सिद्धू मुर्मू

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सन २००२ में सिद्धू-मुर्मू की स्मृति में भारत सरकार द्वारा जारी डाक-टिकट
राँची के सिद्धू-कान्हू पार्क का प्रवेशद्वार

सिद्धू मुर्मू और कान्हू मुर्मू सगे भाई थे जिन्होने 1855–1856 के सन्थाल विद्रोह का नेतृत्व किया था। सन्थाल विद्रोह ब्रिटिश शासन और भ्रष्ट जमींदारी प्रथा दोनों के विरुद्ध था।

सिदो-कान्हू मुर्मू का जन्म भोगनाडीह नामक गाँव में एक संथाल आदिवासी परिवार में हुआ था। सिदो मुर्मू का जन्म 1815 ई0 में हुआ था एवं कान्हू मुर्मू का जन्म 1820 ई0 में हुआ था। संथाल विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाने वाले इनके दो भाई भी थे जिनका नाम चाँद मुर्मू और भैरव मुर्मू था। चाँद का जन्म 1825 ई0 में एवं भैरव का जन्म 1835 ई0 में हुआ था। इनके अलावा इनकि दो बहने भी थी जिनका नाम फुलो मुर्मू एवं झानो मुर्मू था। इन 6 भाई-बहनो का पिता का नाम चुन्नी माँझी था।

जन्म स्थान:- इन छः भाई बहनो का जन्म भोगनाडी गाँव मे हुआ था जो कि वर्तमान में झारखण्ड राज्य के संथाल परगाना परमण्ल के साहेबगंज जिला के बरहेट प्रखण्ड के भोगनाडीह में है।

संथाल विद्रोह (हूल आंदोलन):- इस आंदोलन का नेतृत्व सिदो कान्हु ने किया था । सिदो के नेतृत्व में इस लड़ाई में संथाल परगना के तमाम स्थानीय आदिवासी गैर आदिवासी ने जान की बाजी लगाकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। अंग्रेजी शासन के गलत नीतियों के कारण जंगल तराई जो आज संथाल परगना है इसके अलग अलग क्षेत्रों में असंतोष गहराने लगा था । इसलिए अंग्रेजी शासन के विरुद्ध स्थानीय आदिवासी गैर आदिवासी 1853 के समय से ही विरोध करना शुरू कर दिया था। बैठक सभा भी संचालित होने लगा था। ज्यों ज्यों दमन और शोषण बढ़ता स्थानीय लोग में भी अंग्रेजी शासन के विरुद्ध क्रोध बढ़ता‌ । समय के साथ पूरे जंगलतराई क्षेत्र में अलग अलग विद्रोहियों जैसे सिदो कान्हो, चानकु महतो, राजवीरसिंह, शाम परगना, बैजल सौरेन, चालो जोलाह, रामा गोप, विजय, गरभू आदि दर्जनों आंदोलनकारियों ने अपने अपने क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को संगठित कर अंग्रेजों की गलत नीतियों का प्रतिकार करना शुरू कर दिया था। इनमें सबसे जोरदार विद्रोह का स्वर सिदो-कान्हू के नेतृत्व में चलाया जा रहा था , यही कारण था कि सिदो पूरे जंगल महल में सबसे सशक्त विद्रोही बन कर उभरे थे। तमाम विद्रोहियों ने सिदो से संपर्क साधा और सिदो वह उनके भाई बहन के नेतृत्व में 30 जून 1855 को पंचकठिया, बरहेट जिला साहेबगंज में पूरे जंगलतराई के तमाम विद्रोहियों व उनके समर्थकों की एक सभा बुलाई। सभा में सिदो को जंगलतराई का राजा चुना गया और उनके नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलन चलाने का निर्णय तमाम लोगों ने लिया। उसके बाद हजारों लोग विभिन्न ने सिदो के नेतृत्व में ब्रिटिश सत्ता, साहुकारो, व्यपारियों व जमींदारो के खिलाफ हूल - हूल के नारा के साथ सशस्त्र युद्ध का शुरूवात किया। जिसे हूल, संथाल हूल, संथाल विद्रोह या हूल आंदोलन, हूल क्रांति आदि नाम के नाम से जाना जाता है। संथाल विद्रोह का नारा था करो या मरो अंग्रेजो हमारी माटी छोड़ो । 30 जून 1855 की सभा में 5000 से भी ज्यादा आदिवासी एकत्र हुए जिसमें सिदो को राजा, कान्हू को मंत्री, चाँद को मंत्री एवं भैरव को सेनापति चुना गया।

जबकि अंग्रेजो मे इसका नेतृत्व जनरल लॉयर्ड ने किया जो आधुनिक हथियार और गोला बारूद से परिपूर्ण थे इस मुठभेड़ में महेश महेश लाल एवं प्रताप नारायण नामक दरोगा कि हत्या कर दि गई इससे अंग्रेजो में भय का माहोल बन गया संथालो के भय से अंग्रेजो ने बचने के लिए पाकुड़ में मार्टिलो टावर का निर्माण कराया गया था जो आज भी झारखण्ड के पाकुड़ जिले में स्थित है। अंततः इस मुठभेड़ में संथालो कि हार हुई और सिदो-कान्हू को फांसी दे दी गई।

मृत्यु:- इस भयंकर मुठभेड़ में संथालो हार हुई क्योंकि ये लोग तीर धनुष से लड़ रहे थे जबकि अंग्रेजो के पास आधुनिक हथियार था। सिदो को अगस्त 1855 में पकड़कर पंचकठिया नामक जगह पर बरगद के पेड़ पर फांसी दे दि गई वह पेड़ आज भी पंचकठिया में स्थित है जिसे शहिद स्थल कहा जाता है जबकि कान्हू को भोगनाडीह में फांसी दे दी गई पर आज भी वह संथालो के दिलो में आज भी जिन्दा है एवं याद किए जाते है।

संथालो के इस हार पर भी अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से हिला कर रख दिया था। कार्ल मार्क्स ने इस विद्रोह को ‘भारत का प्रथम जनक्रांति’ कहा था। आज भी 30 जून को भोगनाडीह में हूल दिवस पर सरकार द्वारा विकस मेला लगाया जाता है एवं विर शहिद सिदो-कान्हू को याद किया जाता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]