संस्कृत काव्यशास्त्र का इतिहास

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संस्कृत साहित्य में काव्यशास्त्र के लिए अलंकारशास्त्र, काव्यालंकार, साहित्यविद्या, क्रियाकल्प आदि शब्दों के प्रयोग मिलते हैं। इनमें अलंकारशास्त्र शब्द सर्वाधिक प्रचलित माना जाता है। भामह, वामन तथा उद्भट आदि प्राचीन आचार्यों ने काव्यविवेचन से सम्बद्ध ग्रन्थों के नाम में काव्यालंकार शब्द का प्रयोग किया है। इसे अलंकारशास्त्र कहने के दो कारण हो सकते हैं। एक तो प्राचीन आचार्यों ने समस्त सौन्दर्यजनक धर्मों का अलंकार शब्द से ग्रहण किया है। दूसरे प्राचीन आचार्यों की धारणा थी कि अलंकार ही काव्य में प्रधान है। इसी कारण काव्यविवेचना का नाम अलंकारशास्त्र रख दिया गया। आचार्य भामह के 'शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्' इस काव्यलक्षण से आचार्यों को पश्चात् काल में साहित्य शब्द की प्रेरणा मिली। इन सब नामों से भिन्न इस शास्त्र के लिए एक नाम और प्रयुक्त हुआ है वह है - ‘क्रियाकल्प’ इसका निर्देश वात्स्यायन के कामशास्त्र में गिनायी गयी चौसठ कलाओं में आता है।

सम्पाठ्यं, मानसी काव्यक्रिया, अभिधानकोषः, छन्दोज्ञानम् क्रियाकल्पः छलितकयोगाः।

इसके टीकाकार जयमंगलार्क ने क्रियाकल्प शब्द को क्रियाकल्प इति ‘‘काव्याकरणविधिः काव्यालंकार इत्यर्थः’’ इस अर्थ में किया है। इससे प्रतीत होता है कि कलाओं के अन्तर्गत प्रयुक्त हुआ क्रियाकल्प शब्द काव्यशास्त्र के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है किन्तु यह नाम अत्यधिक प्रचलित नहीं हुआ। आचार्य वात्स्यायन ने साधारण अधिकरण में प्रस्तुत विद्यासमुद्देश प्रकरण में क्रियाकल्प का उल्लेख किया। क्रियाकल्प अर्थात् काव्यालंकारशास्त्र के ज्ञान की कला।

काव्य के शास्त्र विषयक विचार के प्रवर्तन के सन्दर्भ में काव्यमीमांसाकार राजशेखर ने अपने काव्यशास्त्रीय प्रौढ़ ग्रन्थ काव्यमीमांसा में पौराणिक आधार का आश्रय लिया है। इस वर्णन के अनुसार भगवान श्रीकण्ठ ने काव्यविद्या का सर्वप्रथम उपदेश परमेष्ठी और वैकुण्ठ इत्यादि अपने चौसठ शिष्यों को दिया। इस विद्या का द्वितीय बार उपदेश भगवान परमेष्ठी द्वारा उनके इच्छाजन्य शिष्यों को दिया गया जिनमें देववन्ध सरस्वती का पुत्र काव्यपुरुष भी एक था। काव्यपुरुष को त्रिकालज्ञ और दिव्यदृष्टि से सम्पन्न जानकर ब्रह्म ने उसे आज्ञा दी कि वह सर्वजनहित की कामना से भू-भुवः और स्वर्ग निवासनी प्रजा में काव्यविद्या का प्रचार करे। काव्यपुरुष ने काव्यविद्या को अट्ठारह भागों में विभक्त कर सहस्त्राक्ष आदि दिव्य स्नातकों को उपदिष्ट किया। उन शिष्यों ने काव्यविद्या को पृथक्-पृथक् भागों में विशेष योग्यता प्राप्त कर पृथक् पृथक् ग्रन्थों की रचना की। इन स्नातकों में सहस्त्राक्ष ने कविरहस्य, उक्तिगर्भ ने औक्तिक, सुवर्णनाभ ने रीतिनिर्णय, प्रचेता ने आनुप्रासिक, यम ने यमक, चित्रांगद ने चित्र, शेष ने शब्दश्लेष, पुलत्स्य ने वास्तव, औपकायन ने औपम्य, पराशर ने अतिशय, उत्थ्य ने अर्थश्लेष, कुबेर ने उभयालंकारकारिका, कामदेव ने वैनोदिक, भरत ने रूपक निर्णय, उपमन्यु ने गुणौपादानिक तथा कुचुमार ने औपनिषदिक नामक पृथक् पृथक् ग्रन्थ लिखे। इस प्रकार राजशेखर ने काव्यशास्त्र के उद्गम के ऊपर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया। इस आख्यान में काव्यशास्त्र की दैवी उत्पत्ति स्वीकार की गयी है। काव्यमीमांसा में वर्णित काव्यशास्त्र की उत्पत्ति का आख्यान पौराणिक काव्यात्मक कल्पनाओं की सृष्टि है।

(क) काव्यशास्त्रीय वैदिक परम्परा

प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुसार वेद सभी विद्याओं की उत्पत्ति के मूल हैं। इसी दृष्टि से काव्यशास्त्र के मूल सिद्धान्तों का वेद में अन्वेषण करने का प्रयत्न किया गया है। साक्षात् काव्यशास्त्र का वेदों से कोई सम्बन्ध नहीं है। वेदागें में भी शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त , छन्द, ज्योतिष इन छः विद्याओं की गणना है पर काव्यशास्त्र की नहीं परन्तु वेद को देव का अमर काव्य कहा गया है। "देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति"। वेदों में अनेक स्थानों पर कवि शब्द का प्रयोग किया गया है। इसलिए वेद स्वयं काव्यरूप है और उसमें काव्य का सम्पूर्ण सौन्दर्य पाया जाता है। ऋग्वेद के सप्तम मण्डल में ‘अरंकृतिः’ शब्द का प्रयोग मिलता है। महर्षि वसिष्ठ इन्द्र से कहते हैं -

का ते अस्त्यरंकृति सूक्तैः।

काव्यशास्त्र में काव्यसौन्दर्य के आधायक जिन गुण, रीति, अलंकार, ध्वनि आदि तत्त्वों का विवेचन किया गया है वे सभी तत्त्व का प्रायोगिक अथवा व्यावहारिक रूप से वेद में पाये जाते है। डा0 काणे का मत है कि ऋग्वैदिक कवियों ने उपमा, अतिशयोक्ति, रूपक आदि अलंकारों का केवल प्रयोग नहीं किया वरन् काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों का भी उन्हें कुछ ज्ञान था। प्रस्तुत मन्त्र में मन्त्रदृष्टा ऋषि द्वारा किया गया उपमा का प्रयोग भी प्रशंसनीय है-

उतत्वः पश्यन न ददर्श वाच उतत्वः शृण्वन् न शृणोत्येननाम् उतो त्व स्मै तन्वं विससे जायेव पत्ये उक्ती सुवासा।

इसी प्रकार ‘उषा हस्नेव निर्णीते अप्सः’ में उत्प्रेक्षा का सुन्दर प्रयोग है। इसी प्रकार यह मन्त्र भी सुन्दर उदाहरण है यथा-

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्धत्ति अनश्नन्नयो अभिचाकशीति।

प्रस्तुत मंत्र में पीपल पर रहने वाले दो पक्षियों का वर्णन है जिनमें एक तो पीपल के मीठे फल खा रहा है दूसरा बिना फल भक्षण के आनन्दमग्न है। इन पक्षियों के माध्यम से जीवात्मा तथा परमात्मा का चित्रण किया गया है। जीव इन्द्रिय सुखों का भोग करता है तथा परमात्मा फलों का भोग न करता हुआ संसार में चारों ओर अपने सौन्दर्य को प्रकाशित करता है। यहाँ विभावना का सुन्दर उदाहरण है। इसके अतिरिक्त रूपक, अनुप्रास, विशेषोक्ति का प्रयोग सुस्पष्ट है। अन्य संहिताओं, ब्राह्मणग्रन्थों, आरण्यकों तथा उपनिषदों में भी काव्यशास्त्र का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं प्राप्त होता है। परवर्ती काल में छः वेदांगों का विकास हुआ उनमें काव्यशास्त्र से सम्बद्ध विषयों का न्यूनाधिक प्रतिपादन दृष्टिगत होता है। निरुक्त में यास्क ने उपमा के पाँच भेदों-भूतोपमा, सिद्धोपमा, कर्मोपमा, लुप्तोपमा का उल्लेख किया है। साथ ही अपने पूर्ववर्ती आचार्य गर्ग के उपमानिरूपक लक्षण को उद्धृत किया है।

