सदस्य:Aathira Kumar/प्रयोगपृष्ठ

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कंकाली माता मंदिर का नाम कलि कंकाली माता मंदिर है। यहां पर बहोत वर्षो पहले आदिवासी समुदाय के गोंड़ जनजाति के लोगो द्वारा यह मंदिर (देव थाना) बनाया था। यहां पर स्थापित देवी कलि कंकाली माता को आदिवासियों द्वारा पूजा जाता था जो कि आज के समय मे कलि कंकाली माता का नाम कंकाली माता रख दिया गया है।

=परिचय=<ref>http://www.patrika.com/news/bhopal/kankali-mata-temple-in-bhopal-1259014/<ref>

     हम लोगों ने माँ काली के विभिन्न रूपों से परिचित हैं लेकिन भोपाल के इस मंदिर में काली की सिर टेडी है | यह एक ही बार सीधी हो जाति है | कंकाली देवी का मन्दिर भोपाल में स्थित हैं| यह मंदिर भोपाल से २० किलोमीटर दूर और रायसेन से ३० केलोमीटर दूर पर स्थित हैं |इस मंदिर की स्थापना सत्रह सौ इकत्तीस में खुदाई में यह मंदिर मिला था | मंदिर कब अस्तित्व में आया, इस्का कोई प्रमाण नहीं है | यह भी कहा जाता है कि "हर लाल मेडा" को सपने में आकर इस मंदिर के बारे में बताए थे | उसके बाद ज़मीन में खुदाई करने पर इस माता की मूर्ति मिली थी | मंदिर में करीब पचास साल से अखंड ज्योति प्रचलित हो रही है | पेहली इस मंदिर में बलि देने की प्रथा थी फिर इस प्रथा को बंद कर दिया गया था | मनोकामना करने पर यहाँ भक्त एक बन्धन बाँधते है और मनोकामना पूरा होने पर इस बन्धन को निकालते है | 

==इतिहास==<ref>http://www.patrika.com/news/bhopal/kankali-mata-temple-in-bhopal-1259014/<ref> कंकाली देवी को पूर्व में 'कंस काली' के नाम से जानी जाती थी | उस मूर्ती की स्थापना श्री कृष्ण के जन्म से जुडी हुई है| कंस के द्वरा पूजित होने के कारण उन्हें कंस काली या कंकाली देवी कहलाती हैं |उन्हें कंकाली देवी इसलिए भी कहा गया है क्योंकि वे कंकाल की माला धारण कर रखे हैं | इस मूर्ति दुरगा देवी की है और इस मूर्ती की यह इतिहास है कि जब कंस ने देवकी की बच्ची समझकर उसे मारने लगा तो वह बच्ची दुर्गा देवी में बदल गयी | तभी इस स्थल को कंस काली के नाम से जाने जाते हैं | कृष्ण के जीवन की इतिहास के अनुसार यह उनके लिये मथुरा के बाद द्वीतीय स्थान हैं | इसके अलावा माँ कंकाली देवी की चित्र वाले चाँदी के सिक्के भी बन्वाया गया है |

=विषेशताएँ=<ref>https://www.youtube.com/watch?v=AluiSQVxQLU/<ref> यह कहा जाता है कि दशहरे के दिन मै माँ कंकाली देवी की सिर सीधी हो जाती है | नवरात्री के नौ दिनों मे माँ को अलग अलग रूप में दिखायी देती है | लोग यहाँ सन्तान प्राप्ति की इच्छा पूरी कर्ने केलिए मंदिर पर श्राद्धालू गोबर से उल्टे हाथ के निशान लगाते है | मंदिर की निर्माण केलिए ११ हज़ार रुपये, बहुत सारा दान और भेंट मिले थे | इस समय माँ को देखने केलिए दूर से लोग आते है | यह माना जाता है कि जिन लोगों को माँ की सीधी सिर देखने को मिलता है उनके सिर बिगडे काम हो जाता है | भोपाल से कुल १५ किलोमीटर दूर रायसान जिले के गुदावल गाँव में माँ काली की प्राचीन मंदिर है| यहाँ माँ काली की २० भुजाओं वाली प्रतिमा के साथ भगवान ब्रह्म, विष्णु और महेश की प्रतिमाए भी स्तिथ है | यह कहा जाता है कि दशहरे के दिन माता की झुकि हुई गर्दन (कुल ४५ दिग्री) कुछ पलों केलिए सीधी हो जाती है | यह भी कहा जात है कि जिन माता-बेहनों की गोद सूनी होती है, वह श्र्दाभाव से यहाँ उल्टे हाथ लगाती है, उनकी मान्यता ज़रूर पूरी हो जाती है | चैत्र और शारदेय के दौरान, इस मंदिर में विशेष पूजन होती है | मध्य प्रदेश की पर्यटन मंत्री सुरेन्द्र पटवा ने बताया कि इस मंदिर का कायाक्लप हो रहा है | यहाँ पाँच करोड की लगत से मंदिर को भव्य स्वरूप देने की मंजूरी, पर्यटन ने दी है | इस मंदिर के ट्र्स्ट के अध्यक्ष रायसेन जिल्ला के कलेक्टर हैं | वे इस मंदिर की भलाई केलिए बहुत परिश्रम करते है |

=निष्कर्ष=<ref>http://naidunia.jagran.com/spiritual/kehte-hain-kankali-dham-nera-raisen-center-of-devotees-faith-708431/<ref>

  कंकाली देवी के मंदिर होने के कारण यहाँ कई लोग यहाँ गुप्त पूजन भी करते हैं | कंकली देवी के मंदिर रायसेन रोड पर स्थित बिलखिरिया गाँव से कुछ ही दूर पर जंगल के बीच बना हुआ है | मंदिर के चारों और लगे हरे-भरे पेड-पौधों यहाँ के सबसे बडा आकर्षण हैं | यह भी कहा जाता है कि माँ के दर्बार से कोई भी भक्त निराश होकर वापस घर नहीं जाता| अत: इससे हम माँ की शक्ति के बारे पता चला है और उनकी और भक्ति और भी बड गया है |