सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५

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ग्रामीण भारत में आरटीआई का संज्ञान

भूमिका

    आर.टी.आई. कानून का विस्तृत नाम राईट टू इन्फार्मेशन एक्ट अर्थात सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 कहा जाता है।
     भारत में कानून संसद द्वारा 12 अक्टूबर 2005 को पारित करके पूरे देश में लागू किया गया, जिसे सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के रूप में जाना जाता है। यह कानून सरकारी तत्र में भ्रष्टाचार पर लगाम और पारदर्शिता बनाए रखनें में अबतक का सबसे प्रभावी कानून रहा है, जिसकी बागडोर देश की जनता के हाथों में एक कानूनी अधिकार के रूप में प्रदान की गई है। यह कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू है।
     चूंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है। जिसमें लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जनता सरकार को चयनित करती है। लेकिन सरकारे यह भूल जाती है कि जनता ने उन्हे चुना है और जनता ही देश की असली मालिक होती है।
 चूंकि जनता के टैक्स से ही सरकारे कार्य करती हैं इसलिए जनता को जानने का पूरा हक होना चाहिए कि उसके टैक्स के रूप में दिया जाने वाला पैसा कब और किस काम में लगाया गया है। इस कानून से लोगों को उन सभी सूचनाओं की जानकारी दिए जाने का प्रावधान है जो जनता क हित और पारदर्शिता से सम्बन्धित है।
         हमारे देश में आय का एक बड़ा स्त्रोत कृषि है जो कि पूरी अर्थव्यवस्था की नीव है, जिसका सीधा सरोकार ग्रामीण जनता है जो देश के 80 प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन ये ग्रामीण जनता अपने इस अधिकार के प्रति कितनी सजग और जागरूक है ?
  संज्ञान का तात्पर्य- संज्ञान का तात्पर्य कुछ मानसिक महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं का समूह जिसे देखकर, सुनकर अथवा समझ कर जानकारी प्राप्त करना है।

इस शोध के लिए गाज़ीपुर जनपद में स्थित ग्राम उसिया का चयन किया गया। पूर्व केन्द्रीय सूचना आयुक्त डा0 एम.एम. अंसारी इसी गांव के निवासी हैं। अतः इस गांव पर शोध का एक विशेष महत्व है।

लेकिन इससे पहले जानना बहुत जरूरी है कि सूचना का अधिकार कानून कैसे आया और भारत एवं विश्व में इसका क्या एतिहासिक महत्व है?

