साध्वी ऋतम्भरा

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और जब जल उठे बुझते दीप...

विश्व की आध्यात्मिक शक्ति "पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी" के पावन मार्गदर्शन में निराश्रित नवजात बच्चों के संस्कारपूर्ण पालन-पोषण हेतु वात्सल्य ग्राम, वृन्दावन में संचालित "पालना घर" की चार मर्मस्पर्शी कहानियाँ ....। '

(एक)

          गंभीर हृदय रोग से जूझते नवजात बच्चे को कोई माँ अपने दिल पर पत्थर रखकर वात्सल्य ग्राम के पालना घर में छोड़ गई थी। पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी की गोद में आकर उसे नाम मिला ‘रूद्राक्ष’। उसके मेडिकल टेस्ट में पता चला कि उसकी बीमारी के निदान में भारी खर्च और लंबा समय लगेगा। देखने वालों को लगा कि यह सब आखिर कैसे होगा, लेकिन दीदी माँ की वात्सल्य धारा सारे अभावों, संकटों को जैसे बहा ले जाती है। उन्होंने संकल्प किया कि जैसे भी हो सकेगा आधुनिक तकनीक की सहायता से रूद्राक्ष को बचाने की हरसंभव कोशिश की जाएगी। उनका यही संकल्प उस नन्हें बच्चे की एक ऐसी शक्ति बना हुआ है जिसके बल पर वह अपने रोग की तमाम चुनौतियों का सामना करता हुआ आधुनिक चिकित्सा की मदद से धीरे-धीरे स्वस्थ जीवन की राह पर बढ़ रहा है। 


नन्हा रूद्राक्ष अपने जन्म से ही ‘रिवर्स पम्पिंग’ नामक एक गंभीर हृदय रोग से पीड़ित है, जिसके कारण उसके हृदय में चेंबर की कार्यप्रणाली किसी सामान्य हृदय की अपेक्षा एकदम विपरीत हैं। जिस चेंबर द्वारा आॅक्सीज़न की आपूर्ति फेफड़ों को होनी चाहिए वह उसके बजाय शरीर के अन्य भागों में चली जाती है। संभवतः इलाज ना करा पाने की विवशता के चलते इसकी माँ इसे जन्म देते ही वर्ष 2014 में पूज्या दीदी माँ जी की शरण में छोड़कर चली गई थी। इस रोग से उसे मुक्ति दिलाने के लिए उसी समय ओखला, दिल्ली के ‘फोर्टिस एस्काॅर्ट हाॅस्पिटल’ में रूद्राक्ष की सर्जरी की गई। आॅपरेशन करने वाले डाॅ. राजेश शर्मा के अनुसार बच्चे के दिल में चेंबर प्रक्रिया की इस जटिलतम विसंगति को समझकर उसे ठीक करने के प्रयासों में उनकी टीम ने गहरा अनुसंधान किया और पाया कि इस आॅपरेशन के बाद भी 21 वर्ष की आयु तक रूद्राक्ष के कई और आॅपरेशन होने के बाद ही वह ठीक हो सकेगा। पहला आॅपरेशन वर्ष 2014 में हुआ और लगातार दस दिनों तक चली गहन चिकित्सकीय निगरानी के बाद वह वात्सल्य ग्राम, वृंदावन लौटा। मई 2016 में नोएडा के जे.पी.हाॅस्पिटल में उसकी दूसरी ‘ओपन हार्ट’ सर्जरी हुई। लगातार 11 घण्टों तक चला यह आॅपरेशन अत्याधिक जटिल था। चूँकि इसमें दिल को शरीर से अलग कर उसके कार्य मशीन को सौंपना होते हैं, लिहाजा मरीज के प्राणों पर संकट भी बना रहता है। 11 घण्टों के उस लंबे आॅपरेशन से जूझते हुए रूद्राक्ष को ‘पोस्ट आॅपरेशन केयर’ के अन्तर्गत अगले पाँच दिनों तक ‘हार्ट-लंग मशीन’ पर रखा गया, क्योंकि गहरी थकान के कारण उसका हृदय ठीक से काम नहीं कर पा रहा था। आॅपरेशन के दौरान अत्याधिक रक्तस्राव होने से उसे 14 यूनिट रक्त भी दिया गया। सुखद संयोग यह रहा कि वेन्टीलेटर हटाए जाने के बाद उसके हृदय ने अपना काम करना शुरू कर दिया।

