स्टीव जॉब्स

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स्टीव जॉब्स
Steve Jobs Headshot 2010-CROP.jpg
जन्म स्टीवन पॉल जॉब्स
24 फ़रवरी 1955
सैन फ्रांसिस्को
मृत्यु अक्टूबर 5, 2011(2011-10-05) (उम्र 56)
पालो आल्टो, कैलिफ़ोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका
राष्ट्रीयता अमेरिकी
जातीयता Syrian American[*], Arab American[*], white people[*], German American[*]
शिक्षा प्राप्त की Reed College[*], Homestead High School[*]
व्यवसाय को-फ़ाउंडर, चेरमन और सी॰ई॰ओ॰, एप्पल इंक°, पिक्सार (Pixar), को-फ़ाउंडर और सी॰ई॰ओ॰, नेक्स्ट इंक॰
सक्रिय वर्ष १९७४–२०११
कुल मूल्य $७.० बिलियन डॉलर
बोर्ड सदस्यता द वॉल्ट डिज़्नी कंपनी, एप्पल इंक॰
धार्मिक मान्यता बौद्ध धर्म
जीवनसाथी लोरेन पॉवेल
(१९९१–२०११, उसका मौत)
बच्चे ४ – लीसा ब्रेनन-जॉब्स, रीड, एरिन, ईव
माता-पिता John Abdulfattah Jandali[*], Paul Jobs[*]
Clara Jobs[*], Joanne Schieble[*]
संबंधी मोना सिम्पसन (बहन)
पुरस्कार National Medal of Technology and Innovation[*], Grammy Trustees Award[*], California Hall of Fame[*], National Inventors Hall of Fame[*], Disney Legends[*]
हस्ताक्षर
SteveJobsSignatureInsideOriginalMacintoshCase-Villenero.jpg

स्टीवन पॉल "स्टीव" जॉब्स (अंग्रेज़ी: Steven Paul "Steve" Jobs) (जन्म: २४ फरवरी, १९५५ - अक्टूबर ५, २०११) एक अमेरिकी बिजनेस टाईकून और आविष्कारक थे। वे एप्पल इंक के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी थे। अगस्त २०११ में उन्होने इस पद से त्यागपत्र दे दिया। जॉब्स पिक्सर एनीमेशन स्टूडियोज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी रहे। सन् २००६ में वह दि वाल्ट डिज्नी कम्पनी के निदेशक मंडल के सदस्य भी रहे, जिसके बाद डिज्नी ने पिक्सर का अधिग्रहण कर लिया था। १९९५ में आई फिल्म टॉय स्टोरी में उन्होंने बतौर कार्यकारी निर्माता काम किया।

परिचय[संपादित करें]

कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन बनाने वाली कंपनी ऐप्पल के भूतपूर्व सीईओ और जाने-माने अमेरिकी उद्योगपति स्टीव जॉब्स ने संघर्ष करके जीवन में यह मुकाम हासिल किया। कैलिफोर्निया के सेन फ्रांसिस्को में पैदा हुए स्टीव को पाउल और कालरा जॉब्स ने उनकी माँ से गोद लिया था। जॉब्स ने कैलिफोर्निया में ही पढ़ाई की। उस समय उनके पास ज़्यादा पैसे नहीं होते थे और वे अपनी इस आर्थिक परेशानी को दूर करने के लिए गर्मियों की छुट्टियों में काम किया करते थे।

१९७२ में जॉब्स ने पोर्टलैंड के रीड कॉलेज से ग्रेजुएशन की। पढ़ाई के दौरान उनको अपने दोस्त के कमरे में ज़मीन पर सोना पड़ा। वे कोक की बोतल बेचकर खाने के लिए पैसे जुटाते थे और पास ही के कृष्ण मंदिर से सप्ताह में एक बार मिलने वाला मुफ़्त भोजन भी करते थे। जॉब्स के पास क़रीब ५.१ अरब डॉलर की संपत्ति थी और वे अमेरिका के ४३वें सबसे धनी व्यक्ति थे।

जॉब्स ने आध्यात्मिक ज्ञान के लिए भारत की यात्रा की और बौद्ध धर्म को अपनाया। जॉब्स ने १९९१ में लोरेन पॉवेल से शादी की थी। उनका एक बेटा है।[1]

