सदस्य:Bhakitiramji maharj

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                                                                  भजनानन्दी महापुरुष 
                                                            सतगुरु दाता श्री भक्तिरामजी महाराज





            सतगुरु श्री भक्तिराम जी महाराज (जन्मदिन|1914|28|02) is A भारत भजनानन्दी महापुरुष संत From [[धनारी खुर्द जोधपुर राजस्थान] ]].


सतगुरु श्री भक्तिराम जी महाराज
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Bhakatiramji maharj
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जन्म सतगुरु श्री भक्तिराम जी महाराज
| date of birth =1914/28/02
धनारी खुर्द, जोधपुर, राजस्थान, भारत
राष्ट्रीयता भारत
अन्य नाम हेम सिंह
व्यवसाय भजनन्दी महापुरुष संत
धार्मिक मान्यता हिदू


जीवन-चरित्र

पूज्य श्री बापजी का जन्म विक्रम सं. 1970 फाल्गुण शुक्ल द्वितीया शानिवार जाेधपुर जिलान्तर्गत छोटी धनारी नामक ग्राम में हुआ | इसी छोटी धनारी का नाम बदलकर पू़. बापजी के प्रयत्नों से कृष्ण नगर रखा गया | पू़. बापजी के पिताजी का नाम श्री देवीसिंह जी राठौड़ व माता का नाम धन्य कंवर बाईसा था | सतगुरु श्री जी का पुर्व नाम श्री हेमसिंह जी था | श्री देवीसिंह जी जन्म से ही धार्मिक प्रर्वति वाले थे । आये-गये अतिथियों का अन्ऩ - जल से विशेष सम्मान करने वाले दयालु पुरुष थे। सनातन धर्म परम्परा अनुसार समय-समय पर यथा योग्य धार्मिक कार्य भी अपनी शक्ति के - अनुसार करते थे । तीर्थ व्रत , उपवास आदि में भी पूर्ण निष्ठा रखते थे | एक बार पुष्कर राज तीर्थ में स्नान के लिए पधारे वहां संकल्प किया कि हे परमपिता परमेश्वर आपके सिवा और कोई वस्तु नहीं है जो वस्तु प्रतीत होती है वहां भी स्वरूप सत्य नहीं है क्योंकि माया के गुण के क्षुभित होने के कारण केवल आप ही अनेकों रूपों में प्रतीत हो रहे हैं । आप सर्वदा अपने स्वरूप के प्रकाश से ही प्राणियों के भेद भ्रम रूप अन्धकार का नाश करते रहते हो । तथा ज्ञान के अधिष्ठान साक्षात परम पुरुष हैं| मैं आपको नमस्कार करता हूं । संसार की उत्पत्ति स्थिति और संहार के निमित्त से जो माया की लीला होती है वह आपका ही खेल है । अतः आप परमेश्वर को में बारम्बार नमस्कार करता हूं आप जगत के लोगों की वंशवृद्धि करते हो मुझे भी एक प्रभु प्रेमी बालक प्रदान करो | संकल्पानुसार भगवान ने श्री देवी सिंह जी को रात्रि संपने में संकेत किया कि तुम अपने विषय में इस प्रकार खेद न करो ; तुम्हारे घर में अविनाशी भगवान श्रीहरिः के भक्त का जन्म होगा श्री भगवान के वचन स्वरूप श्री देवी सिंह जी के दाम्पत्य जीवन के अठारह वर्ष बीतने के बाद सतगुरु श्री भक्ति राम जी महाराज का जन्म हुआ तो उन्होंने पुष्कर राज के स्नान के समय जो संकल्प किया उसी का प्रभाव माना विक्रम संवत 1970 फाल्गुन शुक्ल पक्ष द्वितीय शनिवार प्रातः 4:00 बजे तदनुसार दिनांक 28/02 /1994 ई. को ग्राम कृष्ण नगर तहसील भोपालगढ़ जिला जोधपुर राजस्थान में बापजी का पदार्पण जन्म हुआ | स्वभावतः संसार में पुत्र जन्म बड़े आनंद का विेषय मनाते हैं | फिर जीवन के उत्तर काल में अतुल तेज एवं विशेष शुभ लक्षणों से युक्त बालक के होने से घर में तो आनन्द होना स्वभाविक ही था | लेकिन समस्त नगर (ग्राम )में भी प्रसन्नता की लहर दौड़ गई महापुरुष जब अवतार धारण करते हैं | तब अष्ट सिद्धियाँ एवं नव निधियाँ भी साथ में ही आती है मंगल गीतों से ग्राम गूंज उठा | याचिकों को मुंह मांगा दान दिया गया , बधाई -बाजे बजने लगे आज पिता श्री देवी सिंह जी की खुशि का कोई पारावर नहीं था |

