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सुभाष काक

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सुभाष काक

सुभाष काक (जन्म 26 मार्च 1947) प्रमुख भारतीय-अमेरिकी कवि, दार्शनिक और वैज्ञानिक हैं। वे ऐतिहासिक संशोधनवादी (historical revisionist) हैं। उनके कई ग्रन्थ वेद, कला और इतिहास पर भी प्रकाशित हुए हैं।[1]

वे अमेरिका की ओक्लाहोमा स्टेट यूनिवर्सिटी-स्टिलवाटर में इलेक्ट्रिकल एवं कंप्यूटर इंजीनियरिंग स्कूल के रीजेंट्स प्रोफेसर हैं तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग के मानद विजिटिंग प्रोफेसर हैं। वे भारत के प्रधानमंत्री की विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार सलाहकार परिषद (पीएम-एसटीआईएसी) के सदस्य हैं।

सुभाष काक ने विज्ञान के इतिहास, विज्ञान के दर्शन, पुराखगोलिकी और गणित के इतिहास पर लेख प्रकाशित किए हैं। उन्होंने पुराखगोलिकी पर भी लेख प्रकाशित किए हैं और आर्यों के स्वदेशी होने के विचार का समर्थन किया है। कई विद्वानों ने इन विषयों पर उनके सिद्धांतों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है और उनके लेखन की कड़ी आलोचना की है।

2019 में, भारत सरकार ने उन्हें भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया।

जीवन परिचय

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उनका जन्म श्रीनगर, कश्मीर में राम नाथ काक और सरोजिनी काक के यहाँ हुआ। उनकी शिक्षा कश्मीर और दिल्ली में हुई।[2]

उन्होंने श्रीनगर के क्षेत्रीय इंजीनियरी महाविद्यालय से इंजीनिअरी में स्नातक डिग्री प्राप्त की। अब इस कॉलेज का नाम राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान कर दिया गया है। उन्होंने १९७० में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली से पी०एच०डी० की।

कार्यक्षेत्र

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सुभाष काक का कार्यक्षेत्र विविधता से भरा हुआ है। वे व्यवसाय से एक संगणक विज्ञानी हैं। वे भारतीय दर्शन एवं प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा पर लिखते और बोलते हैं। इसके साथ-साथ वे काव्यरचना भी करते हैं।

कविता और जीवन का मर्म

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उनकी कविता जीवन की पहेलियों पर प्रकाश डालती है। सुभाष काक की शैली सरल है पर इस सरलता के भीतर विचारों की जटिलता छिपी हुई है। वह प्रकृतिवाद के समर्थक हैं। प्रकृति के माध्यम से वह जटिल मानव भाव प्रस्तुत करते हैं। विख्यात विद्वान और आलोचक गोविन्द चन्द्र पाण्डे ने उनकी कविता की अंग्रेजी के विलियम वर्ड्सवर्थ की रचनाओं से तुलना की है। पाण्डे जी लिखते हैं --

उनकी भाषा और शैली आन्तरिक गाम्भीर्य को सरल प्रासादिकता से प्रस्तुत करती है जैसी कभी शेषनाग सरोवर का सलिल। उनकी भाव-भूमि स्मृतियों की पच्चीकारी से अलंकृत है। उनके बिम्ब प्रकृति और सहज मानवता से बराबर जुड़े रहते हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि न सिर्फ कवि एक बीते शैशव और सुदूर प्रदेश की स्मृतियों से अभिभूत है बल्कि अपनी सांस्कृतिक धरोहर की बदलती परिस्थिति की आशंकाओं से भी चिन्तित है। उनकी कविताएं अनुभव रस से सिक्त हैं, वे उलझी बौद्धिकता और आन्तरिक विसंगतियों से दुर्बोध नहीं हैं। [3]

उनकी कविता ने हिन्दी के समकालीन मार्ग और विधि से दूर नये रूप की स्थापना का प्रयत्न किया है। उनकी कविता के कई संग्रह प्रकाशित -- और अन्य भाषाओं में अनूदित -- हो चुके हैं।[4][5]

