श्रीराघवेंद्रचरितम्

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परिचय[संपादित करें]

राघवेंद्र चरित 【श्री राघवेंद्र चरितम्】 संस्कृत में लिखा गया एक विशाल महाकाव्य है। इसमें गद्य और पद्य का समावेश है तथा यह सभी प्रमुख रामायणों की कथावस्तु पर आधारित है। इसकी रचना संस्कृत के विद्वान् एवं साधक विद्यामार्तण्ड महामहिम श्रीभागवतानंद गुरु ने की है। इसमें बीस से अधिक सर्वमान्य प्रामाणिक रामायणों की अद्भुत एवं दिव्य कथानकों का समावेश है। ग्रन्थ के प्रथम अध्याय से यह जानकारी मिलती है कि श्रीभागवतानंद गुरु को समाधि की अवस्था में भी श्रीराम सम्बन्धी इतिहास की अनेक घटनाओं का दर्शन हुआ जो किसी अन्य ग्रन्थ में नहीं पाए जाते हैं। उन घटनाओं का वर्णन भी श्रीराघवेंद्रचरितम् में प्राप्त होता है।

इतिहास[संपादित करें]

कहा जाता है कि बिहार के उमगा पहाड़ पर तपस्या में लीन श्रीभागवतानंद गुरु को स्वप्न में इसकी रचना करके की प्रेरणा भगवान् शिव ने दी। उस समय उनकी उम्र बीस वर्ष की थी। इस ग्रंथ के कुछ भाग उमगा पहाड़, कामाख्या , अमरकंटक , एवं झारखंड के आंजन पर्वत एवं टांगीनाथ धाम में लिखे गए।

इस महाकाव्य में आधुनिक भारतीय समाज की चुनौतियों, हिन्दू धर्म में वैदिक, पौराणिक एवं स्मार्त प्रारूप, नियम एवं उद्देश्यों के साथ साथ राजनैतिक, धार्मिक एवं सामाजिक संरचना की समालोचना भी प्राप्त होती है। हिन्दू धर्म के ज्ञान विज्ञान का वर्णन करने वाला ये ग्रंथ श्रीराम कथानक को एक बहुत ही भिन्न और प्रभावी शैली में वर्णित करता है। सनातन धर्म से सम्बन्धित मुद्दों एवं विवादित विषयों को भी इस ग्रंथ में संवादात्मक प्रारूप से शास्त्रपक्ष के साथ बताया गया है।

आकार[संपादित करें]

यह महाभारत के बाद सम्भवतः संस्कृत साहित्य का दूसरा सबसे बड़ा इतिहास ग्रन्थ है। इसके पहले अध्याय के अनुसार इसका कलेवर निम्न प्रकार है।

त्रिंशत्सहस्रश्लोकानि सर्गाश्चार्धसहस्रकाः।
क्वचिद्गद्यांशसम्मिश्रम् दशकाण्डै: समावृतम् ॥

इस महाकाव्य में तीस हजार श्लोक, पांच सौ अध्याय एवं गद्य पद्य मिश्रित रूप से दश कांडों में कथा का वर्णन किया गया है। प्रसिद्ध राम तांडव स्तोत्र इसी ग्रन्थ में वर्णित है। इसमें अनुष्टुप्, मालिनी, वसंततिलका, शार्दूलविक्रीड़ित, प्रमाणिका, उपजाति, इन्द्रवज्रा, स्रग्धरा, शिखरिणी, भुजंगप्रयात, इंदिरा, आदि छंदों का प्रयोग हुआ है।

इस ग्रंथ में वाल्मीकीय आर्ष, अद्भुत, अध्यात्म, आनंद, मन्त्र, भुशुण्डि, योगवाशिष्ठ, कम्ब, कृत्तिवास एवं तुलसीदास की रामायणों का सार है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]