श्वासनली के निचले हिस्से का संक्रमण

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निचली श्वासनली, स्वर ग्रंथि के नीचे स्थित श्वसन पथ का ही एक भाग है। इस शीर्षक, श्वसन पथ के निचले भाग का संक्रमण, का प्रयोग प्रायः निमोनिया के समानार्थक शब्द के रूप में किया जाता है, लेकिन इसका प्रयोग अन्य प्रकार के संक्रमणों के लिए भी किया जा सकता है जिसमे फेफड़ों में होने वाला फोड़ा और गंभीर श्वसन शोथ (फेफड़ों की सूजन) भी शामिल हैं। इसके लक्षणों में सांस लेने में कठिनाई, कमजोरी, तेज़ बुखार खांसी और थकावट आते हैं।

श्वसन पथ के निचले भाग का संक्रमण साधारणतया इसके ऊपरी भाग के संक्रमण से अधिक गंभीर होता है और इससे हमारे स्वास्थ्य बजट पर भी काफी दबाव पड़ता है। 1993 से श्वसन पथ के निचले भाग में होने वाले संक्रमण के कारण होने वाली मृत्युओं की संख्या में मामूली कमी आयी है। हालांकि फिर भी सन 2002 में इसका प्रतिशत संक्रमण के कारण होने वाली बिमारियों में सर्वधिक था और इस बीमारी के कारण उस वर्ष विश्व स्तर पर 3.9 मिलियन मृत्यु हुई थी और उस वर्ष हुई कुल मृत्युओं में से 6.9 प्रतिशत मौतें इसी के कारण हुई थीं।

कई तरह के घातक और दीर्घकालिक संक्रमण श्वसन पथ के निचले हिस्से को प्रभावित करते हैं। दो सर्वाधिक प्रचलित संक्रमण निमोनिया और ब्रोंकाइटिस हैं। ज़ुकाम श्वसन पथ के निचले और ऊपरी दोनों हिस्सों को प्रभावित करता है। श्वसन पथ के निचले हिस्से के संक्रमणों में एंटीबॉयटिक को प्रायः प्राथमिक उपचार माना जाता है; हालांकि वायरल (विषाणुजनित) संक्रमणों में ऐसा नहीं होता है। संक्रमण फ़ैलाने वाले जीव के आधार पर उचित एंटीबॉयटिक का चुनाव आवश्यक है और इसके लिए इन संक्रमणों की विकास की प्रकृति तथा परम्परागत उपचारों के प्रति विकसित प्रतिरोधक क्षमता के साथ साथ उपचार का तरीका भी बदलना पड़ता है। एच. इन्फ्ल्युएंज़ा (H. influenzae) और एम.कटेर्हेलिस (M. catarrhalis) समुदाय उपार्जित निमोनिया (community acquired pneumonia)(CAP) और दीर्घकालिक ब्रोंकाइटिस की घातक तीव्रता (acute exacerbation of chronic bronchitis) (AECB) के सम्बन्ध में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं जबकि एस.निमोनिया का महत्व घटता जा रहा है। असामान्य रोगाणुओं जैसे सी. निमोनिया, एम. निमोनिया और एल. निमोनिया की CAP में महत्ता भी स्पष्ट हो गयी है।

वर्गीकरण[संपादित करें]

ब्रोंकाइटिस[संपादित करें]

ब्रोंकाइटिस घातक और दीर्घकालिक दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। घातक ब्रोंकाइटिस को स्वस्थ रोगियों, जिनमे बीमारी के आवर्ती होने का कोई इतिहास न हो, में वृहद् वायु मार्ग के घातक जीवाणुजनित या विषाणुजनित संक्रमण के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। यह प्रतिवर्ष 1000 में से 40 वयस्कों को प्रभावित करता है और इसमें प्रमुख श्वासनली एवं बहुशाखित श्वसनी में अस्थायी जलन होती है। प्रायः यह विषाणु संक्रमण के कारण होता है और इसीलिए प्रतिरोध सक्षम लोगों में इसके लिए एंटीबॉयटिक उपचार नहीं किया जाता. विषाणु जनित ब्रोंकाइटिस के लिए कोई प्रभावशाली उपचार नहीं है। घातक ब्रोंकाइटिस का एंटीबॉयटिक दवाओं के द्वारा उपचार प्रचलित है लेकिन यह विवादस्पद भी है क्यूंकि इसके कारण पड़ने वाले संभावित गौण प्रभावों (मिचली और उल्टी) की तुलना में इससे होने वाले लाभ अत्यंत सामान्य है। कभी कभी तीव्र ब्रोंकाइटिस के कारण होने वाली खांसी से राहत के लिए बीटा2 पदार्थों का प्रयोग किया जाता है। हाल में हुई सुनियोजित समीक्षाओं में यह पाया गया कि इसके प्रयोग के समर्थन में कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

