सत्येन्द्र दूबे

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सत्येन्द्र कुमार दूबे
जन्म 1973
मृत्यु 27 नवंबर 2003 (30 वर्ष की आयु में)
गया, भारत
मृत्यु का कारण हत्या
राष्ट्रीयता भारतीय
शिक्षा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
शिक्षा प्राप्त की भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) वाराणसी
प्रसिद्धि कारण भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष और बलिदान
धार्मिक मान्यता हिन्दू

सत्येन्द्र कुमार दूबे का जन्म बिहार के सिवान जिले में हुआ था। वे भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में परियोजना निदेशक के पद पर कार्यरत थे। सत्येन्द्र दूबे द्वारा स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना में व्याप्त भ्रष्टाचार को जनता के सामने लाये जाने के कारण उनकी हत्या 27 नवम्बर 2003 में गया जिले में हो गई थी।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा[संपादित करें]

सत्येन्द्र के पिता का नाम श्री बागेश्वरी दूबे और माता का नाम श्रीमती फूलमती देवी था। उनका जन्म बिहार प्रांत के सिवान जिले के शाहपुर ग्राम में हुआ था। मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे सत्येन्द्र ने 15 वर्ष की आयु तक की अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव में ही प्राप्त की और उसके बाद आगे की शिक्षा के लिए इलाहाबाद चले आए। इलाहाबाद में इनका विद्यार्थी जीवन बड़ा ही संघर्षपूर्ण था। इसके पश्चात 1990 में इन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के सिविल अभियांत्रिकी विभाग में प्रवेश लिया और 1994 में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में परास्नातक में प्रवेश लिया और यह परीक्षा सम्मान के साथ उत्तीर्ण किया। बचपन से ही सत्येन्द्र की गणना प्रतिभाशाली विद्यार्थियों में होती थी।

बाद का जीवन[संपादित करें]

सत्येन्द्र ने भारतीय अभियांत्रिकी सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण की जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें सन् 2002 में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में परियोजना निदेशक का पद मिला। इस पद पर काम करते समय उन्हें स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना में कार्य करने का मौका मिला। इस परियोजना में कार्य करते समय उन्हें बहुत बडे़ स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमिताओं का पता चला। विभाग के ठेकेदारों और इंजिनियरों की साठ-गाठ से भ्रष्टाचार का धंधा खूब फल फूल रहा था। सत्येन्द्र ने अपने ही विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और इंजीनियरों के खिलाफ कार्यवाही की और उन्हें निलंबित किया।

भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष[संपादित करें]

सत्येन्द्र ने इसके बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहीम शुरू कर दी और अपने विभाग में हो रही दूसरी अनियमितताओं पर भी ध्यान केन्द्रित किया। उन्होंने इन अनियमितताओं के बारे में अपने विभाग के निदेशक और अन्य अधिकारियों को पत्र भी लिखा लेकिन किसी ने भी उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। इन शिकायतों के परिणाम स्वरूप उनका स्थानांतरण गया जिले में कर दिया गया। गया जिले में भी उन्होंने अपनी भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहीम में कोई कमी नहीं आने दी। सत्येन्द्र को इन सभी के फलस्वरूप धमकियां भी मिली।

प्रधानमंत्री को पत्र[संपादित करें]

उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार को देखते हुए सत्येन्द्र ने इसकी शिकायत प्रधानमंत्री से करने का निर्णय लिया और एक विस्तृत पत्र लिखा। उस गोपनीय पत्र में सत्येन्द्र ने भ्रष्टाचार पर विधिवत प्रकाश डाला और उसे प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज दिया। भ्रष्टाचार की गंभीरता को देखते हुए सत्येन्द्र ने उस पत्र में अपना नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया था। बाद में यह देखा गया कि सत्येन्द्र के अनुरोध के बाद भी कार्यालय अधिकारियों ने उस पत्र को सत्येन्द्र के नाम के साथ अलग अलग विभागों में अग्रसारित कर दिया।

सत्येन्द्र की हत्या[संपादित करें]

सत्येन्द्र की हत्या तब हो गई जब वे बनारस से एक विवाह समारोह के बाद घर लौट रहे थे। वे बनारस से गया तक ट्रेन द्वारा पहुंचे और उसके बाद गया स्टेशन से रिक्से द्वारा घर जाते समय रास्ते में गोली मार उनकी हत्या की गई। गया में जे.पी. कॉलोनी के रास्ते में उनका मृत शरीर पाया गया। सत्येन्द्र की मृत्यु ने लोक सभा तक को आंदोलित किया। देश में हो रहे विरोध प्रदर्शनों और सामान्य जनता के असंतोष को देखते हुए सरकार द्वारा उनकी मृत्यु की जांच केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंप दिया गया।[1]

भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन[संपादित करें]

सत्येन्द्र की हत्या से राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर एक भूचाल आ गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाली अन्य संस्थाओं ने इस मामले को उठाया। जिसके परिणामस्वरूप सरकार को नीतिगत स्तर पर भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले लोगों की पहचान सुरक्षित रखने का नियम बनाना पड़ा। सत्येन्द्र के बलिदान का एक यह सबसे बड़ा परिणाम हुआ कि सरकारी विभागों के भ्रष्ट अधिकारी इमानदार लोगों से डरने लगे। बाद के वर्षों में आया सूचना का अधिकार अधिनियम इस दिशा में मील का एक पत्थर साबित हुआ। यह नियम भ्रष्टाचार को उजागर वाले व्यक्तियों के लिए एक हथियार साबित हुआ।[2]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. बी.बी.सी, 10 दिसम्बर 2003
  2. इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित

वाह्य कड़ियां[संपादित करें]