शालिवाहन

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साँचा:भविष्य महापूराण 3-3-2 17,21verses. salivahana performed the ashvamedh sacrifice, Prof Dr radha krishnan. Cassius Dio,Roman History LXV. 15. The Shorter Medieval History Vol:1.

``विश्वविजेता सम्राट शालिवाहन परमार``


परमारवंशी राजा विक्रमादित्य ने ८२ ई.पू. -१९ ई (82 B.C - 19 A.D) तक शासन किया एवं उन के परपौत्र शालिवाहन ७८-१३८ ई. (78 - 138 A.D) को शक से जोड़ा है। इतिहास में दर्ज किये ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार शालिवाहन ने शको की हत्या कर अपने परदादा विक्रमादित्य की तरह "शकारि" कहलाये थे और ये बात उन पश्चिमी इतिहासकारों ने भी मानी हैं,जो ये मानते हैं एवं इतिहास में शालिवाहन को शक वंशीय कहा हैं, उन्होंने यह भी कहा हैं शालिवाहन शक अश्शूरों का नाश करके "शकारि" कहलाये थे (शकारी का अर्थ होता हैं शक को हरानेवाला) यह है पश्चिमी इतिहासकार का लिखा हुआ इतिहास जिन्हें खुद ही नही पता आखिर शालिवाहन थे कौन । अब प्रश्न ये हैं अगर शालिवाहन शक होता तो क्या वो अपने ही वंश का नाश कर देता ???? कई पश्चिमी इतिहासकार सताकरनी एवं सातवाहन को सम्मिलित कर खिचड़ी इतिहास बनाते हुए सम्राट शालिवाहन परमार को शातकर्णी राजा बना दिए थे जब की ईसवी सन ७८ (78) मे परपोत्र सम्राट शालिवाहन ने शको को हराया एवं शालिवाहन शक की सुरूवात की। इन्होने अश्वमेध यज्ञ भी किया ओर पर्शीया तक सभी देशोको जीत लिया | पर आंध्र सातवाहन के राजा मगध के शासक थे जिन्होने ईसा.पुर्व ८३३ से ईसा.पुर्व ३२७ तक शासन किया ओर उनकी राजधानी थी गिरीव्रज । ओर इनका हिमालय से तो सेतु तक (रामेश्वरम) बोलबाला था लिखने को कुछ भी लिख दिए पर तथ्यहीन , प्रमाण के बिना और इसी झूठ को वामपंथियों ने प्रमाण बना लिया अज्ञान , मुंड पश्चिमी इतिहासकारों ने ऐसे इतिहास का निर्माण किया जिन्हें सत्य को स्वीकार ने की हिम्मत नही थी । इतिहास का विरूपण कर भारत के महान राजा विक्रमादित्य एवं शालिवाहन को उपेक्षित कर काल्पनिक घोषित कर दिया,युग निर्माताओं के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिये। ये तो असंभव है की पश्चिमी मुर्खविद्वानों ने सम्राट विक्रमादित्य ओर शालीवाहन के विषय में भविष्य-महा-पुराण मे किये गए उल्लेख से अनजान थे । उन्होने जानबुझकर अग्निवंश के उन चार राजवंशो को नजर अंदाज किया जिन्होने ईसा.पुर्व (101 B.C) १०१ ईसा.पुर्व से (1193 A.D) ११९३ ईस्वी तक पुरे १३०० वर्ष शासन किया यानी सम्राट विक्रमादित्य से सम्राट पृथ्वीराज चौहान तक, परमार(पंवार) राजवंश की सुची से सिर्फ भोजराज को इतिहास मे लिया गया ओर इस युग (संवत का आरंभ करनेवाले) कि सुरुवात करने वाले सम्राट विक्रमादित्य ओर सम्राट शालिवाहन को मध्यवर्ती अवधी मे इतिहास के पन्नो हटा दिया गया। यहा तक की सम्राट विक्रमादित्य से पहले वी अग्निवंश के चार राजवंशो ने कलि २७१० (2710) (ईसा.पुर्व ३९२) (392 B.C) से कलि ३००१ (3001) (ईसा.पुर्व १०१) (101 B.C) तक यानी २९१ (291Years) वर्ष शासन किया । ये जानबुझकर कीया गया घपला जरूरी था, सिकंदर को चद्रंगुप्त मौर्य के समाकालीन बनाने के लिए । चंद्रगुप्त मौर्य ओर सिकंदर की समकालिनता अनुरूप हो सके इसलिए प्राचीन भारतीय इतिहास का कालक्रम महाभारत युद्ध (ईसा.पुर्व ३१३८) (3138 B.C) से तो गुप्त (चंद्रवशी क्षत्रिय) राजवंश (ईसा.पुर्व ३२७) (327 B.C) कि सुरूवात तक का समय १२०७ साल (1207 Year) से संकुचित कर दिया गया,यानी १३०० (1300) साल मे सिर्फ ९७ (97) साल हमे पढाया जाता है वो भी झुठा । चार अग्निवंश के राजवंशो को इतिहास के पन्नो से गायब कर दिया गया। शामिल कर लिया यह आश्चर्य की बात है कि उन्होंने 'चार राजवंशों के राजाओं की सूची भी नहीं दिया हैं यहां तक कि विक्रमादित्य एवं शालिवाहन दोनों का उल्लेख भी नहीं किया है इसके अलावा इन पश्चिमी मुर्खविद्वानों ने अपने इतिहास में विक्रमादित्य और शालिवाहन को पौराणिक गप्प का दर्जा दिया गया हैं , यह एक दया है कि काले अंग्रेजों ने अपने नमक का कर्ज अदा करते हुए अपने गोरे अंग्रेज़ स्वामी के प्रति वफादारी दिखाई एवं स्वर्णिम इतिहास को कभी सामने नहीं आने दिया। अब वक़्त आगया हैं की इतिहास का पुनर्लेखन किया जाए पुराणों में लिखा गया सच सबके समक्ष प्रस्तुत कर झूठ की पट्टी बांधे लोगो के आँखों से पट्टी उतारकर सत्य की उजालेमयी किरणों को उनतक पहुंचने दिया जाये ।