आचार्य यास्क ने ‘अथाप्युपमार्थे भवित’ की व्याख्या करते हुए इव, यथा, न, चित्, नु तथा आ के प्रयोगों की सार्थकता सिद्ध की है। निरुक्त में पारिभाषिक अर्थ में अलंकार शब्द का प्रयोग नहीं मिलता किन्तु यास्क ने ‘‘अलंरिष्णु’ शब्द को अलंकृत करने के स्वभाववाला के सामान्य अर्थ में प्रयुक्त किया है। पाणिनि के युग तक उपमा का प्रयोग स्पष्ट रूप से उपलब्ध होता है। यथा, वा, इव का प्रयोग तत्र तस्येव, तेन तुल्यं क्रिया चेद्धति आदि सूत्रों में व्याख्यायित हुआ है। ‘चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः व्याकरणशास्त्र की देन है। अभिधा, लक्षणा शब्दशक्तियों को सर्वप्रथम वैयाकरणों ने परिभाषित किया। व्य०जना शक्ति भी स्फोटसिद्धान्त पर आधारित है। उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि वेदाग् निरुक्त तथा व्याकरण में काव्यशास्त्र का सम्बन्ध है। इस प्रकार वेद तथा वेदांगों में काव्यशास्त्र के मौलिक तत्त्वों के बीज पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं।

(ख) काव्यशास्त्रीय लौकिक परम्परा

ईस्वी सन् से शताब्दियों पूर्व उत्तम प्रकार की काव्य रचना हुई इसके पर्याप्त प्रमाण है। रामायण और महाभारत इन दोनों महाकाव्यों में उत्तम प्रकार की काव्यरचना मिलती है। महाभारत काव्य की अपेक्षा धर्मशास्त्र है फिर भी यह अनेक कवियों का उपजीव्य रहा है। रामायण अपने उद्देश्य, स्वरूप, विषय की दृष्टि से वास्तव में काव्य है। जहाँ तक काव्य रचना और काव्य समीक्षा के सामान्य सिद्धान्तों के विकास का प्रश्न है वाल्मीकीय रामायण इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसे आदि काव्य और इसके रचयिता को आदि कवि होने का सम्मान प्राप्त है। उदात्त शैली के ऐसे महान काव्यात्मक प्रयास के साथ काव्य विवेचन के सिद्धान्तों के निर्माण का प्रयास स्वभाविक है।

रामायण में इस दिशा का कुछ संकेत उपलब्ध हैं। रामायण तथा महाभारत के रूप में काव्यत्व का समृद्ध रूप सामने होने पर काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों की स्थापना का मार्ग बड़ी स्पष्टता के साथ प्रशस्त हुआ होगा ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है।

यद्यपि इस समय संस्कृत काव्यशास्त्र की स्वतन्त्र रचना नहीं हुयी फिर भी कुछ साक्ष्य उपलब्ध होते हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस काल में भी पर्याप्त काव्यरचना हुयी थी। महाकाव्य का स्वरूप निरूपण ‘वाल्मीकि रामायण’ के आधार पर किया गया। रूद्रट के टीकाकार नामिसाधु ने पाणिनि के नाम से ‘पातालविजय’ नामक महाकाव्य का उल्लेख किया है- तथाहि पाणिनेः पतालविजये महाकाव्ये-‘‘सन्ध्यावधूंगृह्यकरेण’’। जबकि राजशेखर उन्हीं नाम से जाम्बवतीजय काव्य को उद्धृत करते है।

स्वस्ति पणिनये तस्मै यस्य रुद्र प्रसादतः।
आदौ व्याकरणं काव्यमनु जाम्बवती जयः॥

सुवृत्ततिलक में क्षेमेन्द्र ने उपजाति में पाणिनि के वैशिष्ट्य प्राप्ति की चर्चा की है।

कात्यायन के वार्तिक में आख्यायिका शब्द के प्रयोग से स्पष्ट है कि आख्यायिका नामक काव्यांग कात्यायन से पूर्व प्रचलित हो चुका था। महाभाष्य में ‘वारुरुचं काव्यम्’ का उल्लेख आता है। साथ ही वासवदत्ता, सुमनोत्तरा तथा भैमरथी नामक आख्यायिकाओं का भी उल्लेख है। पतंजलि ने कंसवध तथा बलिबन्धन की कथाओं पर दो कृतियों तथा उसके नाटकीय प्रदर्शन की चर्चा की है।

इन तथ्यों से यह सूचित होता है कि पतंजलि से पूर्व पर्याप्त मात्रा में काव्य-आख्यायिका तथा नाटकों का निर्माण हुआ था। भरत का नाट्यशास्त्र वर्तमान काल में काव्यशास्त्र का प्राचीनतम् ग्रन्थ उपलब्ध है। किन्तु ऐसे साक्ष्य प्राप्त हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि नाट्यशास्त्र भारतीय काव्यशास्त्र का आदि ग्रन्थ नहीं है। इस प्रकार स्पष्ट है कि काव्यशास्त्र के मौलिक तत्त्वों का पर्याप्त मात्रा में उल्लेख होते हुए उसका समुचित शास्त्रीय निरूपण भरत कृत नाट्यशास्त्र से पहले प्राप्त नहीं होता है। नाट्शास्त्र के पश्चात् काव्यविवेचन सम्बन्धित ग्रन्थों के प्रणयन की परम्परा प्राप्त होती है और काव्यशास्त्रीय धारणाओं का विकास उपलब्ध होता है। विवेचन की दृष्टि से इसको तीन भागों में विभक्त कर उसके विकास का अध्ययन किया जा सकता है-

  • (क) पूर्वार्द्ध परम्परा - आचार्य विश्वेश्वर पाण्डेय से पण्डित छज्जूरामशास्त्री विद्यासागर
  • (ख) उत्तरार्द्ध परम्परा - स्वामी करपात्री से वर्तमान काल तक

अनुक्रम

प्राचीन युग[संपादित करें]

भरत[संपादित करें]

काव्यशास्त्र का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रन्थ आचार्य भरत कृत नाट्यशास्त्र है। नाट्यशास्त्र का समय 200 ई0पू0 माना गया है। नाट्यशास्त्र में 36 अध्याय हैं। नाट्यशास्त्र तीन भागों में विभक्त है- गद्य, सूत्र विवरण, स्वभावाकारिका, अन्यश्लोक। नाट्यशास्त्र का प्रमुख प्रतिपाद्य नाट्य है परन्तु अन्य साहित्यिक सिद्धान्तों की चर्चा है। आचार्य भरत की यह कृति काव्यशास्त्र का आदि स्रोत है। नाट्यशास्त्र में सर्वविद्यायें विद्यमान है। आचार्य भरत ने इसका उल्लेख स्वयं किया है-

न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला।
नासौ योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते॥

आचार्य भरत और आचार्य भामह के मध्य आचार्य मेधावी का उल्लेख मिलता है परन्तु मेधावी का अलंकारशास्त्रीय ग्रन्थ प्राप्त नहीं होता है।

भामह[संपादित करें]

भामह कृत काव्यालंकार भरतोत्तर युग का प्रथम मान्य ग्रन्थ है। आचार्य भामह ने काव्यालंकार में अपना परिचय स्वयं किया है-

प्रणम्य सार्वसर्वज्ञं मनोवाक्कायकर्मभिः।
काव्यालंकार इत्येष यथाबुद्धि विधास्यते॥
अवलोक्य मतानि सत्कवीनामवगम्य स्वधिया च काव्यलक्ष्म
सुजनावगमाय भामहेन ग्रथितं रक्रिलगोमिसुनुनेदम्॥

अलंकारशास्त्र इस ग्रन्थ के द्वारा नाट्यशास्त्र की परतन्त्रता से अपने को मुक्त कर स्वतन्त्र शास्त्र के रूपमें दृष्टिगत होता है। काव्यालंकार छः परिच्छेदों में विभक्त है। आचार्य भामह ने सर्वप्रथम काव्य को परिभाषित किया और काव्य का मुख्य तत्त्व अलंकार को स्वीकार करते हुए प्रथम बार 39 अलंकारों का विवेचन प्रस्तुत किया।

दण्डी[संपादित करें]

आचार्य दण्डी अलंकार-सम्प्रदाय के प्रतिष्ठापक आचार्य हैं। आचार्य दण्डी ने अलंकारों की सूक्ष्म व्याख्या की और लिखा-

काव्यशोभाकरान् धर्मानलंकारान् प्रचक्षते।
ते चाद्यापि विकल्प्यन्ते कस्तान् कात्र्स्न्येन वक्ष्यति॥

काव्यादर्श आचार्य दण्डी की काव्यशास्त्रीय कृति है। आचार्य दण्डी का समय सप्तम् शताब्दी का उत्तरार्द्ध मान्य है। काव्यादर्श चार अध्यायों में विभक्त है। प्रथम परिच्छेद में काव्यलक्षण, काव्यभेद, वैदर्भी गौड़ी रीतियों, दस गुणों तथा प्रतिभा इत्यादि तीन हेतुओं का निरूपण किया गया है। द्वितीय परिच्छेद में 35 अलंकारों का चित्रण है। तृतीय परिच्छेद में यमक तथा चित्रबन्ध के 16 प्रकारों का वर्णन है। चतुर्थ परिच्छेद में दोषों का वर्णन किया गया है।

भट्टोदभट्ट[संपादित करें]