दीर्घकालिक ब्रोन्काइटिस की घातक तीव्रता प्रायः विषाणुजनित और असंक्रामक कारणों से होती है। 50 प्रतिशत रोगी हेमोफीलस इन्फ्ल्युएंज़ा (Haemophilus influenzae), स्ट्रैप्टोकोकस निमोनिया (Streptococcus pneumoniae) या मोरैक्सेला कटेर्हेलिस (Moraxella catarrhalis) से ग्रसित होते हैं। एंटीबॉयटिक तभी प्रभावी देखी गयी हैं जब यह तीन लक्षण दिखाई पड़ते हैं- श्वास लेने में अधिक कठिनाई का होना, अधिक बलगम आना और पीप का बनना. ऐसी अवस्थाओं में मौखिक माध्यम से 500 मिलीग्राम एमोक्सिसिलिन हर 8 घंटे पर 5 दिन तक या 100 मिलीग्राम डोक्सीसाइक्लिन मौखिक माध्यम द्वारा ही 5 दिन तक दी जानी चाहिए।

निमोनिया[संपादित करें]

निमोनिया यह कई प्रकार की परिस्थितियों में हो जाता है और उपचार भी परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है। इसे समुदाय उपार्जित या अस्पताल उपार्जित के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि रोगी को इसका संक्रमण कहां से लगा। यह अधिक उम्र के लोगों या उन लोगों के लिए जो प्रतिरोध अक्षमता से ग्रस्त हैं, जानलेवा है। इसका सबसे प्रचलित उपचार एंटीबॉयटिक दवाएं है और यह अपने विपरीत प्रभाव और कार्यसाधकता के अनुसार बदलकर प्रयोग की जाती हैं। 5 साल से कम उम्र के बच्चों में भी निमोनिया मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। निमोनिया का कारण आमतौर पर न्युमोकोकल जीवाणु होता है, स्ट्रैप्टोकोकस निमोनिया जीवाणु जनित निमोनिया के 2/3 भाग के लिए उत्तरदायी होता है। यह फेफड़ों का एक घातक संक्रमण है जिससे संक्रमित लगभग 25 प्रतिशत लोगों की मृत्यु हो जाती है। निमोनिया से पीड़ित रोगी के अत्यंत उत्तम इलाज के लिए निम्न का मूल्यांकन कर लेना बहुत ज़रूरी है;- निमोनिया की गंभीरता (जिसमे इलाज का स्थान भी शामिल है जैसे कि घर, अस्पताल या गहन संरक्षण केंद्र), संक्रमण के कारक जीव की पहचान, सीने के दर्द का अनुभव न कर पाना, अतिरिक्त आक्सीज़न की आवश्यकता, शारीरिक चिकित्सा की आवश्यकता, जलयोजन की आवश्यकता, ब्रोंकोडडाईलेटर्स (फेफड़ों तक वायु पहुंचाने वाले मार्ग को फैलाने वाली दवा) की आवश्यकता और फेफड़े में फोड़ा होने की अवस्था या फेफड़ों की असामान्य सूजन की अवस्था के कारण हो सकने वाली कठिनताओं का मूल्यांकन.

समुदाय उपार्जित संक्रमणों के लिए फ्लोरोक्वीनोलोंस का उचित प्रयोग एक उपचारात्मक विकल्प है। इन दवाओं ने सामान्य और असामान्य दोनों ही प्रकार के रोगाणुओं के विरुद्ध कृत्रिम वातावरण की गतिविधि का प्रदर्शन किया है। नयी फ्लोरोक्वीनोलोंस (जैसे, मौक्सीफ्लौक्सासिन या जेटीफ्लौक्सासिन) ने ग्राम धनात्मक गतिशीलता और प्रतिदिन एक बार दवा की खुराक लेने की शुरुआत की है और इसीलिए श्वसन पथ के निचले भाग के संक्रमण में संभाव्य प्राथमिक उपचार मानी जाती हैं। हालांकि संक्रमण के प्रभाव के सबसे अच्छ संकेत नैदानिक प्रतिक्रिया से ही मिलते हैं और मौक्सिफ्लौक्सासिन या जेटीफ्लौक्सासिन समुदाय उपार्जित निचले श्वसन पथ संक्रमण के लिए नैदानिक रूप से भी प्रभावी सिद्ध हो चुकी हैं।

