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सेलखड़ी

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सेलखड़ी (Soapstone)
सेलखड़ी के रंग-बिरंगे नमूनों का समूह
प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले सेलखड़ी (सोपस्टोन) के विभिन्न रंगीन खनिज नमूने।
बनावट
मैग्नीशियम-समृद्ध टॉक खनिज

सेलखड़ी (जिसे वैज्ञानिक जगत में स्टीटाइट या सोपरॉक भी कहा जाता है) एक अत्यंत महत्वपूर्ण टॉक-शिष्ट है, जो एक प्रकार की रूपांतरित चट्टान के अंतर्गत आती है। यह मुख्य रूप से मैग्नीशियम से भरपूर टॉक खनिज से निर्मित होती है। इसका निर्माण पृथ्वी की परतों के नीचे अधोगमन क्षेत्रों (सबडक्शन जोन) में गतिक-तापीय रूपांतरण और रासायनिक प्रतिस्थापन (मेटासोमैटिज़्म) की जटिल भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा होता है। इस प्रक्रिया में अत्यधिक भूगर्भिक दबाव, उच्च तापमान और जलीय तरल पदार्थों के प्रवाह के कारण मूल चट्टानें बिना पिघले रासायनिक रूप से पूरी तरह बदल जाती हैं। अपनी अत्यधिक कोमलता, चिकने स्पर्श और अद्वितीय तापीय गुणों के कारण यह पत्थर पिछले हजारों वर्षों से मानव सभ्यता में नक्काशी, मूर्तिशिल्प, आभूषणों और बर्तनों के निर्माण का एक प्रमुख माध्यम रहा है।

शब्दावली और औद्योगिक वर्गीकरण

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अध्ययन और कलीसियाई अनुप्रयोग के क्षेत्रों के अनुसार सेलखड़ी और स्टीटाइट शब्दों की परिभाषाओं में सूक्ष्म अंतर पाया जाता है:

  • भूवैज्ञानिक परिभाषा: भूविज्ञान के अंतर्गत 'स्टीटाइट' शब्द का प्रयोग विशेष रूप से ऐसी चट्टान के लिए किया जाता है जो लगभग पूरी तरह से शुद्ध टॉक खनिज से निर्मित होती है।
  • खनन उद्योग की परिभाषा: खनन उद्योग में स्टीटाइट को उच्च शुद्धता वाले टॉक पत्थर के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो विद्युत रोधी घटकों के निर्माण के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। इससे कम गुणवत्ता वाले खनिजों को सामान्य रूप से केवल 'टॉक रॉक' (टॉक पत्थर) कहा जाता है। इसका उपयोग बड़े ढेरों (ब्लॉक) और पिसे हुए पाउडर दोनों रूपों में किया जा सकता है।
  • औद्योगिक आयाम पत्थर: निर्माण उद्योगों में 'सोपस्टोन' शब्द का प्रयोग ऐसे कटे हुए बड़े पत्थरों (स्लैब) के लिए किया जाता है जिनमें टॉक के साथ-साथ एम्फीबोल, क्लोराइट और कार्बोनेट खनिजों का मिश्रण होता है। यदि पिसे हुए स्टीटाइट को कृत्रिम रूप से दबाकर बड़े ब्लॉकों में बदला जाता है, तो उद्योग जगत में इसे 'सिंथेटिक ब्लॉक स्टीटाइट' या 'कृत्रिम ... लावा टॉक' के नाम से जाना जाता है।[1]

शैलविज्ञान और रासायनिक संघटन

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शैलविज्ञान (पेट्रोलॉजी) के दृष्टिकोण से सेलखड़ी का मुख्य घटक टॉक खनिज है, लेकिन इसमें क्षेत्रीय भूविज्ञान के आधार पर क्लोराइट समूह और एम्फीबोल समूह (मुख्य रूप से ट्रेमोलाइट, एंथोफिलाइट और कमिंग्टोनाइट) के खनिज अलग-अलग मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अलावा इसमें सूक्ष्म मात्रा में क्रोमियम और लोहे के ऑक्साइड भी मौजूद होते हैं। यह पत्थर बनावट में शिस्ट-युक्त (परतदार) या पूरी तरह से सघन हो सकता है। इसका निर्माण मुख्य रूप से अल्ट्रामैफिक मूल चट्टानों (जैसे ड्युनाइट या सर्पेन्टीनाइट) के रूपांतरण से होता है।

भार के अनुपात के आधार पर पूरी तरह से शुद्ध स्टीटाइट का रासायनिक संगठन निम्नलिखित तालिका के अनुसार होता है:[2]

