सामाजिक संघटन

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syllabus of sociology

समाजशास्त्र में, सामाजिक संघटन एक सैद्धांतिक अवधारणा होती है जिसके अंतर्गत एक समाज या सामाजिक संरचना को एक "क्रियाशील संघटन" के रूप में देखते हैं. इस दृष्टिकोण से, आदर्शतः, सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए, सामाजिक विशेषताओं, जैसे कानून, परिवार, अपराध आदि, के संबंधों का निरीक्षण समाज के अन्य लक्षणों के साथ पारस्परिक क्रिया के दौरान किया जाता है. एक समाज या सामाजिक संघटन के सभी अवयवों का एक निश्चित प्रकार्य होता है जो उस संघटन के स्थायित्व और सामंजस्य को बनाये रखता है.

इतिहास[संपादित करें]

समाज का एक संघटन के रूप में प्रतिदर्श या इसकी अवधारणा का विकास 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में फ्रांसिस समाजशास्त्री, एमिले डुर्कहेम के द्वारा किया गया था. डुर्कहेम के अनुसार, एक संघटन या समाज का प्रकार्य जितना ही विशिष्ट होगा उसका विकास भी उतना ही अधिक होगा, इसका ठीक विपरीत भी सत्य होगा. आमतौर पर, संस्कृति, राजनीति और अर्थशास्त्र समाज की तीन प्रमुख गतिविधियां हैं. सामाजिक स्वास्थ्य इन तीन गतिविधियों की सुव्यवस्थित पारस्परिक क्रिया पर निर्भर करता है. इसलिए, सामाजिक संघटन के "स्वास्थ्य" को संस्कृति, राजनीति और अर्थशास्त्र की पारस्परिक क्रिया के प्रकार्य के रूप में देखा जा सकता है, जिसका एक सिद्धांत के रूप में अध्ययन किया जा सकता है, प्रतिदर्श बनाया जा सकता है और विश्लेषण किया जा सकता है. "संघटनात्मक समाज" की अवधारणा की और अधिक विस्तृत व्याख्या हर्बर्ट स्पेंसर द्वारा उनके निबंध "द सोशल ऑर्गेनिज़्म" में की गयी थी.

संबंधित तथ्य[संपादित करें]

इसकी एक समवृत्त अवधारणा का नाम गाइआ अवधारणा है जिसमें संपूर्ण पृथ्वी की परिकल्पना एक एकल एकीकृत संघटन के रूप में की गयी है.

संदर्भ[संपादित करें]

  1. MacLay, George R. (1990). The Social Organism: A Short History of the Idea That a Human Society May Be Regarded As a Gigantic Living Creature. North River Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-88427-078-5. 
  2. Rawie, Henry (1990). The Social Organism and its Natural Laws. Williams & Wilkins Co.. ASIN B000879AT2. 
  3. Steiner, Rudolf (1985). The Renewal of the Social Organism. Steiner Books. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-88010-125-3. 

बाहरी लिंक्स[संपादित करें]