उपचार[संपादित करें]

एंटीबॉयटिक का चुनाव[संपादित करें]

दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित होने के साथ, परम्परागत अनुभवजन्य उपचारों का प्रभाव कम होता जा रहा है, इसलिए यह आवश्यक है कि एंटीबॉयटिक का चुनाव पृथक जीवाणु और संवेदनशीलता परीक्षणों के आधार पर किया जाये. एंटीबॉयटिक वयस्कों में कैप (CAP) की अवस्था में एंटीबॉयटिक के प्रयोग पर कोकहरेन समीक्षा के अनुसार, आरसीटी द्वारा प्राप्त वर्तमान प्रमाण एंटीबॉयटिक चुनाव हेतु प्रमाण आधारित निर्णय करने के लिए अपर्याप्त हैं। निर्णय लेने के लिए अभी और अध्ययन की आवश्यकता होगी। CAP के उपचार के सम्बन्ध में यह पाया गया कि को-ट्रीमोक्साजोल की तुलना में अमौक्सासिलिन और प्रोकेन अधिक प्रभावशील हैं। अस्पताल के वातावरण में पेनिसिलिन और जेंटामाइसिन क्लोराम्फेनिकोल की तुलना में अधिक प्रभावकारी पायी गयीं और मौखिक माध्यम से दी जाने वाली अमौक्सिसीलिन सूई द्वारा लगायी जाने वाली पेनिसिलिन के सामान ही परिणाम दे रही थी। गंभीर निमोनिया से ग्रस्त बच्चों पर की गयी एक अन्य समीक्षा में यह पाया गया कि, मौखिक माध्यम से दी जाने वाली एंटीबॉयटिक दवाएं भी सूई के माध्यम से दी जाने वाली एंटीबॉयटिक दवाओं के सामान ही प्रभावकारी होती है और उनमे दर्द, संक्रमण या अधिक खर्च का कोई भय भी नहीं होता है। कोकहरेन की एक समीक्षा में यह दिखाया गया कि श्वसन पथ के निचले भाग के संक्रमण के उपचार में एज़िथ्रोमाइसिन, एमौक्सासिलिन या क्लैव्युलेनिक अम्ल युक्त एमौक्सासिलिन से अधिक उपयुक्त नहीं है। ऐएमएच ने एमौक्सासिलिन को AECB और समुदाय उपार्जित निमोनिया के उपचार में प्रथम श्रेणी में रखा है जबकि एज़िथ्रोमाइसिन IV को जानलेवा की प्रथम श्रेणी में रखा है। गंभीर अस्पताल उपार्जित निमोनिया में यह कैल्व्युलेनिक अम्ल के साथ IV जेंटामाइसिन और टिकार्सीलिन लेने की सलाह देता है।

गैर औषधीय उपचार[संपादित करें]

सन 2003 में श्वास संबंधी बिमारियों और विकसित देशों में शिशु को आहार खिलाने के तरीके के कारण अस्पताल में भर्ती करने के जोखिम के सम्बन्ध में एक उच्च गुणवत्ता युक्त शोध किया गया जो कि प्रकाशित भी हुआ था। इस शोध में मां का दूध पीने वाले 3,201 शिशु और मां का दूध न पीने वाले 1,324 शिशु सम्मिलित थे। इससे यह पता चला कि उन बच्चों में जो कि जन्म के पश्चात 4 माह या उससे अधिक समय तक मां का दूध पीते हैं उनमे ऊपर का दूध पीने वाले बच्चों की तुलना में कुल मिलाकर अस्पताल में भर्ती कराने सम्बन्धी जोखिम 72 प्रतिशत तक कम रहता है। अतः शिशु को 4 माह या उससे अधिक समय तक विशेष रूप से मां का दूध पिलाने का सम्बन्ध श्वसन पथ के निचले भाग के संक्रमण और अस्पताल में भर्ती कराने के जोखिम को कम करने से हुआ है।

