श्री चक्र

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
श्री चक्र
श्री चक्र की ज्यामितीय संरचना

श्री चक्र एक यन्त्र है जिसका प्रयोग श्री विद्या में होता है। इसे 'श्री यंत्र', 'नव चक्र' और 'महामेरु' भी कहते हैं। यह सभी यंत्रो में शिरोमणि है और इसे 'यंत्रराज' कहा जाता है। वस्तुतः यह एक एक जटिल ज्यामितीय आकृति है। इस यंत्र की अधिष्ठात्री देवी भगवती त्रिपुर सुंदरी जो वैदिक मैं श्रीदेवी मतलब महालक्ष्मी हैं। श्री यंत्र की स्थापना और पूजा से हर सिद्धि की प्राप्ति होती है।

श्री यंत्र के केन्द्र में एक बिंदु है। इस बिंदु के चारों ओर 9 अंतर्ग्रथित त्रिभुज हैं जो नवशक्ति के प्रतीक हैं। इन नौ त्रिभुजों के अन्तःग्रथित होने से कुल ४३ लघु त्रिभुज बनते है

श्री विद्या के यंत्र को ‘श्रीयंत्र’ या ‘श्रीचक्र’ कहते हैं। ‘श्रीयंत्र’ भगवती त्रिपुर सुंदरी का यंत्र है। श्रीयंत्र को यंत्रराज, यंत्र शिरोमणि, षोडशी यंत्र व देवद्वार भी कहा गया है। श्रीयंत्र में देवी लक्ष्मी का वास माना जाता है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा विकास का प्रतीक होने के साथ मानव शरीर का भी द्योतक है। श्री शब्द का अर्थ लक्ष्मी, सरस्वती, शोभा, संपदा, विभूति से किया जाता है। यह यंत्र श्री विद्या से संबंध रखता है। श्री विद्या का अर्थ साधक को लक्ष्मी़, संपदा, विद्या आदि हर प्रकार की ‘श्री’ देने वाली विद्या को कहा जाता है।

श्री चक्र पराशक्ति का ब्रह्मांडीय उत्सर्जन है और पृथ्वी उनके उत्सर्जन में से एक है। दूसरे शब्दों में, श्री चक्र पराशक्ति का लौकिक रूप है। ऐसा कहा जाता है कि श्री चक्र में शिव और शक्ति दोनों की उपस्थिति का एहसास होना चाहिए। इसमें पाँच त्रिभुज होते हैं जो नीचे की ओर होते हैं (योनि से मिलते-जुलते हैं) और चार त्रिभुज ऊपर की ओर होते हैं। पांच अधोमुखी त्रिभुज स्त्री पहलू हैं और चार ऊपर की ओर मुख वाले त्रिकोण पुरुष पहलू हैं।

पांच अधोमुखी त्रिभुज रचनात्मक ऊर्जा के रूप में जाने जाते हैं और चार उर्ध्वमुखी त्रिभुज अग्नि ऊर्जा कहलाते हैं जो विनाश करने में सक्षम हैं।

माना गया है कि श्रीयंत्र की दक्षिणाम्नाय उपासना करने वाले व्यक्ति को भोग की प्राप्ति होती है और ऊर्ध्वाम्नाय उपासना करने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसलिए कहा जा सकता है कि यह श्रीयंत्र मोक्ष तथा मुक्ति के लिए भी लाभ प्रदान करता है.

श्रीयंत्र का उल्लेख तंत्रराज, योगिनी हृदय, ललिता सहस्रनाम, कामकला विलास, त्रिपुरोपनिषद आदि विभिन्न प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। महापुराणों में श्री यंत्र को देवी महालक्ष्मी का प्रतीक कहा गया है। महालक्ष्मी स्वयं कहती हैं – ‘श्री यंत्र मेरा प्राण, मेरी शक्ति, मेरी आत्मा तथा मेरा स्वरूप है। श्री यंत्र के प्रभाव से ही मैं पृथ्वी लोक पर वास करती हूं।’

