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Nine years younger wife full love story[संपादित करें]

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कुशल दबे पाँव इस तरह घर में घुसा था , जैसे घर उसका अपना न हो और खाँसी आने पर वह गली में जा कर इस तरह जी भर कर खाँस आया था, जैसे मदन को नसीहत करने का मौका न देने के लिए वह प्रायः दुकान के बाहर जा कर खाँसा करता है। फिर उसने सोचा कि वह शायद अपने अचानक आ जाने से तृप्ता को चौंकाना चाहता है। यह सोच कर वह मुस्करा दिया कि चौंकाने के लिए ये छोटी-छोटी बातें ही रह गयी हैं।

तृप्ता ने कुशल को देखा तो सचमुच ही चौंक गयी। उसने कुशल को देखते ही कागजों का एक पुलिन्दा ट्रंक में छिपा दिया, जिसे वह दीवार से पीठ टिकाए फुसफुसा कर बड़ी एकाग्रता से पढ़ रही थी। उसकी आवाज में उतार-चढ़ाव को भी लक्षित किया जा सकता था। उसने हाल ही में धोये हुए बालों को जूड़े के रूप में इकट्ठा करके उन पर अपना सर इस ढंग से रखा हुआ था, जैसे बालों से तकिए का काम ले रही हो। कुशल को देखते ही उसके माथे पर ढेर-सा पसीना इकट्ठा हो गया और वह खड़ी हो गयी। उसके बाल खुल कर कन्धों पर बिखर गये। उसने कार्निश से लाल रंग का रिबन उठाया और बाल बाँधने लगी।

कुशल ने खाट पर बैठ कर अपने जूते उतारे और बोला, 'आज मदन दिल्ली गया है और मैं उठ आया[1]।'

तृप्ता की कमीज पसीने से देह पर चिपकती जा रही थी। और गर्दन से पसीने[2] के कतरे चू कर कालर बोन पर ऐसे रेंग रहे थे, जैसे मेह के बाद बिजली की तारों पर पानी रेंगता है। उसने कमीज के पल्लू से मुँह पोंछा और बोली, 'आज तो बहुत गर्मी है।' फिर उसने ट्रंक को खाट के नीचे सरकाते हुए कहा, 'मैं तो समझी थी, प्रकाश खाना लेने आया होगा, आप इस समय कैसे आ गये?' फिर उसने कुशल के चेहरे की ओर देखते हुए पूछा, 'तबियत तो ठीक है?'

कुशल सोचने लगा कि यदि वह तृप्ता के स्थान पर होता, तो इस समय कैसे आ गये के स्थान पर 'कहाँ से टपक पड़े, कहता[1]। तृप्ता को उत्तरोत्तर सुर्ख होते देख कर और ढूँढ़ने पर भी न मिलने के अंदाज में इधर-उधर घूमते और दृष्टि दौड़ाते देख कर कुशल ने जेब से माचिस निकाल कर तृप्ता की ओर फेंकते हुए कहा, 'यह लो।'

तृप्ता ने माचिस दबोच ली और बोली, 'आप कैसे जान गये थे कि मैं माचिस ढूँढ़ रही थी।'

कुशल को मालूम था कि तृप्ता माचिस नहीं ढूँढ़ रही थी, बल्कि छोटी-सी बात को ले कर परेशान हो रही थी। उसने केवल उसकी घबराहट कम करने के लिए ही माचिस फेंकी थी। फिर उसने कहा, मैं जानता था, स्टोव पर तुम्हारी नजर नहीं जायेगी। हालाँकि तुम्हें मालूम है कि माचिस वहीं पड़ी रहती है।[3]

तृप्ता ने स्टोव जलाया और चाय का पानी चढ़ा दिया और फिर स्वयं भी कुशल के निकट खाट पर आ कर बैठ गयी और पैर हिलाने लगी। कुशल ने कहा, 'पैर क्यों हिला रही हो[4]?'

तृप्ता ने पैर हिलाने बन्द कर दिये और पास रखा तौलिया उठा कर रगड़-रगड़ कर मुँह साफ करने लगी। पसीना सूख गया था और वह फिर भी तौलिया नहीं छोड़ रही थी। कुशल ने उसे आश्वस्त और शान्त करने के लिए अपने लहजे को भरसक स्वाभाविक बनाते हुए कहा, 'कहानी लिख रही थी क्या?' उसने तृप्ता की पीठ थपथपाते हुए कहा, 'मुझे लगता है कि तुम कहानियाँ लिखती रहो तो बहुत बड़ी लेखिका हो जाओगी।'[5]