                                              मात  पिता स्वर्ग सिदाया,एक राम को ध्याया ।
                                                 सरणा राम का लिना ,नाना नानी पालन किना ।।

बापजी के जन्म से 6 महीने के बाद बापजी के माताजी व पिताजी का स्वर्गवास हो गया | इसके बाद नाना-नानी बापजी को ननिहाल ग्राम बेरू में ले गए | 5 से 7 वर्ष तक बापजी ननिहाल में रहे थे | बाद में मासीसा ने अपने पास बापजी को रख लिया और बापजी की खूब सेवा की बापजी भी कभी-कभी फर्माते थे । कि मेरे मासीसा ने मेरी सेवा अच्छी तरह की थी, जैसे यशोदा ने कन्हैया कि की थी ।

उम्र 13 वर्ष के बाद वापिस आप कृष्ण नगर आयें |
कुछ बड़े होने के बाद बापजी सरकारी नौकरी में चले गए वहाँ घोड़ों की देखभाल करना दवा -पानी खुराक सम्बन्धी  सभी कार्य करते और सहयोगियों से करवाते इस दौरान बापजी घोड़ों के विशेषज्ञ बन गए- सुलक्षणी घोड़ो कुलक्षणी घोड़ों -तथा घोड़ों के शरीर में जो  भंवरियों को चिहन अादि होते हैं उसका प्रभाव घुड़सवार पर  तथा मालिक पर क्या पड़ता है इसकी विलक्षण जानकारी बापजी को थी| जो घोड़े पोलो में खेल के लिये  टाले जाते थे वे बापजी के पास किये  घोड़े होते थे ।
                                                 वैराग्य धारण करना एवं घर का त्याग करना 

परिवार वालो ने बापजी की शादी की बात चलाई तो बापजी अपने परिवार वालों को समझाते हैं । मुझे शादी नहीं करनी है | चाचाश्री ! यह मेरा निश्चय हैं कि अध्यात्म योग ही मनुष्यों के अत्यान्तिक कल्याण का मुख्य साधन है जहाँ दुःख और सुख की सर्वथा निवृत्ति हो जाती हैं | चाचाजी ! सब अंगों से सम्मान उस योग का मैंने पहले संत महात्माओं से सुना अब वही वृतांत मैं आपको सुनाता हूँ |

इस जीव  के बंधन और मोक्ष का कारण मन  ही माना गया  है | विषयों में अासक्त होने पर वह बंधन का हेतु  होता है और परमात्मा में अनुरक्त होने पर वही मोक्ष का कारण बन जाता है |  जो लोग सहनशील, दयालु ,समस्त देहधारियों अकारण हेतु , किसी के  प्रति भी शत्रु भाव न रखने वाले, शान्त , सरल स्वभाव और सत्पुरुषों का  सम्मान करने वाले होते हैं | जो प्रभु में अनन्य  भाव से सुदृढ़ प्रेम करते हैं , भगवान के लिए सम्पूर्ण कर्म तथा अपने सगे-सम्बन्धियों को भी त्याग देते हैं और भगवान-परायण रहकर भगवान की कथाओ का श्रवण कीर्तन करते हैं | तथा ईश्वर में ही चिंता लगाये  रहते हैं -उन भक्तों को संसार के तरह - तरह के ताप कोई कष्ट नहीं पहुँचाते हैं | 
 बापजी ने कहा चाचाजी मुझे शादी नहीं करनी है मेरे मन भगवान में लगा है |  अब मैं संसारी लोगों को  मन नहीं दुंगा । मन देने के लिये परमात्मा है | दूसरा  कोई नहीं है |