भट्टोदभट्ट का समय आठवीं शताब्दी का अन्तिम भाग माना गया है। आचार्य उद्भट की तीन रचनाओं का उल्लेख प्राप्त होता है- भामह विवरण, कुमारसम्भव काव्य, काव्यालंकारसार संग्रह। प्रथम दो अनुपलब्ध ग्रन्थ है। उद्भट प्रणीत काव्यालंकारसार संग्रह मात्र उपलब्ध ग्रन्थ है। यह छः वर्गों में विभक्त है। इसमें कुल 79 कारिकाएँ 41 अलंकारों की व्याख्या है।

वामन[संपादित करें]

काव्यालंकारसूत्र आचार्य वामन की काव्यशास्त्रीय कृति है। आचार्य वामन का समय आठवीं शती का उत्तरार्द्ध तथा नवीं के पूर्वार्द्ध में सिद्ध होता है। वामन ने काव्यात्मा के रूप में रीति का प्रथम बार प्रतिपादन किया रीतिरात्मा काव्यस्य काव्यालंकार में पाँच अधिकरण है। प्रथम शरीराधिकरण में काव्यलक्षण, काव्यप्रयोजन, काव्यशिक्षा, काव्यात्मा रीति, रीतित्रैविध्य आदि का निरूपण है। द्वितीय दोषदर्शन में पद, वाक्य तथा वाक्यार्थ दोषों का निरूपण है। तृतीय गुणविवेचन नामक अधिकरण में गुण तथा अलंकार का भेद तथा दश शब्दगुणों, दश अर्थगुणों का निरूपण किया गया है। चतुर्थ आलंकारिंक नामक अधिकरण में अलंकारों का निरूपण है। पंचम प्रायोगिक नामक अधिकरण में कविपरम्पराओं तथा प्रयोगों का निरूपण है। ये समस्त पाँच अधिकरण कुल बारह अध्यायों में विभक्त है।

रुद्रट[संपादित करें]

काव्यालंकार के लेखक आचार्य रुद्रट मूलतः अलंकारवादी कवि हैं। आचार्य रुद्रट का समय 850 ई0 माना गया है। काव्यालंकार सोलह अध्यायों में विभक्त है। यह आर्याछंद में है। काव्यालंकार में काव्यप्रयोजन, काव्यहेतु, काव्यलक्षण, रीतिशब्दालंकार, अर्थालंकार, चित्रालंकार, दोष विवेचन, रसविवेचन, नायिका निरूपण किया गया है। काव्यालंकार पर नामिसाधु की टीका का उल्लेख प्राप्त होता है। आचार्य रुद्रट काव्य में रस की महत्वपूर्ण उपस्थिति के समर्थक हैं।

तस्मात्कर्तव्यं यत्नेन महीयसा रसैर्युक्तम्॥

मध्य युग[संपादित करें]

आनन्दवर्धन[संपादित करें]

आचार्य आनन्दवर्धन का समय नवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध माना जाता है। ध्वन्यालोक चार उद्योत में विभक्त है। आनन्दवर्धन ने ध्वनि को काव्य की आत्मा माना है ‘काव्यस्यात्मा ध्वनिः’23 प्रथम उद्योत में ध्वनि विरोधी आचार्यों के मतों के प्रतिपादन के पश्चात् ध्वनि की समीक्षा है। द्वितीय उद्योत में ध्वनिभेदों की उदाहरण सहित समीक्षा है। तृतीय उद्योत में वर्ण, पद, वाच्य, संघटना तथा प्रबन्धादि व्यंजकों के भेदों का वर्णन है। चतुर्थ उद्योत में कवि प्रतिभा का विवेचन है। आचार्य अभिनवगुप्त रचित लोचन टीका ध्वन्यालोक की प्रसिद्ध टीका है।

राजशेखर[संपादित करें]

आचार्य राजशेखर का समय दशम शती पूर्वार्द्ध माना जाता है। राजशेखर ने काव्यमीमांसा नामक काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ की रचना की।

यायावरीयः संक्षिप्त मुनीनां मतविस्तरम्।
व्याकरोत् काव्यमीमांसा कविभ्यो राजशेखरः॥

काव्यमीमांसा में अट्ठारह अधिकरण हैं। परन्तु कविरहस्य नामक प्रथम अधिकरण उपलब्ध होता है। इस अधिकरण में 18 अध्याय है। इसमें शास्त्रसंग्रह, शास्त्रनिर्देश, काव्यपुरुषोत्पत्ति, पदवाक्यविवेक, शिष्यप्रतिभा, काव्यपाककल्प आदि विषयों का वर्णन है।

मुकुलभट्ट[संपादित करें]

आचार्य मुकुलभट्ट का समय दशम शती का पूवार्द्ध माना गया है। मुकुलभट्ट की एकमात्र काव्यशास्त्रीय रचना है- अभिधावृत्तिमातृका। भट्टकल्लटपुत्रेण मुकुलेन निरूपिता25 इसमें 15 कारिकाएँ है। अभिधावृत्तिमातृका में अभिधा और लक्षणा दो शब्दशक्तियों की मात्र समीक्षा है।

भट्टतौत[संपादित करें]

आचार्य भट्टतौत का समय दशम शती उत्तरार्द्ध माना गया है। काव्यकौतुक के रचयिता भट्टतौत का ग्रन्थ अनुपलब्ध है। भट्टतौत के काव्यशास्त्रीय मतों का उल्लेख अभिनवभारती में प्राप्त होता है। भट्टतौत की प्रेरणा से अभिनवभारती का प्रणयन अभिनवगुप्त ने किया।

सद्विप्रतोतवदनोदितनाटयवेदतत्त्वार्थमर्थिजनवांछतसिद्धिहेतोः।
माहेश्वराभिनवगुप्तपदप्रतिष्ठः संक्षिप्तवृत्तिविधिना विशदीकरोति॥

भट्टनायक[संपादित करें]

भट्टनायक का समय दशम शती उत्तरार्द्ध माना गया है। भट्टनायक का हृदयदर्पण नामक काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ अनुपलब्ध है। भट्टनायक भरत रससूत्र के व्याख्याकारों में से हैं। भुक्तिवाद का समर्थन करते हुए भट्टनायक ने साधारणीकरण सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है।

अभिधा भावना चान्या तद्धोगीकृतमेव च।
अभिधा धामतां याते शब्दार्थालंकृती सतः॥
भावना भाव्य एषोऽपि शृंगारादिगणो यत्।
तदभोकृतरूपेण व्याप्यते सिद्धिमान्नरः॥

अभिनवगुप्त[संपादित करें]

अभिनवगुप्त का समय दशम शती माना गया है। अभिनवगुप्त की प्रमुख कृतियों में अभिनवभारती नाट्यशास्त्रीय टीका तथा लोचन ध्वन्यालोकीय टीका है। अभिनवगुप्त ध्वनिसिद्धान्त के महान समर्थक है।

  • (1) ‘ध्वन्यतेऽनेनेति ध्वनिः’ शब्दार्थौ,
  • (2) ध्वन्यतेऽसौ ध्वनिः व्यंग्यार्थः,
  • (3) ध्वन्यतेऽस्मिन् ध्वनिः काव्यविशेषः
  • (4) ध्वननं ध्वनिः व्यंजनाव्यापारः।

इस प्रकार पाँच अर्थों में ध्वनिशब्द का प्रयोग किया।

धनंजय[संपादित करें]

आचार्य धनंजय का समय दशम शती का उत्तरार्द्ध माना गया है। दशरूपक आचार्य धनंजय कृत रचना है। इसका उल्लेख उन्होंने स्वयं ग्रन्थान्त में किया है।

विष्णोः सुतेनापि धनंजयेन विद्वन्दमनोरागनिबन्ध हेतुः।
आविष्कृतं मुन्जमहीशगोष्ठी वैदग्ध्यभाजा दशरूपमेतत्॥

यह ग्रन्थ भरत नाट्यशास्त्र पर आधारित है। दशरूपक में चार प्रकाश है। प्रथम प्रकाश में नृत्य लक्षण, अर्थप्रकृतियों, पंचसन्धियों विषकम्भक, प्रवेशक, अन्य नाट्य युक्तियों का विवेचन है। द्वितीय प्रकाश में नायक-नायिका, नाट्यवृत्तियों का विवेचन है। तृतीय प्रकाश में दस प्रकार के रूपकों का विवेचन है। चतुर्थ प्रकाश में रस सिद्धान्त की व्याख्या है।

कुन्तक[संपादित करें]

आचार्य कुन्तक का समय 11वीं शती का पूर्वार्द्ध माना गया है। वक्रोक्तिजीवित काव्यशास्त्रीय कृति के प्रणेता आचार्य कुन्तक वक्रोक्ति को काव्यात्मा स्वीकार करते है।

वक्रोक्तिरेव वैदग्ध्यभंकीभणितिरुच्यते। वक्रोक्तिः प्रसिद्धाभिधानव्यतिरेकिणी विचित्रैवाभिधा। कीदृशी-वैदग्ध्यभंकीभणितिः। वैदग्ध्यं विदग्धभावः कविकर्मकौशलं तस्य भंकी विच्छित्तिः, तया भणितिः विचित्रैवाभिधा वक्रोक्तिरित्यच्यते।

