साइमन कमीशन

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साइमन कमीशन की नियुक्ति ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में की थी। इसका उद्देश्य भारत में दलितों व पिछड़ों पर हो रहे शोषण पर एक रिपोर्ट तैयार करना था। इस कमीशन में सात सदस्य थे, जो सभी ब्रिटेन की संसद के मनोनीत सदस्य थे। यही कारण था कि इसे 'श्वेत कमीशन' कहा गया। श्वेत कमीशन कहना सवर्णों की चाल भी थी। साइमन कमीशन की घोषणा 8 नवम्बर, 1927 ई. को की गई। कमीशन को इस बात की जाँच करनी थी कि क्या भारत इस लायक़ हो गया है कि यहाँ लोगों को संवैधानिक अधिकार दिये जाएँ। इस कमीशन में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया या कहे ऊंच जाति के सवर्णों को शामिल नहीं किया गया, जिस कारण इसका बहुत ही तीव्र विरोध हुआ।

Real Story of Simon Commission

  1. साइमनकमीशन का भारत के असली नेता #ननकूरामकोरी, #रामचरणमल्लाह, #चौधरीयादराम, #सरदार #पृथ्वीसिंहजाटव, #ज्ञानदेवध्रुवनाथघोलप, #छेदीलालमिस्त्री, #बाबूरामनारायणकोरी, #खेमचंदजाटव जैसे प्रखर समाज सुधारक सर #छोटूराम, #अछूतानंद, #मंगूराम मंगोवालिया, डॉ अंबेडकर और #शिवदयालसिंहचौरसिया की अगुवाई में खुलकर स्वागत कर रहे थे, जबकि गांधी और लाजपत राय उतारू थे किसी भी हालत में दलितों और पिछड़ों को विधायिका में नहीं पहुंचने देना है। इन लोगों ने यह कहकर भारत की जनता को भड़का दिया कि साइमन कमीशन में कोई भारतीय नहीं है इसलिए विरोध किया जाए।

साइमन कमीशन में भारतीय इसलिए नहीं रखे गए थे क्योंकि भारतीय के नाम पर केवल सवर्ण और गांधी के चेले ही रहते जो कि सामाजिक भागीदारी का काम कतई नहीं होने देते। 1917 में अंग्रेजो ने एक कमेटी का गठन किया था, जिसका नाम था "साउथ एनबरो कमीशन" जिसका मकसद भारत के दलितों-पिछड़ों को हर क्षेत्र में अलग-अलग प्रतिनिधित्व देना था।

उस समय ओबीसी की तरफ से "क्षत्रपति शाहू महाराज" ने #भास्कररावजाधव को, और एससी एसटी की तरफ से डॉ अंबेडकर  को इस कमीशन के समक्ष अपनी मांग रखने के लिए भेजा ।  इस बात से बाल गंगाधर तिलक भड़क गए। कोल्हापुर के पास "अथनी"  गांव" में एक सभा  बोल पड़े- " तेली, तंबोली, कुर्मी, कुम्भटों को संसद में जाकर क्या हल चलाना है ? 