                                            तजो मद लोभ चतुराई । निशंक होई रहो जग मांहि ।।


संसार में अपना कोई नहीं है, हम झूठा लोभ क्यों करते है और किस लिए करते हैं | ऐसे बापजी कह कर जंगल में चले गए, बापजी रहे वन में 12 महीने तक भ्रमण करते रहे | बाद में बापजी ने सरदार समन्द में नौकरी की उसके बाद एक बार धनारी खुर्द आये कुछ दिन के बाद वहाँ से निकल गये | बापजी मेड़ता रोड में पधारे तो वहाँ एक संत महात्मा विराजते थे । वहां बापजी पुहुँच गये | संत बोले यह अरहट का कुआ चलाया करो और गौओं के लिए हरा - चारा तैयार करो गौऊ सेवा करो | बापजी का वस्त्र फटकर, जीर्ण-शीर्ण हो गया था | ऐसे देखकर महात्मा ने नया कटिवस्त्र बनाकर दिया | 6 महीने तक वहाँ बापजी रहे लेकिन मन को सन्तोष नहीं - आत्मशांति नहीं हुई | महात्मा से आज्ञा लेकर चलने लगे तो महात्मा ने अपना दिया वस्त्र वापिस उतरवा लिया -पूज्य बापजी ने वापिस जीर्ण -शीर्ण कन्था शरीर पर लपेट लि और आगे चल दिये आध्यात्म राहगीरे की सर्वत्र यही दशा होती हैं | हीरो की जितनी घिसाई होती हैं | उतनी ही चमक ज्यादा होती है | सर्दी का समय था बापजी बाद में मेड़ता सिटी चारभुजा मंदिर के सामने धर्मशाला है वहाँ पहुंच गये | जैसे-तैसे रात निकाली प्रातःकाल एक पुरुष ने बापजी को देखा और बोला -यहां एक सेठजी रहते हैं , वह कपड़ा देता हैं आप वहाँ पहुंच कर कपड़े प्राप्त कर लो | भगवान जैसे खेल खेलते हैं वैसा खेलना किसी को नहीं आता है | प्रातः काल सेठ बापजी के पास आया और सेठ ने सबसे पहले बापजी को वस्त्र दिया चुपचाप वस्त्र ग्रहण करके पहन लिया| मेड़़ता से चलकर कई दिनों बाद बापजी डीडवाना चले आये | वहां एक सूरदास जी महाराज रहते थे ,बापजी ने विचार किया कि महाराज को दिखता नहीं है , मैं इनकी सेवा करूंगा | यह विचार कर बापजी सूरदास जी महाराज की सेवा में लग गये | सेवा करते करते कई दिन बीत गए एक दिन सूरदास जी महाराज ने बापजी को कहा हम गोचरी लेने के लिये चलें तो बापजी ने हाँ भर ली कि चलो चलें | गोचरी लेने गए तो वहां रोटी और आटा भी आता सूरदास जी बोले -आटा तो बेच देंगे | रोटी प्रसाद में पालें | बापजी यह सुनकर बोले-

                                                  धान नहीं धीणो नहीं, नहीं रुपीयों रोक ।
                                                     जीमण बैठा रामदास, अान मिले सब थोक ।।