इसके अतिरिक्त इसमें सूक्ष्म मात्रा में कैल्शियम ऑक्साइड और एल्युमिनियम ऑक्साइड जैसे अन्य घटक भी पाए जाते हैं। पायरोफिलाइट नामक खनिज भी भौतिक गुणों और नक्काशी में उपयोग के मामले में सेलखड़ी के समान ही होता है, इसलिए कई बार उसे भी सामान्य बोलचाल में सोपस्टोन कह दिया जाता है, हालांकि उसका स्पर्श सेलखड़ी की तरह पूरी तरह से साबुन जैसा चिकना नहीं होता।[3]

भौतिक एवं तापीय गुणधर्म

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सेलखड़ी में टॉक खनिज की अत्यधिक प्रचुरता के कारण यह पत्थर अविश्वसनीय रूप से बेहद कोमल होता है। खनिज विज्ञान के मोह्स कठोरता पैमाना पर इसे 1 का प्रामाणिक मान दिया गया है, जो सबसे न्यूनतम कठोरता है। छूने पर यह पूरी तरह से नहाने के साबुन की तरह चिकना अहसास देता है, जिसके कारण ही इसे अंग्रेजी प्रभावों में सोपस्टोन कहा जाता है। इसकी कठोरता इसके भीतर मौजूद टॉक की मात्रा पर निर्भर करती है; वास्तुकला और रसोई की स्लैब में प्रयुक्त होने वाले सोपस्टोन में लगभग 30% टॉक होता है जिसके कारण वे थोड़े कड़े होते हैं, जबकि व्यावसायिक मूर्तियों की नक्काशी के लिए उपयोग किए जाने वाले पत्थरों में 80% तक टॉक की मात्रा होती है जो अत्यधिक कोमल होते हैं।

तापीय दृष्टिकोण से इस पत्थर की विशेषताएं बेजोड़ हैं। इसमें ऊष्मा को सोखने, उसे अपने भीतर संचित रखने और फिर बहुत धीरे-धीरे समान रूप से बाहर प्रसारित करने की अभूतपूर्व क्षमता (उच्च तापीय द्रव्यमान) होती है। इसके अलावा यह अत्यधिक ऊष्मा-प्रतिरोधी होता है और आग के सीधे संपर्क में आने पर भी इसमें दरारें नहीं पड़तीं।[4]

जब इस पत्थर को 1000 से 1200 डिग्री सेल्सियस के अत्यधिक तापमान पर गर्म किया जाता है, तो यह रासायनिक रूप से एनस्टैटाइट और क्रिस्टोबालिट खनिजों में बदल जाता है। इस तापीय रूपांतरण के बाद मोह्स पैमाने पर इसकी कठोरता बढ़कर 5.5 से 6.5 तक पहुँच जाती है, जिसके बाद यह काँच से भी अधिक कठोर हो जाता है। इस कठोर रूप को उद्योग जगत में 'कास्ट लावा' या केवल 'नमक लावा' कहा जाता है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा

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1. एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप

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भारतीय इतिहास और पुरातत्व में सेलखड़ी का स्थान अत्यंत गौरवशाली है। प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा संस्कृति) के दौरान खोजी गई प्रसिद्ध चौकोर मोहरें और ताबीज मुख्य रूप से स्टीटाइट पत्थर से ही बनाए गए थे। प्राचीन शिल्पी इस कोमल पत्थर पर पशुओं की आकृतियों और लिपि के प्रतीकों को उकेरते थे, और फिर उन मोहरों को अत्यधिक टिकाऊ और कड़ा बनाने के लिए कई दिनों तक 1000 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर भट्टी में पकाते थे, जिससे वे सदा के लिए सुरक्षित हो जाती थीं।

बाद के मध्यकालीन भारत में, कर्नाटक के होयसल साम्राज्य, पश्चिमी चालुक्य साम्राज्य और विजयनगर साम्राज्य के दौरान वास्तुकला के बेजोड़ मंदिरों (जैसे बेलूर और हैलेबीडु के मंदिर) के निर्माण में इसी सूक्ष्म-क्रिस्टलीय सेलखड़ी का उपयोग किया गया था। इस पत्थर की असाधारण कोमलता के कारण ही होयसल शिल्पी मंदिरों की दीवारों पर आभूषणों जैसी अत्यंत बारीक, जालीदार और जटिल नक्काशी उकेरने में सफल हो पाए थे। चीन में वसंत और शरद काल (771-476 ईसा पूर्व) के दौरान इससे अनुष्ठानिक छुरियां और शाही मोहरें बनाई जाती थीं। म्यांमार में 11वीं शताब्दी के पगान साम्राज्य से लेकर 19वीं शताब्दी तक इसका उपयोग काले कागजों के पाण्डुलिपियों (परबैक) पर लिखने वाली पेंसिल के रूप में किया जाता था।