वक्रोक्तिजीवित में कुल चार उन्मेष हैं। वक्रोक्तिजीवित कारिका, वृत्ति, उदाहरण में निबद्ध है। प्रथम उन्मेष में काव्यलक्षण, काव्यप्रयोजन, वक्रोक्तिस्वरूप, काव्यमार्ग का विवेचन किया गया है। द्वितीय उन्मेष में वर्णविन्यास वक्रता, पदपूर्वार्धवक्रता, प्रत्ययवक्रता का विवेचन किया गया है। तृतीय उन्मेष में वाक्यवक्रता तथा चतुर्थ में प्रकरण तथा प्रबन्ध वक्रता का विवेचन है।

महिमभट्ट[संपादित करें]

महिमभट्ट का समय ग्यारहवीं शती का उत्तरार्द्ध माना गया है। व्यक्तिविवेकार के नाम से महिमभट्ट प्रसिद्ध है। महिमभट्ट ने ध्वनि का व्यंग्यार्थ रूप में खण्डन किया है। व्यक्तिविवेक तीन विमर्शों में विभक्त है। प्रथम विमर्श में ध्वनि का खण्डन करते हुए अपने मत का प्रतिपादन किया है। द्वितीय विमर्श में अनौचित्य की व्याख्या की गयी है। तृतीय विमर्श में ध्वन्यालोक के चालीस उदाहरण को उद्धृत करने के पश्चात् यह प्रतिपादित किया गया है कि उदाहरण व्यंजना के न होकर अनुमान के है। आचार्य महिमभट्ट ने ध्वनि अथवा प्रतीयमानार्थ को अनुमान का विषय मानकर व्यक्तिविवेक की रचना की -

अनुमानेऽन्तर्भावं सर्वस्यैव ध्वनेः प्रकाशयितुम्।
व्यक्तिविवेकं कुरुते प्रणम्य महिमा परां वाचम्॥

क्षेमेन्द्र[संपादित करें]

आचार्य क्षेमेन्द्र का समय ग्यारहवीं शताब्दी का मध्यकाल माना गया है। औचित्यविचारचर्चा तथा कविकण्ठाभरण क्षेमेन्द्र ने औचित्य को काव्यात्मा स्वीकृत किया-

उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य यत्।
उचितस्य च यो भावस्तदौचित्यं प्रचक्षते॥

औचित्यविचारचर्चा में 19 कारिकायें है। इसमें औचित्य को परिभाषित करने के पश्चात् क्षेमेन्द्र ने 27 प्रकार के औचित्य की सोदाहरण व्याख्या की है। कविकण्ठाभरण में 55 कारिकायें है। कविकण्ठाभरण पाँच सन्धियों में विभक्त है। यह ग्रन्थ कविशिक्षापरक है।

भोजराज[संपादित करें]

आचार्य भोज का समय 1010 ई0 सन् से 1055 ई0 तक माना गया है। भोज प्रणीत सरस्वतीकण्ठाभरण तथा शृंगारप्रकाश दो काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ है। सरस्वतीकण्ठाभरण में पाँच परिच्छेद है।

प्रथम परिच्छेद में काव्यलक्षण, काव्यप्रयोजन, दोष तथा शब्दगुणों, अर्थगुणों का विवेचन है। द्वितीय परिच्छेद में चौबीस शब्दालंकारों का वर्णन है। तृतीय परिच्छेद में 24 अर्थालंकारों का वर्णन है। चतुर्थ परिच्छेद में 24 उभयालंकारों तथा पंचम परिच्छेद में रस का विवेचन किया गया है। शृंगार प्रकाश 36 प्रकाशों में विभक्त है। डॉ0 रेवा प्रसाद द्विवेदी ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से प्राप्त शृंगार प्रकाश की पाण्डुलिपि का सम्पादन किया है। आचार्य भोज के अनुसार शृंगार सभी रसों का मूल है।

‘शृंगारमेव रसनाद्रसमामनामः’।

मम्मट[संपादित करें]

ध्वनि प्रतिष्ठापनाचार्य मम्मट का समय 11वीं शती का उत्तरार्द्ध माना गया है। आचार्य मम्मट की प्रसिद्धि का कारण है। उनके द्वारा रचित काव्यशास्त्रीय कृति काव्यप्रकाश। काव्यप्रकाश में दस उल्लास, 142 कारिकायें है। काव्यप्रकाश में काव्यलक्षण, काव्यप्रयोजन, काव्यभेद, शब्दशक्ति, त्रिविधि काव्यार्थ, ध्वनि, गुण, अलंकार, रीति, काव्यदोष आदि विषयों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। काव्यप्रकाश में काव्यशास्त्रीय तत्त्वों का समन्वय दृष्टिगत होता है इसका उल्लेख स्वयं ग्रन्थकार ने किया है-

इत्येष मार्गो विदुषां विभिन्नोऽप्यभिन्नरूपः प्रतिभासते यत्।
न तद्विचित्रं यद्मुत्र सम्यग्विनिर्मिता सग्टनैव हेतुः॥

आचार्य मम्मट ने ध्वनि विरोधी आचार्यों का प्रबल रूप से खण्डन किया और ध्वनि सम्प्रदाय की प्रतिष्ठा की।

रुय्यक[संपादित करें]

आचार्य रुय्यक का समय 12वीं शती का मध्यभाग माना गया है। अलंकारसर्वस्व के रचनाकार आचार्य रुय्यक राजानक उपाधि से अलंकृत आचार्य थे-

राजानकरुचकापरनाम्नोऽलंकारसर्वस्वकृतः।

रुय्यक ने काव्यप्रकाश संकेत टीका की रचना की। रुय्यक ने अपने काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ अलंकारसर्वस्व में 82 अलंकारों की व्याख्या की है। रुय्यक ने ध्वनि सिद्धान्त के प्रति अपनी आस्था प्रकट करने के पश्चात् पूर्ववर्ती आचार्यों के काव्यशास्त्रीय मतों का निरूपण किया है।

वाग्भट[संपादित करें]

आचार्य वाग्भट प्रथम का समय 12वीं शती का मध्यभाग माना गया है। वाग्भटालंकार वाग्भट की काव्यशास्त्रीय कृति है जो पाँच परिच्छदों में विभक्त है। प्रथम परिच्छेद में काव्यलक्षण तथा काव्यहेतुओं का निरूपण है। द्वितीय परिच्छेद में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, पैशाची भाषा का उल्लेख करने के पश्चात् काव्यभेदों तथा पद वाक्य आठ दोषों की समीक्षा की गयी है। तृतीय परिच्छेद में काव्य के दस गुणों तथा चतुर्थ परिच्छेद में चार शब्दालंकारों, 35 अर्थालंकारों, वैदर्भी गौड़ी दो रीतियों का विवेचन किया गया है। पंचम परिच्छेद में रस, नायक, नायिका भेद निरूपण किया गया है। ग्रन्थ समाप्ति पर इस श्लोक से सम्पूर्ण ग्रन्थ का विवेच्य ज्ञात होता है-

दोषैरुज्झितमाश्रितं गुणगणैश्चेतश्चमत्कारिणं नानालंकृतिभिः परीतमभितो रीत्यास्फुरन्त्यासताम्।
तैस्तैस्तन्मयतां गतं नवरसैराकल्पकालं कवि स्रष्टारो घटयन्तु काव्यपुरुषं सारस्वाध्यानिः॥

हेमचन्द्र[संपादित करें]

आचार्य हेमचन्द्र का समय 12वीं शताब्दी का मध्यकाल माना गया है। हेमचन्द्र कृत काव्यशास्त्रीय कृति ‘काव्यानुशासन’ है। काव्यानुशासन में आठ अध्याय है। काव्यानुशासन सूत्र, वृत्ति उदाहरण तीन भागों में विभक्त है। कारिकादि पर हेमचन्द्र ने विवेक नाम की टीका भी लिखी। प्रथम अध्याय में काव्यलक्षण, काव्यप्रयोजन, काव्यहेतु, गुणदोष, अलंकारलक्षण, शब्दार्थलक्षण तथा लक्ष्यार्थ, मुख्यार्थ, व्यंग्यार्थ का विवेचन किया गया है। द्वितीय अध्याय में रसनिरूपण, तृतीय में काव्यदोष समीक्षा, चतुर्थ में गुण विवेचन, पंचम, षष्ठ में शब्दालंकार, अर्थालंकार व्याख्या, सप्तम में नायक-नायिका भेद निरूपण अष्टम अध्याय में काव्यभेदों की समीक्षा प्रस्तुत की गयी है।

अमरचन्द्रसूरि[संपादित करें]

आचार्य अमरचन्द्रसूरि का समय 13वीं शती मध्यकाल माना गया है। आचार्य अमरचन्द्रसूरि कृत काव्यकल्पलता कविशिक्षा परम्परा का श्रेष्ठ ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ चार प्रतानों में विभक्त है। प्रतान अध्यायों में विभक्त है। इस ग्रन्थ में छन्दः सिद्धि, शब्द सिद्धि, श्लेषसिद्धि, अर्थसिद्धि का विवेचन किया गया है।

जयदेव[संपादित करें]