सूरदास जी के पास बापजी का मन नहीं लगा | बापजी को तो सही सतगुरु के चरणों में पहुंचने हेतु अभी और यात्रा जो करनी थी | करी मन में परमात्मा के प्रति कातर करूणा पूरित प्रार्थनाएँ प्रकट होने लगी | प्रभु के लिये की जाने वाली करूणाएं भला निष्फल कैसे हो सकती हैं | बार-बार एक ही अरदास की कि प्रभु ! मुझे सच्चे सतगुरु के चरणों का आश्रय दिलाओ जो भवतरण की अौषध पिलाकर मतवाला बना दें ; आपकी आराधना उपासना में डूबा दे | बापजी ने सूरदास जी से प्रणाम दण्डवत किया और वहां से निकल पड़े , घूमते- घूमते रेण ग्राम दादूद्वार में पहुंच गये | वहां भी सेवा आदि का कार्ये में रूचि काम करते रहे | बापजी में बचपन से ही स्फूर्ति और कुछ ना कुछ कार्य करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति थी | व्यर्थ बैठकर प्रसाद पाने की प्रवृति बापजी को पसंद नहीं थी | जहां रहते वहां अपनी आवश्यकता प्रकट कर दिखाते साहस अगला व्यक्ति बापजी को छोड़ने नहीं चाहता | बापजी की रहनी , करनी , बोलना चालना आदि व्यवहार देखकर संतों ने कहा आप यहीं रह जाओ आपको दादूद्वार का महन्त बना देते हैं | बापजी ने कहा महापुरुषों यह तो आपकी दया है | संत महापुरुष तो जीव से शिव बना देते है , इसमें आश्चर्य नहीं है आप महन्त बनाते है परन्तु मुझे महन्त नहीं बनना है | मुझे तो परमात्मा की प्राप्ति करनी है मैंने घर - परिवार रामजी का भजन करने के लिए छोड़ा हैं| आप ऐसी कृपा करो , दया करो आशीर्वाद दो ताकि मेरी भावना पूरी हो जाय | नम्रता , सरलता मधुरता तो बापजी में सहज ही प्रवाहित थी |

उपरोक्त भाव साधु - संतों के सामने प्रकट किया तब बाद में वहां

दादूद्वार में ठहरे हुये महात्माओं में से एक महात्मा ने अकेले में बतलाया कि यदि आपको सहज भजन करना है और परमात्मा की प्राप्ति करनी है तो गांव की उत्तर की तरफ रामस्नेही संप्रदाय के सर्व प्रथम प्रवर्तक श्री दरियाव जी महाराज का भव्य स्थान है वहां की परम्परा के एक महान विरक्त समदर्शी महापुरुष श्री गुलाबदास जी महाराज है वहां आप उनके चरणों में चले जाओ आपको जीवन का लक्ष्य वही पूरा होता नजर आता है | क्योंकि धर्म के पालना और मोक्ष की प्राप्ति में पुरुषार्थ ही प्रधान है | अतः आप श्री गुलाबदास जी महाराज के पास चले जावो |

