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तमिल साहित्य के पाँच महान महाकाव्य[संपादित करें]

तमिल साहित्य के पाँच महान महाकव्य तमिल भाषा के पाँच कथा महाकाव्य हैं जो लगभग १०० -५०० साई के बीच लिखे गये थे। इन पाँच महकाव्य हैं- शिलप्पदिकारम जो इलंगो अडिगाल से लिखी हुई हैं, सित्तलइ सतन्नार कि मणिमेगलै तिरुथक्कदेवर के सिवग चिन्तामणि नगुतनार के कुण्डलकेसि एक अजान जैन सन्यासी के वलैयापति यह काव्य,उस समय की लोगों के सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक जीवन के बारे मे जानकारि देते हैं।शिलप्पदिकारम, मणिमेगलै और सिवग चिन्तामणि तमिल संस्कृति में स्त्रीत्व की अवधारणा पर प्रकाश डालते हैं। इन कहानियों में एक शुद्ध पत्नी कन्नगी, एक बहदुर और कर्तव्यमयी बेटी मणिमेगलै, और ममता से भरी हुई माँ के चरित्र को शक्तिशाली और कपटपूर्वक से दिखाते हैं।

कन्नगी की स्मारक

शिलप्पदिकारम[संपादित करें]

शिलप्पदिकारम, जिसक शाब्दिक अर्थ "एक पायल कि कहानी", कन्नगी नामक पवित्र स्री और उसकी पती कोवलन के जीवन के बारे में हैं। इस महाकाव्य में कन्नगी, जो अपनी पती को पांडियन राज्य के अदालत के गलत न्याय मिलने के कारण अपने पती को खो दिया, पूरे रज्य को जलाकर अपना बदला लेती हैं। कोवलन इस कहानी में मधवी नामक नर्तकी के साथ संबंध रखता हैं और उन्की बेटी का नाम मणिमेगलै है, जो 'मणिमेगलै' महाकव्य कि मुख्य पात्र हैं।

मणिमेगलै[संपादित करें]

मणिमेगलै महाकव्य सिलपतिकारम का दूसरा भाग है। इस कहानी में कोवलन और माधवी की सुंदर बेटी बौद्ध भिक्षुक में बदल जाती हैं। मणिमेगलै हिन्दु धर्म के दर्शन के छह रूप और उस समय के अन्य प्रचलित धर्मों को पढती हैं और उनकी तुलना बुद्ध की शिक्षाओ से करती हैं। सारी धर्मों में से मणिमेगलै पर बौद्ध की धर्म की दर्शन का प्रभावित ज़्यादा था क्योंकि बौद्ध धर्म में सब लोग को एक समान प्यार और आधार मिलता हैं। जब वह बौद्ध भिक्षु अरवन अडिगाल के दर्शन सुन्ती है, तो वह पूरी तरह एक बोधिक भिक्षुणी बन जाती है। मणिमेगलै पूरी तरह से बुद्ध के शिक्षाओँ का अभयास करती है और बौद्ध आध्यात्मिक ज्ञान या प्राप्ति के उच्च उतम स्तर को प्राप्त करती है।

सिवग चिन्तामणि[संपादित करें]

सिवग चिन्तामणि एक राजा जो अपनी रज्य पर शासन करने की शक्ति उनके भ्रष्ट मंत्री को दे देता है जो राजा को मार देता हैं। उस मंत्री के बेटे का नाम सिवग है जो इस कहानी का मुख्य पात्र हैं। इस कव्य में सिवगन के जीवन के बारे में लिखा हुआ है। सिवगन सारे सान्सारिक सुख को अनुभव करता है। वह शिखार करता था, आठ बार शादी की हैं और युद्ध के बाद उस राज्य का राजा भी बन गया था। जब उनका मिलन महाविर जैन के साथ हुआ, उन्होने इस दुनिया को त्याग कर दिया और एक सन्यास बन गये। इन पाँच महान महाकाव्यों में से वलयापती और कुन्दलकेसी पूरा उप्लब्ध नही हैं। इन काव्यों के सिर्फ भागें कई अन्य काव्यों में बचे हैं। इन काव्यों के खोना बहुत हाल हि मेंन १९व शताब्दी में हुई।

वलैयापति[संपादित करें]

वलैयापति कि कहानि का पता पूरी तरह से नही किया जा सकता है,क्योंकि कहानि के बहुत कम भाग आज तक बचे हैं।जो भी बचा है, उन से यह पता चलता है कि यह काव्य एक धार्मिक काव्य है जो जैन धर्म के दर्शन से मिलती हैं। सांसारिक सुखों की अस्वीकृति, तपस्या की प्रशंसा, शुद्धिकृति और पवित्रता की स्तुति, मांस का न खाना, लगातार परिवर्तन की दृष्टि और पारिस्थिकता सभी इस काव्य के रचयेता जैन साधु होने के ओर दिखाते हैं। कुंडलकेसी, धम्मपद से बौद्ध स्त्री भिक्षु,कुनलेकेशी की कहानी का एक रूपांतर है। वह एक धनी व्यापार की बेटी थी पर वह एक बौद्ध भिक्षुक बन जाती हैं। वह उसकी सारी जिंदगी बुद्ध की शिक्षाओं के प्रसार के लिए बिताती है। वह जैन और हिन्दु जन के साथ धर्म पर वाद करती है और हमेशा अपनी विपक्ष के लोगों को हराती थी। अंत में वह मुक्ति प्राप्त कर देती हैं।

कुण्डलकेसि[संपादित करें]

कुछ विद्वानों का मानना ​​है कि कुण्डलकेसि काव्य का विनाश बोधिक होने के कारण विरोधि ने उसको बरबाद कर दिया। इन पाँच महान महाकाव्य के मुख्य विषय धर्म और दर्शन पर हैं। मणिमेगलै और कुन्दलकेसी बौध धर्म और भिक्षुख पर हैं।

सार्थकता[संपादित करें]

सिवग चिन्तामणि और वलैयापति जैन धर्म पर अधारित हैं। उसी समय संस्कृत साहित्य का विकस हो रहा था और तमिल और संस्कृत साहित्य के विशेश्ताओँ मे कई समानतएँ हैं। इन काव्यों में उन व्यक्तियों के दंड का दर्शाता देते हैं,जो मौत की अनिवार्यता को जानकर भी अपराधों और मानसिक सुखों में लिप्त करते हैं। यह काव्यों बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रसार करने के उद्देश्य से लिखे गये थे। पांच महान महाकाव्यों के समान, तमिल साहित्य में पँच और कव्य हैं, जिन्हे महाकव्य के वर्ग में मिलाते हैं। वे हैं-नीलकेसी, नाग कुमार कवियम, उध्यन कुमर कवियम, यसोधरा कवियम और सूलमणि। 

सन्दर्भ[संपादित करें]

[https://en.wikipedia.org/wiki/The_Five_Great_Epics_of_Tamil_Literature 1]
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