सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी

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सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी या गाज़ी मियाँ (1014 - 1034) अर्ध-पौराणिक ग़ज़नवी सेना का मुखिया था जिसे सुल्तान महमूद का भाँजा कहा जाता है। माना जाता है कि वह 11वीं शताब्दी की शुरुआत में भारत के विजय में अपने मामा के साथ आया था, हालांकि ग़ज़नवी इतिवृत्त में उसका उल्लेख नहीं है।[1]

12वीं शताब्दी तक, सालार मसूद एक संत के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे और भारत के उत्तर प्रदेश, बहराइच में उनकी दरगाह तीर्थयात्रा का स्थान बन गई थी।[2] हालांकि, ग़ज़नवी के साथ उनका संबंध केवल बाद के स्रोतों में दिखाई देता है। उनकी जीवनी का मुख्य स्रोत 17वीं शताब्दी की ऐतिहासिक कल्पित कथा मिरात-ए-मसूदी है।

किंवदंती[संपादित करें]

सन् 1011 में अजमेर के मुस्लिम जिनके अधिकारों का स्थानीय हिंदू शासकों द्वारा उल्लंघन किया जा रहा था, गज़नी के सुल्तान महमूद से मदद की माँग की। महमूद के सेनापति सालार साहू ने अजमेर और आस-पास के क्षेत्रों के हिंदू शासकों को हराया। एक इनाम के रूप में महमूद ने अपनी बहन का सालार साहू से विवाह किया। मसूद इसी विवाह का बालक था। मसूद का जन्म अजमेर में 10 फरवरी सन् 1014 में हुआ था।

फौजी और धार्मिक उत्साह से प्रेरित, मसूद ने ग़ज़नवी सम्राट से भारत आने और इस्लाम फैलाने की अनुमति माँगी। 16 साल की उम्र में, उसने सिंधु नदी पार करते हुए भारत पर हमला किया। उसने मुल्तान पर विजय प्राप्त की और अपने अभियान के 18वें महीने में, वह दिल्ली के पास पहुँचा। गज़नी से बल वृद्धि के बाद उसने दिल्ली पर विजय प्राप्त की और 6 महीने तक वहाँ रहा। उसके बाद उसने कुछ प्रतिरोध के बाद मेरठ पर विजय प्राप्त की। इसके बाद वह कन्नौज चला गया।

मसूद ने सतरिख में अपना मुख्यालय स्थापित किया और बहराइच, हरदोई और बनारस का कब्जा करने के लिए अलग-अलग बलों को भेज दिया। बहराइच के राजा समेत स्थानीय शासकों ने उसकी सेना के खिलाफ गठबंधन बनाया। उसके पिता सालार साहू तब बहराइच पहुंचे और दुश्मनों को हराया। उसके पिता सालार साहू का 4 अक्तूबर 1032 को सतरिख में निधन हो गया। मसूद ने अपने अभियानों को जारी रखा।

बहराइच के हिंदू प्रमुख पूरी तरह से अधीन नहीं हुए थे, इसलिए मसूद स्वयं सन् 1033 में बहराइच पहुँचा।

सुहेलदेव नामक शासक के आगमन तक, बहराइच में अपने हिंदू दुश्मनों को मसूद हराता चला गया। वह 15 जून 1034 को सुहेलदेव के खिलाफ लड़ाई में पराजित और घातक रूप से घायल हो गया।[3] मरने के दौरान, उसने अपने अनुयायियों से पवित्र जलाशय के तट पर उसे दफनाने के लिए कहा। क्योंकि वह युद्ध में मारा गया था, उसे गाज़ी (धार्मिक योद्धा) के रूप में जाना जाने लगा।

वर्तमान[संपादित करें]

2000 के दशक तक, मसूद के दरगाह में आयोजित वार्षिक मेले के अधिकांश आगंतुक हिंदू थे। सालार मसूद की महिमा करने वाली स्थानीय किंवदंतियों के मुताबिक, उसका हत्यारा सुहेलदेव एक क्रूर राजा थे जिसने अपनी प्रजा का दमन किया। हालांकि, हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों ने सुहेलदेव को एक हिंदू व्यक्ति के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया है जो मुस्लिम आक्रमणकारियों के खिलाफ लड़ा था। इन कथाओं में, मसूद को एक क्रूर शासक के रूप में चित्रित किया गया है जिसने हिंदू महिलाओं का नाश किया।[4]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "How Amit Shah and the BJP have twisted the story of Salar Masud and Raja Suheldev". Scroll.in. 17 जुलाई 2017. अभिगमन तिथि 2 जुलाई 2018.
  2. "VHP की 'दरगाह की जगह मंदिर' की योजना को योगी का समर्थन". नवभारत टाइम्स. 15 मई 2017. अभिगमन तिथि 2 जुलाई 2018.
  3. "निनाद : अतीत का तिलिस्म और गाजी मियां". जनसत्ता. 18 नव्मबर 2015. अभिगमन तिथि 2 जुलाई 2018. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  4. रशीद, ओमर (13 अक्टूबर 2016). "The BJP's fascination with a Dalit icon". द हिन्दू (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 2 जुलाई 2018.