सन्त चरणदास

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
चरणदास की प्रतिमा (चरणदास मंदिर, पुरानी दिल्ली)

सन्त चरणदास (१७०६ - १७८५) भारत के योगाचार्यों की श्रृंखला में सबसे अर्वाचीन योगी के रूप में जाने जाते है। आपने 'चरणदासी सम्प्रदाय' की स्थापना की। इन्होने समन्वयात्मक दृष्टि रखते हुए योगसाधना को विशेष महत्व दिया।

परिचय[संपादित करें]

चरण दास जी का जन्म् सन् 1706 ई0 में राजस्थान के अलवर जिला (मेवाड़ क्षेत्र) के डेहरा ग्रांम में हुआ था। बचपन में इनकी माता का देहान्त हो गया था। इनके पिता ने भी इस समय गृहत्याग दिया था। इस कारण चरणदास जी को उनके नाना जो कि दिल्ली में निवास करते थे, अपने साथ दिल्ली ले कर आ गये। इस समय चरणदास जी मात्र 7 वर्ष के थे। इस काल में भारत अनेकों सामाजिक कुरीतियों का शिकार था। ऊँच-नीच जाति-पांति का विकृत स्वरूप था। जनता मनसबदारों से त्रस्त थी। समाज में समाजिक मूल्यों का पतन हो चुका था। तांत्रिक बौद्धों के प्रभाव अभी जीवित बने हुऐ थे। छोटे-छोटे राजा आपस में लड़कर पाश्चात्य राजसत्ता के समक्ष अपना सब कुछ गवाँ रहे थे। अषतोष असुरक्षा सांस्कृतिक धार्मिक शून्यता फैलती जा रही थी। ऐसे समय में चरणदास जी कृष्ण-भक्ति की सशक्त डोर लिए जीवन के लक्ष्य साधन हेतु अष्टांग योग की साधना का प्रचार करने लगे। 79 वर्ष की अवस्था में सन् 1785 ई0 में चरणदास जी समाधिस्थ हुए। एक ही स्थान पर जीवनपर्यन्त इनकी योगसाधना चलती रही। आज भी जामा मस्जिद के पास इनका आखाड़ा इनके बताये अनुशासनों के अनुसार सक्रिय है। हजारों योग अनुयायी आज भी इनके बताये मार्ग पर साधनाशील है।

कृतियाँ[संपादित करें]

योगी चरणदास जी ने अपने साधना परक व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर लोककल्याण हेतु अनेक ग्रन्थों की रचना की जिसमें से 17 लघु ग्रंथ प्राप्य हैं। इन ग्रंथों में हठयोग, राजयोग, मंत्रयोग एवं लययोग अर्थात् योगचातुष्ट्य की सभी साधनाओं का सार रूप समीक्षात्मक तौर पर समाहित किया गया है। इन सभी 17 रचनाओं में से कुछ हैं-

  • भक्तिसागर
  • अष्टांगयोग
  • षट्कर्म हठयोगवर्णन

अष्टांगयोग तथा षट्कर्म हठयोगवर्णन में प्रश्नोत्तर शैली में हैं। अष्टांगयोग में 153 दोहा और अष्टपदी छन्द में गुरु-शिष्य संवाद दिया गया है। इसी प्रकार षट्कर्म हठयोग ग्रंथ भी कुल 41 दोहा और अष्टपदी छन्द के रूप में गुरू शिष्य संवाद शैली में प्रस्तुत किया गया है। ग्रन्थ् में चरणदास जी की साधनानुभूति साधकों के लिए ग्रंथ को महत्व को स्वमेव बढ़ देती है।

अष्टांगयोग ग्रंथ की विषयवस्तु[संपादित करें]

अष्टांग योग ग्रंथ शिष्य की जिज्ञासाओं का समाधान गुरूवचनों द्वारा की जाने वाली संवाद शैली मे प्रस्तुत किया गया है। शिष्य का प्रश्न शुरू होता है कि मैं योग साधना में पूर्णतः (निपट) आज्ञानी हूँ, कृपया मुझे योग के आठ अंगों के बारे में समझाइये तथा उनको साधने की (अभ्यास करने की) विधि बतलाइये। यह भी स्पष्ट कीजिये की इसे 'अष्टांग योग' क्यों कहा जाता है। गुरू वंदना के बाद शिष्य के इस प्रश्न के उत्तर में चरणदास जी गुरूवचन के रूप में अष्टांग योग तथा उनके अलग-अलग अंगों की साधना विधि को बतलाने का आश्वासन इस आधार पर देते है कि पहले साधक को इन्हें समझने के लिए संयम का पालन करना होता है जिससे योग के अभ्यास में बाधा नहीं होती है।

यहाँ 'गुरुवचन' से यह भी ध्वनित होता है कि योग 'समझने का विषय' नही नहीं है। यह अभ्यास के सोपान हैं तथा तथा 'होने का विषय' है। अर्थात् योग को समझ कर योगी नहीं बना जा सकता, योग करके (साधना द्वारा) ही योगी हुआ जा सकता है। योग क्रियापरक धातु है।