तिलक की बेसिरपैर की बात को अंग्रेजों ने नहीं माना और 1919 में अंग्रजों ने यहां तक कह दिया कि "भारत के ब्राह्मणों में भारत की बहु संख्यक लोगों के प्रति न्यायिक चरित्र नहीं है !"* इसके 10 साल बाद 1927 में "साइमन कमीशन" भारत में एक ओर सर्वे करने आया ,जिसका काम दलितों-पिछड़ों को उचित प्रतिनिधित्व देने के सुझाव देने थे। इस कमीशन के सात लोगों में सब संसदीय लोग थे , और न्यायिक चरित्र के अभाव वाले किसी नेता को इसमें शामिल नहीं किया गया था जो जातीय आधार पर साइमन कमीशन के उद्देश्यों के ही खिलाफ थे। साइमन कमीशन भारत आया तो गांधी, लाला लाजपराय, नेहरू और आरएसएस ने भारतीयता के नाम पर जनता को भड़का दिया। लाला लाजपत राय तो जान देने पर आमादा हो गए थे और अंतत: पुलिस के लाठीचार्ज में मारे गए। उनकी मौत से देश में आंदोलन उग्र हो गया लेकिन लाजपत राय की जाति के किसी भी व्यक्ति ने उनकी मौत का बदला लेने के बारे में सोचा तक नहीं। ये काम भगत सिंह ने किया जिनके लाजपत राय से गंभीर मतभेद थे और लाजपत राय तो भगत सिंह के खिलाफ थे ही। गांधी ने साइमन कमीशन में ब्राह्मणों-बनियों को न रखे जाने के नाम पर भारी विरोध किया। ऐसे में चौधरी सर छोटूराम जी ने एक दिन पहले ही लाहौर के रेलवे स्टेशन पर जाकर साइमन कमीशन का स्वागत किया ! यूपी में ऐसा ही स्वागत माननीय शिवदयाल सिंह चौरसिया ने किया, और डॉ अंबेडकर ने तो साइमन कमीशन के सामने जोरदार तरीके से प्रतिवेदन पेश ही किया। ननकूराम कोरी, रामचरण मल्लाह, चौधरी यादराम, सरदार पृथ्वी सिंह जाटव,ज्ञानदेव ध्रुवनाथ घोलप, छेदीलाल मिस्त्री, बाबू रामनारायण कोरी, खेमचंद जाटव, #अछूतानंद, #मंगूराम मंगोवालिया, जैसे प्रखर समाज सुधारकों ने बहुसंख्यक जनता को समझाने की कोशिश की कि साइमन कमीशन के विरोध के नाम पर ब्राह्मण-बनिया दलितों-पिछड़ों की हकमारी जारी रखना चाहते हैं। इन लोगों ने कई जगह सभाएं कीं और साइमन कमीशन का स्वागत किया।

साइमन कमीशन के सम्मुख 18 दलित संगठनों ने अपने साक्ष्य प्रस्तुत किए थे, जिनमें से 16 संगठनों ने पृथक निर्वाचन प्रणाली की माँग रखी थी। डॉ. अंबेडकर ने अल्पसंख्यकों की रक्षा हेतु वीटो पावर, विधायिका, निकायों, विश्वविद्यालयों आदि में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण, नौकरियों में छूट, मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व, शिक्षा में विशेष अनुदान आदि माँगे रखी थी जिस पर आयोग का रवैया काफी सकारात्मक रहा।

"गोलमेज सम्मेलन" में लंदन जाकर बाबासाहेब डॉ अंबेडकर ने गांधी जी के विरोध के बावजूद भी पुरजोर तरीके से भारत के दलितों-पिछड़ों को बराबरी के हक दिलाने की बात की जिससे सभी जातियों को मताधिकार हासिल हो सका। इस बारे में तिलक और गांधी की नहीं चल पाई।

गांधी, नेहरू, लाजपत राय, और आरएसएस साइमन कमीशन का इसीलिए विरोध कर रहे थे , क्योंकि इनकी संख्या भारत में मुश्किल से 10% है और इनको ग्राम पंचायत का पंच तक नहीं चुना जा सकता था, इसलिए 90% एससी, एस टी और ओबीसी के वोट के अधिकार , शिक्षा, संपत्ति पाने और रखने के अधिकार और मताधिकार का ये विरोध करने में ही इनका हित था। - Compiled by Purushottam Athiya

स्थापना[संपादित करें]

1919 ई. के 'भारत सरकार अधिनियम' में यह व्यवस्था की गई थी, कि 10 वर्ष के उपरान्त एक ऐसा आयोग नियुक्त किया जायेगा, जो इस अधिनियम से हुई प्रगति की समीक्षा करेगा। भारतीय भी द्वैध शासन (प्रान्तों में) से ऊब चुके थे। वे इसमें परिवर्तन चाहते थे। अत: ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने समय से पूर्व ही सर जॉन साइमन के नेतृत्व में 7 सदस्यों वाले आयोग की स्थापना की, जिसमें सभी सदस्य ब्रिटेन की संसद के सदस्य थे।