(दो)

मुझे आज भी कुछ वर्ष पूर्व 2 जनवरी की भीषण ठण्ड में ठिठुरती वो रात याद है जब वात्सल्य ग्राम के पालना घर में रात दस बजे के लगभग कोई व्यक्ति या महिला एक नवजात बालक को रखकर चला गया। सूचना मिलने पर जब हम लोग वहाँ पहुँचे तो उसे देखकर दंग रह गए। एक सुन्दर से बालक को बहुत सलीके से ऊनी कपड़ों में लपेटकर कोई वहाँ रख गया था। तमाम सामाजिक कुरीतियों के चलते हमारे देश में एक अरसे से नवजात कन्या को मार दिए जाने अथवा सड़कों पर मरने के लिए छोड़ जाने की पाशविक घटनाएँ तो घटती आ रही हैं, लेकिन इतने सुन्दर से बालक को कोई कैसे छोड़ सकता है! यह एक बड़ा अचरज था। अगले दिन एक निश्चित प्रक्रिया के अनुसार गाजियाबाद के ‘पुष्पांजलि क्राॅसले हाॅस्पिटल’ में उस बालक की चिकित्सकीय जाँच में एक गंभीर हृदय रोग सामने आया जिसके इलाज में लाखों रूपयों का खर्च अनुमानित था। संभवतः अपनी बहुत कमजोर आर्थिक हालत के चलते ही किसी माँ ने अपने कलेजे पर पत्थर रखकर उसे वात्सल्य ग्राम के पालना घर में छोड़ा होगा ताकि उसकी जिंदगी बच सके। हाॅस्पिटल की मेडिकल टीम के अथक प्रयासों के बीच उस नन्हें बच्चे का जीवन दीप निरन्तर जलता रहा। जिसके बचने की भी संभावनाएं क्षीण थीं, लेकिन दीदी माँ जी की वात्सल्यमयी गोद ने उसमें नवजीवन फूँक दिया। आज वह हँसता-खेलता बड़ा हो रहा है।

(तीन)

वात्सल्य ग्राम, वृंदावन के ‘पालना घर’ और तत्कालीन ‘पुष्पांजलि क्राॅसले हाॅस्पिटल’ के सेवाभावी चिकित्सकों ने बड़ी खामोशी के साथ अपने अहर्निश प्रयत्नों के बीच ऐसे अनेकों बच्चों के जीवन बचा लिए, जो मौत के मुहाने तक पहुँच चुके थे। राधा भी उन्हीं में से एक थी। वात्सल्य मन्दिर, ज्वाला नगर, दिल्ली की श्रीमती नीरज गोयल अपनी यादों में जाकर बताती हैं कि -‘पुष्पांजलि हाॅस्पिटल की गहन चिकित्सा इकाई में जीवन रक्षक प्रणाली पर जीवन-मृत्यु से संघर्ष करती नन्हीं सी राधा के वो बीस दिन भुलाए नहीं भूलते।’ नवम्बर 2013 में वात्सल्य परिवार की नन्हीं सदस्या राधा को साँस लेने की तकलीफ के बाद हुए उसके चिकित्सकीय परीक्षण में उसे न्यूूमोनिया रोग से ग्रस्त पाया गया जो कि गंभीर स्थिति में था। फेफड़ों के संक्रमण के बाद उसका एक आॅपरेशन भी किया गया। जिसके बाद बीस दिनों तक वो वेंटीलेटर पर ‘कोमा’ जैसी स्थिति में थी। एक अच्छी-खासी और हँसती-खेलती नन्हीं बच्ची यूँ अचानक गहरी बेहोशी में चली जाएगी, इसका अंदाजा किसी को भी नहीं था। हर दिन, हर पल सब उसकी आँखें खुलने की प्रतीक्षा करते लेकिन उसके शरीर में कोई हरकत नहीं होती थी, सिवाय उसकी मन्द गति से चल रही साँसों के। हाॅस्पिटल की पूरी मेडिकल टीम सारी संभावनाओं के मद्देनज़र उसके इलाज में जुटी हुई थी। सब लोग परमेश्वर से प्रार्थना करते, दीदी माँ जी से उसके लिए आशीर्वाद माँगते। ऐलोपैथी के साथ ही उसे होम्योपैथिक दवाएँ भी दी गईं। उसका जीवन बचाने के सम्मिलित प्रयास, जिनमें दवा और दुआ दोनों ही शामिल थे, अन्ततः सफल हुए। वात्सल्य परिवार खुशी से झूम उठे जब राधा ने अपनी नन्हीं आँखे खोलकर फिर से दुनिया को देखा।