संयम की साधना का चरणदास द्वारा दिया गया यह सर्वथा नवीन प्रस्तुतीकरण है जो उनकी व्यावहारिक मौलिकता का अनूठा उदाहरण है। यहां यह भी जान लेना आवश्यक है कि पूर्व योग ग्रंथों में योग की साधना का प्रारंम्भ यम से शुरू होता है जबकि चरणदास जी के समय में सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तनों के कारण योग साधना के क्रम में संयम से शुरूआत को व्यावहारिक माना गया है। क्योकि इनके समय तक खान-पान रहन-सहन आदि में अनेक गिरावटों का और अनेक प्रदूषण शुरू हो चुके थे। ऐसा प्रतीत होता है कि व्यक्त्ति अनेकों सामाजिक राजनैतिक परिवर्तनों के कारण दैनिक जीवनचर्या के मूल्यों को भुला बैठे थे। जो भी हो चरणदास जी द्वारा संयम की प्रतिपदित आवश्यकता योग साधकों हेतु आज अनिवार्य आवश्यकता के रूप में स्थान पा चुकी है।

शिष्य प्रश्न और गुरू के वचन (उत्तर) के रूप में चरणदास जी के इस अष्टांग योग ग्रंथ के वर्ण्य विषय निम्नांकित है-

1. अष्टांगयोग :-(1)यम (2)नियम (3)आसन (4)प्राणायाम (5) प्रत्याहार (6) धारणा (7) ध्यान (8) सामाधि। 2. षट्कर्म :- 1)नेति (सूत्रनेति) 2) धौति 3)बस्ती 4)कुंजल (गजकरणी) 5)नोलि 6)त्राटक ।

अष्टांगयोग ग्रन्थ का आरम्भिक भाग नीचे दिया गया है-

शिष्यवचन

व्यासपुत्र धनि धनि तुम्हीं, धनि धनि यह अस्थान। मम आशा पूरी करी, धनि धनि वह भगवान ॥ 1
तुम दर्शन दुरलभ महा, भये जु मोको आज। चरण लगो आपा दियो, भये जु पूरण काज॥ 2
चरणदास अपनो कियो, चरणन लियो लगाय। शिरकरधरिसबकछुदियो, भक्ति दई समुझाय॥ 3
बालपने दरशन दिये, तबहीं सब कुछ दीन। बीज जु बोया भक्तिका, अब भया वृक्ष नवीन॥ 4
दिन दिन बढ़ता जायगा, तुम किरपा के नीर। जब लगमाली ना मिला, तबलग हुता अधीर॥ 5
अरू समुझाये योगही, बहु भांति बहु अंग। उरधरेता ही कही, जीतन बिद अनंग॥ 6
अरू आसन सिखलाइया, तिनकी सारी विद्धि॥ तुम्हरी कृपा सो होहिंगे, सबहीसाधन सिद्धि॥ 7
इक अभिलाषा और है, कहि न सकूं सकुचाय। हिये उठै मुख आयकरि, फिरि उलटी ही जाय॥ 8

गुरूवचन

सतगुरू से नहिं सकुचिये, एहो चरणहि दास। जो अभिलाषा मन विषे, खोलि कहौ अब तास॥ 9

शिष्यवचन

सतगुरू तुम आज्ञा दई, कहूँ आपनी बात। योगअष्टांग बुझाइये, जाते हियो सिरात॥ 10
मोहि योग बतलाइये, जोहै वह अष्टांग। रहनीगहनी विधिसहित, जाके आठो आंग॥ 11
मत मारग देखे घने,हृां सियरे भये प्रान। जो कुछ चाहौ तुम करौ, मैं हौं निपट अयान॥ 12

गुरूवचन

योग अष्टांग बुझाइहैं, भिन्न सब अंग। पहिले संयम सीखिये, जाते होय न भंग॥ 13

शिष्यवचन

संयम काको कहत ह हैं, कहौ गुरू शुकदेव। सो सबही समुझाइये, ताको पावै भेव॥ 14

गुरूवचन

प्रथम सूक्ष्म भोजन खावै। क्षुधा मिटैं नहि आलस आवै॥
थोड़ासा जल पीवन लीजै। सूक्ष्म बोलै वाद न कीजै॥
बहुत नींद भर सोवै नहीं। दूजा पुरूष न राखै पाहीं॥
खट्टा चरपरा खार न खावै। बीरज क्षींण होन नहीं पावै॥ 15
करै न काहू बैरी मीता। जगवस्तु की रखे न चीता॥
निश्चल हवे मनको ठहरावै। इन्द्रिन के रस सब बिसरावै॥
तिरया तेल नाहिं देह छुवावै। अष्ट सुगन्ध अंग नहिं लावै॥
पुरूषन की राखै नहि आसा। गुरूका रहै चरणही दासा॥ 16
काम क्रोध मद लोभ अरू राखै ना अभिमान।
रहै दीनताई लिये, लगै न माया बान॥ 17

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]