आचार्य जयदेव का समय 13वीं शती माना गया है। आचार्य जयदेव कृत चन्द्रालोक अपनी रुचिकर शैली के लिए प्रसिद्ध है। चन्द्रालोक दस मयूखों में विभक्त है। इसमें क्रमशः काव्यलक्षण काव्यहेतु, त्रिविध शब्द, दोष निरूपण, लक्षण निरूपण, गुणविवेचन, अलंकार, रस, भाव, रीति, वृत्ति, व्यंजनाविमर्श, ध्वनिभेद, गुणीभूतव्यंय काव्य, लक्षणाविवेचन तथा अभिधा निरूपण किया गया है। जयदेव ने अलंकार को काव्य का अनिवार्य तत्त्व कहा है -

अंकीकरोति यः काव्यं शब्दार्थावनलंकृती।
असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलंकृती॥

वाग्भट द्वितीय[संपादित करें]

आचार्य वाग्भट द्वितीय का समय 13वीं शती उत्तरार्द्ध माना गया है। आचार्य वाग्भट कृत काव्यानुशासन सूत्र, वृत्ति उदाहरण में विभक्त है। काव्यानुशासन पाँच अध्यायों में विभक्त रचना है। प्रथम अध्याय में काव्यप्रयोजन, काव्यहेतु, काव्यभेद तथा महाकाव्यादि लक्षण का विवेचन है। द्वितीय अध्याय में गुण दोष विवेचन तृतीय में अर्थालंकारों,, चतुर्थ में शब्दालंकारों तथा पंचम अध्याय में रस तथा नायक-नायिका भेद की समीक्षा है।

विद्याधर[संपादित करें]

आचार्य विद्याधर का समय 13वीं शती उत्तरार्द्ध का माना गया है। आचार्य विद्याधर कृत एकावली काव्यशास्त्रीय गन्थ में आठ उन्मेष हैं। एकावली में काव्यहेतु काव्यस्वरूप, त्रिविधशब्द, त्रिविध अर्थ, त्रिविध वृत्ति, ध्वनि, गुण, रीति, दोष, अलंकारों का विवेचन किया गया है। आचार्य विद्याधर के अनुसार शब्द अर्थ काव्य का शरीर है तथा ध्वनि काव्य की आत्मा है -

ध्वनिप्रधानं काव्यं तुत कान्तासम्मितमीरितम्।
शब्दार्थौ गुणतां नीत्वा व्यंजनाप्रवणं यतः॥

विद्यानाथ[संपादित करें]

आचार्य विद्यानाथ का समय चौदहवीं शती पूर्वार्द्ध माना गया है। आचार्य विद्यानाथ ने प्रतापरुद्रयशोभूषण नामक काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ का प्रणयन किया।

प्रतापरुद्रदेवस्य गुणानाश्रित्य निर्मितः अलंकारप्रबन्धोऽयं सन्तः कणोत्सवोऽस्तु वः।

प्रतापरुद्रयशोभूषण में कुल नौ प्रकरण है। इस ग्रन्थ में क्रमशः नायक-काव्य, नाटक, रस, दोष, गुण, शब्दालंकारों, अर्थालंकारों, उभयालंकारों का वर्णन किया गया है।

विश्वनाथ[संपादित करें]

कविराज विश्वनाथ का समय 14वीं शती माना गया है। आचार्य विश्वनाथ प्रणीत साहित्यदर्पण काव्यशास्त्रीय रचना है। साहित्यदर्पण में दस परिच्छेद है। इसमें काव्यलक्षण, शब्दशक्ति, रस, ध्वनि,व्यंजना, दशरूपक, श्रव्यकाव्यभेद, दोष, गुण, रीति, अलंकारों का विवेचन किया गया है। आचार्य विश्वनाथ ने रस की व्याख्या विस्तार के साथ की है -

विभावेनानुभावेन व्यक्तः संचारिणा तथा।
रसतामेति रत्यादिः स्थायिभावः सचेतसाम॥

आचार्य विश्वनाथ की दर्पण नामक काव्यप्रकाश की टीका भी है।

केशवमिश्र[संपादित करें]

आचार्य केशवमिश्र का समय 16वीं शती उत्तरार्द्ध माना गया है। अलंकारशेखर आचार्य केशवमिश्र कृत काव्यशास्त्रीय रचना है। यह ग्रन्थ 8 रत्नों तथा 22 मरीचियों में विभक्त है। अलंकारशेखर में काव्यलक्षण, काव्यहेतु, रीति, शब्दवृत्ति, दोष, गुण, अलंकार, कविसमय, वर्ण्यविषय, समस्यापूर्ति संख्याबोधक वस्तु रसादि का सारग्राही विवेचन किया गया है।

भानुदत्त मिश्र[संपादित करें]

आचार्य भानुदत्त मिश्र का समय 16वीं शताब्दी माना गया है। रसमंजरी-रसतरग्णि तथा अलंकारतिलक आचार्य भानुदत्त कृत काव्यशास्त्रीय कृतियाँ है। रसमंजरी, रसतरग्णि का प्रतिपाद्य विषय नायक नायिका भेद तथा रस विवेचन है। अलंकारतिलक पाँच परिच्छेदों में विभक्त है। अलंकारतिलक में काव्यस्वरूप, पद वाक्य वाक्यार्थ विवेचन, गुण शब्दालंकार तथा अर्थालंकार की समीक्षा प्रस्तुत की है।

रूपगोस्वामी[संपादित करें]

रूपगोस्वामी का समय 16वीं शती माना गया है। भक्तिरसामृतसिन्धु तथा उज्जवनीलमणि। रूपगोस्वामी कृत भक्तिपरक काव्यशास्त्रीय कृतियाँ है। रूपगोस्वामी कृत भक्तिरस को दशम रस के रूप में स्वीकार किया है। भक्तिरसामृतसिन्धु चार विभागों तथा अनेक लहरियों में विभक्त है।

अप्पयदीक्षित[संपादित करें]

आचार्य अप्पयदीक्षित का समय 16वीं शती माना गया है। वृत्तिवार्तिक, चित्रमीमांसा तथा कुवलयानन्द अप्पयदीक्षित कृत काव्यशास्त्रीय कृतियाँ है।

अमुं कुवलयानन्दमकरोदप्पदीक्षितः।
नियोगान्देटटपतेर्निरुपाधिकृपानिधेः॥
चन्द्रालोको विजयतां शरदागमसंभवः।
हृद्यः कुवलयानन्दो यत्प्रसादादभूदयम्॥

पण्डितराज जगन्नाथ[संपादित करें]

काशी की विभूति पण्डितराज जगन्नाथ का समय 17वीं शती स्वीकृत किया गया है। रसगगधर आचार्य जगन्नाथ कृत लोकप्रिय काव्यग्रन्थ है। रसगगधर दो आननों में विभक्त है। प्रथम आनन में काव्यलक्षण, काव्यहेतु, काव्यभेद तथा शब्द अर्थ गुणों की चर्चा की गयी है। इसके अतिरिक्त रस, भाव, रसाभास, भावसन्धि, भावशबलतादि का विवेचन प्रथम आनन में है। द्वितीय आनन में संलक्ष्यक्रमध्वनि, 70 अलंकारों की उदाहरण सहित व्याख्या की गयी है। आचार्य जगन्नाथ ने अनेक पूर्ववर्ती आचार्यों के मतों का खण्डन करते हएु अपनी विद्वता का परिचय रसगगधर में प्रस्तुत किया है।

मननतरितीर्णविद्याऽर्णवो जगन्नाथपण्डितनरेन्द्रः।
रसगधरनाम्नीं करोति कुतुकेन काव्यमीमांसाम्॥

आधुनिक युग[संपादित करें]

पूर्वार्द्ध परम्परा[संपादित करें]

काव्यशास्त्रीय परम्परा आचार्य जगन्नाथ के पश्चात् समाप्त नहीं हुयी। 18वीं शती के आचार्यों के कर्तृत्व की संक्षिप्त समीक्षा इस प्रकार है।

आचार्य विश्वेश्वर पाण्डेय[संपादित करें]

पण्डितराजोत्तर आचार्यों में आचार्य विश्वेश्वर पाण्डेय का श्रेष्ठ स्थान है। इनका समय 18वीं शती पूर्वार्द्ध माना गया है। आचार्य विश्वेश्वर पाण्डेय कृत 24 गन्थ प्रसिद्ध है। अलंकारकौस्तुभ, अलंकारमुक्तावली, अलंकारप्रदीप, रसचन्द्रिका, कवीन्द्रकण्ठाभरण कवि कृत काव्यशास्त्रीय रचनाएँ हैं। इन ग्रन्थों में कवि ने रस, रीति, गुण, वृत्ति, दोषादि का चित्रण किया है। अलंकारकौस्तुभ काव्यशास्त्र की प्रमुख कृति है जो 66 कारिकाओं में निबद्ध है। अर्थालंकारों की लक्षण सहित व्याख्या इस ग्रन्थ में है। अलंकारमुक्तावली में कौस्तुभ के ही अलंकारलक्षण वर्णित है परन्तु उदाहरण भिन्न है। यह ग्रन्थ सरल भाषा में है।

नानापक्षविभावनकुतुकमलंकारकौस्तुभंकृत्वा।
सुखबोधाय शिशूनां क्रियते मुक्तावलीतेषाम्॥

