संत वील्होजी सुथार

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वील्होजी एक संत कवि थे । वे सुथार समाज से सम्बन्ध रखते थे। उन्होंने वि. स. 1601 में  बिश्नोई धर्म में दीक्षित कर लिया । उन्होंने श्री गुरु जम्भेश्वर द्वारा बनाए गए बिश्नोई धर्म (पंथ) का प्रचार - प्रसार  में सहयोग दिया।


संत वील्होजी महाराज Vilhoji Maharaj
जन्म 1532
रेवाड़ी , हरियाणा भारत
मृत्यु मालूम नहीं
व्यवसाय संत कवि
प्रसिद्धि कारण बिश्नोई धर्म प्रसार - प्रचारक
अंतिम स्थान Deshdrohi

जीवन[संपादित करें]

वील्होजी का जन्म सन् 1532 रेवाड़ी ( हरियाणा ) में एक खाती ( सुथार ) के घर हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीचन्द (परसराम) और माता का नाम आनन्दा बाई था। इनकी आंखे बचपन में ही चेचक से खराब हो गई थी । एक बार गुजरात की ओर से वेदांती साधुओं की एक टोली उनके गांव आईं। वील्होजी के माता पिता ने इन्हीं साधुओं को इन्हे सौंप दिया वेदान्तियों के साथ रहने में इन्हे "विल्हपूरी" की उपाधि मिली ।उनके शिष्य महत्मा सुरजनंदास जी पूनिया ने इन्हे विठ्ठलदास और विठठलराय के नाम से संबोधित किया जाता है। साहबराम के गुरु गोविंदराम जी ने इन्हे वील्हाजी कहा है। साहबराम जी राहड ने तो अपने प्रसिद्ध ग्रंथ  "जम्भ सार" में उन्हे विल्हदेव कहा है। जम्भ सार में उनके नाम है । यथा- विल्हो, बीठल , विल्हेसुर, वील, वीलो, वीहल, वीलहेश्चर,आदि महार्षि विल्हा जी की प्रस्तुति में साहबराम जी ने इन्हे विल्ह कहा है। और बिश्नोई समाज में वील्होजी के नाम से प्रसिद्ध है।

वील्होजी वेदान्तियों के साथ घूमते फिरते एक बार हिमतसर (जिला बीकानेर ) में पहुंचे सुबह को बाहर घूमने निकले तो उन्होंने जम्भोजी ( गुरु जम्भेश्वर ) के शब्दों का पाठ सुना । एक स्त्री से पूछने पर उन्हे यह मालूम हुआ कि पास में तालवा गांव है। जहा जम्भोजी ( जम्भेश्वर ) का धाम है। यहां सुबह सुबह होम (हवन) होता है । ओर साखी शब्दों का पाठ होता है ।वील्होजी ने अपने साथी वेदान्तियों को वहीं छोड़ा और वे जम्भोजी के धाम मुकाम पहुंच गए।

जम्भोजी ( सन 1451- 1536) के अन्तर्ध्यान होने के आठ वर्ष  बाद सन् 1544 में वील्होजी मुकाम आए थे । इसी समय उन्होंने ""गुरु तारि बाबा बोह दुःख सह्या सरन्य विनय तेरी करी करी करम कुफेरा"" । नामक साखी  जम्भोजी को निवेदन करते हुए गाई थी ।इससे उनकी आंखो में पुनः ज्योति आ गई मानो उनके ज्ञान चक्षु खुल गए । लोगो ने यह एक चमत्कार देखा और उन्हे बहुत आच्ंभा हुआ। उन्हे जम्भोजी की भविष्य वाणी याद आ गई। जम्भोजी द्वारा बताई गई सब बाते लोगो को वील्होजी में नजर आईं उसी समय जम्भोजी के शिष्य नथोजी ने उन्हे पाहल (दीक्षा) देकर बिश्नोई धर्म में दीक्षित कर लिया था।