सदस्य:88shalini/शेलेन्द्र चौहन

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88shalini/शेलेन्द्र चौहन

परिचय[संपादित करें]

शैलेन्द्र चौहान का जन्म ८ फरवरी १९५४ वसंत पंचमी के दिन उत्तर प्रदेश में हुआ था| स्कूल में उनकी जन्मतिथि २१ दिसम्बर लिखी गई थी जो अनेक जगह परिलक्षित होती है| उनके पिताजी राजेंद्र सिंह चौहान मध्य प्रदेश में विदिशा नगर के एक विद्यालय में शिक्षक थे | उनकी माता का नाम विद्यावती था | शैलेन्द्र जी ने कविताएं पंद्रह वर्ष की उम्र में अपने हायर सेकंडरी स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही लिखनी प्रारम्भ कर दी थीं | १९७८ में उनकी कई कविताएं हिंदी की प्रतिष्ठित पत्र - पत्रिकाओं में छपीं | १९७९ में उन्होंने विदिशा से ही एक साहित्यिक लघुपत्रिका धरती का प्रकाशन प्रारम्भ किया| विदिशा में रहकर ही शैलेन्द्र ने अपना शिक्षण पूरा किया| १९७८ में उन्होंने एस.ए.टी.आई. कॉलेज विदिशा से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग इलेक्ट्रिकल शाखा में पढ़ाई पूरी की | उसके बाद वह एस.ए.टी.आई. पॉलिटेक्निक में व्याख्याता के रूप में शामिल हो गए और दो वर्ष वहां पर सेवा प्रदान की | तदुपरांत उन्होंने महाराष्ट्र राज्य के नांदेड़ नामक स्थान पर 'महाराष्ट्र राज्य बीज मंडळ' में सेवाएं प्रदान कीं | १९८४ में शैलेन्द्र इलाहबाद आए और वहां की साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भागीदारी की। वहां वह सभी वरिष्ठ साहित्यकारों के स्नेहपात्र रहे | १९८४ में ही शैलेन्द्र इलाहबाद से कानपुर स्थानांतरित हो गए | इलाहबाद के बाद कानपुर में एन.टी.पी.सी. संस्थान में उनकी तैनाती हो गई | कानपुर में जानेमाने आलोचक हृषिकेश से उनका संपर्क हुआ इनके संपर्क में आकर इन्होंने अपनी आलोचनात्मक मेधा को और प्रखर किया | शैलेन्द्र ने अपनी कविताएं और कहानियां लिखना जारी रखा | वहां प्रसिद्ध लेखक, कथाकार गिरिराज किशोर और जनकवि मन्नू लाल शर्मा 'शील' से उनके प्रगाढ़ सम्बंध स्थापित हो गए |

संग्रह[संपादित करें]

उन्होंने अपना पहला काव्य संग्रह "नौ रुपाए बीस पैसे" १९८३ में परिमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कराया | वहीं उसी वर्ष उन्होंने 'धरती; पत्रिका के लिए त्रिलोचन शास्त्री पर केंद्रित शोध के महत्त्व का एक अंक संपादित और प्रकाशित किया | यह अंक त्रिलोचन जी के "ताप के ताये हुए दिन" काव्य संग्रह के अकादमी पुरस्कार पर प्राप्त होने के अवसर पर प्रकाशित किया गया था | अंक पाठकों ने बडे पैमाने पर पसंद किया | १९८८ में शैलेन्द्र मोरादाबाद चले गए और एक ही वर्ष के उपरांत वहां से कोटा जाकर उन्होंने नाट्यकर्मी लेखक और कार्यकर्ता मित्र शिवराम के साथ अपने साहित्यिक सांस्कृतिक जीवन में एक नया मोड़ लिया | वह विशुद्ध साहित्यकार से एक साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यकर्ता बने | इसके बाद शैलेन्द्र काफी जगहों पर रहे जैसे जयपुर, गाज़ियाबाद, फरीदाबाद आदि | १९९८ में वे महाराष्ट्र के भद्रावती नामक स्थान पर स्थानांतरित हो गए | यहाँ रहने के दौरान कविताओं के साथ साथ इनके कई साहित्यिक लेख और साहित्यिक पुस्तकों की आलोचना अखबार और पत्रिकाओं में प्रकाशित हुये | वर्ष २००० में शैलेन्द्र नागपुर जाकर सामाजिक कार्यकर्त्ता बन कर कार्यशालाओं और सेमिनारों में हिस्सा लेने लगे | उन्होंने नागपुर से एक सांस्कृतिक मोर्चे 'विकल्प' और एक साहित्यिक आंदोलन 'साझा सांस्कृतिक अभियान' का समन्वय भी किया |