प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

स्टीव जॉब्स का जन्म २४ फ़रवरी १९५५ को सैन फ्रांसिस्को, कैलिफ़ोर्निया में हुआ था। स्टीव के जन्म के समय उनके माता पिता की शादी नही हुए थी, इसी कारण उन्होने उसे गोद देने का फ़ैसला किया। इसी लिये स्टीव को  कैलिफोर्निया पॉल रेनहोल्ड जॉब्स और क्लारा जॉब्स ने गोद ले लिया था। क्लारा जॉब्स ने कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त नहीं की थी और पॉल जॉब्स ने केवल उच्च विद्यालय तक की ही शिक्षा प्राप्त की थी।

जब जॉब्स 5 साल के थे तो उनका परिवार सैन फ्रांसिस्को से माउंटेन व्यू, कैलिफोर्निया की और चला गया। पॉल एक मैकेनिक और एक बढ़ई के रूप मे काम किया करते थे और अपने बेटे को अल्पविकसित इलेक्ट्रॉनिक्स और 'अपने हाथों से काम कैसे करना है' सिखाते थे, वहीं दूसरी और क्लॅरा एक अकाउंटेंट थी और स्टीव को पढ़ना सिखाती थी।[2] जॉब्स ने अपनी प्राथमिक शिक्षा मोंटा लोमा प्राथमिक विद्यालय मे की और उच्च शिक्षा कूपर्टीनो जूनियर हाइ और होम्स्टेड हाई स्कूल से प्राप्त की थी। सन् 1972 में उच्च विद्यालय के स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद जॉब्स ने ओरेगन के रीड कॉलेज में दाखिला लिया मगर रीड कॉलेज बहुत महँगा था और उनके माता पिता के पास उतने पैसे नही थे। इसी वज़ह से स्टीव ने कॉलेज छोड़ दिया और क्रिएटिव क्लासेस में दाखिला ले लिया, जिनमे से से एक कोर्स सुलेख पर था।

व्यवसाय[संपादित करें]

प्रारंभिक कार्य[संपादित करें]

सन् 1973 मई जॉब्स अटारी मे तकनीशियन के रूप मे कार्य करते थे। वहाँ लोग उसे "मुश्किल है लेकिन मूल्यवान" कहते थे। मध्य १९७४, मे आध्यात्मिक ज्ञान की खोज मे जॉब्स अपने कुछ रीड कॉलेज के मित्रो के साथ कारोली बाबा से मिलने भारत आए। किंतु जब वे कारोली बाबा के आश्रम पहुँचे तो उन्हें पता चले की उनकी मृत्यु सितम्बर १९७३ को हो चुकी थी। उस के बाद उन्होने हैड़खन बाबाजी से मिलने का निर्णय किया। जिसके कारण भारत मे उन्होने काफ़ी समय दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश मे बिताया।

सात महीने भारत मे रहने के बाद वे वापस अमेरिका चले गऐ। उन्होने अपनी उपस्थिति बदल डाली, उन्होने अपना सिर मुंडा दिया और पारंपरिक भारतीय वस्त्र पहनने शुरू कर दिए, साथ ही वे जैन, बौद्ध धर्मों के गंभीर व्यवसायी भी बन गया

सन् 1976 मे जॉब्स और वोज़नियाक ने अपने स्वयं के व्यवसाय का गठन किया, जिसका नाम उन्होने "एप्पल कंप्यूटर कंपनी" रखा। पहले तो वे सर्किट बोर्ड बेचा करते थे।

एप्पल कंप्यूटर[संपादित करें]

एप्पल लोगो
27 अगस्त 1999 से उपयोग किया जा रहा लोगो।

सन् 1976 में, स्टीव वोज़नियाक ने मेकिनटोश एप्पल 1 कंप्यूटर का आविष्कार किया। जब वोज़नियाक ने यह जॉब को दिखाया तो जॉब ने इसे बेचने का सुझाव दिया, इसे बेचने के लिये वे और वोज़नियाक गैरेज में एप्पल कंप्यूटर का निर्माण करने लगे। इस कार्य को पूरा करने के लिये उन्होने अर्द्ध सेवानिवृत्त इंटेल उत्पाद विपणन प्रबंधक और इंजीनियर माइक मारककुल्ला से धन प्राप्त किया।[3]

सन् 1978 में, नेशनल सेमीकंडक्टर से माइक स्कॉट को एप्पल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में भर्ती किया गया था। सन् 1983 मे जॉब्स ने लालची जॉन स्कली को पेप्सी कोला को छोड़ कर एप्पल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में काम करने के लिए पूछा, " क्या आप आपनी बाकी ज़िंदगी शुगर पानी बेचने मे खर्च करना चाहते हैं, या आप दुनिया को बदलने का एक मौका चाहते हैं?"

