श्रेणी:छंद

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छप्पय छंद कैसे लिखे

हिंदी साहित्य जगत में छंदों का विशेष महत्व है । छंदों से साहित्य को पूर्ण माना जाता है । छंद विधा में.कवि अपनी रचना को एख सजी सँवरी स्त्री की भाँति पेश करता है , रस छंद अलंकार से सजी काव्य की सौदर्यं दो गुना हो जाती है । कवि नपे तुले सार्थक शब्दों और नियमों  से आबद्ध काव्य पाठक के मन में गहरी छाप छोड़ने में सक्षम होता है । प्राचीन काल में लिखे गये ग्रंथों में राम चरित्र मानस (तुलसी दास कृत) , पंचवटी , साकेत( मैथलीशरण गुप्त) , ।  इन छंदों की मात्रा भार एवं वर्ण के आधार पर विभिन्न भागों में बाटा जाता है । उनसे से छप्पय छंद भी एक है । https://www.sahitydrshan.com/2021/05/Chhappay-chhand-kaise-likhe.htmlके बारे में बताने जा रहे है । इस छंद को जानने से पहले आइए छंद किसे कहते हैं ? -

छंद किसे कहते हैं : छंद शब्द ‘ चद ‘ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है – खुश करना । हिंदी साहित्य के अनुसार अक्षर, अक्षरों की संख्या, मात्रा, गणना, यति, गति से संबंधित किसी विषय पर रचना को छंद कहा जाता है । अर्थात  छंद में निश्चित चरण, उनकी लय, गति, वर्ण, मात्रा, यति, तुक, गण से नियोजित पद्य रचना को छंद कहते हैं।

छप्पय छंद  एक हिन्दी साहित्य की विधा है इसे कैसे लिखे,  इसका विधान क्या है आइए जानते हैं-

छप्पय छंद बहुत ही प्राचीन छंद है

आ.नाभादास जी ने अपने ग्रंथ "भक्तमाल " में इसका सर्वप्रथम प्रयोग किया और उन्ही के अनुसार लघु, दीर्घ वर्णों के यह छंद 71 प्रकार का होता है यह रोला और उल्लाला दो छंदों से मिलकर बनाता है -

विधान -

छप्पय छंद = रोला छंद+ उल्लाला छंद

प्रारंभ की चार पंक्तियाँ रोला होती है 11,13 मात्रा पर

रोला के विषम चरण का कल संयोजन- 4421या 33221

सम चरणों का कल संयोजन- 3244

बाकी दो पंक्तियाँ  उल्लाला होती है 13,13 या 15,13 मात्रा पर

उल्लाला के विषम चरणों का कल संयोजन- 44 212या 332 212 या 244 212 / 233212

सम चरणों का कल संयोजन- 44212 या 332212

क्रमागत दो दो पद में तुकान्त ।

उदाहरण अवलोकनार्थ👇

ज्ञान दायिनी ज्योति , गिरी दुर्गा गायत्री ।

सर्व व्यापिनी मातु , नमः हे माँ स्वर दात्री ।।

मातु शारदा शुभ्र , विमल भावों की देवी ।

सकल चराचर जीव , परम पद वंदन सेवी ।।

जड़ चेतन में संगीत की , देती शक्ति सरस्वती ।

माँ स्वरागिनी पद्मासना , ज्ञान दान दे भारती ।।

वंदन बारंबार , करूँ मैं वीणापाणी ।

दे दो माँ वरदान , मधुर हो मेरी वाणी ।।

ज्ञान दायिनी मातु , ज्ञान का भर  दो गागर ।

मैं हूँ बूँद समान , आप करुणा की सागर ।।

निस दिन मैं पूजन करूँ , करना उर में वास माँ ।

माँगू कृपा प्रसाद मैं , देना नव उल्लास माँ ।।

जीवन तुझ पर वार , बनूँ माता आराधक ।

तपो भूमि संसार , काव्य की मैं हूँ साधक ।।

सेवक की है चाह  , बनूँ तेरी पूजारन ।

रचूँ नवल साहित्य , तुम्हारी बनकर चारन ।।

धारदार हो लेखनी , मिले प्रेरणा आपकी ।

दे पाऊँ उपहार मैं , काव्य कुंज की पालकी ।।

सुकमोती चौहान "रुचि"

बिछिया , महासमुन्द , छ.ग.

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