१९ साल बाद २००३ में शैलेन्द्र चौहान का 'श्वेतपत्र' नामक दूसरा काव्य संग्रह संघमित्रा प्रकशन द्वारा प्रकाशित किया गया | "और कितने प्रकाशवर्ष" नामक काव्य संग्रह २००४ में नागपूर से प्रकाशित हुआ | उन्होंने कुछ विचारशील और मार्मिक कवितायें लिखी हैं जो "ईश्वर की चौखट पर" संग्रह में समाविष्ट हैं | यह संकलन दिल्ली से २००४ में प्रकाशित किया गया है। २००५ के मध्य में उन्हें मध्य प्रदेश के धार जिले के एक छोटे से गांव में स्थानांतरित कर दिया गया। वहाँ उन्होंने धार, झाबुआ और बड़वानी आदि जिलों में नर्मदा घाटी के आदिवासियों के बीच में काम किया। उन्होंने वहाँ के आदिवासियों को होने वाली कठिनाइयों पर लिखा । उसी समय उन्होंने 'माण्डू' जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर भी लिखा | २००६ के अंत में शैलेन्द्र गुजरात राज्य में बड़ोदा स्थानांतरित हुए। यहाँ वे सुप्रसिद्ध भाषाविद और सामाजिक कार्यकर्ता गणेश डेवी के संपर्क में आये | यहाँ उन्होंने कई महत्वपूर्ण कवितायेँ रचीं | २००८ के मध्य में शैलेंद्र राजस्थान में 'बारां' नामक मध्य प्रदेश के एक सीमावर्ती जिले में गए | वहां 'सहरिया' जनजाति ने उनका ध्यान आकर्षित किया और उन्होंने एक संगोष्ठी आयोजित कर क्षेत्र के सभी बुद्धिजीवियों को आदिवासियों की जीवन शैली के बारे में चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया | और कई अन्य कार्यक्रम भी आयोजित किये |

२०१० में उनका एक उपन्यास बचपन के संस्मरण पर आधारित 'पांव जमीन पर' बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित किया गया है। जिसकी चर्चा हिंदी जगत में सम्मान के साथ हुई |

शैलेंद्र के अगले गंतव्य जम्मू, जहां वह युवा लेखकों के लिए एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व के रूप में उभर आए थे | वे युवा 'हिंदी लेखक संघ' के साथ जुड़े गए और सक्रिय रूप से कई कार्यक्रमों में भाग लेने लगे | युवा लेखकों की कविताओं को एकत्र कर और उन्हें अपने नोट / टिप्पणी के साथ साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित किया | निडर होकर उन्होंने कश्मीर के मुद्दे पर लिखा | कश्मीरी बुद्धिजीवियों ने उनके लेखन की प्रशंसा की। दिल्ली में रहकर शैलेन्द्र ने 'धरती' पत्रिका का मीडिया पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण अंक प्रकाशित, संपादित किया | 'क्रमशः' पत्रिका के दो अंक भी संपादित किये | एक स्व. कवि - आलोचक संजय कुमार गुप्त पर और दूसरा हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि एवं ग़ज़लकार रामकुमार कृषक पर केंद्रित किया | यहीं उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में  भी सक्रिय योग किया | देश के अनेकों समाचार पत्रों में अपने ढंग से लिखा | अपनी सेवाओं से निवृत २०१५ में वह जयपुर वापस लौट गए। शैलेन्द्र की यात्रा अभी भी जारी है वे आजकल ताजमहल के शहर आगरा में रह कर वहां की मिश्रित संस्कृति का अनुभव ले रहे हैं |

प्रमुख कृतियाँ[संपादित करें]

  • नौ रुपय बीस पैसे (कविता संग्रह)
  • और कितने प्रकाश वर्ष (कविता संग्रह)
  • ईश्वर की चौखट पर (कविता संग्रह)
  • नहीं यह कोई कहानी नहीं (कहानी संग्रह)
  • पांव जमीन पर (उपन्यास)