संस्कृति और दर्शन

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वे भारतीय विद्या में निपुण और साहित्य, दर्शन, कला, एवं संस्कृति के सहृद-मर्मज्ञ हैं। वेदकाल का बहुत समय से लुप्त उन्होंने एक ज्योतिष ढूंढ निकाला है जिससे भारत की संस्कृति, विज्ञान और कालक्रम पर नया प्रकाश पड़ता है। इनमें से सबसे रोचक १०८ अंक, जो भारतीय संस्कृति में बहुत आता है, की व्याख्या है। प्रमुख देवी-देवताओं के १०८ नाम हैं, जपमाला में १०८ दाने, १०८ धाम हैं, आदि। इनके शोध ने दिखाया है कि वैदिक काल में यह ज्ञान था कि सूर्य और चन्द्रमा पृथिवी से क्रमशः लगभग १०८ गुणा निजि व्यास की दूरी पर हैं। आधुनिक ज्योतिष ने तो यह भी दिखाया है कि सूर्य का व्यास पृथिवी के व्यास से लगभग १०८ गुणा है।[6] पिण्ड और ब्रह्माण्ड के समीकरण के कारण मानव अपने व्यक्तिगत आध्यात्मिक यात्रा में भी इस संख्या को पाता है, यह वेद की धारणा है।[7]

इस शोध का विद्वानों ने स्वागत किया है। अमेरिका के वेदपण्डित वामदेव शास्त्री ने इस शोध को "स्मारकीय उपलब्धि" (monumental achievement) कहा है।[8]

कनाडा के विख्यात आचार्य क्लास क्लास्टरमेयर के अनुसार, "मेरी बहुत देर की समझ थी कि ऋग्वेद में भाषाशास्त्र और इतिहास के परे बहुत कुछ था। यह है वह!... यह एक युगान्तककारी खोज (epoch-making discovery) है।"[9]

उनका दार्शनिक दृष्टिकोण पुनर्गमनवाद से प्रेरित है, जिसके अनुसार विश्व में प्रतिरूप विभिन्न अनुमाप में पुनरावृत, अथवा दोहरते, हैं और कवि और कलाकार इसीका चित्रण करते हैं। इसका प्रयोग कर उन्होंने भारतीय कला और संस्कृति की विवेचना की है। [10] [11] उनके अनुसार पुनर्गमन ही विश्व का समझना सम्भव करता है।

वे संस्कृत के भी विद्वान हैं, इस भाषा में उन्होंने वेदान्त के नए सूत्र (प्रज्ञा सूत्र) की रचना की है।

विज्ञान की सीमाएं

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विज्ञान में इनका योगदान भौतिक शास्त्र और संगणन शास्त्र पर हुआ है। उन्होंने कृत्रिम बुद्धि (en:Artificial Intelligence) की सीमा पर शोध किया है और वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि संगणक बुद्धि कभी भी मानव बुद्धि की सीमा पर नहीं पहुंच सकती है।[12] उनके अनुसार भौतिक सिद्धान्तों का एकीकरण - जो पिछले कुछ दशकों में विज्ञान का प्रमुख लक्ष्य रहा है - असफल रहेगा। पार्थव और आध्यात्मिक में निरन्तर द्वन्द्व बना रहेगा। वह अपने यमल परोक्षक के समाधान के कारण समाचार पत्रों में बहुत चर्चित रहे हैं।[13]

डॉ सुभाष काक (२०१५)
अन्य ग्रन्थ
  1. हिन्दु समाचारपत्र में साक्षात्कार
  2. "Distinguished Alumni Awards". मूल से से 14 जुलाई 2010 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 13 दिसंबर 2013. {{cite web}}: Unknown parameter |trans_title= ignored (|trans-title= suggested) (help)
  3. गोविन्द चन्द्र पाण्डे, प्राग्वाच, एक ताल, एक दर्पण, १९९९
  4. "स्टेट पत्रिका". मूल से से 18 जनवरी 2015 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 1 नवंबर 2013.
  5. "Subhash Kak". www.museindia.com (अंग्रेज़ी भाषा में). आईएसएसएन 0975-1815. मूल से से 4 मार्च 2016 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 2026-01-17.
  6. सु. काक,Birth and Early Development of Indian Astronomy. In "Astronomy Across Cultures: The History of Non-Western Astronomy", Helaine Selin (editor), Kluwer Academic, Boston, 2000, pp. 303-340.
  7. सु. काक, ऋग्वेद का कूट-ज्योतिष (2000)
  8. 'दि एस्ट्रोनोमिकल कोड आफ दि ऋग्वेद' के जिल्द से, मुंशीराम मनोहरलाल, नई दिल्ली, २०००।
  9. 'दि एस्ट्रोनोमिकल कोड आफ दि ऋग्वेद' के जिल्द से, मुंशीराम मनोहारलाल, नई दिल्ली, २०००।
  10. सु. काक, रीति और यज्ञ Archived 2015-01-20 at the वेबैक मशीन
  11. सु. काक, संगीत
  12. सु. काक, मानव और कृत्रिम बुद्धि, ACM Ubiquity, 2005
  13. फिज़-ओर्ग

बाह्य कडियां

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साक्षात्कार