अप्रैल 10 1985 और 11, बोर्ड की बैठक के दौरान, एप्पल के बोर्ड के निदेशकों ने स्कली के कहने पर जॉब्स को अध्यक्ष पद को छोड़कर उसकी सभी भूमिकाओं से हटाने का अधिकार दे दिया।

परंतु जॉन ने यह फ़ैसला कुछ देर के लिया रोक दिया। मई 24, 1985 के दिन मामले को हल करने के लिए एक बोर्ड की बैठक हुई, इस बैठक मे जॉब्स को मेकिनटोश प्रभाग के प्रमुख के रूप में और उसके प्रबंधकीय कर्तव्यों से हटा दिया गया।

नेक्स्ट कंप्यूटर[संपादित करें]

नेक्स्ट कंप्यूटर

एप्पल से इस्तीफ़ा देने के बाद, स्टीव ने १९८५ मे नेक्स्ट इंक की स्थापना की। नेक्स्ट कार्य केंद्र अपनी तकनीकी ताकत के लिए जाना जाता था, उनके उद्देश्य उन्मुख सॉफ्टवेयर विकास प्रणाली बनाना था। टिम बर्नर्स ली ने एक नेक्स्ट कंप्यूटर पर वर्ल्ड वाइड वेब का आविष्कार किया था। एक साल के अंदर पूँजी की कमी के कारण उन्होने रॉस पेरोट के साथ साझेदारी बनाई और पेरोट ने नेक्स्ट मे अपनी पूँजी का निवेश किया। सन् १९९० मे नेक्स्ट ने अपना पहला कम्प्यूटर बाजार मे उतारा जिस की कीमत ९९९९ डालर थी। पर इस कम्प्यूटर को महंगा होने के कारण बाज़ार मे स्वीकार नही किया गया। फिर उसी साल नेक्स्ट ने नया उन्नत 'इन्टर पर्सनल' कम्प्यूटर बनाया।[4]

एप्पल मे वापसी[संपादित करें]

सन् १९९६ मे एप्पल की बाजार में हालत बिगड़ गई तब स्टीव, नेक्स्ट कम्प्यूटर को एप्पल को बेचने के बाद वे एप्पल के चीफ एक्जिक्यूटिव आफिसर बन गये। सन् १९९७ से उन्होंने कंपनी में बतौर सी°ई°ओ° काम किया 1998 मे आइमैक[5] बाजार में आया जो बड़ा ही आकर्षक तथा अल्प पारदर्शी खोल वाला पी°सी° था, उनके नेतृत्व मे एप्पल ने बडी सफल्ता प्राप्त की। सन् २००१ मे एप्पल ने आई पॉड का निर्माण किया। फिर सन् २००१ मे आई ट्यून्ज़ स्टोर क निर्माण किया गया। सन् २००७ मे एप्पल ने आई फोन नामक मोबाइल फोन बनाये जो बड़े सफल रहे। २०१० मे एप्पल ने आइ पैड नामक टैब्लेट कम्प्यूटर बनाया। सन् २०११ मे उन्होने सी ई ओ के पद से इस्तीफा दे दिया पर वे बोर्ड के अध्यक्ष बने रहे।[6]

निजी जीवन[संपादित करें]

जॉब्स की एक बहन है जिन का नाम मोना सिम्प्सन है। उनके एक पुराने सम्बन्ध से १९७८ मे उनकी पहली बेटी का जन्म हुआ जिसका नाम था लीज़ा ब्रेनन जॉब्स है। सन् १९९१ मे उन्होने लौरेन पावेल से शादी की। इस शादी से उनके तीन बच्चे हुए। एक लड़का और तीन लड़कियाँ। लड़के का नाम रीड है जिसका जन्म सन् १९९१ में हुआ। उनकी बड़ी बेटी का नाम एरिन है जिस का जन्म सन् १९९५ मे हुआ और छोटी बेटी का नाम ईव है जिस्का जन्म सन् १९९८ मे हुआ। वे संगीतकार दि बीटल्स के बहुत बड़े प्रशंसक थे और उन से बड़े प्रेरित हुए।

