श्रेणी:अल्पसंख्यक अधिकार

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अल्पसंख्यक की परिभाषा ‘अल्पसंख्यक’ शब्द भारतीय राजनीति का तेज रफ्तार गतिशील सिक्का है. अल्पसंख्या का अर्थ तुलनात्मक है.

इस लिहाज से अल्पसंख्या वाले लोग अल्पसंख्यक हो सकते हैं. लेकिन यह संख्या देखने का आधार क्या होगा? क्या यह तुलना गरीबों और अमीरों के बीच है, तब अमीर अल्पसंख्यक होंगे और गरीब बहुसंख्यक. क्या जातियों के बीच ऐसी तुलना हो सकती है, तब कुम्हार, गड़रिया, भुर्जी, बढ़ई आदि जातियां अल्पसंख्यक होंगी. तो क्या यह तुलना पंथिक आस्था के लोगों के बीच है तब पारसी और ईसाई अल्पसंख्यक होंगे.

‘अल्प’ से बड़ा भ्रम पैदा होता है. भारतीय जनतंत्र में 51 को बहुमत कहते हैं और 49 को अल्पमत. लेकिन संसदीय बहुमत बदला करता है, अल्पमत वाले समूह जनसमर्थन पाकर बहुमत बन जाते हैं. लेकिन राजनीति में अल्पसंख्यक का सीधा मतलब मुसलमान हो गया है. 26 मई 1949 को भारत की संविधान सभा में अल्पसंख्यक आरक्षण पर दिलचस्प बहस हुई थी. अनुसूचित जातियों को आरक्षण देने के प्रश्न पर आम राय थी. लेकिन अल्पसंख्यक आरक्षण पर विचार-विमर्श जारी था. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने साफ किया कि पंथ/आस्था/मजहब/धर्म आधारित आरक्षण गलत है. तब तक अल्पसंख्यक का मतलब मुसलमान हो चुका था.

बिहार के वरिष्ठ नेता और संविधान सभा के सदस्य तजम्मुल हुसैन ने जोर देकर कहा हम अल्पसंख्यक नहीं हैं. अल्पसंख्यक शब्द अंग्रेजों का निकाला हुआ है. अंग्रेज यहां से चले गए. अब इस शब्द को डिक्शनरी से हटा दीजिए. अब हिन्दुस्तान में कोई अल्पसंख्यक वर्ग नहीं रह गया है... हुसैन के भाषण के इस अंश पर सभा में ‘खूब-खूब’ की आवाजें उठीं. संविधान सभा की कार्यवाही में यह बात भी कोष्ठक में दर्ज है.

संविधान का एक पूरा अनुच्छेद 366 परिभाषाओं का है. इसके 30 उपखंड हैं. यहां पेंशन, रेल, सर्वोच्च न्यायालय जैसे जगजाहिर शब्दों की परिभाषा है लेकिन ‘अल्पसंख्यक’ की परिभाषा नहीं है. अनुच्छेद 29 का शीषर्क है - अल्पसंख्यक वगरे के हितों का संरक्षण. यहां कहा गया है कि भारत के किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा. इससे भी अल्पसंख्यक की परिभाषा नहीं निकलती. संविधान निर्माताओं को अल्पसंख्यक आयोग गठन की जरूरत नहीं महसूस हुई. राजनीति को इसकी जरूरत थी, सो सरकार ने 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का कानून पारित करवाया.

इस कानून में भी अल्पसंख्यक की मजेदार परिभाषा है- अल्पसंख्यक वह समुदाय है जो केंद्रीय सरकार अधिसूचित करे. अर्थात अल्पसंख्यक घोषित करने का अधिकार सरकार ने खुद अपने हाथ में ले लिया. किसी जाति समूह को अनुसूचित जाति या जनजाति घोषित करने की विधि (अनु. 341 व 342) बड़ी जटिल है. यह काम संसद ही कर सकती है लेकिन अल्पसंख्यक घोषित करने का काम सरकारी दफ्तर से ही होने का प्रावधान है.

संविधान, कानून और राजनीति के विद्यार्थी के लिए अल्पसंख्यक की परिभाषा दूर की कौड़ी है. राजनीति वोट बैंक बनाती है. ठीक करती है. हरेक राजनीतिक दल को अपनी विचारधारा के अनुसार अपने समर्थक बढ़ाने का अधिकार है. लेकिन पंथ या मजहब आधारित किसी आस्था समूह को राजकोष से अलग सुविधाएं देना ‘सेकुलर’ सिद्धांत का उल्लंघन है. पं. नेहरू ने इसी आधार पर पंथ आधारित आरक्षण का प्रस्ताव खारिज किया था. इंदिरा गांधी ने आपातकाल में संविधान की उद्देशिका में सेकुलर शब्द जोड़ने वाला संशोधन करवाया था.

‘सेकुलर’ विचार राष्ट्र-राज्यों को पंथिक आस्था के आधार पर भेदभाव की इजाजत नहीं देता. लेकिन राजनीति ने अल्पसंख्यक का अर्थ 20 करोड़ वाले विशाल मुस्लिम जनसमुदाय में परिवर्तित किया है और सेकुलर का अर्थ मजहबवादी कर दिया है. यहां न अल्पसंख्यक की वैधानिक परिभाषा है और न ही सेकुलर की. सिर्फ चुनावी जीत में ही सारी परिभाषाएं अंतर्निहित हैं. लेकिन राष्ट्र के लिए यह शुभ नहीं.

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