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शौचालय नहीं तो दुल्हन नहीं

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हरियाणा में शादी की उम्र वाले पुरुषों के बीच शौचालय के मालिकाना हक में बदलाव उन इलाकों में काफी ज़्यादा था, जहां शादी की उम्र वाली महिलाएं कम थीं।

“शौचालय नहीं, दुल्हन नहीं” हरियाणा सरकार का एक सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान था, जिसे 2005 में शुरू किया गया। इस अभियान का मकसद लोगों को यह समझाना था कि हर घर में शौचालय होना कितना जरूरी है।[उद्धरण चाहिए]

सरकार ने इस पहल के जरिए लड़कियों और महिलाओं को प्रोत्साहित किया कि वे उन लड़कों से शादी से इनकार कर दें, जिनके घर में शौचालय नहीं है। इसका मुख्य कारण यह था कि उस समय हरियाणा के लगभग 70% ग्रामीण परिवारों में शौचालय नहीं था, और लोग खुले में शौच करने जाते थे, जिससे गंदगी और बीमारियाँ फैलती थीं।[1]

इसके अलावा, महिलाओं को खुले में शौच जाने के दौरान छेड़छाड़ और घूरने जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। इसी डर की वजह से कई महिलाएँ रात के समय खुले में शौच करने जाती थीं, और इससे यौन उत्पीड़न के कई मामले भी सामने आते थे।[2][3] इस अभियान का उद्देश्य सिर्फ स्वच्छता बढ़ाना ही नहीं था, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की रक्षा करना भी था।

क्योंकि निजी शौचालय महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, इसलिए अभियान चलाने वालों ने हरियाणा में शादी को महिलाओं की सामाजिक ताकत के एक बड़े मौके के रूप में इस्तेमाल किया।[1][4] राज्य सरकार ने महिलाओं और उनके परिवारों को प्रोत्साहित किया कि वे शादी तय करने से पहले लड़के के घर में शौचालय होना ज़रूरी शर्त बना दें। इसी संदेश को फैलाने के लिए उन्होंने “नो टॉयलेट, नो ब्राइड” और “नो लू, नो ‘आई डू’” जैसे नारे बनाए, जिन्हें पोस्टरों, होर्डिंग्स और रेडियो विज्ञापनों के ज़रिए फैलाया गया।[1][5]

गाँवों की दीवारों पर भी बड़े-बड़े हिन्दी अक्षरों में लिखा गया था—

“मैं अपनी बेटी की शादी ऐसे घर में नहीं करूँगा जहाँ शौचालय नहीं है।[5][6]

2011 में डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में भी दुल्हन के घर वाले शादी की बातचीत शुरू करने से पहले सबसे पहले यही पूछने लगे थे कि क्या लड़के के घर में शौचालय है।[7]

2012 के एक अध्ययन में पाया गया कि इस अभियान के कारण हरियाणा में पुरुषों द्वारा शौचालय बनाने में 15% की बढ़ोतरी हुई। यह बढ़ोतरी उन जगहों पर ज़्यादा थी जहाँ लड़कियाँ कम थीं (26%), जबकि जहाँ लड़कियाँ ज़्यादा थीं वहाँ यह बढ़ोतरी 6% ही थी।[1][4]

इसी शोधकर्ता के 2017 के एक और अध्ययन में पता चला कि “नो टॉयलेट, नो ब्राइड” अभियान की वजह से उन परिवारों में 21% ज़्यादा निजी बाथरूम बने, जिनके घर में शादी की उम्र के लड़के थे। लेकिन जिन घरों में शादी-योग्य लड़के नहीं थे, वहाँ कोई खास बदलाव नहीं देखा गया।[5][8]

इन परिणामों से यह समझ आता है कि जब किसी जगह लिंग अनुपात असमान होता है (यानी लड़कियाँ कम होती हैं), तो शादी के बाज़ार में महिलाओं की बातचीत करने और अपनी शर्तें रखने की ताकत बढ़ जाती है।[5]

2013 में मध्य प्रदेश के सीहोर ज़िला में अधिकारियों ने एक नया नियम बनाया। जो भी लड़के सामूहिक विवाह (एक साथ कई शादी होने वाले कार्यक्रम) में पंजीकरण करवाना चाहते थे और सरकार से मिलने वाले फायदे लेना चाहते थे, उन्हें यह साबित करना पड़ता था कि उनके घर में एक सही तरह से काम करने वाला शौचालय है। इसके लिए उन्हें अपने घर के शौचालय के साथ खुद की तस्वीर जमा करनी अनिवार्य की गई।[9][10]

