सितारा देवी

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सितारा देवी
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सितारा देवी
राष्ट्रीयता भारतीय
शिक्षा शंभु महाराज और
पंडित बिरजू महाराज के पिता अच्छन महाराज
प्रसिद्धि कारण कथक नृत्य
बच्चे Ranjit Barot[*]
पुरस्कार संगीत नाटक अकादमी सम्मान- 1959
पद्मश्री - 1975
कालिदास सम्मान - 1994

सितारा देवी (8 नवम्बर, 1920 – 25 नवम्बर, 2014) ) भारत की प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना थीं। जब वे मात्र १६ वर्ष की थीं, तब उनके नृत्य को देखकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उन्हें 'नृत्य सम्राज्ञी' कहकर सम्बोधित किया था। उन्होने भारत तथा विश्व के विभिन्न भागों में नृत्य का प्रदर्शन किया।

इनका जन्म 1920 के दशक की एक दीपावली की पूर्वसंध्या पर कलकत्ता हुआ था। इनका मूल नाम धनलक्ष्मी और घर में धन्नो था। इनको बचपन में मां-बाप के लाड-दुलार से वंचित होना पड़ा था। मुंह टेढ़ा होने के कारण भयभीत मां-बाप ने उसे एक दाई को सौंप दिया जिसने आठ साल की उम्र तक उसका पालन-पोषण किया। इसके बाद ही सितारा देवी अपने मां बाप को देख पाईं। उस समय की परम्परा के अनुसार सितारा देवी का विवाह आठ वर्ष की उम्र में हो गया। उनके ससुराल वाले चाहते थे कि वह घरबार संभालें लेकिन वह स्कूल में पढना चाहती थीं।[1] स्कूल जाने के लिए जिद पकड लेने पर उनका विवाह टूट गया और उन्हें कामछगढ हाई स्कूल में दाखिल कराया गया। वहां उन्होंने मौके पर ही नृत्य का उत्कृष्ट प्रदर्शन करके सत्यवान और सावित्री की पौराणिक कहानी पर आधारित एक नृत्य नाटिका में भूमिका प्राप्त करने के साथ ही अपने साथी कलाकारों को नृत्य सिखाने का उत्तरदायित्व भी प्राप्त कर लिया।

नृत्य जीवन[संपादित करें]

उस समय एक अखबार ने उनके नृत्य प्रदर्शन के बारे में लिखा था, "एक बालिका धन्नो ने अपने नृत्य प्रदर्शन से दर्शकों को चमत्कृत किया।" इस खबर को उनके पिता ने भी पढा और बेटी के बारे में उनकी राय बदल गई। इसके बाद धन्नो का नाम सितारा देवी रख दिया गया और उनकी बडी बहन तारा को उन्हें नृत्य सिखाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई।[1] सितारा देवी ने शंभु महाराज और पंडित बिरजू महाराज के पिता अच्छन महाराज से भी नृत्य की शिक्षा ग्रहण की। दस वर्ष की उम्र होने तक वह एकल नृत्य का व्यावसायोक प्रदर्शन करने लगीं। अधिकतर वह अपने पिता के एक मित्र के सिनेमा हाल में फिल्म के बीच में पंद्रह मिनट के मध्यान्तर के दौरान अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया करती थीं। नृत्य की लगन के कारण उन्हें स्कूल छोडना पड़ा और ग्यारह वर्ष की आयु में उनका परिवार मुम्बई चला गया। मुम्बई में उन्होंने जहांगीर हाल में अपना पहला सार्वजनिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। यहीं से कथक के विकास और उसे लोकप्रिय बनाने की दिशा में उनके साठ साल लंबे नृत्य व्यवसाय का आरंभ किया।

अपने सुदीर्घ नृत्य कार्यकाल के दौरान सितारा देवी ने देश-विदेश में कई कार्यक्रमों और महोत्सवों में चकित कर देने वाले लयात्मक ऊर्जस्वित नृत्य प्रदर्शनों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया है। वह लंदन में प्रतिष्ठित रायल अल्बर्ट और विक्टोरिया हाल तथा न्यूयार्क में कार्नेगी हाल में अपने नृत्य का जादू बिखेर चुकी हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि सितारा देवी न सिर्फ कथक बल्कि भारतनाट्यम सहित कई भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों और लोकनृत्यों में पारंगत हैं। उन्होंने रूसी बैले और पश्चिम के कुछ और नृत्य भी सीखें हैं। सितारा देवी के कथक में बनारस और लखनऊ घराने की तत्वों का सम्मिश्रण दिखाई देता है। वह उस समय की कलाकार हैं। जब पूरी-पूरी रात कथक की महफिल जमी रहती थी।

चलचित्र[संपादित करें]

सितारा देवी ने बॉलीवुड की अनेक अभिनेत्रियों को नृत्य का प्रशिक्षण दिया है। सितारा देवी के व्यक्तित्व का एक भाग चलचित्र से सीधे भी जुडा है। सवाक फिल्मों के युग में उन्होंने कुछ फिल्मों में भी काम किया। उस दौर में उन्हें सुपर स्टार का दर्जा हासिल था लेकिन नृत्य की खातिर आगे चलकर उन्होंने फिल्मों से किनारा कर लिया। फिल्म निर्माता और नृत्य निर्देशक निरंजन शर्मा ने उषा हरण के लिए उन्हें तीन माह के अनुबंध पर चुना और वह १२ वर्ष की उम्र में ही सागर स्टूडियोज के लिए नृत्यांगना के रूप में काम करने लगीं। शुरुआती फिल्मों में उन्होंने मुख्यत छोटी भूमिकाएं निभाईं और नृत्य प्रस्तुत किए। उनकी फिल्मों में शहर का जादू (1934), जजमेंट ऑफ अल्लाह (1935), नगीना, बागबान, वतन (1938), मेरी आंखें (1939) होली, पागल, स्वामी (1941), रोटी (1942), चांद (1944), लेख (1949), हलचल (1950) और मदर इंडिया (1957) प्रमुख हैं।

सम्मान[संपादित करें]

इन्हें संगीत नाटक अकादमी सम्मान १९६९ में मिला। इसके बाद इन्हें पद्मश्री १९७५ में मिला। १९९४ में इन्हें कालिदास सम्मान से सम्मानित किया गया। बाद में इन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण दिया गया जिसे इन्होंने लेने से मना कर दिया। इन्होंने कहा कि क्या सरकार मेरे योगदान को नहीं जानती है? ये मेरे लिये सम्मान नहीं अपमान है[2]। मैं भारत रत्न से कम नहीं लूंगी। मात्र १६ वर्ष की आयु में इनके प्रदर्शन को देखकर भावविभोर हुए गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इन्हें 'नृत्य सम्राज्ञी' की उपाधि दी थी।

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

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