सैयद अली शाह गिलानी

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सैय्यद अली शाह गिलानी
سید علی شاہ گیلانی
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जन्म 29 सितम्बर 1929 (1929-09-29) (आयु 89)
दुरु, सोपोर, बारामूला, कश्मीर, भारत
राष्ट्रीयता भारतीय
राजनैतिक पार्टी तहरीक-ए-हुर्रियत , हुर्रियत काँफ़्रेंस

वेबसाइट
http://www.huriyatconference.com

http://www.syedaligeelani.info

सैय्यद अली शाह गिलानी भारत के एक पाकिस्तानपरस्त इस्लामिक अलगाववादी व्यक्तित्व है जिनका कश्मीरी आतंकवादिता को बढावा देने में खुला हाथ है। वे कश्मीर के पाकिस्तान में विलय करने के समर्थक हैं। गीलानी भारत के जम्मू कश्मीर छेत्र के प्रमुख अलगावादी नेता हैं। वह पहले जमात ए इस्लामी कश्मीर के एक सदस्य थे, लेकिन बाद में इन्होने तहरीक ए हुर्रियत के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। इस समय यह हुर्रियत कांफ्रेंस के सभी दलों के अध्य्क्श हैं जो जम्मू और कश्मीर में अलगाववादी दलों का एक समूह है। यह जम्मू एवं कश्मीर के सोपोर क्षेत्र के एक पूर्व विधायक भी हैं। यह कश्मीर में लोक्प्रिय हैं और वहाँ की जनता उन्हे 'बाब" केहलाती है। गीलानी का ताल्लुक़ बारामूला ज़िले के क़स्बे सोपोर से है।

पाकिस्तानपरस्त अलगाववादी होने के साथ साथ वो इलम और अदब से शग़फ़ रखने वाली शख़्सियत भी हैं और अल्लामा इक़बाल के बहुत बड़े मद्दाह हैं। वो अपने दौर असीरी की याददाश्तें एक किताब की सूरत में तहरीर करचुके हैं जिस का नाम "रूदाद क़फ़स" है। सय्यद अलीशाह गिलानी ऐसी शख्स हैं जो पासपोर्ट भारत का ही लेते है, और लिख कर देते है कि मैं भारतीय नागरिक हूँ। पाकिस्तान परस्ती की वजह से उन्होंने अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा कश्मीरी जेल में और अपने आलीशान घर में नजरबंदी में रह कर भी गुज़ारा है।

अलगाववादी नेता सैय्यद अलीशाह गिलानी को भारतीय नागरिक बने रहने तथा भारत के प्रति ही वफादार बने रहने की शपथ और लिखित / घोषित शपथपत्रों तथा पाकिस्तानी राजदूतावास के ईद मिलन व अन्य कार्यक्रमों का भारत व कश्मीर के विस्तृत हित को देखते हुऐ बहिष्कार करने के पुरस्कार स्वरूप हालिया भारत सरकार ने 21 जुलाई 2015 को 9 माह तक का वैध भारतीय पासपोर्ट जारी कर दिया है

प्रारंभिक जीवन

सैयद अली शा गीलानी का जन्म २९ सितंबर १९२९ में जम्मू कश्मीर के सोपोर जनपद के दुरु गांव में हुआ था। इन्होने अपनी प्राथमिक शिक्षा सोपोर में प्राप्त की। उच्च शिक्षा के लिये यह लाहोर गये जहां इन्होने कुरान और् धर्मशास्त्र सीखा। कश्मीर लौट कर यह अध्यापक बन गये और इसि दौरान यह सोपोर में जमात ए इस्लामी के प्रमुख कार्यकर्ता भी बन गये।

राजनीतिक सक्रियता

गीलानी ने अपना राजनीतिक जीवन १९५० में शुरु किया और अब तक उन्होने जेल में एक दशक से भी अधिक काल व्यतीत किया है। उन्होने कहा है कि भारतीय अधिकारी अक्सर अक्सर उन्हे चुनाव से पहले गिरफ्तार करते हैं। नवम्बर २०११ में, गीलनी जी ने सामाजिक नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक पर कथित' आपत्तिजनक इस्लाम विरोधी 'सामग्री के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का आह्वान किया। इस कारण् कश्मीर घाटी के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुप्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच मामूली झड़पें हुइ।

आलोचना

जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर में आतंकवाद और रक्तपात में वृद्धि के लिए गीलनी को दोषी ठहराया है और उन्के पिता और केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला ने गीलानी से आग्रह किया है कि वह ऐसा मार्ग अपनाए जो कश्मीर के लोगों को विनाश से बचाए। उनपे आरोप लगाया गया है कि वह पूर्व 1990 जम्मू एवं कश्मीर विधान सभा में अपनी सदस्यता के लिए अभी भी सरकार की ओर से पेंशन प्राप्त करते हैं। अक्टूबर 2010 में आयोजित नई दिल्ली में एक संगोष्ठी में दिए गये अपने भाशण के लिए इन्कि आलोचना भी हुइ।

बीमारी

गीलानी को गुर्दे के कैंसर से निदान किया गया है और इलाज के लिए डॉक्टरों द्वारा सिफारिश की गई है कि वह विदेश जाए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हस्तक्षेप के बाद, भारतीय सरकारी एजेंसियों ने गीलानी का पासपोर्ट पतन कर दिया। उनका यह कहना था कि १९८१ में "भारत विरोधी गतिविधियों" के कारण पहले भी उनका पासपोर्ट जब्त किया जा चुका है और इस कारण उन्हें भारत छोड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। उन्हें केवल २००६ में हज तीर्थयात्रा के लिए भारत छोड्ने की अनुमती दी गई थी। चार साल पहले एक संक्रमण के कारण डॉक्टरों को उनका बायां गुर्दा निकालना पडा। अपोलो अस्पताल, मुम्बई के डॉक्टरों ने यह सुझाव दिया कि उन्को इलाज के लिए अमेरिका भेजा जाए लेकिन ऐसा हो न पाया क्युन्कि उन्को अमेरिका से विसा नहीं मिला। इसका कारण यह था कि गीलानी ने पहले इराक युद्ध में अमेरिकी नीति की आलोचना की थी।

सन्दर्भ

बाहरी कड़ियाँ

  • ibnlive.in.com/newstopics/syed-ali-shah-geelani.html‎