                                                     पूज्य श्री बापजी भक्तिरामजी महाराज की गुरु परम्परा 


रामानन्द जी महाराज की परंपरा में अग्रदास जी महाराज हुए ,इनकी परंपरा में स्वामी श्री संत दास जी महाराज गुदड़िया गादी मेवाड़ दांतड़ा में हुए | संत दास जी के शिष्य प्रेमदास जी महाराज , प्रेम दास जी महाराज के शिष्य रामस्नेही संप्रदाय के सर्वप्रथम प्रवर्तक अनन्त श्री दरियाव जी महाराज, दरियाव जी महाराज के श्री किशन दास जी महाराज, श्री किशन दास जी महाराज के श्री मेघोदास जी महाराज, श्री मेघादास जी महाराज के शिष्य श्री माल दास जी, श्री माल दास जी के शिष्य श्री चतुरदास जी महाराज ,श्री चतुरदास जी महाराज के शिष्य श्री सेवादास जी महाराज ,सेवादास जी महाराज के शिष्य श्री मनसा राम जी महाराज ,श्री मनसा राम जी महाराज के शिष्य श्री अमर दास जी महाराज थे, अमर दास जी महाराज का जन्म पश्चिमी राजस्थान (रोडा़) के पास बीकानेर जिले में देनोक चम्पावतों की ढाणी गांव में सघन्न ठाकुर परिवार में हुआ था बड़े ही उच्च कोटि के महापुरुष थे चौपाहे पशुओं के रोगों के निदान तथा उपचार में जैसा व्यक्तित्व वाला पुरुष मिलना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव जैसा है |उस समय शल्य चिकित्सा का प्रयोग पुरुषों के लिये भी संभव नहीं बन पाया था , तो पशुओं के लिये उपलब्ध कैसे होता था | पूज्य श्री अमरदास जी म.अपने कुशल हाथों से अनुमान की आंखों से पशु गर्भस्थ शिशुशावकों को कुशलता से जीत अथवा मृतक को काट -काट कर बाहर निकाल देते थे | इस तरह से पशुपालक वर्ग के लोगों के लिए वे ईश्वर सदृश्य थे | परम वीतराग श्री अमरदास जी महाराज के शिष्य श्री गुलाब दास जी महाराज थे और इन्हीं दाता श्री गुलाब दास जी के अनेको योग्य शिष्यों में परम पूज्य श्री भक्ति राम जी महाराज शिष्य थे | श्री बापजी भक्ति राम जी महाराज के आदर्श और पुनीत जीवन लोगों के लिये एक प्रेरणादायक तथा श्रद्धा का भरपूर सम्बल था | भगवान बुद्ध के जीवन से जो परिचित हैं | उनको मालूम है भगवान बुद्ध के साथ शिष्य आनंद का जो सम्बन्ध था | बस वैसा ही सम्बन्ध दाता श्री गुलाब दास जी महाराज के साथ पूज्य बापजी महाराज का भी वैसी ही श्रद्धा तथा भाव व ह्रदय में अनुराग था | बापजी श्री का जीवन दाता श्री गुलाब दास जी महाराज की जीवन से कितना जुड़ा हुआ था | यह तो बाप जी के भक्त ही जानते थे और जानते हैं परम पावन श्री भक्ति राम जी महाराज बापजी जैसे गुरुभक्त व निष्ठावान शिष्य बहुत कम सुनने में पढ़ने में आएंगे भक्तमालादि ग्रन्थों में जैसे गुरुभक्तों के उदाहरण पढ़ते सुनते हैं उसी के अनुरूप श्री बापजी गुरुभक्तथे