ईश्वर की चौखट पर

शैलेंद्र चौहान की कविताओं में मध्यवर्गीय उदासी या सब कुछ न पाने की निराशा न होकर अपने समय के सच को पहचानने की जिद है और उसे व्यक्त करने की बेचैनी है । मैं नहीं कहता कि यह जिद और बेचैनी शैलेंद्र चौहान को जीवन में क्या देगी लेकिन यह तो तय है कि अच्छे कवि के रूप में उनकी पहचान को बढ़ायेगी । इसलिये वे निर्द्वंद्व होकर कहते हैं ' अपनी छोटी दुनिया और /छोटी-छोटी बातें /मुझे प्रिय हैं बहुत /करना चाहता हूं /छोटा-सा कोई काम । कुछ ऐसा कि /एक छोटा बच्चा /हंस सके /मारते हुये किलकारी । एक बूढ़ी औरत/कर सके बातें सहज /किसी दूसरे व्यक्ति से /बीते हुये जीवन की । मैं प्यार करना चाहता हूं /खेतों , खलिहानों /उनके रखवालों को । एक औरत का /जिसकी आंखों में तिरती नमी /मेरे माथे का फाहा बन सके । मैं प्यार करना चाहता हूं तुम्हें /ताकि तुम /इस छोटी दुनिया के लोगों से /आंख मिलाने के /काबिल बन सको । ' यह छोटी दुनिया किन लोगों की है कहने की जरूरत नहीं । पर कवि बार-बार इन्हीं लोगों की दुनिया में रहना चाहता है , उनके दुख-दर्दों के साथ आत्मीय रिश्ता बनाकर उन्हें व्यक्त करना चाहता है और चाहता है कि ऐसे लोगों की दुनिया चमत्कार और चकाचौध में अंधे हो रहे तथाकथित लोगों से आंख मिलाने की हिम्मत कर सके । कविता हिम्मत दिलाने का काम करती है इसलिये कवि यह चाहता है । जो लोग कविता की ताकत और उसकी अभिव्यक्ति की मार से मुंह मोड़े हुये हैं , उन्हें कविता में छुपी इस ताकत को पहचानना चाहिये । मैं फिर जोर देकर कहना चाहता हूं कि यह ताकत दुहरे जीवन से नहीं आती , कविता की पंक्तियां केवल लेखनी से नहीं फूटतीं बल्कि वे निजी जीवन के संघर्षों और ईमानदार प्रतिबद्धता से निकलती हैं । ऐसा जीवन चुनौतियों भरा है , इसके लिये खोना अधिक पड़ता है । विरले ही कवि ऐसा जीवन जीते हैं - निराला और मुक्तिबोध इसलिये बड़े हैं कि उनके यहां जीवन का ताप और संघर्ष है , ऐसी दुनिया का वरण है जिसमें धूप अधिक और छांव बहुत बहुत कम है । पर दिक्कत यह है कि हम उदाहरण तो ऐसे बड़े कवियों के देते हैं और जीवन में आचरण उनके विपरीत करते हैं । ऐसी स्थिति में कविता कहीं छूट जाती है । शैलेंद्र चौहान के यहां स्थिति दो टूक साफ है इसलिये वे कहते हैं ' त्रासदी है मात्र इतनी /सोचता और समझता हूं मैं /अभिव्यक्त करता भाव निज / सुख-दुख और यथास्थिति के /पहचानता हूं , हो रहा भेद /आदमी का आदमी के साथ /प्रतिवाद करना चाहता हूं /अन्याय और अत्याचार का । किंतु व्यवस्था /देखना चाहती /मुझे मूक और निश्चेष्ट । नहीं हो सका पत्थर मैं /बावजूद , चौतरफा दबावों के /तथाकथित इस विकास-युग में । '

शैलेंद्र चौहान की यह त्रासदी नहीं है बल्कि आत्मविश्वास है । उनके जीवन में कोई खोट नहीं है , द्वैत नहीं है इसलिये वे अपनी बात साफ-साफ कहते हैं । वे सोचते हैं , विचारते हैं इसलिये उनकी कविता में इतनी ताकत है । वरना कवियों के पास अब कहने को बचा ही क्या है ? वे अपनी सीमित और सुरक्षित दुनिया में मस्त हैं और दिखावे के लिये शब्दों की बाजीगरी कर रहे हैं । जुलाई , 2007 के कथादेश में जानी-मानी नाट्यकलाकार असीमा भट्ट की आत्मकथा के दुख भरे हिस्से छपे हैं , उन्हें पढ़कर अपार दुख , घृणा और लज्जा आती है । एक क्रांतिकारी बाप की कलाकार बेटी ने जब कवि आलोक धन्वा से उन्हीं की इच्छा रखते हुये शादी की तो उन्हें वे दिन देखने पड़े जो एक सामंती परिवार में एक स्त्री को देखने पड़ते हैं । हमारे कवियों का यह सामंतवाद इसलिये और त्रासद है कि वे अपने को प्रगतिशील कहते हैं और 'ब्रूनो की बेटियां' जैसी कविता लिखते हैं । मैं सच कहता हूं कि असीमा भट्ट की पीड़ा का यदि शतांश भी सही है तो यह हमारे जैसे सोचने-विचारने वाले लोगों के लिये शर्म की बात है । ऐसे आलोक धन्वा की कविताएं झूठी हैं और पाखंड हैं । शैलेंद्र चौहान की कविता मुझे इस प्रसंग में और बड़ी नजर आती है क्योंकि मैं उन्हें मुद्दत से जानता हूं ।

