शिक्षाशास्त्री

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

पूरब और पश्चिम के अनेक शिक्षाशास्त्री - शंकर, रामानुज, निंबार्क, कर्वे, मदनमोहन मालवीय, सुकरात न्यूटन, स्पेसर आदि हुए हैं।

पश्चिम के शिक्षाशास्त्रियों में सुकरात, अफलातून (प्लेटो) और उसके शिष्य अरस्तू का प्रमुख स्थान है।

अफलातून (प्लेटो)[संपादित करें]

यूनान का अति प्रसिद्ध दार्शनिक और शिक्षाविद् था। उसने अकादेमी नामक स्थान में एक बड़े शिक्षा संस्थान की स्थापना की थी जिसमें विभिन्न विषयों की शिक्षा दी जाती थी। उसका विश्वास था कि परिपक्व बुद्धिवाला ज्ञानी दार्शनिक ही सुयोग्य शासक वन सकता है। इसके लिए उत्तम शिक्षाप्रणाली का होना आवश्यक है। उसने राजनीति, सौंदर्य तत्व, सृष्टि तत्व, गणतंत्र, तथा शिक्षाशास्त्र आदि विषयों पर दो दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। यूरोप के परवर्ती शत शत विचारकों पर उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।

अरस्तू[संपादित करें]

अरस्तु, अफलातून(प्लेटो) का प्रमुख शिष्य था। वह 18 वर्ष की उम्र में एथेंस आकर अफलातून का शिष्य बना। 20 वर्ष तक उसके समीप रहकर उसने विविध विषयों का ज्ञान प्राप्त किया। वह लंबे समय तक अध्ययन और अध्यापन के कार्य में व्यस्त रहा। उसने बहुत सी पुस्तकें लिखीं। वह अनेक विषयों का जानकार और उन्हें एक सूत्र में बाँधने का प्रयत्न करनेवाला उच्च श्रेणी का दार्शनिक था।

मदनमोहन मालवीय[संपादित करें]

मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द)[संपादित करें]

डाक्टर भगवानदास[संपादित करें]

डॉ॰ मारिया मांटेसरी[संपादित करें]

ये इटली की रहने वाली थी और पेशे से डाक्टर थी

सर सैयद अहमद खाँ[संपादित करें]

सर सैयद अहमद खाँ

आशुतोष मुखर्जी[संपादित करें]

महान् शिक्षाशास्त्री तथा राष्ट्रनेता श्री आशुतोष मुकर्जी का नाम देश में राष्ट्रीय शिक्षा की पुनर्रचना के लिए स्मरणीय रहेगा। आपका जन्म 29 जून सन् 1864 ई. को कलकत्ता में हुआ था। आपकी शिक्षा दीक्षा कलकत्ता में ही हुई। विश्वविद्यालय की शिक्षा पूर्ण हो जाने पर आपकी इच्छा गणित में अनुसंधान करने की थी किंतु अनुकूलता न होने के कारण कानून की ओर आकृष्ट हुए। तीस वर्ष की अवस्था के पूर्व ही आपने विधि में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त कर ली। सन् 1904 में आप कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त हुए। देश के विधिविशारदों में आपका प्रमुख स्थान था। सन् 1920 ई. में आपने कलकत्ता उच्च न्यायालय के प्रधान के पद पर भी कुछ समय तक कार्य किया। 2 जनवरी 1924 को आपने इस पद से अवकाश ग्रहण किया। विश्वविद्यालयीय, शिक्षा के मानदंड को स्थिर करने तथा तत्संबंधी आदर्शों की स्थापना के लिए श्री आशुतोष का नाम राष्ट्र के इतिहास में अमर रहेगा। कलकत्ता विश्वविद्यालय को परीक्षा लेनेवाली संस्था से उन्नत कर शिक्षा प्रदान करनेवाली संस्था बनाने का मुख्य श्रेय आपको ही है। सन् 1906 से 14 तक तथा 1921 से 1923 तक आप कलकत्ता विश्वविद्यालय के वाइसचांसलर रहे। विश्वविद्यालय के "फेलो" तो आप सन् 1889 से सन् 1924 तक बने रहे। बँगला भाषा को विश्वविद्यालयीय स्तर प्रदान कराने का श्रेय भी आपको ही प्राप्त है। कवींद्र रवींद्र ने आपके विषय में यह कथन किया था - "शिक्षा के क्षेत्र में देश को स्वतंत्र बनाने में आशुतोष ने वीरता के साथ कठिनाइयों से संघर्ष किया।" राष्ट्रीय शिक्षा की रूपरेखा स्थिर कर उसे आदर्श रूप में कार्यान्वित करे के लिए आपका सदा स्मरण किया जाएगा। सन् 1924 ई. में आपका निधन हुआ।