निधन[संपादित करें]

सन् २००३ मे उन्हे पैनक्रियाटिक कैन्सर की बीमारी हुई। उन्होने इस बीमारी का इलाज ठीक से नही करवाया। जॉब्स की ५ अक्टूबर २०११ को ३ बजे के आसपास पालो अल्टो, कैलिफोर्निया के घर में निधन हो गया। उनका अन्तिम सन्स्कार अक्तूबर २०११ को हुआ। उनके निधन के मौके पर माइक्रोसाफ्ट और् डिज्नी जैसी बडी बडी कम्पनियों ने शोक मनाया। सारे अमेंरीका मे शोक मनाया गया। वे निधन के बाद अपनी पत्नी और तीन बच्चों को पीछे छोड गये।

पुरस्कार[संपादित करें]

सन् १९८२ मे टाइम मैगज़ीन ने उनके द्वारा बनाये गये एप्पल कम्प्यूटर को मशीन ऑफ दि इयर का खिताब दिया। सन् १९८५ मे उन्हे अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा नेशनल मेडल ऑफ टेक्नलोजी प्राप्त हुआ। उसी साल उन्हे अपने योगदान के लिये साम्युएल एस बिएर्ड पुरस्कार मिला। नवम्बर २००७ मे फार्चून मैगज़ीन ने उन्हे उद्योग मे सबसे शक्तिशाली पुरुष का खिताब दिया। उसी साल मे उन्हे 'कैलिफोर्निया हाल ऑफ फेम' का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। अगस्त २००९ में, वे जूनियर उपलब्धि द्वारा एक सर्वेक्षण में किशोरों के बीच सबसे अधिक प्रशंसा प्राप्त उद्यमी के रूप में चयनित किये गये। पहले इंक पत्रिका द्वारा २० साल पहले १९८९ में 'दशक के उद्यमी' नामित किये गये। ५ नवम्बर २००९, जाब्स् फॉर्च्यून पत्रिका द्वारा दशक के सीईओ नामित किये गये। नवम्बर २०१० में, जाब्स् फोरब्स पत्रिका ने उन्हे अपना 'पर्सन ऑफ दि इयर' चुना। २१ दिसम्बर २०११ को बुडापेस्ट में ग्राफिसाफ्ट कंपनी ने उन्हे आधुनिक युग के महानतम व्यक्तित्वों में से एक चुनकर, स्टीव जॉब्स को दुनिया का पहला कांस्य प्रतिमा भेंट किया। युवा वयस्कों (उम्र १६-२५) को जब जनवरी २०१२ में, समय की सबसे बड़ी प्रर्वतक पहचान चुनने को कहा गया, स्टीव जॉब्स थॉमस एडीसन के पीछे दूसरे स्थान पर थे। १२ फ़रवरी २०१२ को उन्हे मरणोपरांत ग्रैमी न्यासी[7] पुरस्कार, 'प्रदर्शन से असंबंधित' क्षेत्रों में संगीत उद्योग को प्रभावित करने के लिये मिला। मार्च 2012 में, वैश्विक व्यापार पत्रिका फॉर्चून ने उन्हे 'शानदार दूरदर्शी, प्रेरक् बुलाते हुए हमारी पीढ़ी का सर्वोत्कृष्ट उद्यमी का नाम दिया। जॉन कार्टर और ब्रेव नामक दो फिल्मे जाब्स को समर्पित की गयी है।

""स्टे हंग्री स्टे फ़ूलिश""

