साँची (Sanchi, संस्कृत: साञ्चीस्तूपः) भारत के मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन ज़िले में साँची नगर के पास एक पहाड़ी पर स्थित एक छोटा सा गांव है।
भारत में मौजूद सबसे पुराने बौद्ध स्तूपों में से एक साँची का स्तूप संख्या-2 है। इसे साँची 2 या साँची द्वितीय स्तूप भी कहते हैं। यह स्तूप मध्य प्रदेश राज्य के साँची स्थित बौद्ध स्मारक समूह का हिस्सा है। यह स्तूप खास है क्योंकि इसमें भारत की सबसे पुरानी सुंदर नक्काशी देखने को मिलती है। माना जाता है कि ये नक्काशियाँ बोधगया के महाबोधि मंदिर और भरहुत[1] की नक्काशियों से भी पहले की हो सकती हैं।[2]
साँची के स्तूप II में बहुत पुरानी और सुंदर सजावट देखने को मिलती है एवं इसकी नक्काशियों में जातक कथाओं से जुड़ी कई कहानियाँ दिखाई गई हैं। इसलिए ऐसा माना जाता है की जातक कथाओं के चित्रों की शुरुआत यहीं से देखा जाता है।[1]
सांची पहाड़ी का नक्शा, जिसमें स्तूप 2 पश्चिम दिशा में सबसे बाईं ओर स्थित है।
स्तूप संख्या 2 सांची के बौद्ध परिसर में स्थित है। माना जाता है कि इसे सांची के महान स्तूप यानी स्तूप संख्या 1 के बाद बनाया गया था। यहाँ मौर्य काल (323–185 ईसा पूर्व) के कुछ अवशेष भी मिले हैं। इस स्तूप की सबसे खास बात इसकी सुंदर और पुरानी नक्काशी है। इसे भारत के उन सबसे शुरुआती स्तूपों में माना जाता है, जिन पर सजावटी नक्काशी की गई थी। इसकी नक्काशी स्तूप संख्या 1 की नक्काशी से लगभग 100 साल पुरानी मानी जाती है।[1]
स्तूप में एक अवशेष पेटी मिली थी। इसमें चार छोटे ताबूत थे, जिनमें मानव हड्डियाँ रखी हुई थीं। इस पेटी पर प्रारंभिक ब्राह्मी लिपि में लिखीं हुई एक शिलालेख भी मिला। जिसमें लिखा था कि इसमें कासपगोता और वाची-सुविजयिता सहित कई शिक्षकों के अवशेष रखे गए हैं।[3] इसके अलावा इन ताबूतों पर दस बौद्ध संतों के नाम भी लिखे हुए थें। माना जाता है कि इनमें से कुछ संतों ने अशोक के समय हुई तीसरी बौद्ध संगीति में भाग लिया था। कुछ संतों को बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए हिमालय के क्षेत्रों में भेजा गया था।
इनमें मोगलिपुत्र नाम भी मिलता है। हो सकता है कि यह मोगलिपुत्र तिस्स हों, जिन्हें तीसरी बौद्ध संगीति का अध्यक्ष माना जाता है। हालांकि, इस बात को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है।[3]
साँची स्तूप 2 की रेलिंग पर ब्राह्मी लिपि में कई छोटे-छोटे लेख मिले हैं। इन लेखों की लिखने की शैली भरहुत स्तूप के लेखों जैसी है। इस समानता से पता चलता है कि साँची स्तूप 2 और भरहुत स्तूप लगभग एक ही समय में बनाए गए होंगे।
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साँची में रेल, सड़क और हवाई मार्ग तीनों से पहुँचा जा सकता है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन साँची ही है, लेकिन वहाँ बड़ी ट्रेनें नहीं रुकती हैं। इसलिए विदिशा या भोपाल से भी साँची पहुँचा जा सकता है। इनमें विदिशा रेलवे स्टेशन सबसे पास है।अगर हवाई जहाज से जाना हो, तो भोपाल उतरकर वहाँ से सड़क के रास्ते साँची पहुँचा जा सकता है।
साँची एक विश्व धरोहर स्थल है, इसलिए यह आमतौर पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है। मुख्य सड़क के पास ही साँची का संग्रहालय भी है।
123Alexander Peter Bell Didactic Narration: Jataka Iconography in Dunhuang with a Catalogue of Jataka Representations in China. LIT Verlag Münster, 2000 p.15ff
↑"The railing of Sanchi Stupa No.2, which represents the oldest extensive stupa decoration in existence, (and) dates from about the second century B.C.E" John Clifford Holt, Jacob N. Kinnard & Jonathan S. Walters, Constituting Communities: Theravada Buddhism and the Religious Cultures of South and Southeast Asia. SUNY Press, 2012 p.197
↑"The hippocamps, the tritons, centaurs and other weird creatures, which certainly were borrowed from Western Art, occur at Gaya and other places, in the sculptures of the early period. Forms more or less similar occur at Mathura and Arnaravati." Banerjee, Gauranga Nath (1920). Hellenism in ancient India. Calcutta. p.64.
↑"A man wrestling with an upright lion on a second stupa relief at north Indian Sanchi" The Parthian Period by Malcolm A. R. Colledge "The scene of king versus rampant lion appears on the coins of Persian satraps in Cilicia. At Dura the oriental tradition is so strong that even Heracles is represented fighting with upraised club a rampant lion; and it is of special interest to note that this same oriental scene of hero fighting rampant lion occurs on the sculptures of the railing pillars of Stupa II at Sanchi in India. The motif was, therefore, widespread and might be called a stock scene in the Parthian repertoire." in Berytus: Archaeological Studies (अंग्रेज़ी भाषा में). American University of Beirut. 12 August 2023. p.291.