टॉमस ऐक्वाइनस[संपादित करें]

सेंट टॉमस ऐक्वाइनस (Thomas Aquinas ; 1226-1274 ई.) इटली की विद्वान् धर्मशास्त्री। तेरहवीं शताब्दी के तत्ववेत्ताओं में वह पहला व्यक्ति था जिसने इंद्रियानुभूति के महत्व और मानवीय ज्ञान के प्रयोगात्मक आधार पर बल दिया।

डॉ॰ धोंडो केशव कर्वे[संपादित करें]

जेंतील जियोवानी[संपादित करें]

जॉन डुई[संपादित करें]

रेने देकार्त[संपादित करें]

जोहान् हाइनरिख पेस्तालॉत्सी[संपादित करें]

जोहान् हाइनरिख पेस्तालॉत्सी (Johann Heinrich Pestalozzi ; 1746-1827 ई.) प्रसिद्ध पाश्चात्य शिक्षाशास्त्री। बचपन में पिता चल बसे अत: माता ने इन्हें पाला। इनके दादा का भी इनके मन पर बहुत प्रभाव पड़ा। रूसो के विचारों में कुछ संशोधन कर इन्होंने उन्हें कार्यरूप में परिणत करने के प्रयास किए। विद्यार्थीजीवन में ही समाजसेवा की ओर झुकाव हो गया था। पत्रिकाओं में लेख लिखते थे। आगे चलकर इन्हें पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। 1781 और 1787 के बीच इनकी "लियोनार्ड ऐंड गर्ट्रूड" ( Leonard and Gertrude ) शीर्षक पुस्तक चार खंडों में प्रकाशित हुई। 1792 में जर्मनी के गेटे, फिक्टे इत्यादि विद्वानों से उन्हीं के देश में जाकर ये मिले। सौ एकड़ भूमि मोल लेकर अपने नवीन कृषिक्षेत्र (Neuhof) में इन्होंने कुछ बच्चों को उद्योग के साथ साथ शिक्षा देने का असफल प्रयास किया था। 1799 के पूर्वाध में स्टैज में इन्हें कुछ अनाथ बच्चों को शिक्षा देने का अवसर मिला। उसी वर्ष के अंत में बर्गडॉर्फ के दुर्ग में इनका विद्यालय स्थापित हुआ। इन्हें अच्छे अध्यापकों का सहयोग प्राप्त हुआ। 1801 में इनकी "हाइ गर्ट्रूड टीचेज़ हर चिल्ड्रैन" शीर्षक पुस्तक प्रकाशित हुई। प्रारंभिक शिक्षा संबंधी कुछ अन्य पुस्तकें भी लिखी गर्इं। 1804 में इन्हें बर्गडॉर्फ का दुर्ग सैनिकों के लिए खाली कर देना पड़ा। 1805 से 1825 तक इनका विद्यालय इवर्डन में चलता रहा। अर्थाभाव के कारण इनकी योजनाओं में बाधा पड़ जाती थी।

पेस्तालॉत्सी ने व्यक्ति की समस्त शक्तियों के सामंजस्यपूर्ण विकास को शिक्षा का उद्देश्य माना। उन्होंने मनोविज्ञान को शिक्षा का आधार बनाने के प्रयास किए। आधुनिक शिक्षण के कई प्रमुख सिद्धांतों को पेसलॉत्सी के शैक्षिक प्रयोगों द्वारा महत्व प्राप्त हुआ। शिक्षणविधि में संप्रेक्षण एवं स्वानुभव को इन्होंने मुख्य स्थान दिया। बाद में आनेवाले शिक्षाशास्त्रियों तथा अध्यापकों पर इनके विचारों का प्रचुर प्रभाव पड़ा।

फ्रीड्रिक फ्रोबेल[संपादित करें]

फिलिप इमैनुएल फॉन फेलेनबर्ग[संपादित करें]

फिलिप इमैनुएल फॉन फेलेनबर्ग (Philipp Emanuel von Fellenberg ; 1771-1844 ई.) स्विट्ज़रलैंड का शिक्षाविद् तथा अर्थशास्त्री। 1799 ई. में हॉफबिल नामक स्थान पर इन्होंने एक कृषि महाविद्यालय की स्थापना की जिसने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। इन्होंने अन्य शैक्षिक संस्थाओं तथा एक अनाथालय की स्थापना भी की।