तीन कहानियाँ- जो बदल सकती हैं आपकी ज़िन्दगी! पढ़िए आइपॉड और iPhone बनाने वाली कंपनी एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स के जीवन की तीन कहानियां जो बदल सकती हैं आपकी भी ज़िन्दगी। स्टीव जॉब्स जब कभी दुनिया के सबसे प्रभावशाली उद्यमियों का नाम लिया जाता है तो उसमे कोई और नाम हो न हो, एक नाम ज़रूर आता है। और वो नाम है स्टीव जॉब्स (स्टीव जॉब्स) का। एप्पल कंपनी के सह-संस्थापक इस अमेरिकी को दुनिया सिर्फ एक सफल उद्यमी, आविष्कारक और व्यापारी के रूप में ही नहीं जानती है बल्कि उन्हें दुनिया के अग्रणी प्रेरक और वक्ताओं में भी गिना जाता है। और आज आपके साथ बेहतरीन लेख का आपसे साझा करने की अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करते हुए हम पर आपके साथ स्टीव जॉब्स के अब तक की सबसे अच्छे भाषण को में से एक "रहो भूखे रहो मूर्ख" को हिंदी में साझा कर रहे हैं। यह भाषण उन्होंने स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह (दीक्षांत समारोह) 12 में जून 2005 को दी थी।। तो चलिए पढते हैं - कभी स्टीव जॉब्स द्वारा सबसे अच्छा भाषण, हिंदी में : स्टैनफोर्ड में स्टीव जॉब्स दीक्षांत भाषण "स्टे हंग्री स्टे फ़ूलिश" "धन्यवाद ! आज दुनिया की सबसे बहेतरीन विश्वविद्यालयों में से एक के दीक्षांत समारोह में शामिल होने पर मैं खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। आपको एक सच बता दूं मैं; मैं कभी किसी कॉलेज से पास नहीं हुआ; और आज पहली बार मैं किसी कॉलेज के स्नातक समारोह के इतना करीब पहुंचा हूँ। आज मैं आपको अपने जीवन की तीन कहानियां सुनाना चाहूँगा ... ज्यादा कुछ नहीं बस तीन कहानियां।

