स्वरूपानंद सरस्वती

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शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज (जन्म: २ सितम्बर १९२४) एक हिन्दू अध्यात्मिक गुरु, स्वतन्त्रता सेनानी हैं।[1]


इस्कॉन के विरुद्ध निराधार आरोपों का खंडन 2 अगस्त 2016 · सार्वजनिक गलत बयानों पर इस्कॉन की प्रतिक्रिया हाल ही में इलाहबाद के माघ मेले के इस्कॉन के विरुद्ध कुछ द्वेषपूर्ण और उसकी छवि को क्षति पहुँचाने वाले बयान दिए। कहना है कि इस्कॉन अवैध धन और चयनात्मक प्रचार के गतिविधियों में लिप्त है और पूर्वोत्तर भारत के आदिवासीय क्षेत्रों की उपेक्षा करता है। सर्वप्रथम, इस्कॉन स्पष्टरूप से इस झूठे, भ्रामक और गलत दोषारोपण का खंडन करता है। इस्कॉन, इतने बड़े पैमाने पर आध्यात्मिक कल्याण के लिए विश्वभर में भारत और भारतीय संस्कृति को प्रचारित करने में सफल हुआ है और यह आरोप बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं। गत ४५ वर्षों से भारत में सेवारत इस्कॉन अपने विशाल एवं भव्य मंदिरों के कारण सुविख्यात है। हम सामान्य-जन को यह सूचित करना चाहते हैं कि ६०० मंदिर और लाखों अनुयायी भक्त वाला इस्कॉन, भारत में सबसे अधिक प्रख्यात धार्मिक संस्था है जिसने किसी जाति, वर्ण, लिंग, राष्ट्रीयता, भाषा या समुदाय के पक्षपात के बिना कृष्ण-भक्ति को सम्पूर्ण विश्व में प्रचारित किया है। साथ ही साथ गत ५० वर्षों से इस्कॉन संस्था ने साधुओं एवं अन्य हिन्दू पंथों के साथ सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखा है। उदाहरण के लिए, सन १९७१ से हर कुम्भ मेले में इस्कॉन के शिविर में साधुओं और तीर्थयात्रियों के लिए निशुल्क भोजन और सत्संग का आयोजन किया जाता है।

आरोपों के विपरीत असम, छत्तीसगढ़, मणिपुर, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में इस्कॉन के दो दर्जन से अधिक केंद्र हैं।  इस्कॉन, आदिवासी संरक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत ३० जिलों में निशुल्क स्वास्थ्य शिविरों, शिक्षा केन्द्रों एवं स्व-सहायता समूहों का संचालन कर रहा है। 