2017 में श्योपुर के एक अनुसूचित जाति समुदाय ने भी शादी के लिए यही नियम बना दिया— अगर घर में काम करने वाला शौचालय नहीं है, तो शादी नहीं होगी। इसके लिए दूल्हे के घर को शौचालय होने का सर्टिफिकेट दिखाना जरूरी कर दिया गया।[11]

इसी साल हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के 110 गाँवों से आए लगभग 1,200 मुस्लिम प्रतिनिधियों ने भी सर्वसम्मति से यह फैसला लिया कि वे अपनी बेटियों की शादी केवल ऐसे घर में ही करेंगे जहाँ शौचालय मौजूद हो। यानी दूल्हे के परिवार को यह साबित करना होगा कि उनके घर में एक काम करने वाला शौचालय है, तभी शादी तय होगी।[12][13]

उसी वर्ष, घाना की राजनेता सेसिलिया दापाह ने भी घाना में “शौचालय नहीं, तो दुल्हन नहीं” जैसा ही अभियान शुरू किया।[14]

बाहरी कड़ियाँ

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सन्दर्भ

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  1. 1 2 3 4 Hanemann, W. Michael (2013). "Water and Sanitation: Alternative perspective 10.1". In Lomborg, Bjørn (ed.). Global problems, smart solutions: costs and benefits. Cambridge: Cambridge University Press. ISBN 978-1-107-03959-9.
  2. ↑ A, Divya (2009-03-22). "It's no toilet, no bride in Haryana". द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया. आईएसएसएन 0971-8257. अभिगमन तिथि: 2025-10-01.
  3. ↑ Shah Singh, Harmeet (28 October 2009). "In India's villages: No toilet, no bride - CNN.com". CNN (अंग्रेज़ी भाषा में). मूल से से 2009-10-29 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 2025-10-01.
  4. 1 2 Stopnitzky, Yaniv (2012). "The Bargaining Power of Missing Women: Evidence from a Sanitation Campaign in India". SSRN Electronic Journal (अंग्रेज़ी भाषा में). डीओआई:10.2139/ssrn.2031273. आईएसएसएन 1556-5068.
  5. 1 2 3 4 Stopnitzky, Yaniv (2017-07-01). "No toilet no bride? Intrahousehold bargaining in male-skewed marriage markets in India". Journal of Development Economics. 127: 269–282. डीओआई:10.1016/j.jdeveco.2017.04.003. आईएसएसएन 0304-3878.
  6. ↑ Wax, Emily (2009-10-12). "In India, More Women Demand Toilets Before Marriage". द वॉशिंगटन पोस्ट (अमेरिकी अंग्रेज़ी भाषा में). आईएसएसएन 0190-8286. अभिगमन तिथि: 2025-10-01.
  7. ↑ "Toilets for women can change their lives and of the country". Deccan Herald (अंग्रेज़ी भाषा में). 17 मार्च 2011. अभिगमन तिथि: 2025-10-01.
  8. ↑ "Anjali Adukia's research on India school restrooms | Ed Magazine". www.gse.harvard.edu (अंग्रेज़ी भाषा में). 2018-01-22. अभिगमन तिथि: 2025-10-01.
  9. ↑ Silverstein, Amy; Overdorf, Jason (2016-07-30). "India: Men pose with toilets to woo brides". The World from PRX (अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 2025-10-01.
  10. ↑ Singh, Amarjeet (21 मई 2013). "Pose with a toilet to get hitched in MP district". द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया.
  11. ↑ Saxena, Deshdeep (8 अप्रैल 2017). "Mahors in MP embrace loos, shun dowry". द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया.
  12. ↑ Choudhry, Chetna (12 फ़रवरी 2017). "No brides for no houses without toilets, say 110 villages from 3 states". द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया.
  13. ↑ Bhatia, Anisha (16 फ़रवरी 2017). "No Toilet, No Bride: Haryana Sarpanch's Pro-Women, Pro-Swachh India Message | Swachh Warriors". swachhindia.ndtv.com (अमेरिकी अंग्रेज़ी भाषा में). 3 अगस्त 2025 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 2025-10-01.
  14. ↑ Mohammed-Nurudeen, Mahmud (5 नवम्बर 2017). "'No Toilet, No Marriage' a key message at Mole WASH conference". MyJoyOnline.