एतिहासिक सन्दर्भ -

                     सूचना की आजादी के लिए विश्व में सबसे पहला कदम स्वीडन मे उठाया जिसने वर्ष 1776 में अपने नागरिको को सूचना की स्वतंत्रता के लिए प्रावधान बनाया। इसके बाद कोलम्बिया ने कोड आॅफ म्युनिस्पल आॅर्गेनाईजेशन नामक एक कानून वर्ष 1888 में बनया जो सूचना के अधिकार के रूप में एक प्रभावी माना जाता है। कोलम्बिया के बाद फिनलैण्ड और नार्वे ने 1951 और 1970 में सूचना की स्वतंत्रता से सम्बन्धित कानून का निर्माण किया।
          वर्ष 1966 में अमेरिका भी सूचना का अधिकार अधिनियम  लागू करने वाले देशों की श्रेणी में शामिल हो गया। 1970 के दशक में आस्ट्रिया भी सूचना का अधिकार अधिनियम स्वीकार करने में सफल रहा। इसके बाद सूचना का अधिकार अधिनियम लागू करने की एक होड़ सी मच गई। परिणाम स्वरूप् आस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैण्ड 1982-83 में सूचना की स्वतंत्रता को अपनाया। इसके बाद सूचना की आजादी का यह सिलसिला तेजी से आगे बढ़ा और विश्व के 80 देशों तक फैलता हुआ भारत आया।
           भारत की संसद द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम पारित होने से पहले ही नौ राज्यों ने अपने स्तर पर राज्य में सूचना का अधिकार अधिनियम लागू कर रखा था जिसमें तमिलनाडु ने 1997 में लागू करने वाला पहला राज्य बना इसके साथ ही गोवा ने अपने राज्य में इसी साल यह कानून लागू किया। राजस्थान और कर्नाटक ने 2000 में, दिल्ली, असम और महाराष्ट्र में 2001, मध्य प्रदेश ने 2003 तथा जम्मू-कश्मीर 2004 में लागू किया।
  भारत में इसका इतिहास लगभग 4 दशक पुराना है। इसकी शुरूआत 1975 में उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राजनारायण से हुआ। जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 19 में वर्णित मौलिक अधिकार को स्पष्ट करते हुए कहा कि “प्रत्येक नागरिक को बोलने और अभिव्यक्ति करने की आजादी प्रदान करता है। जब कुछ जानेगी नहीं तो अभिव्यक्ति कैसे करेगी ?
    वर्ष 1990 में राजस्थान के ग्रामीण इलाके के लोगो ने मजदूर किसान शक्ति संगठन के बैनर तले अपने अधिकारों के लिए आन्दोलन किया। मजदूर किसान शक्ति संगठन ने जन अभियान चलाकर सरकारी रिकार्ड को सार्वजनिक करने एवं साशल आडिट करने की मांग उठाई। इसके 6 साल बाद 1996 में प्रेस काउंसिल आॅफ इण्डिया ने सूचना के अधिकार का पहला कानूनी मसौदा तैयार किया जो प्रत्यके नागरिक को किसी भी सार्वजनिक निकाय से सूचना प्राप्त करने के अधिकार की मांग का समर्थन किया। आखिरकार वर्ष 1997 में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में सूचना का अधिकार लागू करने का संकल्प लिया गया जिसके बाद 1997 के अंत तक धीरे-धीरे  नौ राज्यों ने सूचना का अधिकार कानून लागू करने का कार्य प्रारम्भ किया। इसके साथ ही वर्ष 2002 में भारत सरकार ने सूचना की स्वंतत्रता सम्बधित कानून परित किया और वर्ष 2003 में राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई लेकिन इसके प्रावधानों को लेकर कई बुद्धिजीवियों ने आलोचना शुरू कर दी। 
        अंततः संसद ने 12 अक्टूबर 2005 को पूरे देश में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 लागू कर दिया। आज इस कानून को लागू हुए 10 साल का समय बीत चुका है।1

सूचना के अधिकार कानून के बारे में कुछ खास बातेंः

सूचना का अधिकार अधिनियम हर नागरिक को अधिकार देता है कि वह - (क) सरकार से कोई भी सवाल पूछ सके या कोई भी सूचना ले सके। (ख) किसी भी सरकारी दस्तावेज की प्रमाणित प्रति ले सके। (ग) किसी भी सरकारी दस्तावेज की जांच कर सके। (घ) किसी भी सरकारी काम की जांच कर सके। (ड़) किसी भी सरकारी काम में इस्तेमाल सामग्री का प्रमाणित नमूना ले सके।


सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में निहित मुख्य प्रावधानः

सूचना के अधिकार के कुछ प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित है-

 (1) समस्त सरकारी विभाग, पब्लिक सेक्टर यूनिट, किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता से चल रहीं गैर सरकारी संस्थाएं व शिक्षण संस्थान आदि विभाग इसमें शामिल हैं। पूर्णतः निजी संस्थाएं इस कानून के दायरे में नहीं हैं लेकिन यदि किसी कानून के तहत कोई सरकारी विभाग किसी निजी संस्था से कोई जानकारी मांग सकता है तो उस विभाग के माध्यम से वह सूचना मांगी जा सकती है।
 (2) प्रत्येक सरकारी विभाग में एक या एक से अधिक जनसूचना अधिकारी बनाए गए है, जो सूचना के अधिकार के तहत आवेदन स्वीकार करते हैं, मांगी गई सूचनाएं एकत्र करते हैं और उसे आवेदनकर्ता को उपलब्ध कराते हैं।
 (3) जनसूचना अधिकारी की दायित्व है कि वह 30 दिन अथवा जीवन व स्वतंत्रता के मामले में 48 घण्टे के अन्दर (कुछ मामलों में 45 दिन तक) मांगी गई सूचना उपलब्ध कराए।
 (4) यदि जनसूचना अधिकारी आवेदन लेने से मना करता है, तय समय सीमा में सूचना नहीं उपलब्ध कराता है अथवा गलत या भ्रामक जानकारी देता है तो देरी के लिए 250 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से 25000 तक का जुर्माना उसके वेतन में से काटा जा सकता है। साथ ही उसे सही सूचना भी देनी होगी।
 (5) लोक सूचना अधिकारी को अधिकार नहीं है कि वह आपसे सूचना मांगने का कारण नहीं पूछ सकता।
 (6) सूचना मांगने के लिए आवेदन फीस देनी होगी (केन्द्र सरकार ने आवेदन के साथ 10 रुपए की फीस तय की है। लेकिन कुछ राज्यों में यह अधिक है,  बीपीएल कार्डधरकों को कोई आवेदन शुल्क नहीं है।