एक कवि को अपने समय और अपने इर्दगिर्द का ध्यान रखना चाहिये , उन परिस्थितियों की बारीक जांच करनी चाहिये जिनकी वजह से अमानवीय स्थितियां बन रही हैं । वह केवल अपने लिये ही कविता नहीं कर रहा बल्कि अपने समय और समाज को भी रूपायित कर रहा है । जिन लोगों को यह गलतफहमी है या गलतफहमी बनाये रखना चाहते हैं कि कविता स्वांत: सुखाय होती है , उन्हें तुलसीदास की प्रसिद्ध कृति रामचरितमानस के बालकांड और उत्तरकांड को अवश्य पढ़ना चाहिये कि तुलसी बाबा कैसे अपने समय के निर्गुणियों और शासन व्यवस्था पर बरसते हैं । इतने शांत और संत तुलसी बाबा कविता की ताकत पहचानते थे , इसलिये उन्होंने उन प्रवृत्तियों का खंडन किया है , उन्हें खारिज किया है जो मनुष्य के विरोध में जा रही थीं । हमारे समय के कवियों को भी इस आरोप के बावजूद कि कविता नारा नहीं होती , कविता सीधे-सीधे बात करने का माध्यम नहीं हो सकती , दो टूक शब्दों में मनुष्य विरोधी ताकतों का पर्दाफाश करना चाहिये । यदि वे ऐसा नहीं करते तो फिर क्यों कविता लिख रहे हैं ? शिल्प , भाषा और अलंकार के लिये तो हमारे पास रीतिकाल की प्रचुर धरोहर है ही । शैलेंद्र चौहान खुलकर चुनौतियों को स्वीकार करते हैं । अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरोध में उनकी दो कविताएं इसी संग्रह में ध्यान देने योग्य है । मुझे याद है कि कई साल पहले 'उद्भावना' ने पाकिस्तान की कविता में अमेरिका विरोधी स्वरों पर एक अंक केंद्रित किया था तब मुझे यह देखकर प्रसन्नता ओर आश्चर्य दोनों हुये थे कि जिस उर्दू भाषा को हिंदी के अधिकांश पाठक शेरो शायरी और प्रेम जैसी कोमल भावनाओं को व्यक्त करने वाली मानते हैं , उसमें अपने देश के कट्टर दुश्मन और विश्व में साम्राज्यवाद तथा आतंकवाद को फैलाने वाले अमेरिका और उसकी नीतियों का इतना पुरजोर और तीखा विरोध है । दरअसल , हुआ यह कि राजनेताओं पर व्यंग्य करने और हंसी मजाक का माहौल बनाने के लिये मंच की फूहड़ कविता , पुरस्कार पाने और लाभ पाने के लिये कोमलकांत पदावलीयुक्त कविता और जनता का दुख दर्द और आदमी को बचाये रखने के लिये विचारप्रधान कविता । इस तरह तीन खांचों में कविता को बांटकर ऊपरवाले दो लाभ कमा रहे हैं और जनता से बचने को कविता की पवित्रता को बचाये रखने का स्वांग कर रहे हैं । ऐसे स्वांगप्रिय कवि हर युग में होते आये हैं लेकिन उनकी कविता वहीं तक सीमित रहती है , आगे जाने का रास्ता वे कवि स्वयं बंद कर गये थे ।

शैलेंद्र चौहान अमेरिकी साम्राज्यवादी नीतियों से बखूबी परिचित हैं , वे यह मानते हैं कि एक जमाने तक साम्राज्यवाद को बढ़ावा देने वाला इंग्लेंड अब अमेरिका के साथ होकर या उसका पिछलग्गू बनकर दुनिया को आर्थिक रूप से गुलाम बना रहा है । यह गुलामी किसी दूसरे देश पर राज करने से अधिक घातक है । अब गुलामी ऊपर से नहीं दिखती बल्कि उसे मानसिकता के रूप में परिवर्तित किया जा रहा है जिससे उसका अस्तित्व लंबे समय तक बना रह सके । शैलेंद्र चौहान लिखते हैं ' दुनिया का सबसे बड़ा उस्तरेबाज/सफाचट दाढ़ी-मूंछ और /झक्क उजले इस्त्री किये कपड़ों में /बैठा था व्हाइट हाउस में /तबला बजा रहा था वह अपनी उंगली से /चिकनी सफाचट खोपड़ियों पर / काले मनुष्यों की । ... कम्प्यूटरीकृत सेलून में /की-बोर्ड पर चलाते हुये उंगलियां / अनन्य भारतीय सुंदरियां /हो सकती होंगी जो /प्रबल दावेदार / मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स की /सौजन्य से मल्टीनेशनल कंपनियों के । सैट कर रही होंगी विभिन्न भड़कीले / हेअर-स्टायल हॉलीवुड सितारों की तरह / निश्चित ही लिखी जा सकेगी वहां / एक बेहतरीन और मादक कविता । अनगिनत किस्में पराभव की / रूप - रंग , सुख -'सुविधाएं , कैरियर , पुरस्कार , प्रोत्साहन / याचनाएं घुटनेटेक सहाय की ।' तथा आगे लिखते हैं ' जॉर्ज बुश और लादेन / दो चेहरे हैं एक व्यक्ति के'