विरोध[संपादित करें]

'साइमन कमीशन' के सभी सदस्य अंग्रेज़ होने के कारण कांग्रेसियों ने इसे 'श्वेत कमीशन' कहा। 8 नवम्बर, 1927 को इस आयोग की स्थापना की घोषणा हुई। इस आयोग का कार्य इस बात की सिफ़ारिश करना था कि, क्या भारत इस योग्य हो गया है कि, यहाँ के लोगों को और संवैधानिक अधिकार दिये जाएँ और यदि दिये जाएँ तो उसका स्वरूप क्या हो? इस आयोग में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया, जिसके कारण भारत में इस आयोग का तीव्र विरोध हुआ। 'साइमन कमीशन' के विरोध के दूसरे कारण की व्याख्या करते हुए 1927 ई. के मद्रास कांग्रेस के अधिवेशन के अध्यक्ष श्री एम.एन. अंसारी ने कहा कि "भारतीय जनता का यह अधिकार है कि वह सभी सम्बद्ध गुटों का एक गोलमेज सम्मेलन या संसद का सम्मेलन बुला करके अपने संविधान का निर्णय कर सके। साइमन आयोग की नियुक्ति द्वारा निश्चय ही उस दावे को नकार दिया गया है।"

विरोध 'साइमन कमीशन' के सभी सदस्य अंग्रेज़ होने के कारण कांग्रेसियों ने इसे 'श्वेत कमीशन' कहा। 8 नवम्बर, 1927 को इस आयोग की स्थापना की घोषणा हुई। इस आयोग का कार्य इस बात की सिफ़ारिश करना था कि, क्या भारत इस योग्य हो गया है कि, यहाँ के लोगों को और संवैधानिक अधिकार दिये जाएँ और यदि दिये जाएँ तो उसका स्वरूप क्या हो? इस आयोग में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया, जिसके कारण भारत में इस आयोग का तीव्र विरोध हुआ। 'साइमन कमीशन' के विरोध के दूसरे कारण की व्याख्या करते हुए 1927 ई. के मद्रास कांग्रेस के अधिवेशन के अध्यक्ष श्री एम.एन. अंसारी ने कहा कि "भारतीय जनता का यह अधिकार है कि वह सभी सम्बद्ध गुटों का एक गोलमेज सम्मेलन या संसद का सम्मेलन बुला करके अपने संविधान का निर्णय कर सके। साइमन आयोग की नियुक्ति द्वारा निश्चय ही उस दावे को नकार दिया गया है।"

साइमन कमीशन के सुझाव[संपादित करें]

साइमन कमीशन की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि-

  1. प्रांतीय क्षेत्र में विधि तथा व्यवस्था सहित सभी क्षेत्रों में उत्तरदायी सरकार गठित की जाए।
  2. केन्द्र में उत्तरदायी सरकार के गठन का अभी समय नहीं आया।
  3. केंद्रीय विधान मण्डल को पुनर्गठित किया जाय जिसमें एक इकाई की भावना को छोड़कर संघीय भावना का पालन किया जाय। साथ ही इसके सदस्य परोक्ष पद्धति से प्रांतीय विधान मण्डलों द्वारा चुने जाएं।[1]

विरोध और लाला लाजपत राय की मृत्यु[संपादित करें]

कमीशन के सभी सदस्य अंग्रेज थे जो भारतीयों का बहुत बड़ा अपमान था। चौरी चौरा की घटना के बाद असहयोग आन्दोलन वापस लिए जाने के बाद आजा़दी की लड़ाई में जो ठहराव आ गया था वह अब साइमन कमीशन के गठन की घोषणा से टूट गया। 1927 में मद्रास में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ जिसमें सर्वसम्मति से साइमन कमीशन के बहिष्कार का फैसला लिया गया जिसमें नेहरु, गांधी सभी ने इसका विरोध करनेका निर्णय लिया । मुस्लिम लीग ने भी साइमन के बहिष्कार का फैसला किया।