पूज्य गुरुदेव बापजी श्री,प्रतिदिन श्रीमद् भागवत गीता का नियम से पाठ सुनते और करवाते थे | वैसे तो बाप जी सभी ग्रन्थों का सम्मान अादर करते , लेकिन गीता जी भागवत गीता जी बापजी विशेष रूप से मानते थे | कुछ समय बाद बापजी महाराज ने हरि कीर्तन का ऐसा रूप बना दिया कि - भव सागर को तैराने वाली सरिता हो गई हो | इस हरि कीर्तन का महोत्सव एेसा बन जाता कि - बड़े -बुड्ढे भी बालकों के साथ नाच उठते थे | पूज्य बापजी अनेक गांवों में राम जप करते थे और श्रीमद् भागवत का पाठन भी खूब कराया था | बापजी महाराज ने आवधूत वृति में बहुत भजन किया , जगत में बापजी प्रकट नहीं होवें थे | संसार में अलग ही राहे थे | बापजी महाराज ने परमधाम पधारने से पूर्व सभी श्रद्धालुओं से कहा कि- मनुष्य शरीर बहुत दुर्लभ है यह जीवन सार्थक तब ही होता है जब शरीर से परोपकार वह हृदय से प्रभु स्मरण होगा | जीव और ईश्वर की मैत्री हैं | प्रत्येक कार्य में परमात्मा जीव को सहायता देते हैं , पर स्वरूप छिपाकर देते हैं | यह बरसात कैसे आती हैं ? बरसात देने वाला क्या वही दिख पड़ता हैं ? भगवान कहते हैं -भाई ? एक काम तुम करो , एक मैं करता हूँ |बरसात बरसाने का काम मेरा है , धरती में हल चलाकर खेती करने का काम तेरा है | बरसात में बरसने के बाद बीज बोने का काम मेरा है | अंकुर प्रस्फुटित हो जाने पर खेत की रक्षा करने का  काम तेरा है | अनाज उत्पन्न करने का काम मेरा है |  अनाज उत्पन्न होने के बाद खाने का काम तेरा है | तुम्हारे पेट के  अनाज को पचाने का काम मेरा है -
अहं वेश्वांरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापान समतायुक्त: पचाम्यनं चतुर्विधम ।।
 परमात्मा खाते नहीं है मानव जो कुछ खाता है उसे पचाते है |  प्रत्येक के पेट में अग्निरूप में  नारायण विराजमान हैं |
 भगवान कहते हैं कि खाना खाने के बाद सो जाने का कार्य तुम्हारा है और तुम्हारे पास बैठकर सारी रात जागने का कार्य मेरा है | भगवान सोते नहीं है भगवान जागते हैं ,अगर भगवान सो जाय तो हम सभी का अच्युतम केशमं  हो जायेगा | पूज्य बापजी  श्री भक्तिरामजी महाराज पास बैठे भक्तजनों से राम - स्मरण करवाया  और बोले कि अब मैं श्री भगवान की  परम - धाम जा रहा हूँ | परम पूज्य बापजी ने अकेले में ही  रामज्योत बाईसा से कहा कि अब मेरा शरीर नहीं रहेगा | तब साध्वी  रामज्योत बाईसा - बापजी श्री भक्तिराम जी म. परम धाम पधारने की चिन्ता  करने लगी | तब पूज्य बापजी बाईसा ने बताया कि - देख अब मेरा शरीर काम नहीं दे रहा है और मुझे भगवान श्री कृष्ण का दर्शन हुआ |  श्रीकृष्ण भगवान बोले कि - प्रिय भक्त  तेरा सिंहासन  मेरे  सिंहासन के पास है पूज्य बापजी ने बताया कि भगवान श्री कृष्ण का तेज बहुत था और भगवान के हाथ में वंशी सिर पर मोर मुकुट व शरीर पर पिताम्बर  धारण किये  हुवे थे | 
  रामज्योत बाईसा से बापजी  बोले कि अब तुं मना मत करना और भगवान से प्रार्थना कर कि मेरे पंच भौतिक शरीर छूट जाय | 
  बाईसा से ऐसे कहते हुए पूज्य बापजी पलंग से यानी चारपाई से नीचे उतारकर पद्मासन लगाकर विराजमान हो गये |  बापजी  भगवान का स्मरण करवाते हुए | व अन्य  शिष्यों एवं भक्तों से राम -स्मरण करवाते हुए | वि. सं. 2053 आषाढ़ शुक्ल  दूसरी चौथ शनिवार को पद्मासन की स्थिति में पहले स्नान करके, भोजन करके- और फिर बापजी रामज्योत बाईसा से कहा कि करुणासागर का पाठ, संतों की अारतियां व भगवान की अारतियां एवं भजन सुना तो बाईसा  ने भजन  सुना कर के व सभी शिष्य एवं भक्तों को राम-राम करने को कहा और मौन धारण करके पद्मासन लगाकर विराज गये और  सबके  देखते -देखते दसवां द्वार से ब्रहारन्घ्र से प्राणों का प्रयाण किया | जबकि ऐसा सुना जाता है , ऐसी घटना बहुत - कम संत महात्मा की होती है और प्रत्यक्ष कभी किसी ने नहीं देखी  | यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि हमने इस तरह प्राण विसर्जन करने वाले महापुरुष के  अन्तिम समय में दर्शन किये सांय  5:00 बजे के बाद तीव्र ध्वनि के साथ राम नाम एक शब्द हुआ और पूज्य बापजी श्री भक्तिराम जी महाराज ने ब्रहारन्घ्र का भेदन करके  परमात्मा में लीन हो गये |

पूज्य बापजी म. की बैकुंठी रखने से पहले ,एक छोटा सा हवन किया बाद में दूध व गंगा जल से पवित्र किया ओर बाद में बैकुंठी रखी तो बैकुंठी के चारों तरफ अग्नैय कोण से अग्निदेवता प्रकट हो गये | पूज्य बापजी का अग्निसंस्कार अपने आप हुआ था |


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