सदस्य:Mahishashish/प्रयोगपृष्ठ/1

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छत्तीसगढ का त्योहार[संपादित करें]

Rice plant with grains.jpg

हरेली त्योहारभारत एक त्योहारो का देश माना जाता है। यहाँ बहोत सारे त्योहार मनाये जाते है। हर राज्य के अपने अपने त्योहार होते है। यह त्योहार छत्तीसगढ के एक छोटे अनजाने त्योहारो मे से एक त्योहार है। यह त्योहार छत्तीसगढ मे फसल कि कटाई के बाद मनाया जाता है। मूख्य रूप से चावल की कटाई पुरी हो जाने के बाद ही यह त्योहार मनाया जाता है।

कब मनाया जाता है[संपादित करें]

यह त्योहार पौस-माह के अतिम दिनो मे मनाया जाता है।पौस माह मतलब जनवरी के आखिर मे और फरवरी के महिने के आने के पहले मनाया जाता है।इस त्योहार का कोई निशचित दिनाँक नही है।इस त्योहार का समय पुरी तरह से फसल कि कटाई पर निरभर करता है।अगर फसल कि कटाई जल्दी होती है ,तो यह त्योहार जल्दी मनाया जाता है।अगर फसल कि कटाई मे देरी हो तो यह त्योहार भी देरी से मनाया जाता है। 

नाम और मतलब[संपादित करें]

यह त्योहार को लोकल भाषा मे छेर-छेरा या छेरता (छत्तीसगढी भाषा मे नाम) भी कहा जाता है।छेर-छेरा का मतलब छत्तीसगढी मे फसल कि कटाई के बाद के समय को कहा जाता है और छेरता का मतलब छत्तीसगढी मे मागना होता है।यह त्योहार एक खुशी का त्योहार या प्रतिक भी माना जाता है। इस त्योहार को खुशी का त्योहार मानने का कारण यह है कि सभी किसान लोग कई महिनो से बहोत् कठिन परिश्रम के बाद उन सब कि कडी मेहनत का फल अनाज के रुप मे घर आता है। इस कारण से यह त्योहार खुशी त्योहार माना जाता है।

त्योहार कि रसम[संपादित करें]

इस त्योहार के दिन एक अनोखी चिज देखने को मिलती है। क्योकि यह त्योहार फसल के घर आ जाने के बाद मनाया जाता है, तो इस दिन लोग एक-दुसरे के घर-घर जाकर अनाज मागते है । यह घर-घर जाकर अनाज मागने की प्रथा बहोत सालो से चली आ रही है । इस घर-घर जाकर मागने की प्रथा मे बच्चे तथा युवा भाग लेते है,बच्चे या तो अकेले हि एक बैग लेकर घर-घर जाकर पुरे गाँव मे अनाज मागते है या फीर सारे बच्चे मिलकर साथ-साथ अनाज मागने जाते है। युवा भी इसी प्र्कार से छोटी बडी टोलिया बनाकर घर-घर अनाज मागने जाते है । लेकिन युवा लोग एक गाँव मे सिमीत ना रहकर कई गाँवो मे अनाज मागने जाते है । यह तो बच्चे तथा युवा करते है। बडे लोग इस दिन अनाज देने का काम करते है । जब बच्चे तथा युवा अनाज माँगने घर आते है तो बडे लोग उन्हे अनाज देने का काम करते है । इस अनाज देने की प्रक्रिया मे कोइ नियम नही है कि कितना अनाज देना है । कोई कितना भी अनाज दे सकता है।सब लोग अपने मन के अनुसार देते है।यह घर-घर जाकर अनाज मागने का काम सुबह से शाम तक चलता है। जब शाम को अनाज मागने के बाद जो अनाज जमा हो जाता है। उसे बच्चे और युवा या तो आपस मे बाट लेते है या तो उस अनाज को बेच बेते है ,और जो पैसे अनाज बेचने से मिलता है उसे आपस मे बाट लेते है।

भगवान कि अराधना[संपादित करें]

मगर यह इस त्योहार का मुख्य कारण यह नही है।इस त्योहार मे अनाज मागने के अलावा और भी कई काम होते है,जैसे इस दिन भगवान को अच्छि फसल के लिये धन्यवाद भी दिया जाता है। सारे लोग इस दिन भगवान को प्रेम के साथ याद करते है, उन्कि पुजा करते है,तथा उन्हे सारे मन से धन्यवाद दे ते है।लोगो का मानना है कि जो भी फसल हमे प्राप्त होती है वो सब कुछ भगवान का दिया हुआ है। इसीलिये इस दिन सारे लोग एक जगह जमा हो कर पुजा करते है।पुजा के समय ढोल-मदिरे के साथ कई प्रकार के साहित्यिक नाच तथा गाने गाये जाते है।इस दिन लोग मंदिर जाते है और पुजा के साथ -साथ अपनी नई फसल का कुछ हिस्सा बलिदान के रुप मे भगवान को चढावे के रुप मे चढाया जाता है। लोगो का यह मान्ना है कि नई फसल को घर मे पकाने से पहले अनाज को भगवान को देना चाहिए ,क्योकि लोगो का भरोसा है कि ऐसा करने से फसल सुरक्षित रहती है तथा आने वाले नये साल मे भी फसल अच्छी होगी और भगवान हमारी रक्षा करेगे सारी मुश्किलो से , यह मान्ना है हमारे बडे बुढे लोगो का है। इस त्योहार मे हम अपने पुरवजो को भी याद करते है। क्योकि पुरवजो से ही तो हमे सारे ज्ञान प्राप्त हुए है कि कैसे फसल उगानी है ।तो इस कारण से इस त्योहार मे पुरवजो को भी याद किया जाता है।

नये पकवान[संपादित करें]

क्योकि यह नई फसल का त्योहार है तो इस दिन सारे घरो मे नई फसल का उपयोग करते हुए खाना बनाया जाता है ।इस दिन कई प्रकार के पकवान बनाये जाते है। इनमे से कई पकवान नई फसल से बनाये जाते है ,उनमे से कुछ पकवानो के नाम लोकप्रिय है जैसे कि सुहारी रोटी ,अईरसा रोटी ,बडा और चिला (ये सारे नाम छत्तीसगढी मे है) आदि बनाये जाते है। लोग इस दिन अपने रिश्तेदारो और पडोसियो के साथ मिलकर भोजन करते है। मगर आजकल लोग इस त्योहार को भुलते जा रहे है।यह एक त्योहार है जो हमे एक दुसरे के साथ मिलजुल रहने की शीख देता है।