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रामेश्वर मंदिर (Rameshwar Temple) उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित एक ऐतिहासिक और पौराणिक शिव मंदिर है। यह मंदिर पिथौरागढ़, चंपावत और अल्मोड़ा जिलों के संगम स्थल पर एक पवित्र धाम के रूप में पूजा जाता है।
पौराणिक महत्व
[संपादित करें]- भगवान राम से संबंध: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना त्रेतायुग में स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। माना जाता है कि भगवान राम ने यहीं पर अस्त्र-शस्त्र और धनुर्विद्या की शिक्षा ली थी।
- स्कन्द पुराण में उल्लेख: महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित स्कन्द पुराण के मानस खंड में इस मंदिर का विस्तार से वर्णन मिलता है। पुराणों के अनुसार, यहाँ पूजन करने का फल काशी विश्वनाथ से 10 गुना और सेतुबंध रामेश्वरम से 100 गुना अधिक मिलता है।
- प्राकृतिक शिवलिंग: मंदिर के भीतर एक प्राकृतिक रूप से बना हुआ शिवलिंग स्थापित है।
भौगोलिक स्थिति
[संपादित करें]यह धाम पिथौरागढ़ मुख्य बाजार से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर मानसरोवर झील से निकलने वाली सरयू नदी और परशुराम द्वारा खोजी गई रामगंगा नदी के पवित्र संगम (पनार) पर बना हुआ है। इस संगम पर स्नान करना हरिद्वार के समान अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
ऐतिहासिक प्रमाण और ताम्रपत्र
[संपादित करें]रामेश्वर मंदिर का ऐतिहासिक महत्व कुमाऊँ के चंद राजाओं के समय से रहा है, जिसके अकाट्य प्रमाण मंदिर से प्राप्त ऐतिहासिक 'रामेश्वर ताम्रपत्र' (शाके 1617 और शाके 1711) से मिलते हैं।[1][2]
- राजा रुद्रचंद का संदर्भ: इस ताम्रपत्र के अनुसार, बीतड़ी (बीतडी) क्षेत्र में 1 ज्यूला भूमि पहले से ही चंद वंश के शासक राजा रुद्रचंद द्वारा मंदिर को चढ़ाई गई थी, जिसे बाद के राजाओं ने भी यथावत बनाए रखा।[2]
- राजा उद्योत चंद का योगदान (सन् 1695): चंद राजवंश के शासक महाराजाधिराज श्री राजा उद्योत चंद ने शाके 1617 (सन् 1695) में प्रतिज्ञापूर्वक रामेश्वर मंदिर को कुल 5 ज्यूला भूमि दान (भूमि चढ़ाई) की थी।[1][2]
- राजा महेंद्र चंद का योगदान (सन् 1789): चंद वंश के अंतिम शासक श्री महेंद्र चंद ने शाके 1711 (सन् 1789) में सूर्य ग्रहण के पावन पर्व पर मंदिर के पुजारियों (वर्मदेव, मणीराम, और हरि जैमद्र) को चार मों भूमि दान की थी और मंदिर में नित्य पूजा व अखंड दीप जलाने की व्यवस्था सुनिश्चित की थी।[2]
दैनिक पूजा और भोग की व्यवस्था
[संपादित करें]इस ऐतिहासिक ताम्रपत्र में राजाओं द्वारा मंदिर के दैनिक संचालन के लिए कड़े नियम और आर्थिक बजट तय किया गया था:[1][2]
- नित्य भोग: प्रतिदिन 2 तामी चावल का भोग और 6 मुट्ठी दाल चढ़ाने का नियम था।
- पूजा सामग्री: प्रतिदिन की पूजा के लिए 2 मुट्ठी अक्षत, 10 पैसे का लाल चंदन, और अखंड दीप के लिए 12 पैसे का तेल निर्धारित था।
- धूप और अन्य सामग्री: सालभर के लिए 5 पैसे का गूगल (धूप), बत्ती बनाने के लिए 8 पैसे का कपड़ा, भोग के लिए 24 पैसे का घी और प्रतिदिन छटांगभर माप के अनुसार नमक देने का नियम राजा द्वारा तय किया गया था।
मंदिर प्रबंधन और परंपराएं
[संपादित करें]- समय: मंदिर के कपाट प्रतिदिन सुबह 5:00 बजे खुलते हैं और शाम 7:00 बजे की आरती के बाद बंद होते हैं।
- मुख्य पुजारी: मंदिर के पारंपरिक मुख्य पुजारी मेलडुंगरी का जोशी परिवार है, और वर्तमान में आनंद बल्लभ जोशी जी इसके मुख्य पुजारी हैं। मंदिर के प्रबंधक के रूप में महेश गिरी जी इसका इंतजाम देखते हैं।
- धार्मिक गतिविधियां: यह स्थल पिथौरागढ़, चंपावत और अल्मोड़ा के लोगों के लिए यज्ञोपवीत संस्कार (जनेऊ), देव डांगरों के पवित्र स्नान और शवदाह संस्कार का मुख्य केंद्र है।
सन्दर्भ
[संपादित करें]- 1 2 3 रामेश्वर ताम्रपत्र (हिन्दी रूपान्तरण अभिलेख) - पृष्ठ 1: महाराजाधिराज श्री राजा उद्योत चंद देव का ऐतिहासिक विवरण (शाके 1617 / सन् 1695)।
- 1 2 3 4 5 रामेश्वर ताम्रपत्र (हिन्दी रूपान्तरण अभिलेख) - पृष्ठ 2: श्री महेन्द्र चंद देव का ऐतिहासिक विवरण (शाके 1711 / सन् 1789)।
- पिथौरागढ़ में इस जगह भगवान राम ने बनाया था मंदिर, यहीं सीखी थी धनुर्विद्या - News18 Uttarakhand, 29 नवंबर 2022.
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