श्री हिन्दी साहित्य समिति, भरतपुर

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श्री हिन्दी साहित्य समिति, भरतपुर की स्थापना सन १९१२ में हुई थी। प्रथम अध्यक्ष ओंकार सिंह परमार व प्रथम मंत्री अधिकारी जगन्नाथ दास विद्यारत्न निर्वाचित हुए।

संस्था के उद्देश्य[संपादित करें]

श्री हिंदी साहित्य समिति, भरतपुर की स्थापना हिंदी भाषा एवं देवनागरी लिपि के उन्नयन, हिंदी साहित्य एवं भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं विकास तथा हिंदी के प्राचीन ग्रंथो की खोजकर उन्हें संग्रहित करने तथा उन्हें सुरक्षित रखने के प्रमुख उद्देश्य से की गई। इन उद्देश्यो को दृष्टिगत रखते हुए समिति अपने जन्म के प्रारंभ से ही एक पुस्तकालय तथा एक वाचनालय का नियमित संचालन कर रही है।

इतिहास[संपादित करें]

भारतवर्ष के इतिहास में भरतपुर का नाम महाराजा सूरजमल एवं महाराजा जवाहर सिंह जैसे दुर्जेय वीरो के लिए ही नही अपितु सोमनाथ एवं सूदन जैसे उच्चकोटि के कवियों के लिए भी चिरचर्चित रहा है। भरतपुर का दुर्जेय दुर्ग, जहाँ पर लार्डलेक की सेना को चार बार पराजय का मुख देखना पड़ा, अजेय लोहागढ़ के नाम से सुविख्यात है। अंग्रेजों के साथ भीषण युद्ध में अपनी अप्रतिम वीरता प्रदर्शित करने के कारण ही भरतपुर में यह उक्ति विख्यात हो गई –

आठ फिरंगी नौ गोरा।
लडें जाट के दो छोरा।

ऐसा वीरभाव सम्पन्न भरतपुर राजस्थान राज्य के ३३ जिलों में से एक है। यह राजस्थान का 'पूर्वी सिंहद्वार' कहलाता है। यही पर श्रावण शुक्ला १ संवत १९६९, १३ अगस्त १९१२ को श्री हिंदी साहित्य समिति भरतपुर की स्थापना हुई। इसके प्रथम अध्यक्ष श्री ओंकार सिंह परमार तथा प्रथम मंत्री श्री अधिकारी जगन्नाथ दास विद्यारत्न निर्वाचित हुए।

तब से अब तक हुए आयोजनों में देश की अनेक विभूतियां समिति आईं। इनमें सरोजनी नायडू, कवि रविन्द्र नाथ टैगोर, मदन मोहन मालवीय, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, मोरारजी देसाई, जयप्रकाश नारायण, हरिभाऊ उपाध्याय, जैनेंद्र कुमार, मुराई नोविस्ता जापान, अली अहमद नाटककार पाकिस्तान, सेठ गोविंददास, सत्य भक्त, कमलारत्नम, वियोगी हरि, काका कालेलकर, रूस के हिन्दी विद्वान डॉ॰ बारान्निकोब, डॉ॰ सम्पूर्णानंद, मोहनलाल सुखाडिय़ा, हरिवंशराय बच्चन, डॉ॰ राममनोहर लोहिया आदि। इसके अलावा समिति को सुविख्यात दार्शनिक डॉ॰ रामानंद तिवारी, डॉ॰ गुरुदत्त सोलंकी और डॉ॰ रामगोपाल शर्मा आदि का सानिध्य प्राप्त रहा।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]