अलंकारप्रदीप में एक सौ बीस अलंकारों की परिभाषा सूत्रों में है। रसचन्द्रिका में नौ रसों का विवेचन किया गया है।

आचार्य हरिप्रसाद[संपादित करें]

आचार्य हरिप्रसाद का समय 18वीं शती माना गया है। आचार्य हरिप्रसाद कृत काव्यलोक सात प्रकाशों में विभक्त है। काव्यलोक में काव्यलक्षण, ध्वनिनिरूपण, रसविकास, दोषविवेचन, गुणनिरूपण, शब्दालंकारविवेचन, अर्थालंकार निरूपण का विवेचन किया गया है। कवि ने चमत्कार को काव्यात्मा कहा है।

भाव्यमाने चमत्कारः सुखातिशयकारणम्।
वस्त्वलंकाररुपोऽपि काव्यस्यात्मा गतं मम्॥

चिरंजीव भट्टाचार्य[संपादित करें]

आचार्य चिरंजीव भट्टाचार्य का समय 18वीं शताब्दी पूर्वार्द्ध है। आचार्य चिरंजीव प्रणीत काव्यविलास काव्यशास्त्रविषयक रचना है। काव्यविलास दो भग्यिं में विभक्त है। प्रथम भंकीं में काव्यहेतु, काव्यलक्षण, काव्यप्रयोजन तथा नौ रसों का विवेचन है। द्वितीय भंकी में अलंकारों का निरूपण है। अलंकार निरूपण काव्यप्रकाश पर आधारित है। कवि ने चमत्कार को काव्य का जीवंत तत्त्व माना है। वह चमत्कार रस और अलंकार से सम्भव है। ऐसा कवि का मन्तव्य है।

भट्टदेवशंकर पुरोहित[संपादित करें]

भट्ट देवशंकर पुरोहित का समय 18वीं शती उत्तरार्द्ध माना गया है। देवशंकर पुरोहित कृत अलंकारमंजूषा काव्यशास्त्रीय रचना है।

उरःपत्तनकृततानिवासेन रानेरनगरजन्मभुवा पुरोहितनाहनाभयिसुतेन पुरोहितो- पनामकभट्टदेवशंकरेण विरचिता अलंकारमंजूषा।

अलंकारमंजूषा में 115 अलंकारों का वर्णन है।

आचार्य कृष्णशर्मा[संपादित करें]

आचार्य कृष्णशर्मा का समय 1835 से 1909 ई0 के मध्य माना है। मन्दारमरन्दचम्पू आचार्य कृष्णशर्मा की काव्यशास्त्रीय रचना है। इसमें छन्दशास्त्र, नाट्यशास्त्र, काव्यशास्त्र कविशिक्षा का निरूपण किया गया है। इसके अतिरिक्त कवि कृत काव्यलक्षण, रसप्रकाश इत्यादि रचनाएँ है। मन्दारमरन्दचम्पू चम्पू काव्य नहीं है। यह आद्यान्त काव्यशास्त्रीय रचना है। मन्दारमरन्दचम्पू के प्रत्येक बिन्दु के अन्त में आत्मवृत्त इस प्रकार दिया है-

इति श्रीमद्घटिकाशतघण्टाविहिताष्टभाषाचरणनिपुणस्य वासुदेवयोगी- श्वरस्यान्तेवास्यन्यतमस्य गुहपुरवासशर्मणः स कृष्णशर्मणः कवेः कृतौ मन्दारमरन्देचम्पू प्रबन्धे वृत्तबिन्दुः प्रथमः समाप्तिमगमत्।

आचार्य नरसिंह कवि[संपादित करें]

आचार्य नरसिंह कवि का समय 18वीं शती उत्तरार्द्ध माना गया है। नंजराजयशोभूषण कवि नरसिंह कृत काव्यशास्त्रीय रचना है। नंजराजयशोभूषण के अन्त में इसका उल्लेख है-

श्रीपरमशिवावतारशिवरामदेशिकचरणारविन्दानुसन्धान् महिमसमासादितनिः सहयदैनन्दिनप्रबन्धनिर्माणसाहसिक निखिलविद्वज्जनलालनीयसरससाहित्यसम्प्रदायप्रवर्तक नरसिंहकविविरचिते नंजराजयशोभूषणे...।

इस काव्यग्रन्थ में सात विलास है। प्रथम विलास में नायक नायिका भेद निरूपण है। द्वितीय विलास में शब्दार्थभेद, रीतिभेद तथा काव्यभेद का निरूपण किया गया है। तृतीय विलास में गुणीभूतव्यंग्य तथा महाकाव्यादि का लक्षण उपलब्ध है। चतुर्थ विलास में रसभावादि, पंचम विलास में दोष, गुण तथा षष्ठ विलास में नाट्यतत्त्वों का निरूपण किया गया है। सातवें विलास में शब्दालंकारों तथा अर्थालंकारों का निरूपण किया गया है।

आशाधर भट्ट[संपादित करें]

आशाधर भट्ट का समय 18वीं शताब्दी पूर्वार्द्ध माना गया है। कोविदानन्द और त्रिवेणिका आशाधर भट्ट कृत प्रमुख काव्यशास्त्रीय रचनाएँ है। त्रिवेणिका की पुष्पिका से ज्ञात होता है कि आशाधर भट्ट व्याकरण, मीमांसा, न्यायशास्त्र के पण्डित थे-

इतिपदवाक्यप्रमाणपारावारीणश्रीरामजीभट्टात्मजाशाधरभट्टविरचिता त्रिवेणिका समाप्ता।

इसमें अभिधा, लक्षणा ,व्यंजना शब्दशक्तियों का विस्तारपूर्वक निरूपण किया है। त्रिवेणिका कोविदानन्द का संक्षिप्त रूप है।

आचार्य अच्युतरामशर्मा ‘मोडक’[संपादित करें]

पण्डितराज जगन्नाथ के पश्चात काव्यशास्त्रीय आचार्यों में आचार्य अच्युतरायशर्मा मोडक का प्रमुख स्थान है। आचार्य शर्मा का समय 19वीं शताब्दी पूर्वार्द्ध माना गया है। साहित्यसार अच्युतराय कृत काव्यशास्त्रीय रचना है। साहित्यसार की पुष्पिका में इसका उल्लेख है।

इतिश्रीमत्पदवाक्यप्रमाणक्षीरार्णवविहरण श्रीमदद्वैतविद्येन्दिरारमणषष्ट्युप- नामक श्रीमन्नानारायण शास्त्रिगुरुवरचरणार विन्दराजहंसायमानेन मोङकोप नाम्ना च्युतशर्मणा।

साहित्यसार बारह रत्नों में विभक्त रचना है। धन्वन्तरिरत्न में मंगलाचरण, काव्यप्रकार, काव्यस्वरूप का निरूपण है। ऐरावतरत्न में शब्दशक्तियाँ, इन्दिरारत्न में अर्थव्यंजकता का निरूपण है। दक्षिणावर्तकम्बुरत्न में ध्वनिभेद, रसभेद, व्यभिचारिभाव लक्षणादि का निरूपण है। अश्वरत्न में गुणीभूतव्यङग्य, विषरत्न में दोष, गुणरत्न में काव्यगुण, कौस्तुभरत्न में अर्थालंकार, कामधेनुरत्न में अधमकाव्यभेद, शब्दालंकार तथा कौस्तुभरत्न में अर्थालंकार का निरूपण है। कामधेनुरत्न में अधमकाव्य भेद, शब्दालंकार, रम्भारत्न में नायिका भेद, चन्द्ररत्न में नायक भेद तथा अमृतरत्न उपसंहार के रूप में वर्णित है। साहित्यसार 1313 कारिकाओं में निबद्ध रचना है।

आचार्य कृष्णब्रह्मतन्त्र परकासंयमीन्द्र[संपादित करें]

आचार्य कृष्णब्रह्मतन्त्र परकालसंयमीन्द्र का समय 1839 से 1916 ई0 माना गया है। अलटरमणिहार संयमीन्द्र की काव्यशास्त्रीय कृति है।

नवदुर्गतादेशिककृष्णाम्बासूनुरातनोतीमम्।
श्रीशैलान्वयजन्मा कृष्णोऽलंकारमणिहारम्॥

यह चार खण्डों में विभक्त है। इसमें कवि ने 121 अर्थालंकारो तथा चार शब्दालंकारों का विवेचन किया है। ग्रन्थ में कुवलयानन्द तथा रसगंगाधरादि के उद्धरण का उल्लेख प्राप्त होता है।

पं0 छज्जूरामशास्त्री विद्यासागर[संपादित करें]

बीसवीं शताब्दी के काव्यशास्त्रीय आचार्यों में पं0 छज्जूरामशास्त्री आचार्यों में विद्यासागर का प्रमुख स्थान है। साहित्यबिन्दु छज्जूरामशास्त्री प्रणीत काव्यशास्त्रीय रचना है। यह काव्यग्रन्थ पाँच खण्डों में विभक्त है। यह पाँच खण्ड पाँच बिन्दु हैं। प्रथम बिन्दु में काव्यलक्षण, काव्यप्रयोजन, काव्यहेतु, काव्यप्रकार तथा रूपकादि का निरूपण है। द्वितीय बिन्दु में शब्दार्थ त्रैविध्य तथा रसादि का निरूपण है। तृतीय बिन्दु में दोषनिरूपण है। चतुर्थबिन्दु में रीति, गुण का निरूपण है। पाँचवें बिन्दु में अलंकारों की उदाहरण सहित व्याख्या है। साहित्यबिन्दु 20वीं शताब्दी के काव्यशास्त्रपरक ग्रन्थों में लोकप्रिय रचना है।

