सेतुबंध

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

सेतुबन्ध प्राकृत भाषा का एक महाकाव्य है। इसे 'रावणवहो' (रावणवधः) भी कहते हैं। इस महाकाव्य के रचयिता के रूप में प्रवरसेन द्वितीय तथा कालिदास दोनों का नाम लिया जाता है। 'सेतुबन्ध' के व्याख्याकार रामदास भूपति ने कालिदास को इसका रचयिता माना है। प्रवरसेन, वाकाटक राजवंश के वास्तविक संस्थापक थे। 'सेतुबन्ध' को कथा वाल्मीकीय रामायण से ग्रहण की गई है। व्यापक कथा-विस्तार की दृष्टि से आदि रामायण तथा सेतुबन्ध की कथा में मौलिक अन्तर नहीं है।

सेतुबन्ध में १५ आश्वास (काण्ड) हैं। इसका प्रारम्भ शरद ऋतु के वर्णन से हुआ है। इसके पूर्व केवल दो छन्दों में कवि ने यह सूचना दी है कि राम ने बालि का वध करके सुग्रीव को राजा बना दिया है और निष्क्रियता की स्थिति में वर्षाकाल अत्यन्त क्लेश के साथ बिताया है। 'आदि रामायण' में शरद-वर्णन का स्थान किंचित भिन्न है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]