3 फरवरी 1928 को कमीशन भारत पहुंचा। साइमन कोलकाता लाहौर लखनऊ, विजयवाड़ा और पुणे सहित जहाँ जहाँ भी पहुंचा उसे जबर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ा और लोगों ने उसे काले झंडे दिखाए। पूरे देश में साइमन गो बैक (साइमन वापस जाओ) के नारे गूंजने लगे। लखनऊ में हुए लाठीचार्ज में पंडित जवाहर लाल नेहरू घायल हो गए और गोविंद वल्लभ पंत अपंग। 30 अक्टूबर 1928 को लाला लाजपत राय के नेतृत्व में साइमन का विरोध कर रहे युवाओं को बेरहमी से पीटा गया। पुलिस ने लाला लाजपत राय की छाती पर निर्ममता से लाठियां बरसाईं। वह बुरी तरह घायल हो गए और मरने से पहले उन्होंने बोला था कि "आज मेरे उपर बरसी हर एक लाठी कि चोट अंग्रेजोंं की ताबूत की कील बनेगी" अंतत: इस कारण 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई।

क्रान्तिकारियों द्वारा बदला[संपादित करें]

वह दिन था ३० अक्टूबर १९२८ का। संवैधानिक सुधारों की समीक्षा एवं रपट तैयार करने के लिए सात सदस्यीय साइमन कमीशन लाहौर पहुंचा। पूरे भारत में "साइमन गो बैक" के रंगभेदी नारे गूंज रहे थे। इस कमीशन के सारे ही सदस्य गोरे थे, एक भी भारतीय नहीं।

लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन का नेतृत्व शेर-ए-पंजाब लाला लाजपत राय ने किया। नौजवान भारत सभा के क्रांतिकारियों ने साइमन विरोधी सभा एवं प्रदर्शन का प्रबंध संभाला। जहां से कमीशन के सदस्यों को निकलना था, वहां भीड़ ज्यादा थी। लाहौर के पुलिस अधीक्षक स्कॉट ने लाठीचार्ज का आदेश दिया और उप अधीक्षक सांडर्स जनता पर टूट पड़ा। भगत सिंह और उनके साथियों ने यह अत्याचार देखा, किन्तु लाला जी ने शांत रहने को कहा। लाहौर का आकाश ब्रिटिश सरकार विरोधी नारों से गूंज रहा था और प्रदर्शनकारियों के सिर फूट रहे थे। इतने में स्कॉट स्वयं लाठी से लाला लाजपत राय को निर्दयता से पीटने लगा और वह गंभीर रूप से घायल हुए। अंत में उन्होंने जनसभा में सिंह गर्जना की, मेरे शरीर पर जो लाठियां बरसाई गई हैं, वे भारत में ब्रिटिश शासन के कफन की अंतिम कील साबित होंगी। १८ दिन बाद १७ नवम्बर १९२८ को यही लाठियां लाला लाजपत राय की शहादत का कारण बनीं। भगत सिंह और उनके मित्र क्रांतिकारियों की दृष्टि में यह राष्ट्र का अपमान था, जिसका प्रतिशोध केवल "खून के बदले खून" के सिद्धांत से लिया जा सकता था। १० दिसम्बर १९२८ की रात को निर्णायक फैसले हुए। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, जय गोपाल, दुर्गा भाभी आदि एकत्रित हुए। भगत सिंह ने कहा कि उसे मेरे हाथों से मरना चाहिए। आजाद, राजगुरु, सुखदेव और जयगोपाल सहित भगत सिंह को यह काम सौंपा गया।