तृप्ता कुशल की ओर देख कर मुस्करायी और उसकी बुश्शर्ट पर रेंगती हुई एक चींटी फेंकते हुए बोली, 'शादी के बाद तो कुछ भी नहीं लिखा। वही पुरानी कहानी पढ़ रही थी जिसे सुन कर आपने मेरा बहुत मजाक उड़ाया था।'

वह फिर पैर हिलाने लगी और शिकायत की मुद्रा में कुशल की ओर देखने लगी। कुशल ने महसूस किया कि कई बार बेवकूफ बना कर उतना मजा नहीं आता, जितना बन कर आता है। परन्तु जब तृप्ता बिल्कुल निश्चिंत हो गयी कि कुशल पूरा बेवकूफ बन चुका है तो कुशल को वह अच्छा नहीं लगा। उसने कहा, 'अजीब बात है, टाँगे तो मेरी दर्द कर रही हैं और हिला तुम रही हो।' फिर उसने कुछ देर चुप रह कर कहा, 'तृप्ता! जरा मेरी ओर देखो।'[6]

तृप्ता ने तौलिए को ऊपर सरका कर थोड़ी-सी आँख नंगी की और फिर तुरंत मुँह छिपाती हुई बोली, 'आप मुझे डरा क्यों रहे हैं?'

'डरा कैसे रहा हूँ?' कुशल को हल्की-सी खुशी हुई। उसने तृप्ता के हाथ से तौलिया खींचते हुए कहा, 'देखो स्टोव शायद बुझ गया है।'

तृप्ता अतिरिक्त त्वरा से भाग कर स्टेाव की ओर गयी, जैसे दूध उफन गया हो, और फिर कुशल की ओर पीठ करके स्टोव के निकट की पटड़ी पर बैठ गयी।

सहसा कुशल को लगा कि बाथरूम का नल खुला है। वैसे बाथरूम का नल तब तक खुला रहता है, जब तक म्युनिसिपैलिटी उसकी रगों को पानी मुहैया कर सकती है। इससे पहले गली में शोर कर रहे बच्चों की आवाज भी उसे सुनायी नहीं दे रही थी। बच्चों का शोर सुन कर वह सहसा मुस्करा दिया। मदन जब कभी मूड में होता है तो दुकान में आने वाले ग्राहकों को कभी-कभी कुशल का हवाला दे कर सुनाया करता है कि 'भारत में तभी चैन से सोया जा सकता है', मदन चुटकी बजा कर कुशल को हाफ सेट चाय का आर्डर देने का संकेत करते हुए अपनी बात जारी रखता, 'जब रात को आप बच्चों की चिल्ल-पों को लोरी समझें और सुबह गली के नन्हें मुन्नों के सामूहिक रोदन से आप घड़ी के अलार्म का काम लें।[7]

इतवार की दोपहर तो कुशल जैसे-तैसे करके घर में ही बिता लेता है, परतु इस समय बच्चों की धींगामुश्मी न तो लोरी का काम दे रही थी और घड़ी के अलार्म की। उसने तृप्ता से पूछा, 'क्यों तृप्ता, गली के बच्चों के स्कूल कब खुल रहे हैं?'

तृप्ता ने मुस्करा कर पीछे की ओर देखा, वह शायद अब तक सँभल चुकी थी या शायद उक्त प्रश्न की संभाव्यता से प्रभावित हो कर उसने सोच लिया था कि कुशल की दृष्टि इतनी पैनी नहीं है, जितनी कि वह समझ बैठी है। वह स्टोव से केतली उतारने लगी।

उसने कुशल के लिए चाय का प्याला तैयार किया और कुशल को पकड़ाते हुए बोली, 'आप शेव बना लें, मैं तब तक आपके कपड़े आयरन कर दूँ। कितना अच्छा रहे, अगर आज पिक्चर चलें।'

'मेरा ख्याल है पिक्चर तो हम मदन के लौटने तक नहीं जा सकेंगे। उसे दिल्ली जाना था, मैंने पैसे नहीं माँगे।'

'पिक्चर जित्ते पैसे मेरे पास हैं।' तृप्ता ने पैरों से ट्रंक को खाट के और भी नीचे धकेलते हुए कहा, 'कल सोम दे गया था।'

कुशल की लम्बी नाक चाय के प्याले में डूब गयी, उसने अंतिम घूँट भरने के बाद खाली प्याला तृप्ता के हाथ में थमाते हुए कहा, 'पहले चाय का एक और कप, बाद में कुछ और।'

कुशल कल से ही सोम की चर्चा में आनन्द ले रहा था। कल जब सोम घर का पता जानने के लिए दुकान पर आया था, तो कुशल जान-बूझ कर सोम के साथ स्वयं नहीं आया था, बल्कि उसने दुकान के चपरासी के साथ सोम को घर भिजवा दिया था।[8]