फ्रांसिस वेकन[संपादित करें]

अलेग्जैंडर वेन[संपादित करें]

अलेग्जैंडर वेन (1818-1903 ई.) ऐबरडीन में तर्कशास्त्र का प्राध्यापक था जो बाद में रेक्टर निर्वाचित हुआ। उसकी महत्वपूण्र रचनाएँ ये हैं - "इंद्रियाँ तथा प्रज्ञा" (दि सेंसेज ऐंड इंटिलेक्ट), "मनोभाव तथा संकल्प", "मानस तथा नैतिक विज्ञान" और "तर्कशास्त्र"। उसका मनोविज्ञान शरीरविज्ञान पर आधारित था किंतु उसका मत था कि मनुष्य ऐसा चेतन प्राणी है जो बाहरी प्रभावों और संस्कारों के अनुसार ही कार्य नहीं करता वरन् संवेगों को स्वयं भी जन्म दे सकता है।

वेल ऐंड्रयू[संपादित करें]

वेल ऐंड्रयू (1753-1832 ई.) अंग्रेज शिक्षाशास्त्री जिसने "मद्रास शिक्षाप्रणाली" का प्रचलन शुरू किया। सन् 1787 में वह भारत आया और दो वर्ष बाद मद्रास के सैनिक अनाथालय का अधीक्षक नियुक्त हुआ। उसने कक्षानायक द्वारा शिक्षा चलाने की प्रणाली शुरू की और स्वयं विद्यार्थियों की ही सहायता से शिक्षा प्रसार का प्रयत्न किया। उसकी पुस्तिका "शिक्षा में परीक्षात्मक प्रयोग" सन् 1797 में प्रकाशित हुई। सन् 1811 में जब गरीबों की शिक्षा के लिए एक राष्ट्रीय सभा स्थापित की गई तो वह उसका अधीक्षक बनाया गया। यह सभा गरीबों के 12 हजार स्कूलों का संचालन करती थी।

गुरुदास बैनर्जी[संपादित करें]

जोहान बर्नहार्ड बैज़ीडो[संपादित करें]

जोहान बर्नहार्ड बैज़ीडो (1723-1790 ई.) जर्मन शिक्षाशास्त्री जिसने रूसो तथा कमैनिअस के सिद्धांत वचनों को कार्यान्वित करने का प्रयत्न किया (मेयर द्वारा लिखित उसकी जीवनी देखिए)। उसने शारीरिक शिक्षा पर जोर दिया।

रसेल[संपादित करें]

रूसो[संपादित करें]

रूसो ( 1712 - 78 )महान शिक्षा शास्त्री थे। उन्होंने एमील नामक ग्रन्थ में शिक्षा का दर्शन लिखा | रूसो के शिष्य पेस्टालोज़ी थे। पेस्टालोज़ी के शिष्य एफ़. ए. फ्रोबेल ने किंडरगार्टन विधि प्रारम्भ की। कान्ट ने उन्हें आचार शास्त्र का न्यूटन कहा है।

रैटिख (रैट्के)[संपादित करें]

रैटिख (रैट्के) (1571-1635) एक जर्मन शिक्षाशास्त्री। उसके विचारानुसार राष्ट्रीय एवं धार्मिक एकता के लिए समस्त राष्ट्र में एक भाषा का ज्ञान आवश्यक है और मातृभाषा में पटु हो जाने के बाद उसी के माध्यम से अन्य भाषाओं का ज्ञान सहज हो जाता है। रैटिख के अन्य शिक्षा सिद्धांतों में प्रमुख हैं - प्राकृतिक क्रम से विद्यार्जन, साहित्य एव अभ्यास के द्वारा भाषाशिक्षण, रटना निरर्थक, दबाव अनावश्यक तथा भाषाओं की व्याकरण संबंधी समानता पर ध्यान। रैटिख ने 1618 तथा 1620 में दो असफल शैक्षिक प्रयोग किए। उस का दंभी स्वभाव, युगीन धार्मिक अस्थिरता और लूथर में अटूट आस्था उसकी असफलता के कारण थे। परंतु रैटिख के निखरे विचार कमेनियस के शैक्षिक सुधारों में सजग हो उठे थे।

रॉबर्ट रेक्स[संपादित करें]

