संरचनावाद (मनोविज्ञान)

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

मनोविज्ञान में संरचनावाद (Structuralism in psychology) या संरचनात्मक मनोविज्ञान (structural psychology), विल्हेम वुन्ट तथा एडवर्ड ब्रडफोर्ड टिचनर द्वारा विकसित एक चेतना सिद्धान्त (theory of consciousness) है।

मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र से अलग करके क्रमबद्ध अध्ययन करने का श्रेय संरचनावाद को जाता है, जिसके प्रवर्तक विलियम बुण्ट (1832-1920) तथा ई.बी. टिचनर (1867-1927) थे। इन्होनें अमेरिका के कार्नेल विश्वविद्यालय में इसकी शुरूआत की। बुण्ट ने 1879 में लिपजिंग विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला की स्थापना की और मनोविज्ञान के स्वरूप को प्रयोगात्मक बना दिया। बुण्ट ने मनोविज्ञान को चेतन अनुभूति का अध्ययन करने वाला माना, जिसे मूलतः दो तत्वों में विश्लेषित किया जा सकता था। वे दो तत्व थे- संवदेन तथा भाव। बुण्ट ने चेतन को वस्तुनिष्ठ (ऑब्जेक्टिव) तत्व बताया। बुण्ट का विचार था कि प्रत्येक भाव का अध्ययन तीन विभाओं में अवस्थित किया जा सकता है- उत्तेजना-शांत, तनाव-शिथिलन तथा सुखद-दुःखद। इसे भाव का त्रिविमीय सिद्धान्त कहा गया। टिचनर ने बुण्ट की विचारधारा को उन्नत बनाते हुये कहा कि चेतना के दो नहीं तीन तत्व होते है- संवदेन, प्रतिमा तथा अनुराग। टिचनर ने बुण्ट के समान अन्तःनिरीक्षण को मनोविज्ञान की एक प्रमुख विधि माना है। बुण्ट ने चेतना के तत्वों की दो विशेषताएं बतायी थी- गुण तथा तीव्रता। टिचनर ने इनकी संख्या चार कर दी- गुण, तीव्रता, स्पष्टता तथा अवधि। टिचनर ने ध्यान प्रत्यक्षण, साहचर्य, संवेदन आदि क्षेत्रों में भी अपना योगदान दिया।

संरचनावाद का शिक्षा में योगदान[संपादित करें]

  • (१) संरचनावाद का योगदान शिक्षा तथा शिक्षा मनोविज्ञान के लिये प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष रूप में है। संरचनावाद ने सर्वप्रथम मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र से अलग करके इसका स्वरूप प्रयोगात्मक बनाया, जिससे मनोविज्ञान की हर शाखा, जिसमें शिक्षा मनोविज्ञान भी शामिल था, का स्वरूप प्रयोगात्मक हो गया।
  • (२) मनोविज्ञान का स्वरूप प्रयोगात्मक होने से शिक्षा की नयी पद्धति के बारे में शिक्षकों को सोचने की चेतना आयी। अन्तःनिरीक्षण विधि को प्रयोग शिक्षार्थी की मानसिक दशाओं तथा ध्यान, सीखना, चिंतन आदि प्रक्रियाओं के अध्ययन करने में प्रारंभ कर दिया।
  • (३) शिक्षा में उन पाठ्यक्रमों को अधिक महत्व दिया जाने लगा जिससे शिक्षार्थियों के चिन्तन, स्मरण, प्रत्यक्षण एवं ध्यान जैसी मानसिक क्रियाओं का समुचित विकास तथा उनका प्रयोगात्मक अध्ययन संभव हो।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]