हर इस्कॉन मंदिर को पूर्ण स्वायत्ता प्राप्त है और अपने स्थानीय प्रचार हेतु अपनी क्षमता के अनुसार धन जुटाते हैं। यही कारण है कि एक देश से दूसरे देश में धन हस्तांतरित करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। वास्तव में, हमारी समूची संस्था, मायापुर (पश्चिम बंगाल), जहाँ श्रीमन चैतन्य महाप्रभु का जन्मस्थान है, वहां पर वैदिक तारामंडल का मंदिर (Temple of the Vedic Planetarium) बनवाने के लिए ५०० करोड़ रुपए एकत्रित कर रही है। मंदिर के ढांचे का निर्माणकार्य संपन्न हो चूका है। फोर्ड मोटर कंपनी के संस्थापक श्री हेनरी फोर्ड के प्रपौत्र और इस्कॉन के संस्थापकाचार्य ए सी भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के शिष्य, अल्फ्रेड बी फोर्ड (अम्बरीश दास) ने करोड़ों रुपए के अपने उत्तराधिकार को इस विशाल एवं भव्य मंदिर के निर्माण हेतु दान कर दिया है। बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के अंतर्गत इस्कॉन एक पंजीकृत धर्मार्थ संस्था है। भारत सरकार के आयकर विभाग द्वारा आयकर अधिनियम की धारा १२ए के अंतर्गत इस्कॉन को छूट प्राप्त है और दानकर्ताओं को धारा ८०जी के लाभ प्राप्त हैं। आयकर अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार कोई भी दान स्वीकार करने वाली गैर-सरकारी संस्था को वह धन भारत के अंदर ही धर्मार्थ प्रयोजनों हेतु ही व्यय करने की अनुमति है। इस्कॉन के बही-खाते प्रति वर्ष आयकर विभाग के अधिकारीयों द्वारा बारीकी से जाँचे जाते हैं। इस्कॉन का वार्षिक लेखा-परीक्षण (ऑडिट) मुंबई के चैरिटी आयुक्त के समक्ष भी दायर किया जाता है एवं आकलन अधिकारी हर विवरण की पुष्टि करके यह सुनिश्चित करते हैं कि हम आयकर विभाग के अधिनियमों का अक्षरशः पालन करें। इस्कॉन भारतीय संस्कृति के एक राजदूत के समान विश्वभर में प्रशंशित है। हम कीर्तन, शाकाहारी भोजन पकाने की प्रक्रिया, प्रसाद, वैदिक विषयों पर पुस्तकों और जन्माष्टमी, रामनवमी एवं दिवाली आदि जैसे हिन्दू पर्वों को सम्पूर्ण विश्व के साथ साझा करने के लिए जाने जाते हैं। इस्कॉन ने भगवद-गीता, श्रीमद् भागवत-पुराण, ईशोपनिषद जैसे पवित्र ग्रंथों का ८१ से अधिक भाषाओँ में अनुवाद करके सम्पूर्ण विश्व में उनका प्रचार किया है। आज इस्कॉन के कारण वृन्दावन, तिरुपति और जगन्नाथ पुरी जैसे पवित्र तीर्थ स्थानों पर भारी मात्रा में विदेशी भक्त भारतीय संस्कृति का अनुभव करने आते हैं। इस्कॉन के अन्य उल्लेखनीय सामाजिक योगदान भी हैं : • हरे कृष्ण "फूड फॉर लाइफ" (जीवन के लिए भोजन) कार्यक्रम विश्व का सबसे बड़ा शाकाहारी खाद्यान्न वितरित करने का उपक्रम है। भारत में हुयी कई प्राकृतिक विपदाओं जैसे ओड़िशा का चक्रवात, कश्मीर और तमिलनाडु में आई बाढ़ में इस्कॉन के इस उपक्रम ने लोगों तक सबसे पहले खाद्यान्न पहुँचाने का कार्य किया था। • इस्कॉन के अनुयायी अपने एक सम्बद्ध उपक्रम "अन्नामृत" के तहत प्रतिदिन १३ लाख से अधिक सरकारी स्कूल के बच्चों को कुपोषण एवं निरक्षरत

जीवन परिचय[संपादित करें]

स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म २ सितम्बर १९२४ को मध्य प्रदेश राज्य के सिवनी जिले में जबलपुर के पास दिघोरी गांव में ब्राह्मण परिवार में पिता श्री धनपति उपाध्याय और मां श्रीमती गिरिजा देवी के यहां हुआ। माता-पिता ने इनका नाम पोथीराम उपाध्याय रखा। नौ वर्ष की उम्र में उन्होंने घर छोड़ कर धर्म यात्रायें प्रारम्भ कर दी थीं। इस दौरान वह काशी पहुंचे और यहां उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज वेद-वेदांग, शास्त्रों की शिक्षा ली। यह वह समय था जब भारत को अंग्रेजों से मुक्त करवाने की लड़ाई चल रही थी। जब १९४२ में अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगा तो वह भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और १९ साल की उम्र में वह 'क्रांतिकारी साधु' के रूप में प्रसिद्ध हुए। इसी दौरान उन्होंने वाराणसी की जेल में नौ और मध्यप्रदेश की जेल में छह महीने की सजा भी काटी। वे करपात्री महाराज की राजनीतिक डाल राम राज्य परिषद के अध्यक्ष भी थे। १९५० में वे दंडी संन्यासी बनाये गए और १९८१ में शंकराचार्य की उपाधि मिली। १९५० में ज्योतिष्पीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड-सन्यास की दीक्षा ली और स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "स्वरूपानंद सरस्वती: सारांश". http://jagadgurushankaracharya.org/. 

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]