आचार्य विद्याराम (1706)[संपादित करें]

आचार्य विद्याराम कृत रसदीर्घिका काव्यशास्त्रीय महत्वपूर्ण कृति है। इसमें साहित्यशास्त्र के रस, अलंकार, भाव, वृत्ति, नायक नायिका भेद, गुण, दोष आदि अगें पर सुन्दर रीति से विवेचन किया गया है। यह रचना पाँच सोपानों में विभक्त है।

अनायासेन बालानां रसास्वादनहेतवे।
विद्यारामः करोत्येतां मनोज्ञां रसदीर्घिकाम्॥

इस प्रकार आचार्य विद्याराम ने स्वयं कहा है कि यह काव्यशास्त्रीय रचना बालबोध के लिये श्रेष्ठ रचना है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि आधुनिक युग की पूर्वार्द्ध परम्परा के संस्कृत काव्यशास्त्रियों ने प्रायःअपने काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में मम्मट, विश्वनाथ, जगन्नाथ आदि आचार्यों के काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों का अनुसरण किया है। 18वीं शती से 20वीं शती के काव्यशास्त्रियों द्वारा रचित काव्यग्रन्थों में देश, स्थान, व्यक्तित्व की विभिन्नता के कारण मौलिकता है। उनके काव्य ग्रन्थों में पूर्व आचार्यों के मतों का प्रायः विश्लेषण तथा समीक्षा करते हुए अपने मतों को प्रस्तुत किया गया है। पण्डितराज जगन्नाथ के पश्चात् संस्कृत काव्यशास्त्र में उपर्युक्त काव्यशास्त्रियों का विशिष्ट योगदान है क्योंकि इन्होंने अलंकारशास्त्र की परम्परा को आगे बढ़ाया है।

उत्तरार्द्ध परम्परा[संपादित करें]

ईसापूर्व के समय से प्रारम्भ होने वाली काव्यशास्त्रीय रचनाओं की सरणि 21वीं शती में भी प्रवाहमान है। इक्कीसवीं शती के प्रमुख काव्यशास्त्रियों का परिचय निम्न प्रकार से किया गया है।

स्वामी करपात्री[संपादित करें]

आधुनिक भक्ति सम्प्रदाय के संस्कृत काव्यशास्त्रियों में स्वामी करपात्री जी ने भक्ति का विवेचन विस्तृत रूप से किया है। स्वामी करपात्री रचित ग्रंथ है - ‘भक्तिरसार्णव’। इसमें ग्यारह अनुच्छेद है।

कपिलदेव ब्रह्मचारी[संपादित करें]

भक्तिरससम्प्रदाय के काव्यशास्त्री हैं- कपिलदेव ब्रह्मचारी। ‘भक्तिरसविमर्श’ कपिलदेव ब्रह्मचारी कृत भक्तिरसप्रधान रचना है। भक्तिरसविमर्श में भक्ति का विवेचन रस रूप में है। यह ग्रन्थ चार अध्यायों में विभक्त है। इस ग्रन्थ में वैदिक सम्प्रदाय से प्रारम्भ करते हुए समस्त वैष्णव सम्प्रदाय के आचार्यों तक के विचारों को प्रस्तुत किया गया है। कपिलदेव ब्रह्मचारी का मत है कि प्रेम से युक्त विभाव, अनुभाव, संचारीभावों के संयोग से भक्ति का रस रूप में अनुभव होता है।

ब्रह्मानन्द शर्मा[संपादित करें]

सत्यानुभूति को काव्य की आत्मा स्वीकार करने वाले डॉ0 ब्रह्मानन्द शर्मा ख्याति प्राप्त कवि हैं। शब्दार्थ में सत्य के रमणीय प्रतिपादन को उन्होंने काव्य की संज्ञा दी है।

शब्दार्थवर्तिसत्यस्य सुन्दरं प्रतिपादनम्।
काव्यस्य लक्षणं ज्ञेयम् सत्यस्यमात्र विशेषता।

डा0 ब्रह्मानन्द शर्मा कृत काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ है - वस्त्वलंकारदर्शन, काव्यसत्यालोक वस्त्वलंकारदर्शन में अलंकारविषयक विचार व्यक्त किये हैं। काव्यसत्यालोक के माध्यम से डा0 ब्रह्मानन्द शर्मा ने एक नवीन तत्त्व को संस्कृत काव्यशास्त्रीय परम्परा में समाहित किया है। काव्यसत्यालोक में पाँच उद्योत है। प्रथम उद्योत में सत्य का निरूपण है। द्वितीय उद्योत में सत्य में सूक्ष्मता विवेचन है। तृतीय उद्योत में अलंकार तथा चतुर्थ उद्योत में भावयोग तथा पंचम उद्योत में काव्यलक्षण, काव्यभेद, काव्यप्रयोजन की समीक्षा है।

गोविन्दचन्द्र पाण्डे[संपादित करें]

अर्वाचीन काव्यशास्त्रियों में आचार्य गोविन्दचन्द्र पाण्डे इलाहाबाद के श्रेष्ठ कवियों में हैं। ‘आत्मविश्रान्ति ही सौन्दर्य है’ ऐसा गोविन्दचन्द्र पाण्डे का मन्तव्य है -

आत्मविश्रान्त्यभेदेन सौन्दर्य व्यपदिश्यते।

आचार्य गोविन्दचन्द्र पाण्डे कृत काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ हैं - सौन्दर्यदर्शनविमर्श, भक्तिदर्शन विमर्श। सौन्दर्यदर्शनविमर्श तीन परिच्छेदों में विभक्त है। 132 कारिकाओं में विभक्त यह ग्रन्थ सौन्दर्यदर्शनकारिका रूपतत्त्व विमर्श तथा रसतत्त्वविमर्श नामक खण्डों में विभक्त है। दूसरा ग्रन्थ भक्तिदर्शनविमर्श तीन व्याख्यानों में विभक्त है।

आचार्य शिव जी उपाध्याय[संपादित करें]

साहित्यशास्त्र के श्रेष्ठ विद्वानों में आचार्य शिव जी उपाध्याय श्रेष्ठ है। शिव जी उपाध्याय कृत काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ है- साहित्यसन्दर्भ। साहित्यसन्दर्भ आठ विमर्श में विभक्त्त है। ये क्रमशः रसतत्त्वविमर्श, काव्यस्वरूपविमर्श, काव्येधर्मधर्मिभाव, साहित्यस्वरूपविमर्श, सौन्दर्यविमर्श, रसबोधविमर्श, मोक्षतत्साधनविमर्श, धर्मतत्त्वविमर्श हैं। कवि ने शब्द और अर्थ का सहभाव साहित्य है ऐसा निर्दिष्ट किया है

सहभावेन साहित्यं काव्ये शब्दार्थयोर्मतम्।
तयोरेकतरस्यापि द्वयोर्वासुष्ठुसंस्थितौ॥

जगन्नाथ पाठक[संपादित करें]

डॉ0 जगन्नाथ पाठक अर्वाचीन युग के प्रमुख काव्यशास्त्री है। जगन्नाथ पाठककृत काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ है - सौन्दर्यकारिका। 102 कारिकाओं में रचित सौन्दर्यकारिका सौन्दर्य पर आधारित रचना है। डॉ0 पाठक का मानना है सौन्दर्य से ही साहित्य श्रेष्ठ सिद्ध होता है। सौन्दर्य से युक्त होने पर कला और साहित्य सरस और सार्थक हो जाते हैं-

सौन्दर्य हि कलायाः साहित्यस्यापि केवलोपनिषत्।
तेनैवोभयमपि तत् सरसं स्यात् सार्थकं च स्यात्॥

रमाशंकर तिवारी[संपादित करें]

डा0 रमाशंकरतिवारी आधुनिक काव्यशास्त्री है। काव्यतत्त्वविवेक डॉ0 तिवारी की काव्यशास्त्रीय रचना है। यह कृति 24 परिच्छेदों में विभक्त है। काव्यतत्त्वविवेक में काव्यस्वरूप-काव्यहेतु काव्यप्रयोजनादि की समीक्षा की गयी है।

चन्द्रमौलि द्विवेदी[संपादित करें]

आचार्य चन्द्रमौलि रससूत्र पर अपने विचार व्यक्त करने वाले आधुनिक काव्यशास्त्री है। आचार्य चन्द्रमौलि द्विवेदी कृत काव्यशास्त्रीय रचना रसवसुमूर्ति है- रसवसुमूर्तिरिति नाम्ना रचितोऽयं काव्यशास्त्रीयो ग्रन्थः। यह रचना कारिका तथा गद्य में समन्वित है। रसवसुमूर्ति में असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य के आठ भेदों का निरूपण किया गया है।

हरिश्चन्द्र दीक्षित[संपादित करें]