रॉबर्ट रेक्स (1735-1811) इंगलैंड में "संडे स्कूल" का प्रवर्तक। पिता के देहावसान के बाद "ग्लॉस्टर जर्नल" का मालिक एवं संपादक बना। उसने ग्लॉस्टर नगर में जेल की दशा सुधारने के लिए प्रयास किए। समस्या का सही हल कारण के निवारण में था। पिन की फैक्टरी में काम करनेवाले बच्चे इतवार को ऊधम करते थे। उनके लिए 1780 में "संडे स्कूल" खोला। इसके अतिरिक्त अन्य दिनों में भी अवकाश के समय में उनकी पढ़ाई का प्रबंध किया। उसकी पत्रिका उसके प्रयास के प्रचार का सफल साधन बनी। फलस्वरूप 1785 में बृहत् वर्तानिया के समस्त साम्राज्य में संडे स्कूल की स्थापना एव सहायता के लिए एक समाज की स्थापना हुई। 1803 में संडे स्कूल संघ बना।


जोजेफ लैकैस्टर[संपादित करें]

जोजेफ लैकैस्टर (1778-1858) ई. - अंग्रेज शिक्षाविद्। 1801 में इन्होंने अपने जन्मस्थान साउथवार्क में एक विद्यालय खोला जिसमें कक्षानायकों (मॉनिटर्स) द्वारा शिक्षण की व्यवस्था की गई। "ब्रिटिश ऐंड फॉरेन स्कूल्स सोसाइटी" ने बाद में इसी प्रणाली का प्रयोग अपने विद्यालयों में किया। लैकैस्टर को असांप्रदायिक धार्मिक शिक्षण का जन्मदाता कहा जाता है।

जुआँ लुई बीबेस[संपादित करें]

जुआँ लुई बीबेस (1492-1540) - स्पेन स्थित वैलेंशिया में 6 मार्च 14922 को जन्म। वह चिंतक, मनोवैज्ञानिक एवं शिक्षाशास्त्री था। पेरिस में उच्च शिक्षा प्राप्त कर लोउवेन में प्राध्यापक नियुक्त हुआ। बाद में आक्सफोर्ड में नियुक्ति हुई और राजकुमारी मेरी ट्यूडर का शिक्षक भी रहा। जीवन का शेष समय ब्रुजिज़ में बीता। यह आधुनिक मनोविज्ञान का जन्मदाता माना जाता है, कारण-चेतन व्यवहार को आध्यात्मिक और भौतिक स्वरूप से परे मनोवैज्ञानिक आधार दिया। इसके शैक्षिक सिद्धांत मनोविज्ञान एवं नीतिशास्त्र पर आधारित होने के कारण पुष्ट हैं। दार्शनिक क्षेत्र में उनका निश्चित प्रभाव बेकन और डेकार्ट पर पड़ा था। उसने बताया कि आत्मा का आभास उसके विकसित दैवीय स्वरूप को जान लेने में है और मानस, व्यवहार से ही परखा जा सकता है।

सुकरात[संपादित करें]

स्पेंसर[संपादित करें]

हर्बर्ट स्पेंसर का जन्म 27 अप्रैल 1820 को इंग्लैंड के देर्ब्य्शिएरे , डर्बी शहर में हुआ था। हर्बर्ट ने इवोल्य्लूनिस्म, पोजिटिस्म नामक स्कूल खोला। शिक्षा जगत में उन्होंने अनुदेशन विधि को जन्म दिया। इसमें चार पद थे- स्पष्टता, सम्बन्ध, व्यवस्था, तथा विधि। उनके शिष्य ज़िलर ने स्पष्टता नामक पद को दो भागों में विभाजित किया - (1) प्रस्तावना तथा (2) प्रस्तुतीकरण। ये पाँचों पद हर्बर्ट की पंचपद प्रणाली के नाम से प्रख्यात हैं।

सर फिलिप हैर्टाग[संपादित करें]

इन्होंने भारतीय उच्च शिक्षा की उन्नति के संबंध में कुछ विश्लेषण कार्य किया। सन् 1904 के विश्वविद्यालय अधिनियम (ऐक्ट) पास होने के बाद से भारत में उच्च शिक्षा का प्रसार होने लगा था और कई नए विश्वविद्यालय खुलते जा रहे थे। सन् 1919 से लेकर सन् 1936 तक कई कमीशन नियुक्त किए गए जिन्होंने भारतीय उच्च शिक्षा के संबंध में अपने विचार प्रकट किए। सर फिलिप हैर्टाग भारतीय स्टैटुटरी कमीशन की उपसमिति के अध्यक्ष थे। इस समिति ने सन् 1929 में अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें शिक्षा की प्रगति के संबंध में इसने अपनी कुछ सिफारिशें कीं। भारत सरकार ने समिति की कई सिफारिशें मान लीं और उनका प्रयोग किया।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]