आजकल सूचना तंत्र एक भयावह रूप में स्थापित हो रहा है । उसने बड़ी चीजों से , बड़े संघर्षों से तथा बड़ी समस्याओं से किनारा कर प्रेम , स्त्री पुरुष सम्बन्धों के घिनौने रूप , बलात्कार तथा चिकनी चुपड़ी दुनिया के अंतरंग और लुभावने दृश्यों को समाचार बनाकर प्रस्तुत करने का बीड़ा उठा रखा है ताकि लोग अपनी समस्याओं की बातें न करें । शैलेंद्र चौहान के कवि की नजर उस चालाकी पर है इसलिये वे लिखते हैं ' तुम्हें क्या पता / समस्याओं की छोटी-छोटी /हैं कितनी शक्लें / चप्पे-चप्पे पर कितने अभाव / कितनी बदहाली / सूचना अब पूंजी के प्रभाव से झरती है /पूंजी पर आकर ही / खत्म होती है । ' पूंजी का यह महात्म्य आम आदमी को दिखाई नहीं दे रहा उसे तो वे खबरें दिखाई दे रही हैं जो एक षडयंत्र के तहत दिखाई जा रही हैं लेकिन कवि उन्हें देख रहा है और दिखा भी रहा है ।

शैलेंद्र चौहान स्त्रियों की स्वतंत्रता , पुरुषों की सामंती मानसिकता तथा घर परिवार की कविताएं भी लिखते हैं । मां और पत्नी को वे कविताओं में भी नहीं भूले हैं । कई बार बड़ी बड़ी बातों के चक्कर में घर परिवार छूट जाता है । लेकिन शैलेंद्र चौहान के यहां मां पर लंबी कविता है और पत्नी पर दो कविताएं । एक कविता है 'अस्मिता ' जिसमें वे पत्नी के सपनों के विस्तार को देखते हैं ' आंगन में खड़ी पत्नी /जिसके सपने दूर गगन में /उड़ती चिड़िया की तरह ।' तथा ' हां , मैं तुम पर कविता लिखूंगा / लिखूंगा बीस बरस का / अबूझ इतिहास / अनूठा महाकाव्य / असीम भूगोल और / निर्बाध बहती अजस्त्र / एक सदानीरा नदी की कथा । ... सब कुछ तुम्हारे हाथों का / स्पर्श पाकर /मेरे जीवन-जल में / विलीन हो गया है । ' ये दो आत्मीय कविताएं पत्नी पर , जिसमें शैलेंद्र चौहान अपनी सारी कविताई उड़ेल देते हैं । दरअसल , यह आरोप प्रगतिशीलों पर लगाया जाता है कि वे घर परिवार के लोग नहीं है , वे नहीं जानते कि परिवारों की अस्मिता को कैसे कायम रखा जाता है । ये आरोप कौन लगाते हैं यह हम सभी जानते हैं लेकिन जिन्होंने हमारे कवियों की कविताएं पढ़ी हैं , उन्हें निकट से जाना है वे यह भी जानते हैं कि प्रगतिशीलों के यहां दिखावा नहीं है न जीवन में और न साहित्य में । हमारे बड़े कवि केदारनाथ अग्रवाल ने बुढ़ापे में प्रेम कविताएं अपनी पत्नी के ऊपर लिखीं और हमारे बड़े आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने पत्नी को कितना महत्व दिया इसे कौन नहीं जानता । और कहने वालों को भी हम जानते हैं कि उन्होंने जीवन में कितनी लंपटगिरी की । शैलेंद्र चौहान की पत्नी पर लिखी ये दोनों कविताएं उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है

इस संग्रह की शीर्षक कविता है ' ईश्वर की चौखट पर ' । इस इस कविता का प्रारंभ है ' तमाम प्रार्थनाएं / रह गईं अनुत्तरित /जीवन और प्रेम / के लिये / जो की गईं ।' तथा अंत में ' इतिहास में दर्ज हैं /वे सारी कहानियां / जब ईश्वर की /चौखट पर / तोड़ दिया दम / जीवन और प्रेम के लिये / प्रार्थनाएं करते हुये / मनुष्य ने ।' इस पूरी कविता में ईश्वर से जो प्रार्थना है वह केवल जीवन और प्रेम के लिये है बहुत कुछ पाने के लिये , बहुत कुछ सहेजने के लिये बहुत छोटी लेकिन महत्वपूर्ण प्रार्थना है ईश्वर के चौखट पर जो अनुत्तरित है । यह कविता बहुत ऐसा कुछ कह देती है जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। ईश्वर के अस्तित्व और उसकी प्रार्थना में रात दिन खपते लोगों को इस कविता को अवश्य पढ़ना चाहिये । यह कविता ईश्वर और उसकी प्रार्थना के रहस्य को बताती है एक आदमी की आवाज में । यह आवाज करोड़ों रुपये देने वाले मीडिया के बनाये शताब्दी के महानायक अमिताभ बच्चन की नहीं है बल्कि उसके विरोध में है । ऐसी कविताएं प्रार्थनाओं के विरोध में एक चीख के रूप में खड़ी हैं इसलिये यह कविता बड़ी हैं।