2. अफ्रीका

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प्राचीन मिस्र की सभ्यता में विभिन्न प्रकार के सुरक्षात्मक ताबीजों और शाही स्कारब (गोबरैला बीटल के आकार की मोहरों) के निर्माण के लिए कांच जैसी परत चढ़े (ग्लेज़्ड) स्टीटाइट पत्थर का बहुतायत से उपयोग किया जाता था।[5] पश्चिमी नाइजीरिया के योरूबा समुदायों ने इतिहास में बड़े पैमाने पर सेलखड़ी से इंसानी आकृतियों की मूर्तियां बनाईं, जिनमें से सैकड़ों मूर्तियां पुरातात्विक उत्खनन के दौरान 'एसी' (Esie) नामक ऐतिहासिक स्थल से प्राप्त हुई हैं। केन्या के ताबाका क्षेत्र में रहने वाले गुसी (Gusii) जनजातियों के लोग अपनी पुश्तैनी जमीनों से खुली खदानों द्वारा सोपस्टोन निकालकर आज भी पारंपरिक शिल्पकला को जीवित रखे हुए हैं।[6]

3. अमेरिका और आर्कटिक क्षेत्र

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उत्तर अमेरिका के मूल निवासी (रेड इंडियंस) प्रागैतिहासिक काल (8000 से 1000 ईसा पूर्व) से ही भोजन पकाने के बर्तनों और कड़ाही के निर्माण के लिए इस पत्थर की खदानों पर निर्भर थे। मिट्टी के बर्तनों की तुलना में सेलखड़ी के बर्तन अपनी उच्च तापीय संचय क्षमता के कारण भोजन को बहुत लंबे समय तक गर्म रखते थे। इसके अतिरिक्त वे इस पत्थर से धूम्रपान करने वाली पाइप (चिलम) भी बनाते थे, क्योंकि सेलखड़ी के कम ऊष्मा चालकता गुण के कारण गर्म तंबाकू का धुआँ अंदर खींचते समय भी चिलम का बाहरी हिस्सा गर्म होकर हाथों को नहीं जलाता था। ध्रुवीय क्षेत्रों (आर्कटिक) में रहने वाले इनुइट (एस्किमो) और डोरसेट संस्कृति के लोग सदियों से समुद्री जीवों (जैसे सील या व्हेल) की चर्बी का तेल जलाने के लिए सेलखड़ी से बने विशेष पारंपरिक दीयों का उपयोग करते आ रहे हैं, जिन्हें 'कुलिक' कहा जाता है।

4. यूरोप और ऑस्ट्रेलिया

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यूरोप की प्राचीन क्रीट द्वीप की मिनोअन सभ्यता के महलों में इस पत्थर से बने हुए धार्मिक तर्पण पात्र पाए गए हैं। उत्तर यूरोप में वाइकिंग युग के दौरान, नॉर्वे के वाइकिंग योद्धा पहाड़ों से सीधे कुल्हाड़ियों की मदद से सेलखड़ी की चट्टानों को काटकर खाना पकाने के बर्तन और हांडियां बनाते थे, जिनका व्यापार पूरे यूरोप में किया जाता था। नॉर्वे का प्रसिद्ध मध्यकालीन ऐतिहासिक 'निदारोस कैथेड्रल' भी मुख्य रूप से सेलखड़ी के पत्थरों से ही निर्मित है। ऑस्ट्रेलिया के मध्य मरुस्थलीय भागों में रहने वाले आदिवासी कलाकार अर्लीकिलीका ने स्थानीय जीवों की सुंदर आकृतियां उकेरने के लिए इसी माध्यम को चुना था।

आधुनिक औद्योगिक और व्यावहारिक उपयोग

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आधुनिक तकनीकी युग में सेलखड़ी के भौतिक और विद्युत गुणों का उपयोग कई उन्नत उद्योगों में किया जा रहा है:

  • वास्तुकला और गृह सज्जा: सोपस्टोन का उपयोग आधुनिक घरों की रसोई में काउंटरटॉप्स, फर्श की टाइलों, सिंक और वाशबेसिन के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसे 'क्वाइट स्टोन' (शांत पत्थर) भी कहा जाता है क्योंकि बर्तनों को इस पर रखने से आवाज बहुत कम होती है। समय के साथ इस पर एक प्राकृतिक और सुंदर पुरानी चमक (पेटिना) उभर आती है।
  • तापीय हीटर और चूल्हे: लकड़ी जलाने वाले आधुनिक पर्यावरण-अनुकूल रूम हीटरों और चूल्हों के बाहरी आवरण पर सोपस्टोन की मोटी टाइलें लगाई जाती हैं। यह पत्थर आग बुझ जाने के बाद भी कई घंटों तक कमरे को लगातार और समान रूप से गर्म बनाए रखता है।
  • धातु ढलाई के सांचे: कम पिघलने बिंदु वाली धातुओं (जैसे चांदी या प्यूटर) को पिघलाकर आभूषण और खिलौने बनाने के लिए सेलखड़ी को उकेरकर सांचे तैयार किए जाते हैं, क्योंकि यह अत्यधिक गर्मी से खराब नहीं होता और इसकी चिकनी सतह के कारण जमी हुई धातु का खिलौना बिना चिपके आसानी से बाहर निकल आता है।
  • औद्योगिक मार्कर (चाक): भारी उद्योगों में वेल्डिंग करने वाले कारीगर, लोहार और बढ़ई लोहे या लकड़ी पर निशान लगाने के लिए सेलखड़ी की पतली बत्तियों को चाक की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह निशान वेल्डिंग की अत्यधिक तेज आंच (आग) के संपर्क में आने पर भी नहीं मिटता और साफ दिखाई देता है।
  • विद्युत और सिरेमिक रोधन: स्टीटाइट सिरेमिक का उपयोग कम लागत वाले उच्च-गुणवत्ता वाले पोर्सिलेन घटकों के रूप में किया जाता है। इसके उच्च विद्युत रोधी (डाईइलेक्ट्रिक) गुणों के कारण इसका उपयोग हाई-वोल्टेज बिजली के इंसुलेटरों, स्पार्क潜प्लग और बड़े रेडियो ट्रांसमीटर मास्ट में किया जाता है।
  • विस्की स्टोन्स (मदिरा कंकड़): वर्ष 2007 के बाद से सोपस्टोन के छोटे तराशे हुए चौकोर टुकड़ों का उपयोग बर्फ के टुकड़ों के विकल्प के रूप में किया जा रहा है। इन्हें फ्रिजर में ठंडा करके मदिरा या अन्य पेयों में डाला जाता है, जिससे पेय बिना पानी मिले (पतला हुए बिना) पूरी तरह ठंडा हो जाता है।

व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य जोखिम

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सेलखड़ी का औद्योगिक काम करते समय सुरक्षा नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। सेलखड़ी की धूल (पाउडर) के सीधे संपर्क में आने या सांस के माध्यम से शरीर के भीतर जाने पर गंभीर स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं। सेलखड़ी की प्राकृतिक परतों में कई बार रासायनिक रूप से क्रिस्टलीय सिलिका और ट्रेमोलाइट एस्बेस्टस के रेशे छिपे होते हैं।

यदि इसके पाउडर को बिना सुरक्षा मास्क के लगातार सांस के जरिए अंदर खींचा जाए, तो फेफड़ों के गंभीर व्यावसायिक रोग जैसे एस्बेस्टोसिस, सिलिकोसिस मेसोथेलियोमा और फेफड़ों का कैंसर होने का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है। इसके कारण खाँसी, सांस की तकलीफ, त्वचा का नीला पड़ना (सायनोसिस) और फेफड़ों की कार्यक्षमता का कमजोर होना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। इसी कारण से अमेरिकी व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य प्रशासन (OSHA) ने कार्यस्थलों पर हवा में इसके धूल कणों की उपस्थिति के लिए कड़े विनियामक मानक और अधिकतम सुरक्षित सीमाएं (परमिसिबल एक्सपोज़र लिमिट) निर्धारित की हैं।[7]

इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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  1. Chidester, Alfred Herman; Engel, Albert Edward John; Wright, Lauren Albert (1963). Talc resources of the United States. U.S. Government Printing Office.
  2. Anthony, John W.; Bideaux, Richard A.; Bladh, Kenneth W.; Nichols, Monte C. (1995). Handbook of Mineralogy. Mineralogical Society of America.
  3. Virta, Robert L. (2017). Minerals Yearbook Metals and Minerals 2010. Government Printing Office.
  4. Hansen, Gitte; Storemyr, Per (2017). A Versatile Resource – The Procurement and Use of Soapstone in Norway and The North Atlantic Region. University of Bergen Archaeological Series.
  5. Aldred, Cyril (1971). Jewels of the Pharaohs Egyptian Jewellery of the Dynastic Period. Thames and Hudson.
  6. Akama, John (2018). "The Evolution and Resilience of the Gusii Soapstone Industry". Journal of African Cultural Heritage Studies, 1(1), 1–17.
  7. Proctor, Nick H.; Hughes, James P.; Hathaway, Gloria J. (2004). Proctor and Hughes' Chemical hazards of the workplace (5th ed.). Wiley-Interscience.

बाहरी कड़ियाँ

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