(चार)

वर्ष 2014 की गर्मियों के दिन। वात्सल्य ग्राम, वृंदावन के कार्यालय में सूचना मिली कि एक दम्पत्ति संस्था के प्रशासकीय विभाग से संपर्क करना चाहते हैं और उनके साथ एक नन्हीं नवजात बच्ची भी है। आमतौर पर वात्सल्य ग्राम, वृंदावन का दर्शन करने वाले आगंतुक सबसे पहले स्वागत कक्ष और कार्यालय में ही आते हैं, तो हमें लगा कि वह एक सामान्य शिष्टाचार भेंट के लिए इच्छुक होंगे। उन्हें भीतर बुलाया गया। कक्ष में प्रवेश करते हुए वे दोनों बुझे-बुझे से दिखे। उन्होंने बताया कि वे एक किसान परिवार से हैं। आगे पूछने पर उस युवक की पत्नी ने रोते हुए कहा कि -‘हम यहाँ अपनी नन्हीं नवजात बच्ची को छोड़ने के लिए आए हैं।’ हमें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मध्यमवर्गीय किसान परिवार के उस युवक की आर्थिक स्थिति इतनी भी खराब नहीं थी कि वह उस बच्ची को न पाल सके। जिज्ञासा प्रकट करने पर उस महिला ने विस्तारपूर्वक बताया कि -‘मुझे इसके पहले भी एक बेटी है, जिसके जन्म के समय मेरे ससुराल के लोगों ने मुझे काफी ताने दिए थे। वे बेटा चाहते थे और मेरा बेटी को जन्म देना उनके लिए कष्टकारी था। ऐसा लगा ही नहीं कि मेरे पति को छोड़कर और कोई खुश था, उसके जन्म पर। उसके बाद जब मैं फिर से गर्भवती हुई तो पुत्र जन्म की चाह लिए, मेरे ससुराल वालों ने मुझ पर भ्रूण के लिंग परीक्षण का दबाव बनाया। यह जानते हुए भी कि भ्रूण का लिंग परीक्षण कराना दण्डनीय अपराध है, मैंने अपने ससुर के दबाव में जब यह परीक्षण करवाया तो पता चला कि मेरे गर्भ में फिर से कन्या ही है। यह पता चलते ही परिवार में जैसे कोहराम सा मच गया। तुरन्त ही मुझे गर्भपात करवाने के लिए बाध्य करने की कोशिशें शुरू हो गईं। लेकिन मैं अपने इस निर्णय पर अडिग थी कि मैं किसी भी स्थिति में अपने गर्भस्थ भ्रूण की हत्या नहीं होने दूंगी। मेरे परिवार द्वारा उस कन्या भ्रूण को समाप्त करने की तमाम कोशिशों के बीच भी मैंने उस दूसरी कन्या को जन्म दिया। जिन विरोधों के बीच मैंने उसे जन्म दिया था उनके चलते उसे पालना इतना कठिन हो चला, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। मुझे उसे स्तनपान कराने तक से रोकने की कोशिशें र्हुइं। वह भूखी-प्यासी नवजात बच्ची बिलख-बिलखकर रोती और मुझे किसी ऐसे काम में उलझा दिया जाता, जिसके कारण में उसके पास तक पहुँच ही न सकूँ। पाँच दिनों की वह बच्ची कमजोर तो पहले से ही थी क्योंकि मेरी गर्भावस्था के दौरान मुझे पौष्टिक आहार मिलना तो दूर, सामान्य भोजन भी ठीक से नहीं दिया गया। पूरी कोशिशें इस बात को ध्यान में रखकर की गईं कि कैसे भी वह बच्ची मेरे गर्भ में दम तोड़ दे। लेकिन मेरी इच्छा शक्ति के कारण वह जन्मी। दस-बारह दिनों