मान्यता है कि भोजपत्र की अपेक्षा तांबे पर बने श्रीयंत्र का फल सौ गुना, चांदी में लाख गुना और सोने पर निर्मित श्रीयंत्र का फल करोड़ गुना होता है। ‘रत्नसागर’ में रत्नों पर भी श्रीयंत्र बनाने की बात लिखी गई है। इनमें स्फटिक पर बने श्रीयंत्र को सबसे अच्छा बताया गया है। विद्वानों की ऐसी धारणा है कि भोजपत्र पर 6 वर्ष तक, तांबे पर 12 वर्ष तक, चांदी में 20 वर्ष तक और सोना धातु में श्रीयंत्र आजीवन प्रभावी रहता है। केसर की स्याही से अनार की कलम द्वारा भोजपत्र पर श्रीयंत्र बनाया जाना चाहिए। धातु पर निर्मित श्रीयंत्र की रेखाएं यदि खोदकर बनाई गई हों और गहरी हों, तो उनमें चंदन, कुमकुम आदि भरकर पूजन करना चाहिए।

श्री यंत्र का निर्माण सिद्ध मुहूर्त में ही किया जाता है। गुरुपुष्य योग, रविपुष्य योग, नवरात्रि, धन-त्रयोदशी, दीपावली, शिवरात्रि, अक्षय तृतीया आदि श्रीयंत्र निर्माण और स्थापन के श्रेष्ठ मुहूर्त हैं। अपने घर में किसी भी श्रेष्ठ मुहूर्त में श्रीयंत्र को स्थापित किया जा सकता है। ‘ तंत्र समुच्चय’ के अनुसार किसी भी बुधवार को प्रातः श्रीयंत्र को स्थापित किया जा सकता है। श्रीयंत्र निर्माण की जटिल प्रक्रिया से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि आप जब भी घर में श्रीयंत्र स्थापित करें तो प्राण प्रतिष्ठित श्रीयंत्र ही स्थापित करें।

श्रीयंत्र का मूल मंत्र:- ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः

श्री चक्र स्थापित मन्दिर[संपादित करें]

श्री विंध्यवासिनी क्षेत्र में अष्टभुजा के मंदिर के पास भैरव कुंड नामक स्थान है। यहां एक खंडहर में विशादकार श्रीयंत्र रखा हुआ है।

एक अन्य श्रीयंत्र फर्रुखाबाद जनपद के तिरवा नामक स्थान पर है। वहां एक विशाल मंदिर है, जिसे माता अन्नपूर्णा का मंदिर कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वह त्रिपुरा का मंदिर है। यहां एक ऊंचे से चबूतरे पर संगमरमर पत्थर पर बहुत बड़ा श्रीयंत्र बना हुआ है और उसके केंद्र बिंदु पर पाशाकुंश एंव धनुर्बाण से युक्त भगवती की बहुत ही सुंदर चतुर्भुजी प्रतिमा है। इस मंदिर का निर्माण राजा तिरवा ने लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व किसी तांत्रिक महात्मा के निर्देशानुसार कराया था। यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक है।

इसी प्रकार महराष्ट्र में मोखी नगर में भगवती का विशाल मंदिर है, जहां बहुत ही सुंदर श्रीयंत्र बना हुआ है। इस मंदिर को कामेश्वराश्रम के नाम से जाना जाता है।

जबलपुर के पास जगद गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने सुरम्य वनाच्छादित प्रदेश में परमहंसी गंगा आश्रम की स्थापना की थी उसके गर्भ गृह में भगवती राजराजेश्वरी त्रिपुरसुंदरी की पांच फुट ऊंची दिव्य एवं मनोहर प्रतिमा है। जो मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले मे झोतेश्वर नामक स्थान पर है।

उत्तराखण्ड के कुमाऊ रीजन मे मुक्तेश्वर के पास डोल आश्रम कल्याण दास बाबा अमरकण्टक वालो का.