जब सोम आया था तो कुशल एक पत्र टाइप कर रहा था, जब वह चला गया, वह फिर टाइपराइटर पर झुक गया और टाइप करने लगा : सोम डरपोक था कि तृप्ता डरपोक थी, नहीं सयानी। सोम डरपोक था, सोम डरपोक है, सोम डरपोक रहेगा। तृप्ता डरपोक थी, तृप्ता डरपोक... कुशल ने मदन की ओर देखते हुए कागज निकाला और मेज के नीचे ले जा कर रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।

शाम को जब वह घर लौटा था, तो सोम जा चुका था। भोजन के बाद जब तृप्ता तश्तरी में आम ले आयी, उसने जान-बूझ कर नहीं पूछा कि आम कौन लाया। आम की गुठली चूसते हुए तृप्ता ने कहा था, 'पाँच बजे तक सोम आपका इंतजार करता रहा।'

कुशल ने उत्तर नहीं दिया और तृप्ता को चाय के लिए कह कर नल की ओर चला गया था।

'सोम कह रहा था, माँ बहुत याद कर रही थीं।' नल से लौट कर कुशल ने देखा, तृप्ता की गालों पर आम का रस लगा था। उसने तृप्ता की बात अनसुनी कर दी और तौलिए से उसके गाल पोंछ दिये।

चाय का दूसरा प्याला पीते-पीते कुशल भी पसीने से भीगने लगा। उसने बुश्शर्ट उतार कर खाट पर रख दी और अपनी छाती के घने बालों में तिरता हुआ पसीना पोंछने लगा। काले बालों के बीच एक सफेद बाल पर उसकी दृष्टि गयी तो उसने उसे अँगुली पर लपेट कर जड़ समेत उखाड़ दिया और फिर छाती पर हाथ फेरने लगा।

तृप्ता ने टेबल घसीट कर कुशल के आगे कर दिया और उस पर शेव का सामान टिका दिया। कुशल मुँह पर हाथ फेरते हुए आईने में अपना चेहरा देखने लगा।

'आप अब शेव बना लीजिए।' तृप्ता ने कहा और कुशल की उतारी हुई बुश्शर्ट को चुहिया की दुम की तरह पकड़ कर बाथरूम में ले गयी।

कुशल ने रेजर में ब्लेड फिट किया और देर तक मुँह पर साबुन की झाग करता रहा, परन्तु उसका शेव बनाने का जी नहीं हो रहा था। उसे मालूम था कि अगर उसने शेव बना ली तो नहाना भी पड़ेगा और नहाने के लिए वह बिल्कुल तैयार नहीं था। उसकी पिण्डलियों में दर्द हो रहा था और देह का हर जोड़ टूट रहा था। यह सुबह से हो रहा था। और यही कारण था कि वह सुबह भी बिना नहाये निकल गया था। इस अद्भुत थकावट और विचित्र दर्द से कुन्द हो कर आज सुबह उठते ही तृप्ता से कहा था कि क्या कारण है वह कल से अतिरिक्त प्रेम कर रही है?[9]

कुशल को चेहरे पर झाग करते देख तृप्ता ने पूछा कि वह क्या सोच रहा है?

'यही कि...' कुशल ने रेजर को पानी में गीला करे हुए कहा, 'इस पहली को एक नयी खाट ले आऊँगा।'

'तृप्ता को सुझाव बड़ा फिजूल लगा, बोली, 'मैं तो बहुत कम जगह घेरती हूँ।'

'कई बातें अभी तुम्हारी समझ में नहीं आ सकतीं। तुम अभी बच्ची हो...।' कुशल ने आईने में से तृप्ता की ओर कनखियों से देखते हुए कहा, 'कई बार तो तुम्हारे मुँह से दूध की बू भी आती है।'[10]

तृप्ता कुछ देर अवाक-सी उसकी ओर ताकती रही, फिर बाथरूम में चली गयी। जब वह स्नान करके लौटी तो कुशल तब भी चेहरे पर झाग बना रहा था। तृप्ता को देख कर उसके दिमाग में किसी छायावादी कवि की पंक्तियाँ तैरने लगीं, उन्हें पकड़ने की बजाय वह तृप्ता को चेतावनी देने के लहजे में कहने लगा कि वह भविष्य में उसे शेव बनाने और स्नान करने के लिए कभी न कहे। उसकी इच्छा होगी तो वह खुद स्नान कर लेगा।

इतने में बाहर का दरवाजा खुला और किसी के आने की पदचाप सुनाई दी। तृप्ता ने उचक कर बाहर देखा और बोली, 'सुब्बी है।'.......for more click

by Er. Mumtaz

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