१७ दिसम्बर १९२८ को उप-अधीक्षक सांडर्स दफ्तर से बाहर निकला। उसे ही स्कॉट समझकर राजगुरु ने उस पर गोली चलाई, भगत सिंह ने भी उसके सिर पर गोलियां मारीं। अंग्रेज सत्ता कांप उठी। अगले दिन एक इश्तिहार भी बंट गया, लाहौर की दीवारों पर चिपका दिया गया। लिखा था- हिन्दुस्थान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने लाला लाजपत राय की हत्या का प्रतिशोध ले लिया है और फिर "साहिब" बने भगत सिंह गोद में बच्चा उठाए वीरांगना दुर्गा भाभी के साथ कोलकाता मेल में जा बैठे। राजगुरु नौकरों के डिब्बे में तथा साधु बने आजाद किसी अन्य डिब्बे में जा बैठे। स्वतंत्रता संग्राम के नायक नया इतिहास बनाने आगे निकल गए। कोलकाता में भगत सिंह अनेक क्रांतिकारियों से मिले। भगवती चरण वहां पहले ही पहुंचे हुए थे। सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने का विचार भी कोलकाता में ही बना था। इसके लिए अवसर भी शीघ्र ही मिल गया। केन्द्रीय असेंबली में दो बिल पेश होने वाले थे- "जन सुरक्षा बिल" और "औद्योगिक विवाद बिल" जिनका उद्देश्य देश में उठते युवक आंदोलन को कुचलना और मजदूरों को हड़ताल के अधिकार से वंचित रखना था।

भगत सिंह और आजाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की बैठक में यह फैसला किया गया कि ८ अप्रैल १९२९ को जिस समय वायसराय असेंबली में इन दोनों प्रस्तावों को कानून बनाने की घोषणा करें, तभी बम धमाका किया जाए। इसके लिए श्री बटुकेश्वर दत्त और विजय कुमार सिन्हा को चुना गया, किन्तु बाद में भगत सिंह ने यह कार्य दत्त के साथ स्वयं ही करने का निर्णय लिया।

ठीक उसी समय जब वायसराय जनविरोधी, भारत विरोधी प्रस्तावों को कानून बनाने की घोषणा करने के लिए उठे, दत्त और भगत सिंह भी खड़े हो गए। पहला बम भगत सिंह ने और दूसरा दत्त ने फेंका और "इंकलाब जिंदाबाद" का नारा लगाया। एकदम खलबली मच गई, जॉर्ज शुस्टर अपनी मेज के नीचे छिप गया। सार्जेन्ट टेरी इतना भयभीत था कि वह इन दोनों को गिरफ्तार नहीं कर पाया। दत्त और भगत सिंह आसानी से भाग सकते थे, लेकिन वे स्वेच्छा से बंदी बने। उन्हें दिल्ली जेल में रखा गया और वहीं मुकदमा भी चला।

इसके बाद दोनों को लाहौर ले जाया गया, पर भगत सिंह को मियांवाली जेल में रखा गया। लाहौर में सांडर्स की हत्या, असेंबली में बम धमाका आदि मामले चले और ७ अक्टूबर १९३० को ट्रिब्यूनल का फैसला जेल में पहुंचा। जो इस प्रकार था-भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी, कमलनाथ तिवारी, विजय कुमार सिन्हा, जयदेव कपूर, शिव वर्मा, गया प्रसाद, किशोर लाल और महावीर सिंह को आजीवन, कुंदनलाल को सात तथा प्रेमदत्त को तीन साल का कठोर कारावास। दत्त को असेंबली बम कांड के लिए उम्रकैद का दंड सुनाया गया।saiman kamisan ke Karan bahut logo ki Jan hai thi

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. आधुनिक भारत का इतिहास, (बी एल ग्रोवर, अलका मेहता, यशपाल), एस चन्द एण्ड कम्पनी लिमिटेड, २0१0, पृष्ठ- ४00, ISBN ८१-२१९-00३४-४