(7) दस्तावेजों की प्रति लेने के लिए भी फीस देनी होगी. (केन्द्र सरकार ने यह फीस 2 रुपए प्रति पृष्ठ रखी है लेकिन कुछ राज्यों में यह अधिक है, अगर सूचना तय समय सीमा में नहीं उपलब्ध कराई गई है तो सूचना मुफ्त दी जायेगी।

 (8) यदि कोई लोक सूचना अधिकारी यह समझता है कि मांगी गई सूचना उसके विभाग से सम्बंधित नहीं है तो यह उसका कर्तव्य है कि उस आवेदन को पांच दिन के अन्दर सम्बंधित विभाग को भेजे और आवेदक को भी सूचित करे। ऐसी स्थिति में सूचना मिलने की समय सीमा 30 की जगह 35 दिन होगी।
 (9) लोक सूचना अधिकारी यदि आवेदन लेने से इंकार करता है अथवा परेशान करता है। तो उसकी शिकायत सीधे सूचना आयोग से की जा सकती है। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचनाओं को अस्वीकार करने, अपूर्ण, भ्रम में डालने वाली या गलत सूचना देने अथवा सूचना के लिए अधिक फीस मांगने के खिलाफ केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग के पास शिकायत कर सकते है।
 (10) जनसूचना अधिकारी कुछ मामलों में सूचना देने से मना कर सकता है। जिन मामलों से सम्बंधित सूचना नहीं दी जा सकती उनका विवरण सूचना के अधिकार कानून की धारा 8 में दिया गया है। लेकिन यदि मांगी गई सूचना जनहित में है तो धारा 8 में मना की गई सूचना भी दी जा सकती है। जो सूचना संसद या विधानसभा को देने से मना नहीं किया जा सकता उसे किसी आम आदमी को भी देने से मना नहीं किया जा सकता।
 (11) यदि लोक सूचना अधिकारी निर्धारित समय-सीमा के भीतर सूचना नहीं देते है या धारा 8 का गलत इस्तेमाल करते हुए सूचना देने से मना करता है, या दी गई सूचना से सन्तुष्ट नहीं होने की स्थिति में 30 दिनों के भीतर सम्बंधित जनसूचना अधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी यानि प्रथम अपील अधिकारी के समक्ष प्रथम अपील की जा सकती है।
 (12) यदि आप प्रथम अपील से भी सन्तुष्ट नहीं हैं तो दूसरी अपील 60 दिनों के भीतर केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग (जिससे सम्बंधित हो) के पास करनी होती है।

