सोमवार व्रत कथा

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सोमवार व्रत कथा
चित्र:Chandra img.jpg
सोमवार व्रत कथा व्रत
आधिकारिक नाम सोमवार व्रत कथा व्रत
अनुयायी हिन्दू, भारतीय, भारतीय प्रवासी
प्रकार Hindu
उद्देश्य सर्वकामना पूर्ति
समान पर्व सप्ताह के अन्य दिवस

यह उपवास सप्ताह के प्रथम दिवस सोमवार को रखा जाता है। यह व्रत सोम यानि चंद्र या शिवजी के लिये रखा जाता है।

विधि[संपादित करें]

  • सोलह सोमवार के दिन भक्तिपूर्वक व्रत करें।
  • अधा सेर गेहूं का आटा के तीन अंगा बनाकर घी, गुड़, दीप, नैवेद्य, पूंगीफ़ल, बेलपत्र, जनेउ का जोड़ा, चंदन, अक्षत, पुष्प, आदि से प्रदोष काल में शंकर जी का पूजन करें।
  • एक अंगा शिवजी को अर्पण करें।
  • दो अंगाओं को प्रसाद स्वरूप बांटें और स्वयं भी ग्रहण करें।
  • सत्रहवें सोमवार के दिन पाव भर गेहूं के आटे की बाटी बनाकर. घी और गुड़ बनाकर चूरमा बनायें, भोग लगाकर उपस्थित लोगों में प्रसाद बांटें.

कथा[संपादित करें]

एक समय श्री भूतनाथ महादेव जी मृत्युलोक में विहार की इच्छा करके माता पार्वती के साथ पधारे। विदर्भ देश की अमरावती नगरी जो कि सभी सुखों से परिपूर्ण थी वहां पधारे. वहां के राजा द्वारा एक अत्यंत सुन्दर शिव मंदिर था, जहां वे रहने लगे। एक बार पार्वती जी ने चौसर खलने की इच्छा की। तभी मंदिर में पुजारी के प्रवेश करन्बे पर माताजी ने पूछा कि इस बाज़ी में किसकी जीत होगी? तो ब्राह्मण ने कहा कि महादेव जी की। लेकिन पार्वती जी जीत गयीं। तब ब्राह्मण को उन्होंने झूठ बोलने के अपराध में कोढ़ी होने का श्राप दिया। कई दिनों के पश्चात देवलोक की अपसराएं, उस मंदिर में पधारीं और उसे देखकर कारण पूछा. पुजारी ने निःसंकोच सब बताया। तब अप्सराओं ने ढाढस बंधाया और सोलह सोमवार के व्रत्र रखने को बताया। विधि पूछने पर उन्होंने विधि भी उपरोक्तानुसार बतायी. इससे शिवजी की कृपा से सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। फ़िर अप्सराएं स्वर्ग को चलीं गयीं। ब्राह्मण ने सोमवारों का व्रत कर के रोगमुक्त होकर जीवन व्यतीत किया। कुछ दिन उपरांत शिव पार्वती जी के पधारने पर, पार्वती जी ने उसके रोगमुक्त होने का करण पूछा. तब ब्राह्मण ने सारी कथा बतायी. तब पार्वती जी ने भी यही व्रत किया और उनकी मनोकामना पूर्ण हुई। उनके रूठे पुत्र कार्तिकेय जी माता के आज्ञाकारी हुए. परन्तु कार्तिकेय जी ने अपने विचार परिवर्तन का कारण पूछा. तब पार्वती जी ने वही कथा उन्हें भी बतायी. तब स्वामी कार्तिकेय जी ने भी यही व्रत किया। उनकी भी इच्छा पूर्ण हुई। उनसे उनके मित्र ब्राह्मण ने पूछ कर यही व्रत किया। फ़िर वह ब्राह्मण विदेश गया और एक राज के यहां स्वयंवर में गया। वहां राजा ने प्रण किया था, कि एक हथिनी एक माला, जिस के गले में डालेगी, वह अपनी पुत्री उसी से विवाह करेगा। वहां शिव कृपा से हथिनी ने माला उस ब्राह्मण के गले में डाल दी। राजा ने उससे अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। उस कन्या के पूछने पर ब्राह्मण ने उसे कथा बतायी. तब उस कन्या ने भी वही व्रत कर एक सुंदर पुत्र पाया। बाद में उस पुत्र ने भी यही व्रत किया और एक वृद्ध राजा का राज्य पाया। जब वह नया राजा सोमवार की पूजा करने गया, तो उसकी पत्नी अश्रद्धा होने से नहीं गयी। पूजा पूर्ण होने पर आकाश वाणी हुई, कि राजन इस कन्या को छोड़ दे, अन्यथा तेरा सर्वनाश हो जाये गा.अंत में उसने रानी को राज्य से निकाल दिया। वह रानी भूखी प्यासी रोती हुई दूसरे नगर में पहुंची. वहां एक बुढ़िया उसे मिली, जिसके साथ वह


उसे एक बुढी औरत मिली जो धागे बनाती थी। उसी के साथ काम करने लगी पर दुसरे दिन जब वो धागा बेचने निकली तो अचानक तेज हवा चली और सारे धागे उड गए तो मालकिन ने गुस्से में आकर उसे कामसे निकाल दिया। फिर रोते फिरते वह एक तेली के घर पहुँची तेली ने उसे रख लिया पर भन्डार घर मे जाते हि तेल के बर्तन गिरगए और तेल बह गया तो उस तेली ने उसे घर से निकाल दिया। इस प्रकार सभी जगह से निकाले जाने के बाद वह एक सुन्दर वन मे पहुँची वहाँ के तलाब से पानी पीने के लिए जब बढी तो तालाब सुख गया थोडा पानी बचा जो कि कीटो से युक्त था। उसी पानी को पीकर वो एक वृक्ष के नीचे बैठ गई पर तुरंत उस वृक्ष के पत्ते झड़ गए। इस तरह वो जिस वृक्ष के नीचे से गुज़रती वह वृक्ष पत्तो से विहीन हो जाता ऐसे ही सारा वन ही सुखने को आया। यह देखकर कुछ चरवाह उस रानी को लेकर एक शिव मंदिर के पुजारी के पास ले गए। वहाँ रानीने पुजारी के आग्रह से सारी बात बतायी और सुन कर पुजारी ने कहा की तुम्हे शिव का श्राप लगा है। रानी ने विनती करके पुछा तो पुजारीने इसके निदान का उपाय बताया और सोमवार व्रत की बिधि बताई। रानी ने तन मन से व्रत पूरा किया और शिव की क्रिपा से सत्रहवे सोमवार को राजा का मन परिवर्तन हुआ। राजा ने रानी को ढुढने दूत भेजे। पता लगने के बाद राजा ने बुलावा भेजा पर पुजारी ने कहा राजा को स्वयं भेजो। इसपर राजा ने विचार किया और स्वयं पहुचे। रानी को लेकर दरवार पहुचे और उनका स्थान दिया। सम्पूर्ण शहर मे खुशियां मनायी गई राजा ने गरीबो को काफि दान दक्षिणा किया और शिव के परमभक्त होकर नियमपूर्वक 16 सोमवार का व्रत करने लगे और संसार के सारे सुख को भोगकर अंतमे शिवधाम गए। इस प्रकार जो भी मन लगाकर श्रद्धा पूर्वक नियमसे 16 सोमवार का ब्रत करेगा वह इस लोकमे परम सुख को प्राप्त कर अंत मे परलोक मे मुक्ति को प्राप्त होगा ।

सन्दर्भ[संपादित करें]