स्वामी भवानी दयाल सन्यासी

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स्वामी भवानी दयाल सन्यासी (10 सितम्बर 1892 ई. - 9 मई 1950) दक्षिण अफ्रीका में हिंदी के संस्थापक और महात्मा गांधी के निकट सहयोगी थे। फिजी के भारतीयों की स्वतंत्रता के लिए उन्होने संघर्ष किया। वे अपने समय में दक्षिण अफ्रीका में बेहद सक्रिय, लोकप्रिय औक कर्मठ प्रवासियों में थे। उनके नाम पर फिजी की आर्य प्रतिनिधि सभा ने भवानी दयाल आर्य कॉलेज की स्थापना की है। बिहार के एक गिरमिटिया मजदूर और अयोध्या से आरकाटी प्रथा के तहत ले जायी गयी एक महिला के पुत्र भवानी संन्यासी ने दक्षिण अफ्रीका में अाप्रवासियों के साथ भारतीयों का एकीकरण करने के साथ ही उनका बौद्धिक और राजनीतिक नेतृत्व भी किया था।

संन्यासी दक्षिण अफ्रीकी देशों में रहनेवाले भारतीयों के सबसे विश्वसनीय और लोकप्रिय दूत थे। वे महात्मा गांधी के प्रिय लोगों में से एक भी रहे और इन सबसे बड़ी पहचान उनकी हिंदी के अनन्य सेवक की रही। अपने समय में उन्होंने दक्षिण अफ्रीकी देशों में हिंदी के प्रचार में महती भूमिका निभायी। 1922 में संन्यासी ने नेटाल से 'हिंदी' नाम से साप्ताहिक पत्रिका निकाली जो अफ्रीका के अलग अलग देशों में रहने वाले प्रवासियों के बीच अत्यन्त लोकप्रिय पत्रिका हुई। इसके साथ ही संन्यासी ने दक्षिण अफ्रीका के कई देशों में रात्रि हिंदी पाठशााला की शुरुआत भी की।

परिचय[संपादित करें]

स्वामी भवानी दयाल संन्यासी का जन्म 10 सितम्बर 1892 ई. को जरमिस्टन, गौतेंग में हुआ था। इनके पिता का नाम बाबू जयराम सिंह और माता का नाम मोहिनी देवी था। पंडित आत्माराम नरसिराम व्यास ने एक स्कूल खोला, जिसमें गुजराती और हिन्दी पढ़ाई जाती थी। स्वामी जी ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा यहीं से प्राप्त की थी।

उनकी पत्नी जगरानी देवी अनपढ़ थीं, लेकिन संन्यासी ने उन्हें घर में ही पढ़ाकर इस अनुरूप तैयार किया कि वे हिन्दी की अनन्य सेवी तो बनी हीं, दक्षिण अफ्रीका में प्रमुख महिला सत्याग्रही भी बनीं। उनके नाम पर ही नेटाल में जगरानी प्रेस की स्थापना हुई। संन्यासी के हिन्दी के प्रति समर्पण और उनकी राजनीतिक समझ का ही परिणाम था कि दक्षिण अफ्रीका में वे महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गए पत्र 'इंडियन ओपिनियन' के हिंदी संपादक बनाये गये।

इतना ही नहीं, भारत आकर उन्होंने जिन कार्यों की बुनियाद रखी वह भी चकित करनेवाला है। भवानी दयाल पहली बार 13 साल की उम्र में ही अपने पिता के साथ भारत में पैतृक गांव बहुआरा आये थे। यह गांव बिहार के रोहतास जिले में है। एक बार गांव आये तो फिर उनका आना-जाना लगा रहा। किशोरावस्था में ही संन्यासी ने अपने गांव के गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय पाठशाला की नींव रख दी थी। बाद में उन्होंने एक वैदिक पाठशाला भी खोली। फिर गांव में ही उन्होंने खरदूषण नाम की एक और पाठशाला भी शुरू की। यहां बच्चों को पढ़ाने के साथ संगीत की शिक्षा दी जाती थी और किसानों को खेती संबंधी नई जानकारियां भी। जब उन्होंने खरदूषण पाठशाला की नींव रखी तो उसका उद्घाटन करने डॉ राजेंद्र प्रसाद और सरोजनी नायडू जैसे दिग्गज उनके गांव बैलगाड़ी से यात्रा कर पहुंचे थे। इस पाठशाला के साथ ही संन्यासी ने अपने गांव में 1926 में 'प्रवासी भवन' का भी निर्माण करवाया।

वे 1939 में दक्षिण अफ्रीका के प्रवासी भारतीयों के प्रतिनिधि के रूप में भारत आये। भारत में उनकी गतिविधियां बढ़ीं तो अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। वे हजारीबाग जेल में रहे। वहां उन्होंने ‘कारागार’ नाम से पत्रिका निकालनी शुरू की जिसके तीन अंक जेल से हस्तलिखित निकले। उसी में एक सत्याग्रह अंक भी था जिसे अंग्रेजी सरकार ने गायब करवा दिया था।

इंडियन कॉलोनियल एसोसिएशन से जुड़े प्रेम नारायण अग्रवाल ने 1939 में ‘भवानी दयाल संन्यासी- ए पब्लिक वर्कर आॅफ साउथ अफ्रीका’ नाम से एक किताब लिखी थी। इसे अंग्रेजी सरकार ने जब्त कर लिया था।

संन्यासी स्वयं एक रचनाधर्मी थे और उन्होने कई अहम पुस्तकों की रचना की। उनकी चर्चित पुस्तकों में 1920 में लिखी गयी 'दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास', 1945 में लिखी गयी 'प्रवासी की आत्मकथा', ‘दक्षिण अफ्रीका के मेरे अनुभव’, ‘हमारी कारावास की कहानी’, ‘वैदिक प्रार्थना’ आदि है। ‘प्रवासी की आत्मकथा’ की भूमिका डॉ राजेंद्र प्रसाद ने लिखी है तो ‘वैदिक प्रार्थना’ की भूमिका शिवपूजन सहाय ने। सहाय ने तो यहां तक लिखा है कि उन्होंने देश के कई लोगों की लाइब्रेरियां देखी हैं, लेकिन संन्यासी की तरह किसी की निजी लाइब्रेरी नहीं थी।[1]

भवानी दयाल संन्यासी के नाम पर अब भी दक्षिण अफ्रीका में कई महत्वपूर्ण संस्थान चलते हैं। डरबन में उनके नाम पर भवानी भवन है। नेटाल और जोहांसबर्ग के अलावा दूसरे कई देशों में भी संन्यासी अब भी एक नायक के तौर पर महत्वपूर्ण बने हुए हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

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