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मंदिर मस्जिद विवाद[संपादित करें]

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नये निबन्ध- ओन्कर शरद्

मंदिर मस्जिद विवाद</big>

अयोध्या भगवन राम कि जन्म भूमि है . जिस स्थान को श्री राम का जन्म स्थल कहा जा रहा है वह विवाद का विषय बना हुआ है. जन मानस धात्मिक नेता यह कहते है कि प्रथम मुग़ल सम्राट बाबर ने जिस स्थान पर परंपरागत इस्लामी निति के तहत १५८३ ई. में मस्जिद बनवायी थी. वहाँ पहले श्री राम का मंदिर था और बाबर ने हिन्दुओ का अपमान करने के लिए मंदिर को तोड़ कर मस्जिद का निर्माण करवाया क्योकि उस समय पर हिन्दू पदाक्रान्त थे. यह मंदिर मस्जिद विवाद इस समय एक अत्यंत ज्वलंत समस्या है .

'समस्य प्रारम्ब ' : मंदिर मस्जिद विवाद का प्रारंभ सन १८८३ ई. मिए हुआ जब फैज़ाबाद के उपायुक्त ने उस स्थान पर मंदिर बनाने कि आज्ञा देने से इनकार कर दिया क्योकि उस्का मत था कि इससे मुसलमानो में आक्रोश व्यापत होगा. १८८५ ई. में इस विवाद को लेकर सांप्रदायिक दंगे हुए जिसमे १०० से भी अधिक व्यक्ति मरे गए . इसी वर्ष क़ानूनी विवध भी प्रारम्भ हुआ. जिला ने मंदिर बनाने के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया और २३ मार्च १९४६ ई. को फ़ैजाबाद के सिविल जाज ने यह फैसला सुनाया कि मस्जिद को बाबर ने बनवाया है, और मंदिर बनाने कि आज्ञा नै दी जा सकती है. १९४८ ई. में मंदिर निर्माण के हेतु संघर्ष करने के उद्देश्य से राम जन्मभूमि 'मुक्ति यज्ञ समिति 'का गठन किया गया. फरवरी १९८६ ई. में फैज़ाबाद के जिला जाज श्री पाण्डेय ने जिला प्रशासन को यह आदेश दिया कि विवादस्पद स्थल का ताला खोल दिया जाये . इस के कारण फरवरी १९८६ ई. में कुछ मुस्लिम नेताओ ने इलाहाबाद उच्च न्यायलय से यथापूर्वक स्थिति बहाल करने का आग्रह किया और इलाहाबाद उच्च न्यायलय में यह मामला लंबित पड़ा है . संघर्ष : सितम्बर १९८८ ई. में हुए सम्मलेन में यह निर्णय लिया गया कि वह स्थान मंदिर ही है अतएव हिन्दू सरकार से कोई बात चीत नहीं करेंगे . बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति ने यह निर्णय लिया कि वह अयोध्या मार्च करेगी. १९८९ ई. में विश्व हिन्दू परिषद् ने विवादस्पद स्थान पर २५ करोड़ की लागत से एक मंदिर बनाने का कार्यकर्म घोषित किया. १४ अगस्त १९८९ ई. को लखनऊ खण्ड पीठ ने वहाँ यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया. २९ सितम्बर १९८९ को विश्व हिन्दू परिषद् ने केंद्रीय गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के मंत्री के साथ यह समझौता किया कि वह अदालत का फैसला स्वीकार करेगी .इसी आधार पर १९ अक्टोबर १९८९ को विश्व हिन्दू परिषद् ने प्रस्तावित आयोध्या मार्च स्थगित कर दिया परन्तु शिलान्यास करने का निर्णय लिया . २३ जून १९९० ई. को जब केंद्र में जनता दल की सरकार थी तो हरिद्वार में धर्माचार्यो की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि अक्टूबर १९९० ई. में मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ होगा. भारतीय जनता पार्टी ने इसका समर्थन किया .२५ सितम्बर १९९० ई. को लाखो को भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा प्रारंभ की . १७ अक्टूबर १९९० ई. को बीजेपी ने यह घोषणा की कि यदि रथयात्रा को रोका गया और राम मंदिर के निर्माण में बाधा आयी तो वह राष्ट्रीय मोर्चा सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेगी. इस को लेकर देश के अनेक भागो में दंगे हुए, रथ यात्रा रोक दिया गया और बीजेपी ने राष्ट्रीय मोर्चा से आपना समर्थन वापस ले लिया. ३० अक्टूबर में कारसेवको ने सुरक्षा बलो कि भारी घेराबन्दी को तोड़कर अयोध्या में प्रवेश किया. कुछ कारसेवको ने विवादित स्थल के ढाचे पर केसरिया झण्डे फहरा दिए तथा थोडा नुकसान भी पहुचाया. इसके फलस्वरूप वहाँ कि सुरक्षा बड़ा दी गयी. अयोध्या में ऐसी सुरक्षा व्यवस्था थी कि जैसे किसी विदेशी आक्रमणकारी का सामना करने कि तयारी की जा रही हो. इसके बाद भीषण गोलीबारी हुई और सैकढो की संख्या में कार सेवक मारे गए और कई घायल हुए. उत्तर प्रदेश के ही साथ में मध्य प्रदेश , गुजरात ,राजस्थान ,कर्नाटक ,केरल और तमिल नाडु में भी सांप्रदायिक दंगे फ़ैल गए ,इसे अत्यंत सूझ -भूझ से दबा दिया गया.