ढेरों कविताओं के इस दौर में , ढेरों कवियों की इस जमात में किसी भी कवि के लिये पहचान बना पाना कठिन है लेकिन शैलेंद्र चौहान अपनी पहचान बना पाये हैं क्योंकि उनकी कविता प्रचलित मानदंडों के विरोध में खड़ी हैं । मैं मानकर चलता हूं कि किसी की नकल करके कोई बड़ा नहीं बनता बड़ा बनता है अपने अनुभवों और जीवन संघर्षों को अपनी तरह से रूपायित करके । शैलेंद्र चौहान ने अपनी कविताओं में यही किया है फिर उनकी कविता क्यों नहीं बड़ी बनेगी । 'ईश्वर की चौखट पर ' मैं यही कहना चाहता हूं लेकिन प्रार्थना के स्वर में नहीं ।

पांव जमीन पर

लोक जीवन की लय को स्पंदित और अभिव्यक्त करती शैलेन्द्र चौहान की कथा रिपोर्ताज ‘पांव जमीन पर’ एक महत्वपूर्ण प्रस्तुति है। कवि कथाकार शैलेन्द्र का लेखन एक सचेत सामाजिक कर्म है। उनका चिन्तन प्रतिबद्धता का चिन्तन है। वह जन प्रतिबद्ध लेखक हैं। विवेच्य किताब में शैलेन्द्र चौहान ने भारतीय ग्राम्य जीवन की जो बहुरंगी तस्वीर उकेरी है उसमें एक गहरी ईमानदारी है और अनुभूति की आंच पर पकी संवेदनशीलता है। ग्राम्य जीवन के जीवट, सुख-दु:ख, हास-परिहास, वैमनस्य, खान-पान, बोली-बानी, रहन-सहन आदि को बहुत जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है। यह सब मिलकर पाठक के समक्ष सजीव चित्र की सृष्टि करते हैं और चाक्षुष आनंद देते हैं। लोक जीवन का उत्सव इनमें कदम-कदम पर झलकता है। पीपलखेड़ा गाँव के पोस्टमास्टर ‘बड़े भैया’ हों, कोठीचार के पूरण काका, रघुवंशी जी, तोमर माट साब हों या क्रूर बजरंग सिंह या गाँव में आया साधु हो – सबका सजीव चित्रण हुआ है। नदी, झरने, जंगल, तालाब, पहाड़, गाँव के गैल – गलियारे, पशु-पक्षी, खेत किसान और फसलें हों, मंडी बामोरा का हायर सेकेंडरी स्कूल, सहपाठी, शिक्षक और वहां का परिवेश हो, विदिशा का बहुविध वर्णन हो शैलेन्द्र ने पूरी ईमानदारी और इन्वोल्वमेंट के साथ इन्हें सृजा है। शैलेन्द्र के स्वयं अपने गाँव के लोग, परिजन, सम्बन्धी, मित्र और परिचित, गढ़े-गढ़ाये चरित्र न होकर जीते-जागते एवं गतिशील चरित्र हैं। ‘पांव जमीन पर’ जिस अंदाज में लिखी गई रिपोर्ताज कथाएं है वे हिन्दी साहित्य में विरल हैं जनोन्मुखी होने के साथ-साथ। रिपोर्ताज फ्रांसीसी भाषा का शब्द है। रिपोर्ट किसी घटना के यथातथ्य वर्णन को कहते हैं। रिपोर्ताज गद्य-लेखन की एक विधा है। रिपोर्ट सामान्य रूप से समाचारपत्र के लिये लिखी जाती है और उसमें साहित्यिकता नहीं होती है। रिपोर्ट के कलात्मक तथा साहित्यिक रूप को रिपोर्ताज कहते हैं। वास्तव में रेखाचित्र की शैली में प्रभावोत्पादक ढंग से लिखे जाने में ही रिपोर्ताज की सार्थकता है। आँखों देखी और कानों सुनी घटनाओं पर भी रिपोर्ताज लिखा जा सकता है। कल्पना के आधार पर रिपोर्ताज नहीं लिखा जा सकता है। घटना प्रधान होने के साथ ही रिपोर्ताज को कथातत्त्व से भी युक्त होना चाहिये। रिपोर्ताज लेखक को पत्रकार तथा कलाकार दोनों की भूमिका निभानी पडती है। रिपोर्ताज लेखक के लिये यह भी आवश्यक है कि वह जनसाधारण के जीवन की सच्ची और सही जानकारी रखे। तभी रिपोर्ताज लेखक प्रभावोत्पादक ढंग से जनजीवन का इतिहास लिख सकता है। द्वितीय महायुद्ध में रिपोर्ताज की विधा पाश्चात्य साहित्य में बहुत लोकप्रिय हुई। विशेषकर रूसी तथा अंग्रेजी साहित्य में इसका प्रचलन रहा। हिन्दी साहित्य में विदेशी साहित्य के प्रभाव से रिपोर्ताज लिखने की शैली अधिक परिपक्व नहीं हो पाई है। शनैः-शनैः इस विधा में परिष्कार हो रहा है। सर्वश्री प्रकाशचन्द्र गुप्त, रांगेय राघव, प्रभाकर माचवे तथा अमृतराय आदि ने रोचक रिपोर्ताज लिखे हैं। रांगेय राघव ने कहानी के पारंपरिक ढाँचे में बदलाव लाते