कई वर्षों तक गैर औषधीय उपचारों का मुख्य आधार अधिक मात्रा में तरल पदार्थों का सेवन और आराम करना रहा है। हालांकि चिकित्सकों और अन्य स्वास्थ्य व्यवसायियों के लिए अधिक तरल पदार्थों के सेवन की सलाह एक साधारण बात है किन्तु कोकहेरन की सुनियोजित समीक्षा में अधिक मात्रा में तरल पदार्थों के सेवन के पक्ष व् विपक्ष दोनों ही सम्बन्ध में कोई प्रमाण नहीं मिले। हालांकि बुखार व् ज़ल्दी ज़ल्दी श्वास चलने के कारण होने वाली द्रव क्षति को तरल पदार्थों के माध्यम से पूरा करने का विचार उत्तम था, किन्तु कुछ प्रेक्षण संबंधी अध्ययनों में रक्त में उपस्थित सोडियम सांद्रता के तरलीकरण के हानिकर मामले देखे गए जो कि आगे चलकर सरदर्द, भ्रम और संभवतः दौरों का कारण बन सकते थे। आराम करने से शरीर को संकरण से लड़ने के लिए ऊर्जा एकत्रित करने का अवसर मिलेगा. कुछ विशेष प्रकार के निमोनिया में शारीरिक चिकित्सा की सलाह दी जाती है और इसे आवश्यकतानुसार प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

पूरक चिकित्साएं[संपादित करें]

मौखिक माध्यम से चिकवीड (एक प्रकार की वनस्पति) का सेवन कई वर्षों से ब्रोंकाइटिस के कारण होने वाले बुखार और कफ को कम करने के लिए किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह एक कफनिवारक का काम करता है और हालांकि इसके अनेकों घटकों की औषधीय क्रिया द्वारा भी यही संकेत मिलते हैं कि यह लाभप्रद हो सकती है, फिर भी इसके प्रभाव का समर्थन करने के लिए कोई प्रेक्षणीय अध्ययन उपलब्ध नहीं है।

गंभीर ब्रोंकाइटिस के उपचार में प्रयोग की जाने वाली चीनी जड़ी-बूटियों की एक सुनियोजित समीक्षा में यह पाया गया कि उनके प्रयोग के समर्थन में जो प्रमाण हैं वह अत्यंत क्षीण हैं, लेकिन उनके प्रयोग की सलाह देने के लिए उपलब्ध आंकड़े पर्याप्त गुणवत्ता वाले नहीं थे। जो लाभ पाया गया वह अध्ययन की रूपरेखा और प्रकाशन के पक्षपात के कारण भी हो सकता है। इसलिए इनका प्रयोग सावधानीपूर्वक ही किया जाना चाहिए क्यूंकि यह सुरक्षित हैं या नहीं यह अधिकतर अज्ञात है।

ब्रोंकाइटिस के उपचार में अजवायन का प्रयोग कमीशन E द्वारा अनुमोदित है और गंभीर ब्रोंकाइटिस के मामले में अन्य जड़ी-बूटियों के साथ इसके प्रयोग के सम्बन्ध में प्राप्त आंकड़े भी प्रोत्साहित करने वाले हैं।

साधारणतया यह माना जाता है कि विटामिन सी का प्रयोग ज़ुकाम और श्वसन संबंधी अन्य संक्रमणों को कम करने के लिए किया जाता है। हालांकि एक हालिया कोकहेरन समीक्षा के अनुसार जन समुदाय में निमोनिया को रोकने के लिए एक रोगनिरोधक के रूप में इसके व्यापक प्रयोग का समर्थन करने के लिए उपलब्ध प्रमाण अत्यंत क्षीण हैं। कम लागत व् कम जोखिम के कारण इसका ऐसे रोगियों के लिए इसका प्रयोग उचित हो सकता है जो अधिक जोखिम की अवस्था में हैं और जिनके विटामिन सी का प्लाज्मा स्तर कम है। एक वैकल्पिक एंटीबॉयटिक के रूप में विटामिन सी का प्रयोग सर्वाधिक प्रभावशाली होता है जब इसकी खुराक एक समय सारिणी के अनुसार ली जाये.

