शिल्प (साहित्य)

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'शिल्प' का शाब्दिक अर्थ है निर्माण अथवा गढ़न के तत्व। किसी साहित्यिक कृति के संदर्भ में 'शिल्प' की दृष्टि से मूल्यांकन का बड़ा महत्व है।

शिल्प के अंतर्गत निम्न छः बिन्दुओं की चर्चा की जाती है:

अनुक्रम

कथावस्तु[संपादित करें]

कथानक[संपादित करें]

कथा[संपादित करें]

चरित्रचित्रण[संपादित करें]

नायक के विभिन्न प्रकार[संपादित करें]

धीरोदात्त, धीर ललित, धीर शांत या धीरोद्धत[1]


नरेन्द्र कोहली के उपन्यासों में सभी प्रकार के नायक वर्तमान हैं। 'अभ्युदय' के श्रीराम 'धीरोदात्त नायक' हैं। महासमर के युधिष्ठिर धीर-शांत नायक हैं। 'वसुदेव' में वसुदेव 'धीरोद्धत' नायक हैं।

और महासमर के महानायक श्रीकृष्ण तो प्रसंगवश सभी भूमिकाओं में अवतरित होते हैं। गीता का उपदेश देते समय वे धीर-शांत भी हैं और 'धीर-अद्भुत' भी, दुर्योधन की राजसभा में; कंस, शिशुपाल, जरासंध एवं द्रोणादि के वध में वे धीरोद्धत हैं; युधिष्ठिर के राजसूय में ऋषियों के चरण धोते समय, द्रौपदी की मान-रक्षा के समय, सुदामा के स्वागत एवं गुरु सांदीपनि की गुरुदक्षिणा इत्यादि के समय वे धीरोदात्त हैं एवं गोपियों एवं रूक्मिणी-सत्यभामा आदि के प्रसंग में वे धीर-ललित नायक की भूमिका का सर्वोत्तम निर्वाह करते हैं। उनके इन रूपों का सम्यक् चित्रण महासमर में जिस दक्षता से नरेन्द्र कोहली ने किया है, वह हिन्दी में बस उन्हीं की कलम से संभव था।

चरित्र-वैविध्य[संपादित करें]

पात्रों की संख्या[संपादित करें]

पात्रों का चरित्र-विस्तार[संपादित करें]

संवाद[संपादित करें]

नरेन्द्र कोहली के उपन्यासों में संवाद अत्यंत सशक्त हैं। कथाकार उनके माध्यम से कथा को भी आगे बढाता है, पात्रों के चरित्र का उद्घाटन भी करता है, उनके प्रत्युत्पन्नमतित्व से रोचकता भी बनाए रखता है एवं देश-काल का चित्रण भी करता चलता है। संपूर्ण महासमर, तोड़ो, कारा तोड़ो, वसुदेव एवं अभ्युदय इनके उत्तम उदाहरणों से भरे पड़े हैं।

समय एवं अनुभव के साथ नरेन्द्र कोहली की लेखनी का विकास भी हुआ है। यह विकास कई स्तरों पर है। उनकी संवाद शैली में भी यहाँ दृष्टिगोचर होता है। निम्न उदाहरण दृष्टव्य हैं :

रोचकता[संपादित करें]

मुनि शालिहोत्र के आश्रम में वेदव्यास-युधिष्ठिर संवाद (सार्वजनिक चर्चा में संकेतों के माध्यम से गूढ़-सन्देश का चतुराईपूर्वक आदान-प्रदान)[2]

दूत बनकर कृष्ण के हस्तिनापुर जाते समय द्रौपदी का एकालाप (मोनोलॉग)[3]

प्रत्युत्पन्नमतित्व (हाजिरजवाबी)[संपादित करें]

युधिष्ठिर के युवराज्याभिषेक के लिये दबाव डालते हुए धृतराष्ट्र-अक्रूर संवाद : महासमर -२ (अधिकार)[4]

संवादों के माध्यम से कथा का विकास[संपादित करें]

संवादों के माध्यम से चरित्र चित्रण[संपादित करें]

भीष्म-प्रतिज्ञा के पश्चात् शान्तनु-भीष्म संवाद : महासमर -१ (बन्धन)[5]

हस्तिनापुर प्रवेश पर प्रथम भेंट के अवसर पर भीष्म-द्रोण संवाद : महासमर -२ (अधिकार)[6]

वारणावत में पांडवों के भस्म होने का समाचार पाकर आये वेद-व्यास का धृतराष्ट्र एवं तत्पश्चात् विदुर से संवाद : महासमर-३ (कर्म) [7]

संवादों के माध्यम से पात्र के मनोविज्ञान का चित्रण[संपादित करें]

दशरथ-भीष्म संवाद एवं भीष्म-प्रतिज्ञा : महासमर -१ (बन्धन)[8]


पाण्डु के देहांत के पश्चात् सत्यवती को वनगमन के लिये प्रेरित करते समय सत्यवती-व्यास संवाद : महासमर -१ (बन्धन)[9]


संवादों के माध्यम से शाश्वत आध्यात्मिक सत्यों का चित्रण[संपादित करें]

हिडिम्ब-वन स्थित आश्रम में मुनि शालिहोत्र-युधिष्ठिर-भीम संवाद[10]

नारी की प्रकृति के सन्दर्भ में कुंती-युधिष्ठिर संवाद[11]

संवादों के माध्यम से देश-काल-परिवेश एवं सामाज का चित्रण[संपादित करें]

पात्रानुकूलता[संपादित करें]

पात्र के मानसिक स्तर के अनुरूप संवाद[संपादित करें]

पात्र एवम देश-काल के अनुरूप भाषा[संपादित करें]

देश-काल[संपादित करें]

भाषा-शैली[संपादित करें]

आधुनिक पाठक के साथ तादात्म्य की शक्ति[संपादित करें]

प्रतिपाद्य/उद्देश्य[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%95
  2. महासमर-३ (कर्म) (पृ. १९८-२०१) (अध्याय १७) {महर्षि वेद-व्यास उच्च स्थान पर...आपकी आज्ञा का पालन होगा.}, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
  3. नरेन्द्र कोहली; महासमर-७ (प्रत्यक्ष), पृ. -, अध्याय-, वाणी प्रकाशन.
  4. महासमर -२ (अधिकार), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
  5. पृ. .....; अध्याय .. महासमर-१ (बन्धन), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली}
  6. महासमर -२ (अधिकार), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
  7. पृ. ११५-१२०; अध्याय १४ {पांडवों के प्रेत-कर्म में ...धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा". महासमर-३ (कर्म), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली। }
  8. पृ. .....; अध्याय .. महासमर-१ (बन्धन), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली}
  9. पृ.---- अध्याय -- महासमर-१ (कर्म), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
  10. महासमर-३ (कर्म)(पृ. १६०-१६४)(अध्याय १७), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
  11. नरेन्द्र कोहली; महासमर-३ (कर्म), पृ. -, अध्याय-, वाणी प्रकाशन.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

श्रेणी:साहित्य, आलोचना, समीक्षा, उपन्यास, महाकाव्य