इनके अतिरिक्त कुछ अन्य सुरम्य स्थलों पर भी भगवती त्रिपुरसुंदरी के पीठ स्थापित हैं, जिनमें वाराणसी मे केदारघाट पर श्रीविद्या मठ, पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में कोन्नगर स्थान पर राजराजेश्वरी सेवा मठ, मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में मोहनगढ़ में राजराजेश्वरी मंदिर, कोलकाता के श्रीरामपुर में श्रीमाता कामकामेश्वरी मंदिर और जनपद मेरठ के सम्राट पैलेस स्थान पर भगवती राजराजेश्वरी मंदिर प्रमुख हैं।

यहॉ भी है शक्तिपीठो मे स्थापित श्रीचक्र-

  • कलिकम्बल मंदिर, चेन्नै
  • कामाक्षी मंदिर, मंगदु, चेन्नै
  • श्री काली मंदिर, जयपुर
  • निमिशम्बा मंदिर, श्रीरंगपत्तन, मैसूर
  • माँ हरसिद्धि शक्ति पीठ (उज्जैन)

श्री यंत्र एक श्री नगर / शहर[संपादित करें]

मॉ ललिताम्बा के 57वें नाम (चिन्तामणीगृहन्तस्था) मे दिव्य नगरी श्री नगर का वर्णन अपने पूरे वैभव के साथ वर्णित है। दिव्य शहर की उत्पत्ति का वर्णन दो अलग-अलग ग्रंथों से मिलता है। एक दुर्वासा के ललितास्तवरत्न में है, जिसमें कहा गया है कि श्री नगर का निर्माण खगोलीय वास्तुकार विश्वकर्मा द्वारा किया गया हैा

दूसरा, रुद्र यमला ग्रंथ में (जिसमे भगवान शिव मॉ पार्वती को बताते है) वर्णन है कि श्री नगर, क्षीर सागर के मध्य रत्नद्वीप नामक एक द्वीप के रूप में है। यह विवरण 61वें नाम "सुधा सागर मध्यस्था" से सिद्ध होता है, जो देवी को अमृत के सागर के बीच में रहने के रूप में वर्णित करता है।

श्री नगर पच्चीस (२५) दीवारों से घिरा हुआ है, प्रत्येक दीवार एक तत्व का प्रतिनिधित्व करती है। श्री नगर के चारों ओर 25 गलियां हैं, जो विभिन्न तत्वों, रत्नों और कीमती पत्थरों से बनी हैं। आठवीं (८वीं) गली में मन्त्रिणी (मातंगी) की देखरेख में कदंब वृक्षो का वन है। पंद्रहवीं (१५वीं) गली मे आठ दिशाओ के रक्षक देवताओं का निवास है। सोलहवें (१६वें) में वाराही (दण्डिनी) रहती है जो भांडासुर के साथ युद्ध संग्राम में मॉ ललिता की सेनापति थी। सत्रहवीं (१७वीं) गली में विभिन्न योगिनियाँ निवास करती हैं। अठारहवीं (१८वीं) गली में महाविष्णु निवास करते हैं। उन्नीसवीं (१९वीं) गली में ईशाना, बीसवें (२०वीं) में तारा देवी, इक्कीसवें (२१वीं) में वारुणी, बाईसवीं (२२वीं) गली में कुरुकुल्ला, जो कि महान दुर्ग की अधिपति हैं, तेईसवें (२३वीं) गली में मार्तंड भैरव, चौबीसवें (२४वें) में चन्द्रमा विराजमान हैं, और पच्चीसवें (२५वीं) गली मे मन्मथ (कामदेव) प्रेम वन की देखरेख करते हैं।

श्री नगर के केंद्र में महापद्माटवी (59th name) यानि महान कमल पुष्पो का पोखर वन है, और इसके अन्दर चिंतामणि गृह (57th name), चिंतामणि से निर्मित एक महल है, जो मनोकामना पूर्ण करने वाला रत्न है। कहा जाता है कि यह महल श्री नगर के उत्तर की ओर स्थित हैा इसके उत्तर पूर्व में चिदग्नि कुंड है और इसके पूर्वी द्वार के दोनों ओर मन्त्रिणी और दण्डिनी के घर हैं। इसके चार द्वारों पर चदुरमन्य देवता पहरेदारी और रखवाली के लिए खड़े हैं। श्री चक्र के केंद्र में पंचब्रह्मा (58th name) के सिंहासन पर बिंदुपीठ (380th name) पर महात्रिपुर सुंदरी मॉ विराजमान है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]