सन्दर्भ[संपादित करें]

सरल हिन्दि निबन्ध - डाय्म्न्ड

इस घटना के कुछ समय बाद देश में आम चुनाव हुआ. दिसंबर १९९०- जनवरी १९९१ ई. को विश्व हिन्दू परिषद् और बाबरी एक्शन कमेटी ने अपने-अपने दृष्टिकोष के समर्थन में दस्तावेज सौप दिये. आम- चुनाव के केंद्र में किसी भी दल को बहुमत नहीं प्राप्त हुआ परन्तु राजीव गांधी की निर्मम हत्या के फलस्वरूप केंद्र में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप आयी ,दूसरा स्थान भारतीय जनता पार्टी को मिला. उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी. सहमति के प्रयास : दिसंबर १९९० जनवरी १९९१ ई. में विश्व हिन्दू परिषद् और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने अपने अपने दृष्टिकोण के समर्थन में सरकार को दस्तावेज सौप दिये थे. दोनों पक्षो ने विवादित ढाचे की जॉज के हेतु विशेषज्ञों की सूची भी सरकार को दी. इसके बाद उत्तर प्रदेश की सरकार ने विवादित ढाचे के आस पास की भूमि का अधिग्रहण कर लिया और विश्व हिन्दू परिषद् ने वहाँ जबूतरा बनाने का कार्य प्रारम्भ किया. न्यायालय के हस्तक्षेप और प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिम्हाराव की सूझ-बूझ के फलस्वरूप विश्व हिन्दू परिषद् ने कार्य रोक दिया और प्रधानमंत्री को समस्या के समाधान के लिए तीन माँह का समय दिया. इसके बाद विश्व हिन्दू परिषद् और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेतओ की बैठक हुई परन्तु समस्या का कोई समाधान अभी तक नहीं निकल पाया है विश्व हिन्दू परिषद् निर्माण कार्य करने के लिए कटिबद्ध थे और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी यह होने नहीं देना चाहती. हिन्दुओ का तर्क है कि विवादित मंदिर वही था और वही रहेगा परन्तु मुसलमानो का तर्क है कि उक्त स्थल पर कोई मंदिर था ही नहीं . इस मंदिर मस्जिद विवाद के कारण राष्ट्र में बहुत अधिक छति हुई है परन्तु विवाद ज्यो का त्यों देश कि जनता पर हावी हो रहा है. प्रत्येक सच्चा भारतीय यह चाहता था कि इस समस्या का समाधान सदभावनापूर्वक वातावरण में निकल जाये. मंदिर मस्जिद विवाद देश के साम्प्रदायिकता एकता के लिए अत्यंत घातक है और मिल जुलकर इसका समाधान ढूंढना ही इसका उपाय है . आखिर में इस विवाद को लेकर बहुत दंगे हुए, बीजेपी के मुख्या पर भी बाबरी मस्जिद मुद्दे पर प्रश्न उठाये गए . एक ओर हिन्दूओ की अर्चना ओर दूसरी ओर मुसलमानो की कट्टरता के कारण देश को बहुत नुकसान हुआ. इस विवाद के कारण कई मासूमो ने अपने प्राण दान दिए. यह भारत के विवादो में एक बड़ा विवाद बन गया जिसे सुनकर कई आँखें नम्म ओर कई होठ सहम जाते है .