विषय विवेचन -

               इस कानून को भारत के कोने-कोने तक फैलाने के लिए तमाम सरकारी और गैर सरकारी संगठनों ने सूचना का अधिकार कानून 2005 के प्रचार-प्रसार करने के लिए एड़ी-चोटी का जो़र लगा दिया।
     वर्ष 2007 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रायल ने दूरदर्शन के राष्ट्रीय प्रसारण में “जानने का हक है“ नाम से एक कार्यक्रम चलाया। इस कार्यक्रम में सामाजिक, आरटीआई कार्यकर्ताओ, सूचना आयुक्त और अधिवक्ताओं का एक ऐसा मंच तैयार किया जो ग्रामीणांचल में सुदूर बैठे लोगो तक सूचना के इस कानून के बारे में जागरूक करने का काम किया। ये कार्यक्रम आम लोगों को आरटीआई दाखिल करने की प्रक्रिया में होने वाली जटिलताओं को दूर करता है और विशेषज्ञों की राय भी लेता है। ऐसा में भारत सरकार का उठाया गया यह एक प्रभावी कदम है। संतोष भारतीय का दिल्ली से प्रकाशित होने वाला साप्ताहिक अखबार “चौथी दुनिया" ने भी आरटीआई कानून के प्रचार-प्रसार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस अखबार ने अपने ज्वलंतशील लेखों से आरटीआई के विषय में एक महत्वपूर्ण कार्य किया है।
              आधुनिक दौर में सोशल मीडिया का दौर आने से गांवों के लोगों में फेसबुक, ब्लाॅग एवं समूह चर्चा ने लागो में आरटीआई के प्रति रूचि उत्पन्न की। जिसका असर ये हुआ कि ग्रामीण क्षेत्र के लोगो ने ज्यादा से ज्यादा आरटीआई आवेदन करना शुरू किया जिसका परिणाम तेजी से दिखने लगा।

इसी क्रम में विगत वर्ष 2014 के अंत में अंजलि भारद्वाज के सर्तक नागरिक संगठन ने 5 राज्यों दिल्ली, आन्ध्र प्रदेश, असम, बिहार और राजस्थान समेत केन्द्रीय मंत्रालयों तथा उनके विभागों एवं देश के सभी सूचना आयोगों से आरटीआई के माध्यम से जानकारी प्राप्त किया जिसके आधार पर यह पाया कि आरटीआई आवेदन करने वाले लोगों में लगभग 90 प्रतिशत समाज के सबसे निचले और ग्रामीण क्षेत्रों से सम्बन्धित है जिनका एक बड़ा तबका गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाला है। यह खबर दूरदर्शन के राष्ट्रीय प्रसारण में दिखाए जाने वाले कार्यक्रम “जानने का हक है“ में दिखाया गया है।

शोध निष्कर्ष -

इस गांव पर शोध में प्रश्न करने पर निम्नलिखित परिणाम सामने आए- “जब ग्रामीणों से पहला प्रश्न किया गया कि क्या आप आरटीआई अर्थात सूचना का अधिकार कानून के बारे में जानते है तो 30 में से 21 लोगों ने उत्तर हां में दिया जिससे यह स्पष्ट हुआ कि चयनित संख्या के 70 प्रतिशत लोग आरटीआई के विषय में जानते है। लेकिन जैसे ही उनसे आरटीआई प्रयोग करने के विषय में पूछा गया कि क्या आपने सूचना के अधिकार कानून का प्रयोग किया है तो उनकी संख्या लगभग आधी हो गयी जिसमें सिर्फ 17 लोगो ने आरटीआई प्रयोग करने की बात स्वीकार की अर्थात सिर्फ 56 प्रतिशत लोगों ने कभी न कभी आरटीआई का प्रयोग किया है। इसी प्रकार आरटीआई से लाभ प्राप्त करने वाले लोगो की संख्या 17, निर्धारित समयावधि में संतोषजनक सूचना प्राप्त करने वाले 15, जनसूचना अधिकारी से संतुष्ट न होने की दशा में प्रथम अपील दायर करने वाले 02, प्रथम अपील से संतुष्ट न होने वाले 1, सूचना आयोग में द्वितीय अपील या शिकायत करने वाले 01 तथा सूचना आयोग का संतोषजनक निर्णय पाने वाले 01 व्यक्ति शामिल है।“

शोध सन्दर्भ -

1- फाडिया डा0 बी0एल0(2012), लोक प्रशासन, पृष्ट-1030, साहित्य भवन पब्लिकेशन।

2- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा-2(क) और (ज)

3- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा-5(1)

4- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा-7(1)

5- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 18

6- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 6(2)

7- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 7(5)

8- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 7(6)

9- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा धारा 6(3)

10- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 18(1)

11- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 8

12- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 19(1)

13- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 19(3)

14-https://www.youtube.com/watch?v=GC7qdEcmlsY