के बाद जब उसे बुखार आया, तब मुझे उसे डाॅक्टर के पास ले जाने तक से रोक दिया गया। अब मुझे यह लगने लगा था कि मेरे ससुराल वाले इस बच्ची की जान लेकर ही रहेंगे। मैंने इस दिशा में सोचना शुरू किया कि भले ही यह बच्ची मेरे पास न रहे, लेकिन इसका जीवित रहना बहुत जरूरी है। इसी सोच-विचार के बीच मुझे ख्याल आया कि दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी का एक वात्सल्य ग्राम है वृंदावन में। क्यों न इस बच्ची को उनकी शरण में छोड़ आया जाए। कितने ही बच्चों को वो पाल रही हैं, तो उनके साथ ये भी पल जाएगी। कम से कम इसकी जान तो बचेगी। यही विचार करके आज हम दोनों पति-पत्नी चुपचाप घर से भागकर यहाँ आ गए हैं और इस बच्ची को वात्सल्य ग्राम में छोड़कर जाना चाहते हैं। इस घटना का वर्णन करते हुए कलम उस माँ के दर्द को लिख पाने में असमर्थ थी, जिसने उस माँ को अन्तिम बार अपनी लाडली बेटी को स्तन पान कराते हुए देखा था। बच्ची को पाल पाने की क्षमता होने के बावजूद भी उसे अपने से अलग करते हुए उस माँ के फटते कलेजे की धमक वहाँ मौजूद सभी लोगों के दिलों को हिला रही थी। वह बार-बार उस बच्ची को गले से लगाती। बुखार से तप रही बच्ची को हमेशा के लिए अपने से अलग करते समय उस माँ की छटपटाहट को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। इस दृश्य के साक्षी लोग उस माँ की संकल्प शक्ति के आगे नतमस्तक थे, जिसने जाने कितने दबावों के बावजूद भी न केवल उस बच्ची को जन्म दिया बल्कि उसकी जिंदगी को बचाने के लिए अनेक संघर्षों के बीच वह वात्सल्य ग्राम तक जा पहुँची थी। वात्सल्य परिवार एक विवश माँ के उस संकल्प का आभारी था, जो कहीं न कहीं दीदी माँ जी के ‘बेटी बचाओ आंदोलन’ का एक हिस्सा बनने जा रहा था। उस माँ का दर्द देखकर सबकी आँखें भरी हुई थीं। वात्सल्य ग्राम ने पहली बार ये दृश्य देखा था जब कोई माँ वात्सल्य के पालने में अपनी ममता को सबके सामने रोते-बिलखतेे हुए छोड़कर जा रही हो। रह-रहकर मन-मस्तिष्कों में यह विचार उठता रहा कि कितना निष्ठुर होता है मनुष्य! देवी जैसी आभा लिए उस सुंदर, सुकोमल बच्ची को देखकर हम सब लोगों के दिल दहल उठे कि कैसे कोई व्यक्ति अपनी इस नवजात पोती को मार डालने पर आमादा हो सकता है! आम तौर पर इस प्रकार के बच्चों को लोग वात्सल्य ग्राम के पालना घर में गोपनीय रूप से छोड़ जाते हैं लेकिन यह मामला अलग तरह का था, जिसमें बच्ची के माता-पिता स्वयं प्रस्तुत होकर अपनी विवशता के साथ बच्ची को सौंपना चाहते थे इसलिए इस संबंध में उनकी लिखित सहमति के साथ उस बच्ची को वात्सल्य ग्राम ने स्वीकार कर लिया। इतने वर्षों के बाद आज वह बच्ची पूरे वात्सल्य परिवार में अन्य बच्चों के समान ही सबकी लाडली है।

पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी के पावन मार्गदर्शन में परमशक्ति पीठ द्वारा संचालित मानव सेवा के प्रकल्प :

  1. वात्सल्य ग्राम, वृन्दावन (उत्तरप्रदेश)
  2. कृष्णा ब्रम्हरतन विद्या मंदिर, वात्सल्य ग्राम, वृन्दावन (उत्तरप्रदेश)
  3. समविद गुरुकुलम सीनियर सेकेंडरी स्कूल, वात्सल्य ग्राम, वृन्दावन (उत्तरप्रदेश)
  4. प्रेमवती गुप्ता नेत्र चिकित्सालय, वात्सल्य ग्राम, वृन्दावन (उत्तरप्रदेश)
  5. वैशिष्ट्यम - विशेष बच्चों का निःशुल्क प्रशिक्षण केंद्र, वात्सल्य ग्राम, वृन्दावन (उत्तरप्रदेश)
  6. "उद्यमिता" - महिलाओं के लिए निःशुल्क व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र, वात्सल्य ग्राम, वृन्दावन (उत्तरप्रदेश)
  7. निःशुल्क कम्प्यूटर प्रशिक्षण केंद्र, वात्सल्य ग्राम, वृन्दावन (उत्तरप्रदेश)
  8. कामधेनु गौगृह गौशाला, वात्सल्य ग्राम, वृन्दावन (उत्तरप्रदेश)
  9. वात्सल्य अकादमी, ज्वालानगर (दिल्ली)
  10. स्वामी परमानन्द प्राकृतिक चिकित्सालय, योग एवं अनुसन्धान केंद्र
  11. युगचेतना वात्सल्य पीठ, नालागढ़ (हिमाचल प्रदेश)
  12. वात्सल्य सेवा केंद्र, गुप्तकाशी (उत्तराखंड)
  13. समविद गुरुकुलम आवासीय कन्या विद्यालय, ओंकारेश्वर (मध्यप्रदेश)
  14. समविद गुरुकुलम इंग्लिश मीडियम स्कूल, ओंकारेश्वर (मध्यप्रदेश)
  15. समविद गुरुकुलम स्कूल, सिजई, छतरपुर (मध्यप्रदेश)
  16. वात्सल्य ग्राम, महीषा, डाकोरजी (गुजरात)
  17. वात्सल्य सेवा केंद्र, बाड़मेर (राजस्थान)

साध्वी ऋतम्भरा आध्यात्मिक हिन्दू नेत्री हैं जो बहुत से मानवतावादी सामाजिक प्रकल्पों की प्रेरणा स्रोत हैं। वात्सल्य ग्राम की संकल्पना साध्वी जी की अनुपम देन है। वे अयोध्या के राममन्दिर आन्दोलन से जुड़ी रहीं हैं।

परिचय[संपादित करें]

