे से एक रिवायत निन्मलिखित है:

"ऊतियत उम्मुहू फ़िल मनामि फ़की-ल लहा अन्नकि ह-म-लत सय्यिदल आलमी-न व खैरल वरीयति फ़-सम्मीहु मुहम्मदन इजा व-ज-अतहु सतु ह्मदु बिहा०"

  • अनुवाद: और आपकी माँ को ख्वाव में खुशखबरी दी गयी कि कोई उनसे कहता था कि तेरे पेट में तमाम दुनिया के सरदार हैं और बेहतर हैं सारी दुनिया से और जब यह पैदा हो तो इनका नाम मुहम्मद स० रखना, इसलिए की अंजाम नेक है |

अनाथाव्स्था[संपादित करें]

मुहम्मद स० अल्पायु में ही अनाथ हो गए थे | हज़रत के जन्म से कुछ महीने पहले, हज़रत अब्दुल्लाह, एक व्यापारिक कारवां के साथ पलस्तीन और अल-शाम (वर्तमान:सीरिया) के लिए रवाना हुए थे | कठिन यात्रा और बीमारी के कारण, वह यात्रा के अंतिम चरण में अपनी पैतृक दादी सलमा बिन्त अम्र के गाँव, जो मदीना ( नज्जार समोदय के खजराज़ कबीले) में स्तिथ था, वहा आराम के लिए ठहर गए थे और काफिला उन्हें पीछे छोड कर मक्का शहर को प्रस्थान कर गया था | कारवां द्वारा अब्दुल्लाह की बीमारी की खबर प्राप्त करने के बाद, हज़रत अब्दुल मुतल्लिब ने अपने बड़े बेटे अल-हरित को मदीना भेजा, परन्तु वहा जाने के पश्चात् अल-हरित ने जाना, की उनके भाई की मृत्यु बीमारी के एक महीने बाद हो गयी थी, और उन्हें दारुन-नबिया (मदीना मुनव्वरा ) में दफन किया गया था |

छ: वर्ष की आयु में ही मुहम्मद स० की माता अमिना का भी निधन हो गया था | कहा जाता है, हज़रत अब्दुल्लाह की कब्र के दर्शन करने लिए बीबी अमिना और मुहम्मद स० मदीना की यात्रा पर गए थे | मक्का लौटने के दौरान, कमजोरी और बीमारी की वजह से अमिना का निधन अब्वा नमक एक निर्जन स्थल हो गया था | माता-पिता के निधन के बाद मुहम्मद स० अपने दादा अब्दुल मुत्तलिब की देखभाल में रहे थे, परन्तु जब वह आठ वर्ष के हुए तो उनके दादा का भी निधन हो गया था | इसके बाद वह अपने चाचा अबू तालिब की देखभाल में रहे थे | मुहम्मद स० का कम आयु में अनाथ होना, एक दिव्य योजना के रूप में देखा जाता है, जिसके तहत वह " आत्मनिर्भरता, प्रतिबिंब और द्रढ़ता" के गुणो को विकसित कर सके, और एक महान धर्म के पुन: संस्थापक बने | कई इस्लामिक विद्वानों का मानना है की, मुहम्मद स० की अनाथाव्स्था ने उन्हें अल्लाह पर निर्भर कर दिया था, जिससे एक कठिन रहा की एक उचित शुरुआत हुई थी |

प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

अरब रिवाज़ के अनुसार, उनके जन्म के बाद, शिशु मुहम्मद को एक पड़ोसी बेडौइन जनजाति के बनी साद कबीले में भेजा गया था, जहाँ उन्होंने शुद्ध कथन और रेगिस्तानी शिष्टाचार का ज्ञान प्राप्त किया था | एक रिवायत के अनुसार अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया है की " मैं अरब की सबसे अच्छी बोल वाला हुं, इसलिए की क़ुरैश में पैदा हुआ और बनी साद में पला-बड़ा"| | बनी साद में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ने अपने जीवन के पहले पांच वर्ष अपनी पालक-माँ हलीमा सादिया के साथ बिताए थे |

हिजरत[संपादित करें]

अंत में सन् 622 में उन्हें अपने अनुयायियों के साथ मक्का से मदीना के लिए कूच करना पड़ा। इस यात्रा को हिजरत कहा जाता है और यहीं से इस्लामी कैलेंडर हिजरी की शुरुआत होती है। मदीना में उनका स्वागत हुआ और कई संभ्रांत लोगों द्वारा स्वीकार किया गया। मदीना के लोगों की ज़िंदगी आपसी लड़ाईयों से परेशान-सी थी और मुहम्मद स० के संदेशों ने उन्हें वहाँ बहुत लोकप्रिय बना दिया। उस समय मदीना में तीन महत्वपूर्ण यहूदी कबीले थे। आरंभ में मुहम्मद साहब ने जेरुसलम को प्रार्थना की दिशा बनाने को कहा था।

सन् 6 30 में मुहम्मद स्० ने अपने अनुयायियों के साथ मक्का पर चढ़ाई कर दी। मक्के वालों ने हथियार डाल दिये। मक्का मुसल्मानों के आधीन में आगया। मक्का में स्थित काबा को इस्लाम का पवित्र स्थल घोषित कर दिया गया। सन् 632 में हजरत मुहम्मद साहब का देहांत हो गया। पर उनकी मृत्यु तक लगभग सम्पूर्ण अरब इस्लाम कबूल कर चुका था।

गैलरी[संपादित करें]

मुहम्मद की पत्नियां[संपादित करें]