खसरा के साथ होने वाले श्वसन संक्रमण की गंभीरता और इससे होने वाली मृत्युओं को कम करने में विटामिन ए का प्रयोग सफलता पूर्वक किया गया है। हालांकि की गैर खसरा वाले निमोनिया की एक समीक्षा के दौरान इसके अच्छे व् बुरे दोनों ही प्रभाव नहीं पाए गए।

निवासी अरोग्यसधाकों द्वारा कई हज़ार वर्षों से लहसुन, जिसमे कि एलीसिन होता है, का प्रयोग एक शक्तिशाली फंगसरोधी और एंटीबॉयटिक पदार्थ के रूप में किया जा रहा है। निवासी अमेरिकी जनजाति के लोग लहसुन का प्रयोग खांसी और कंठ रोग के उपचार में करते हैं। ब्रिटेनवासी जड़ी-बूटी विशेषज्ञ लहसुन का प्रयोग खांसी और कर्कशता के उपचार में करते हैं। लुई पाश्चर ने लहसुन के जीवाणु रोधी गुणों का अध्ययन किया। दोनों विश्व युद्धों के दौरान, एलियम सैटिवम का प्रयोग एक रोगाणु रोधक के रूप में किया गया।

निमोनिया के उपचार के लिए बाइकल स्कल्कैप भी एक उपचार के बाद पाइपेरासिलिन के सामान ही प्रभावकारी सिद्ध हुई। पाइपेरासिलिन समूह में 30 में से 4 रोगियों को फंगस संक्रमण हो गया जबकि बाइकल स्कल्कैप समूह में किसी को ऐसा नहीं हुआ।

== जनपदिक रोग विज्ञान (एपिडेमियोलॉजी)==

2002 में, प्रति 100,000 श्वसन संक्रमण के जीवन वर्ष के लिए निवासियों को विकलांगता से समायोजित किया गया[1][52][53][54][55][56][57][58][59][60][61][62][63][64]

== अनुसंधान

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यह संभावित है कि भविष्य में निचले श्वसन पथ के संक्रमण का उपचार नयी एंटीबॉयटिक दवाओं से होगा जो एंटीबॉयटिक दवाओं के प्रति विकसित होने वाले प्रतिरोध के स्थायी उद्भव से जुडी समस्याओं का सामना करेंगी। किसी भी दावा के प्रति इतनी ज़ल्दी प्रतिरोध विकसित हो जाने के कारण भविष्य के उपचारों में इन संक्रमणों को रोकने के लिए टीकों का प्रयोग भी किया जा सकता है। हालांकि कोकहेरन की एक पॉलीसैक्राइड न्युमोकल टीके की समीक्षा में यह पाया गया कि इससे वयस्कों में निमोनिया के कारण होने वाली मृत्यु या निमोनिया के होने में कोई कमी नहीं आयी, लेकिन यह अधिक उम्र के लोगों में होने वाली न्युमोकल बिमारियों जैसे विशिष्ट नतीजों को कम करने में सक्षम था। इसलिए ऐसी आशा की जा रही है कि आगे और विकास होने पर यह निमोनिया के प्रतिरोध में और प्रभावकारी हो जायेंगी.

ऐसा माना जाता है कि एचब से ग्रसित रोगियों का शरद ऋतु में किया गया टीकाकरण बीमारी की गंभीरता को कम करने और इसकी तीव्रता कि संख्याओं को घटाने में जाड़े की अपेक्षा अधिक सकारात्मक परिणाम देता है। इस समीक्षा में जिस मौखिक टीके के बारे में बताया गया है वह वाहक यां गैर चिन्हित हेमोफिलस इन्फल्युएंज़े को घटाने में सक्षम थी जो कि दीर्घकालिक ब्रोन्काइटिस की तीव्रता का सामान्य कारण है। अच्छे से बनाई गयी योजना और आगे के शोध के द्वारा इस प्रकार के टीके श्वसन पथ के निचले भाग के संक्रमण से संबंधित समस्या को कम कर सकते हैं।

ब्रोंकाइटिस और निमोनिया के विषाणुजनित रूपों के लिए भी कुछ उपचार उपलब्ध हैं। श्वसन संबंधी सिंक्शियल विषाणु (RSV) जो बच्चों में विषाणु जनित निमोनिया व् ब्रोंकाइटिस का प्रमुख कारण होता है, उसका एक सशक्त उपचार नये मोनोक्लोनल प्रतिजीवी (mAb) मोटेविज़ुमेब द्वारा किया जा सकता है। जानवरों पर किये गए परीक्षणों में इसने प्रतीजीवियों की संख्या को, इस अवस्था का उपचार करने वाली वर्तमान में एक मात्र उपलब्ध दवा, की तुलना में 100 और कम कर दिया। इससे भविष्य में एलआरटीआइ (LRTI) का उपचार उज्जवल दिखाई पड़ता है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. [51]