अभी कुछ दिनों पूर्व श्रीकृष्ण की लीला स्थली वृन्दावन जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। श्रीकृष्ण की महक से सुवासित इस धार्मिक नगरी में अब भी एक अपना ही आकर्षण है। यहाँ मन्दिरों की बहुतायत और तंग गलियों के मध्य अब भी लोगों के ह्रदय में श्रीकृष्ण विद्यमान हैं। परन्तु इस नगरी में ही एक नये तीर्थ का उदय हुआ है और यदि वृन्दावन जाकर उसका दर्शन न किया तो समझना चाहिये कि यात्रा अधूरी ही रही. यह आधुनिक तीर्थ दीदी माँ के नाम से विख्यात साध्वी ऋतम्भरा ने बसाया है। वृन्दावन शहर से कुछ बाहर वात्सल्य ग्राम के नाम से प्रसिद्ध यह स्थान अपने आप में अनेक पटकथाओं का केन्द्र बन सकता है किसी भी संवेदनशील साहित्यिक अभिरूचि के व्यक्ति के लिये. इस प्रकल्प के मुख्यद्वार के निकट यशोदा और बालकृष्ण की एक प्रतिमा वात्सल्य रस को साकार रूप प्रदान करती है। वास्तव में इस अनूठे प्रकल्प के पीछे की सोच अनाथालय की व्यावसायिकता और भावहीनता के स्थान पर समाज के समक्ष एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत करने की अभिलाषा है जो भारत की परिवार की परम्परा को सहेज कर संस्कारित बालक-बालिकाओं का निर्माण करे न कि उनमें हीन भावना का भाव व्याप्त कर उन्हें अपनी परम्परा और संस्कृति छोड़ने पर विवश करे.

समाज में दीदी माँ के नाम से ख्यात साध्वी ऋतम्भरा ने इस परिसर में ही भरे-पूरे परिवारों की कल्पना साकार की है। एक अधेड़ या बुजुर्ग महिला नानी कहलाती हैं, एक युवती उसी परिवार का अंग होती है जिसे मौसी कहा जाता है और उसमें दो शिशु होते हैं। यह परिवार इकाई परिसर में रहकर भी पूरी तरह स्वायत्त होती है। मौसी और नानी अपना घर छोड़कर पूरा समय इस प्रकल्प को देती हैं और वात्सल्य ग्राम का यह परिवार ही उनका परिवार होता है। इसके अतिरिक्त वात्सल्य ग्राम ने देश के प्रमुख शहरों में हेल्पलाइन सुविधा में दे रखी है जिससे ऐसे किसी भी नवजात शिशु को जिसे किसी कारणवश जन्म के बाद बेसहारा छोड़ दिया गया हो उसे वात्सल्य ग्राम के स्वयंसेवक अपने संरक्षण में लेकर वृन्दावन पहुँचा देते हैं। दीदी माँ ने एक बालिका को भी दिखाया जिसे नवजात स्थिति में दिल्ली में कूड़ेदान में फेंक दिया गया था और उसक मस्तिष्क का कुछ हिस्सा कुत्ते खा गये थे। आज वह बालिका स्वस्थ है और चार वर्ष की हो गई है। ऐसे कितने ही शिशुओं को आश्रय दीदी माँ ने दिया है परन्तु उनका लालन-पालन आत्महीनता के वातावरण में नहीं वरन् संस्कारक्षम पारिवारिक वातावरण में हो रहा है। यही मौलिकता वात्सल्य ग्राम को अनाथालयों की कल्पना से अलग करती है।

दीदी माँ यह प्रकल्प देखकर जो पहला विचार मेरे मन में आया वह हिन्दुत्व की व्यापकता और उसके बहुआयामी स्वरूप को लेकर आया। ये वही साध्वी ऋतम्भरा हैं जिनकी सिंह गर्जना ने 1989-90 के श्रीराम मन्दिर आन्दोलन को ऊर्जा प्रदान की थी, परन्तु उसी आक्रामक सिंहनी के भीतर वात्सल्य से परिपूर्ण स्त्री का ह्रदय भी है जो सामाजिक संवेदना के लिये द्रवित होता है। यही ह्रदय की विशालता हिन्दुत्व का आधार है कि अन्याय का डटकर विरोध करना और संवेदनाओं को सहेज कर रखना. सम्भवत: हिन्दुत्व को रात दिन कोसने वाले या हिन्दुत्व की विशालता के नाम पर हिन्दुओं को नपुंसक बना देने की आकांक्षा रखने वाले हिन्दुत्व की इस गहराई को न समझ सकें।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]