मुहम्मद की पत्नीएं इस्लामिक नबी मुहम्मद से शादी कर रही थीं। मुसलमानों का मानना ​​है कि उन्हें माताओं के विश्वासियों के रूप में (अरबी: أمهات المؤمنين उम्महत अल-मुमीनिन)। मुसलमानों ने सम्मान की निशानी के रूप में उन्हें संदर्भित करने से पहले या बाद में प्रमुख शब्द का प्रयोग किया। यह शब्द कुरान 33: 6 से लिया गया है: "पैगंबर अपने विश्वासियों की तुलना में विश्वासियों के करीब है, और उनकी पत्नियां उनकी माताओं (जैसे) हैं।"

मुहम्मद 25 वर्ष के लिए मोनोग्राम थे। अपनी पहली पत्नी खदीजा बिन्त खुवायलद की मृत्यु के बाद, उसने नीचे दी गई पत्नियों से शादी करने के लिए आगे बढ़ दिया, और उनमें से ज्यादातर विधवा थे मुहम्मद के जीवन को पारम्परिक रूप से दो युगों के रूप में चित्रित किया गया है: पूर्व हिजरत (पश्चिमी उत्प्रवासन) में पश्चिमी शहर में एक शहर, 570 से 622 तक, और हिमाचल प्रदेश में मदीना में, 622 से 632 तक अपनी मृत्यु तक।[20] हिजरत (मदीना के प्रवास) के बाद उनके विवाह का अनुबंध किया गया था। मुहम्मद की तेरह "पत्नियों" से, कम से कम दो, रहिना बंट जायद और मारिया अल-कबीट्या, वास्तव में केवल उपपत्नी थीं; हालांकि, मुसलमानों में बहस होती है कि इन दो पत्नियां बन गईं हैं। उनकी 13 पत्नियों और में से केवल दो बच्चों ने उसे बोर दिया था, जो कि एक तथ्य है जिसे कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के करीब ईस्टर्न स्टडीज डेविड एस पॉवर्स के प्रोफेसर द्वारा "जिज्ञासु" कहा गया है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]


सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Esposito (2002b), pp. 4–5.
  2. Peters, F.E. (2003). Islam: A Guide for Jews and Christians. Princeton University Press. प॰ 9. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-691-11553-2. 
  3. Esposito, John (1998). Islam: The Straight Path (3rd ed.). Oxford University Press. पृ॰ 9, 12. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-511234-4. 
  4. "Muhammad (prophet)". Microsoft® Student 2008 [DVD] (Encarta Encyclopedia). Redmond, WA: Microsoft Corporation. 2007. 
  5. Mead, Jean (2008). Why Is Muhammad Important to Muslims. Evans Brothers. प॰ 5. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-237-53409-7. Archived from the original on 23 June 2016. https://web.archive.org/web/20160623223317/https://books.google.com/books?id=CdJtfwE8_H4C&pg=PA5. अभिगमन तिथि: 29 September 2015. 
  6. Riedling, Ann Marlow (2014). Is Your God My God. WestBow Press. प॰ 38. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-4908-4038-3. Archived from the original on 14 May 2016. https://web.archive.org/web/20160514162431/https://books.google.com/books?id=e5QTBAAAQBAJ&pg=PT38. अभिगमन तिथि: 29 September 2015. 
  7. Matt Stefon, सं (2010). Islamic Beliefs and Practices. New York City: Britannica Educational Publishing. प॰ 58. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-61530-060-0. https://books.google.com/books?id=zBaXys_EI40C&pg=PA58. 
  8. Matt Stefon (2010). Islamic Beliefs and Practices, p. 18
  9. Encyclopedia of Islam। (2009)। संपादक: Juan E. Campo। Facts on File।
  10. Khan, Majid Ali (1998). Muhammad the final messenger (1998 सं॰). India: Islamic Book Service. प॰ 332. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-85738-25-4. 
  11. Shibli Nomani. Sirat-un-Nabi. Vol 1 Lahore.
  12. History of the Arabs. London: Macmillan and Co.. 1946. प॰ 116. 
  13. "Muhammad". Encyclopædia Britannica Online. Encyclopædia Britannica, Inc. 2013. Archived from the original on 27 January 2013. http://www.britannica.com/EBchecked/topic/396226/Muhammad/251796/The-advent-of-the-revelation-and-the-Meccan-period. अभिगमन तिथि: 27 January 2013. 
  14. Ghali, Muhammad M (2004). The History of Muhammad: The Prophet and Messenger. Cairo: Al-Falah Foundation. प॰ 5. Archived from the original on 7 July 2014. https://web.archive.org/web/20140707030002/http://books.google.com/books?id=Ggp8OFBIzssC&pg=PA5. अभिगमन तिथि: 25 January 2013. 
  15. Ramadan, Tariq title=In the Footsteps of the Prophet: Lessons from the Life of Muhammad (2007). New York City: Oxford University Press. प॰ 178. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-530880-8. 
  16. Richard Foltz, "Internationalization of Islam", Encarta Historical Essays.
  17. Muhammad Shafi Usmani. Tafsir Maariful Quran. 6. प॰ 236. http://www.islamibayanaat.com/MQ/English-MaarifulQuran-MuftiShafiUsmaniRA-Vol-6-Page-184-243.pdf. 
  18. "Muhammad". Random House Webster's Unabridged Dictionary.
  19. Opinions about the exact date of Muhammad's birth slightly vary। Shibli Nomani and Philip Khuri Hitti fixed the date to be 571 CE. But 12 rabi-ul-awwal, 570 CE is generally accepted. See Muir, vol. ii, pp. 13–14 for further information.
  20. "जो महिला मोहम्मद के पैग़ंबर बनने में साथ रही". http://www.bbc.com/hindi/international-41291092. 

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]