हुए नवीन कथा प्रयोगों द्वारा उसे मौलिक कलेवर में विस्तृत आयाम दिया। रिपोर्ताज लेखन, जीवनचरितात्मक उपन्यास और महायात्रा गाथा की परंपरा डाली। हिदी में रिपोर्ताज बहुत कम लिखे गए हैं । रेणु के रिपोर्ताज इस कमी को पूरा करते हैं । रेणु ने रिपोर्ताज लिखे और वे कहानी-संकलनों में संकलित हुए । उनकी 1 94 8 की लिखी ‘डायन कोसी’ डॉ० केसरी कुमार द्वारा संपादित ‘प्रतिनिधि कहानियाँ में संकलित की गयी एव ‘धर्मयुग’ के एक कथा दशक के अंतर्गत ‘पुरानी कहानी : नया पाठ’ …रिपोर्ताज लिखा जो ‘आदिम रात्रि की महक’ संकलन में आया। प्रेमचंद का ग्रामीण किसान कुलीन जमीदारों के अन्यायों, सूदखोर व्यापारियों के शोषण, सत्ता के निचले पायदान पर बैठे कर्मचारियों के दबावों और दमन के बावजूद आत्महत्या नहीं करता था। वह आखिरी दम तक हिम्मत न हारकर संघर्षपूर्ण स्थितियों कि चुनौती स्वीकारता था और जब व जैसे हो संभव प्रतिरोध भी करता था फिर उसकी चाहे कितनी बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। गाँव अब पहले जैसे नहीं रह गए हैं वहां नगरों,महानगरों जैसा विकास चाहे न पहुंचा हो उनकी वे विसंगतियां जरुर पहुँच गईं हैं जिन्होंने उनके जीवन को अब उतना सरस, आत्मीय और जिंदादिल नहीं रहने दिया है जितना पहले वह थे। खुली अर्थ व्यवस्था वाले भूमंडलीकरण ने तो गांवों के अस्तित्व को ही नकार दिया है, किसानों और खेतिहर मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर कर दिया है। विकास के नाम पर जब चाहे उन्हें उजाड़ा जा सकता है वहां विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाया जा सकता है। उनके जीवन स्तर को बढ़ाने व सुधारने की बात एक मरीचिका भर बन गई है। गुजिश्ता एक दशक से किसानों में बढती आत्महत्या की प्रवृत्ति ने उन्हें और गांव को एक बार फिर आर्थिक, सामाजिक समस्या के केंद्र में ला दिया है। बावजूद इसके वह हमारे साहित्य में मुकम्मल तरीके से प्रतिबिंबित नहीं हुआ है, बल्कि इधर के कथा साहित्य से गांव धीरे-धीरे कम होता चला गया है। शैलेन्द्र उन कथाकारों में से हैं जिनके कथा साहित्य में गांव बार-बार आया है। गरीबों, पिछड़े वर्ग के लोगों, दलितों और छोटे व मझोले किसानों पर इतना प्रमाणिक वर्णन फिलहाल अन्यत्र नहीं मिलेगा जितना कि यहाँ है। खेतिहर किसान की समस्यायें और उनके सुख-दु:ख, राग-द्वेष पूरी प्रामाणिकता के साथ उभर कर सामने आए हैं। दरअसल गांव-किसान से उनके लगाव की अहम् वजह अपनी मिट्टी से गहरा रिश्ता है जो उन्हें आज भी बांधे रखता है। मैं आज भी मानता हूँ कि असली भारत गांव में ही है। बावजूद इसके कि आज गांव लगभग पूरी तरह से टूट चुका है उसका एक बडा हिस्सा महानगरों से जुड गया है। अगर आजकी कहानी में गांव कम हुआ है तो उसका एक कारण शहरीकरण है। हालांकि आठवें दशक के पश्चात की कहानी में गांव जरूर था लेकिन उस सीमा तक किसान वहां नहीं था। आजादी के बाद गांव का बहुत तेजी से विखण्डन हुआ था, परिणामस्वरूप जिस वर्ग ने गांव से तेजी से पलायन किया उसमें सीमांत किसान और कृषि आधारित कुटीर उद्योगों से जुडे लोग ज्यादा मात्रा में थे। इसलिए किसान की अपेक्षा उस वर्ग पर कहानी में ज्यादा फोकस हुआ। दूसरा कारण यह है कि किसान की समस्यायें स्वयं उसके द्वारा पैदा की हुई समस्यायें नहीं थीं। वे साहूकार ने पैदा की थीं, राजनीति ने पैदा की थीं या अधिकारी वर्ग ने पैदा की थीं लिहाजा कहानियां, किसान के नाम से नहीं, बल्कि एक बड़े कैनवास गांव के आदमी के नाम से लिखी गई। उनका एक कहानी संग्रह 'नहीं यह कोई कहानी नहीं' सन १९९६ में प्रकाशित हुआ था जिसकी कुछ कहानियां इस पुस्तक कि पूर्वपीठिका थीं यथा दादी, मोहरे और