मेरी पहली कहानी बिन्दुओं को जोड़ने के बारे में है।

रीड कॉलेज में दाखिला लेने के 6 महीने के अंदर ही मैंने पढाई छोड़ दी, पर मैं उसके 18 महीने बाद तक वहाँ किसी तरह आता-जाता रहा। तो सवाल उठता है कि मैंने कॉलेज क्यों छोड़ा? असल में, इसकी शुरुआत मेरे जन्म से पहले की है। मेरी जैविक माँ * एक युवा, अविवाहित स्नातकछात्रा थी, और वह मुझे किसी और को गोद लेने के लिए देना चाहती थी। पर उनकी एक ख्वाईश थी कि कोई कॉलेज का स्नातक ही मुझे अपनाये करे। सबकुछ बिलकुल था और मैं एक वकील और उसकी पत्नी द्वारा अपनाया जाने वाला था कि अचानक उस दंपति ने अपना विचार बदल दिया और तय किया कि उन्हें एक लड़की चाहिए। इसलिए तब आधी-रात को मेरेहोने वाले माता पिता,( जो तब प्रतीक्षा सूची में थे)फोन करके से पूछा गया , "हमारे पास एक लड़का है, क्या आप उसे गोद लेना चाहेंगे?" और उन्होंने झट से हाँ कर दी। बाद में मेरी मां को पता चला कि मेरी माँ कॉलेज से पास नहीं हैं और पिता तो हाई स्कूल पास भी नहीं हैं। इसलिए उन्होंने गोद लेने के कागजात पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया; पर कुछ महीनो बाद मेरे होने वाले माता-पिता के मुझे कॉलेज भेजने के आश्वासन देने के के बाद वो मान गयीं। तो मेरी जिंदगी कि शुरुआत कुछ इस तरह हुई और सत्रह साल बाद मैं कॉलेज गया ... .पर गलती से मैंने स्टैनफोर्ड जितना ही महंगा कॉलेज चुन लिया। मेरे नौकरी पेशा माता-पिता की सारी जमा-पूँजी मेरी पढाई में जाने लगी। 6 महीने बाद मुझे इस पढाई में कोई मूल्य नहीं दिखा। मुझे कुछ समझ नहींपारहा था कि मैं अपनी जिंदगी में क्या करना चाहता हूँ, और कॉलेज मुझे किस तरह से इसमें मदद करेगा..और ऊपर से मैं अपनी माता-पिता की जीवन भर कि कमाई खर्च करता जा रहा था। इसलिए मैंने कॉलेज ड्रॉप आउट करने का निर्णय लिए ... और सोचा जो होगा अच्छा होगा। उस समय तो यह सब-कुछ मेरे लिए काफी डरावना था पर जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो मुझे लगता है ये मेरी जिंदगी का सबसे अच्छा निर्णय था। जैसे ही मैंने कॉलेज छोड़ा मेरे ऊपर से ज़रूरी कक्षाओं करने की बाध्यता खत्म हो गयी। और मैं चुप-चाप सिर्फ अपने हित की कक्षाएं करने लगा। ये सब कुछ इतना आसान नहीं था। मेरे पास रहने के लिए कोई कमरे में नहीं था, इसलिए मुझे दोस्तों के कमरे में फर्श पे सोना पड़ता था। मैं कोक की बोतल को लौटाने से मिलने वाले पैसों से खाना खाता था।.. .मैं हर रविवार 7 मील पैदल चल कर हरे कृष्ण मंदिर जाता था, ताकि कम से कम हफ्ते में एक दिन पेट भर कर खाना खा सकूं। यह मुझे काफी अच्छा लगता था। मैंने अपनी जिंदगी में जो भी अपनी जिज्ञासा और अंतर्ज्ञान की वजह से किया वह बाद में मेरे लिए अमूल्य साबित हुआ। यहां मैं एक उदाहरण देना चाहूँगा। उस समय रीड कॉलेज शायद दुनिया की सबसे अच्छी जगह थी जहाँ ख़ुशख़त (Calligraphy-सुलेखन ) * सिखाया जाता था। पूरे परिसर में हर एक पोस्टर, हर एक लेबल बड़ी खूबसूरती से हांथों से सुलिखित होता था। चूँकि मैं कॉलेज से ड्रॉप आउट कर चुका था इसलिए मुझे सामान्य कक्षाओं करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। मैंने तय किया की मैं सुलेख की कक्षाएं करूँगा और इसे अच्छी तरह से सीखूंगा। मैंने सेरिफ(लेखन कला -पत्थर पर लिकने से बनाने वाली आकृतियाँ ) और बिना सेरिफ़ प्रकार-चेहरे(आकृतियाँ ) के बारे में सीखा; अलग-अलग अक्षर -संयोजन के बीच मेंस्थान बनाना और स्थान को घटाने -बढ़ाने से टाइप की गयी आकृतियों को खूबसूरत कैसे बनाया जा सकता है यह भी सीखा। यह खूबसूरत था, इतना कलात्मक था कि इसे विज्ञान द्वारा कब्जा नहीं किया जा सकता था, और ये मुझे बेहद अच्छा लगता था। उस समय ज़रा सी भी उम्मीद नहीं थी कि मैं इन चीजों का उपयोग करें कभी अपनी जिंदगी में करूँगा। लेकिन जब दस साल बाद हम पहला Macintosh कंप्यूटर बना रहे थे तब मैंने इसे मैक में डिजाइन कर दिया। और मैक खूबसूरत टाइपोग्राफी युक्त दुनिया का पहला कंप्यूटर बन गया। अगर मैंने कॉलेज से ड्रॉप आउट नहीं किया होता तो मैं कभी मैक बहु-टाइपफेस आनुपातिक रूप से स्थान दिया गया फोंट नहीं होते, तो शायद किसी भी निजी कंप्यूटर में ये चीजें नहीं होतीं(और चूँकि विंडोज ने मैक की नक़ल की थी)। अगर मैंने कभी ड्रॉप आउट ही नहीं किया होता तो मैं कभी सुलेख की वो कक्षाएं नहीं कर पाता और फिर शायद पर्सनल कंप्यूटर में जो फोंट होते हैं, वो होते ही नहीं। बेशक, जब मैं कॉलेज में था तब भविष्य में देख कर इन बिन्दुओं कोजोड़ कर देखना (डॉट्स को कनेक्ट करना )असंभव था; लेकिन दस साल बाद जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो सब कुछ बिलकुल साफ़ नज़र आता है। आप कभी भी भविष्य में झांक कर इन बिन्दुओं कोजोड़ नहीं सकते हैं। आप सिर्फ अतीत देखकर ही इन बिन्दुओं को जोड़ सकते हैं; इसलिए आपको यकीन करना होगा की अभी जो हो रहा है वह आगे चल कर किसी न किसी तरह आपके भविष्य से जुड़ जायेगा। आपको किसी न किसी चीज में विश्ववास करना ही होगा -अपने हिम्मत में, अपनी नियति में, अपनी जिंदगी या फिर अपने कर्म में ... किसी न किसी चीज मैं विश्वास करना ही होगा ... क्योंकि इस बात में विश्वास करते करना की आगे चल कर बिन्दुओं कोजोड़ सकेंगे जो आपको अपने दिल की आवाज़ सुनने की हिम्मत देगा ... तब भी जब आप बिलकुल अलग रास्ते पर चल रहे होंगे ... और कहा कि फर्क पड़ेगा।

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]