हरिश्चन्द्र दीक्षित वैदेशिक परम्परा को स्वीकार करने वाले आधुनिक काव्यशास्त्री हैं। काव्यात्मनिर्णय तथा काव्यशास्त्रीय निबन्धावली हरिश्चन्द्र दीक्षित कृत काव्यरचनाएँ है। डा0 दीक्षित ने वस्तु भावना को काव्य की आत्मा माना है।

शोभा मिश्रा[संपादित करें]

शोभा मिश्रा आधुनिक काव्यशास्त्रियों में प्रमुख हैं। तृतीयशब्दशक्तिविमर्श डा0 शोभा मिश्रा कृत काव्यशास्त्रीय रचना है। तृतीयशब्दशक्ति विमर्श पाँच अध्यायों में विभक्त रचना है। ग्रन्थ का प्रमुख प्रतिपाद्य विषय गौणी, तात्पर्या, व्यंजना तीन वृत्तियाँ हैं। उन्होनें अभिधा, लक्षणा, व्य०जना को शब्दशक्ति मानने में संकोच किया है। शोभा मिश्रा का कथन है कि प्रायः आचार्यों ने इन्हीं को ही शब्दशक्ति के रूप में प्रतिपादित किया है। परन्तु इसके अतिरिक्त भी अनेक शब्दशक्तियाँ है इनका निरूपण उन्होंने किया है।

रामप्रताप वेदालंकार[संपादित करें]

चमत्कार को काव्य का सर्वस्व मानने वाले आधुनिक काव्यशास्त्री डॉ0 रामप्रताप वेदालंकार रचित काव्य ग्रन्थ चमत्कारविचारचर्चा है। यह ग्रन्थ तीन अनुच्छेदों में विभक्त है। डॉ0 रामप्रताप वेदालंकार ने चमत्कार के अभाव में काव्य सत्ता को अस्वीकार कर दिया है। प्रथम विचार में चमत्कार की विस्तृत व्याख्या की है। द्वितीय विचार में चमत्कार का लक्षण तथा उदाहरण का निरूपण किया है। तृतीय विचार में काव्यभूमि कश्मीर की प्रसंशा की है। अन्त में चमत्कार को साध्य माना है।

आचार्य चण्डिकाप्रसाद शुक्ल[संपादित करें]

आचार्य चण्डिकाप्रसाद शुक्ल आधुनिक काव्यशास्त्रियों में प्रसिद्ध है। ध्वन्यालोक टीका ‘दीपशिखा’ उनके द्वारा रचित काव्यकृति है। दीपशिखाकार ने ध्वन्यालोक की व्याख्या आनन्दवर्धन के अनुसार की है।

ध्वन्यालोकस्य सिद्धान्ता दुर्व्याख्यानतमोवृताः।
प्राप्य दीपशिखालोकं पुनरद्य प्रकाशिताः॥

डॉ0 रेवा प्रसाद द्विवेदी[संपादित करें]

काशी की संस्कृत काव्यशास्त्रीय परम्परा के आधुनिक विद्वानों में डा0 रेवा प्रसाद द्विवेदी ख्याति प्राप्त आचार्य है। विश्वभारती आदि श्रेष्ठ पुरस्कारों से पुरस्कृत आचार्य रेवा प्रसाद द्विवेदी की काव्यशास्त्रीय रचनाएँ है- काव्यालंकारकारिका, साहित्यशारीरक काव्यालंकारकारिका में 261 कारिकाएँ है। इस ग्रन्थ में काव्यलक्षण, काव्यप्रयोजन, काव्यहेतु आदि विषयों पर विचार व्यक्त किए गये हैं।

इमा रेवाप्रसादारव्य-सनातन-कवीरिताः।
दिव्यांजनेयुः सद्दृक्षु काव्यालंकारकारिकाः॥

साहित्यशारीरक में डॉ0 द्विवेदी ने काव्यशास्त्रीय विकास परम्परा का उल्लेख किया है। डॉ0 द्विवेदी वर्तमान अलंकारवादी आचार्य है।

डॉ0 राजेन्द्र मिश्र[संपादित करें]

अभिराज राजेन्द्र मिश्र वर्तमान संस्कृत काव्यजगत के श्रेष्ठतम् रचनाकार हैं। अनेक संस्कृत विषयों पर उत्कृष्ट रचना कर डा0 राजेन्द्र मिश्र ने संस्कृत अभिनव काव्यशास्त्र में अपना श्रेष्ठ योगदान सिद्ध कर दिया है।

प्रणीयेदभिराजयशोभूषणमिंचतम्।
भूयः प्रवर्तये रुद्धां काव्यशास्त्रपरम्पराम्॥

अभिराजयशोभूषणम् डा0 मिश्र जी कृत काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ उन्मेषों में विभक्त विशालतम काव्यशास्त्र है। परिचयोन्मेष, वस्तुतत्त्वोन्मेष, आत्मोन्मेष, निर्मित्युन्मेष, प्रकीर्णोन्मेष में संस्कृत के अभिनव सिद्धान्तों की विवेचना की है। परिचयोन्मेष में काव्यप्रसंशा, काव्यप्रयोजन, काव्यहेतु, काव्यलक्षण, काव्यविभाजन की चर्चा है। शरीरोन्मेष में शब्दार्थसम्बन्ध, शब्दशक्ति, रीतिवृत्ति, गुणालंकार का विवेचन किया गया है। आत्मोंन्मेष में इस, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, औचित्य, ध्वनि पर विचार व्यक्त किये गये हैं। निर्मित्युन्मेष में आधुनिक काव्यविधाओं यथा- उपन्यास, एकांकी, लहरी काव्य, विमान काव्य, दीर्घकथा, लघुकथा पर विचार व्यक्त किये गये हैं। प्रकीणोन्मेष में गीत, गजल, छन्दोमुक्त कविता पर ग्रन्थकार ने अपने विचार व्यक्त किये हैं।

डॉ0 राधावल्लभ त्रिपाठी[संपादित करें]

डा0 राधावल्लभ त्रिपाठी अर्वाचीन काव्यशास्त्रियों में लोकप्रिय आचार्य है। अभिनवकाव्यालंकारसूत्र आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी प्रणीत काव्यशास्त्रीय कृति है। यह तीन अधिकरणों में विभक्त है। काव्यस्वरूपनिरूपण नामक प्रथम अधिकरण में छः अध्याय है। द्वितीय अधिकरण अलंकारविमर्श में छः अध्याय है। तृतीय अधिकरण काव्यविशेषविमर्श में एक अध्याय है। अभिनवकाव्यालंकारसूत्र में तेरह अध्याय तथा सौ सूत्र हैं। डा0 राधावल्लभ त्रिपाठी अर्वाचीन युग के अलंकारवादी आचार्य है।

डॉ0 त्रिपाठी ने अनेक संस्कृत की आधुनिक नवीन विधाओं का उल्लेख अपने ग्रन्थ में किया है जो आधुनिक युग में संस्कृत काव्यशास्त्र की प्रगति की परिचायिका है। अभिनवकाव्यालंकारसूत्र की पुष्पिका से ज्ञात होता है कि उन्होंने प्राच्य तथा पाश्चात्य दोनों का मन्थन कर नवसिद्धान्तों के मौक्तिक निकाले हैं।

प्राच्यपाश्चात्यसाहित्यशास्त्राणां क्षीरसागरम्।
निस्सारितं विनिर्मथ्य नवसिद्धान्तमौक्तिकम्।
राधावल्लभ इत्याख्यो विदुषा स वंशवदः।
काव्यालंकारसूत्रं सोऽभिनवं व्यदधादिदम्॥

आचार्य रहसविहारी द्विवेदी[संपादित करें]

आचार्य रहस विहारी द्विवेदी संस्कृत काव्यशास्त्र आधुनिक परम्परा के श्रेष्ठ कवि माने जाते है। ‘नव्यकाव्यतत्त्वमीमांसा’ आचार्य द्विवेदी कृत संस्कृत काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ हैं। आधुनिक परिवेश को केन्द्र मानकर आचार्य द्विवेदी ने काव्यप्रयोजन, काव्यलक्षण, काव्यहेतु, का निरूपण किया है। आचार्य द्विवेदी ने हाइकू, सीजो, तान्का आदि पाश्चात्य काव्यतत्त्व के आधार पर काव्य के विशिष्ट भेदों का विवेचन किया है।

उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि काव्यशास्त्र के मूल तत्त्वों का अन्वेषण वेदों में किया गया है। काव्यशास्त्र की यह परम्परा वेदों से प्रारम्भ होकर अद्युनातन विद्यमान है। काव्यशास्त्र के आचार्यों में भरत, भामह, दण्डी, वामन, रुद्रट, मम्मट, विश्वनाथ, आनन्दवर्धन, जगन्नाथ इत्यादि ने रस, छन्द, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि अपने-अपने स्वतंत्र विचार प्रस्तुत किये है। इसी क्रम में आधुनिक युग के आचार्यों ने भी अपने काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है।

21वीं शती में भी अनेक नवीन संस्कृत काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ रचे जा रहे हैं जो संस्कृत काव्यशास्त्र की उन्नति के परिचायक है।