उसका लौट आना। उस संग्रह में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर एक बेमिशाल कहानी थी ‘भूमिका’, अब तक ऐसी कहानी कहीं अन्यत्र नहीं देखने में आई है। शैलेन्द्र ग्राम जीवन के चितेरे रचनाकार हैं। हिन्दुस्तान की सामासिक संस्कृति की हिमायत, जायज हकों की लडाई और सकारात्मक जीवन मूल्यों के प्रति निरंतर संघर्ष, उनकी रचनाओं की विशेषता है। वे प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, अमरकांत, मार्कण्डेय, शैलेश मटियानी, पुन्नी सिंह, जगदीश चन्द्र की तरह आंचलिक परिवेश के रचनाकार हैं। अपने कथा साहित्य में स्थानीय बोली के प्रयोग पर जोर देते हुए वे कहते हैं, यद्यपि ऐसा माना जाता है कि आदमी का शोषण, उत्पीडन, दारिद्र, अभाव, अशिक्षा, बेरोजगारी इत्यादि सभी जगह पर एक जैसे हैं, लेकिन मेरा मानना है कि एक जैसे होते हुए भी इनमें बहुत बारीक अंतर भी है और यदि उस बारीकी को हम सफलतापूर्वक पकडना चाहें तो हमारे पास लोक बोलियों से शक्तिशाली अन्य कोई औजार नहीं है। मूलधारा से अलग दूरदराज स्थान पर रहकर जीवन व्यतीत करने वाले आदमी की पीडा को अभिव्यक्त करने वाले शब्द खडी बोली के पास नहीं हैं और अगर हैं भी तो वे किसी बोली से ही आए होंगे। जिस परिवेश में आदमी रहता है उसी के अनुरूप आदमी की पीडा को उसी के शब्दों में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। जाहिर है ये रिपोर्ताज न तो कोरे दृश्यचित्रण हैं न मात्र संस्मरण। इनमें भारतीय ग्राम्य परिवेश, कई-कई आयामों में, ईमानदारी और सजगता से बहुविध सृजित एवं दृष्टव्य है। शैलेन्द्र चौहान की कृति ‘पाँव जमीन पर ‘ को अनेक कोणों से जाँचा-परखा जा सकता है। यह आत्मकथात्मक संस्मरण है या लोक का चित्रण या निम्न मध्यमवर्गीय जीवन की संघर्ष-गाथा? वस्तुत: कृति इन तीनों का सुंदर सम्मिश्रण है। इनके रसायन से जो निर्मित हुआ, उसमें रसानुभूति भी है और तत्व ज्ञान भी। अलग से वैचारिकता का लबादा न लादे होने पर भी इसमें विचार समाहित है जो पाठक को सोचने पर विवश करता है। चेतना को झकझोरता है। अतीत को लौटाया भले ही न जा सके, पर अतीत में लौटा जा सकता है, स्मृति के माध्यम से। शैलेन्द्र ने यही किया है। अनुभव के बाद ‘स्मृति‘ लेखक की महत्वपूर्ण पूँजी है। उससे रचना प्रामाणिक और विश्वसनीय बनती है। जिस रचनाकार के पास स्मृति का कोश नहीं है, उससे बड़ा दरिद्र शायद और कोई नहीं। इन दिनों आत्म-कथाओं और संस्मरणों की बाढ़-सी आई हुई है। इसके अपने खतरे हैं। इनमें आत्म-श्लाघा जैसी अभद्रता भी हो सकती है और स्वयं को अपने कद से बड़ा भी बताया जा सकता है। संतोष इस बात का है कि शैलेन्द्र चौहान के कथ्य में अतिरेक नहीं है। उन्होंने तटस्थ भाव से सच को जस का तस रख दिया है। शैलन्द्र ने हँसी लिखी है तो मन की उदासी भी नहीं छिपायी है। दरअसल, पुस्तक बाल्यकाल से युवावस्था तक की यात्रा का सिलसिलेवार बखान है। उपन्यास-कहानी के परकाया-प्रवेश से भिन्न, स्वकाया-प्रवेश। ग्रामीण भाग की आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक स्थितियां, संरचना, मानसिक बुनावट, श्रम और संस्कृत जिस सहजता से शैलेन्द्र ने उकेरे हैं वह समसामयिक हिंदी साहित्य में अद्वितीय है।

संदर्भ[संपादित करें]

http://www.writers.net/writers/40240 https://literaryyard.com/2017/01/21/bio-shailendra-chauhan-a-poet/ http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%B6%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8 sahityakunj.net www.anubhuti-hindi.org/chhandmukt/s/shailendra_chauhan/index.htm www.rachanakar.org www.kritya.in/0401/En/poetry_at_our_time1.htm