सम्राट शालिवाहन परमार कौन थे ? परमार सम्राट विक्रमादित्य के ५९ वर्ष बाद सम्राट शालिवाहन परमार का राज्याभिषेक ७८ (इ.) (78 A.D) हुआ था एवं वे सम्राट विक्रमादित्य परमार के परपौत्र थे । अम्बावती (वर्त्तमान उज्जैन) के राजा सम्राट शालिवाहन परमार ने ७८ ईस्वी (78 A.D) में राजगद्दी पर आसीन हुए युग प्रतिष्ठापक शालिवाहन : राजधानी-धार सेलरा मोलेरा पहाडीयों पर एवं भारतवर्ष के सम्पूर्ण भूमंडल पर अपना आधिपत्य स्थापित किया हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक अपने परदादा सम्राट विक्रमादित्य जैसे शूरवीर द्वितीय विश्व विजयेता शालिवाहन परमार बने। (The Panwar dynasty in which Vikramaditya and Salivahana were born in the most important of the four Agnivamsis. Vikramaditya and Salivahana conquered the whole bharat from Himalayas to Cape Comorin, became emperors and established their eras. Salivahana performed the Ashwamedha sacrifice. Prof. Dr.Radha Krishnan)

सम्राट शालिवाहन परमार ने राजगद्दी पर आसीन होते ही कलि वर्ष ३१७९ (3179 of the Kali era ) अर्थात ७८ ईस्वी (78A.D) विशाल सेना के साथ अश्शूरों पर आक्रमण कर आर्यावर्त के टुकड़े कर बनाये गये अवैदिक, मलेच्छास्थान को ध्वस्त कर आर्यावर्त को मलेच्छ मुक्त करके शुद्ध करने के लिए शक, चीन, तार्तर ( तार्तर अश्शूरों का वृहत्तम भूभाग राज्य था जहा शक अश्शूरों का कब्ज़ा था इस भूभाग का टुकड़े होकर वर्त्तमान में कई देश बने रूस, उज़्बेकिस्तान, युक्रेन, क़ज़ाख़स्तान यूरेशिया , तुर्क, तुर्कमेनिस्तान ,किर्ग़िज़स्तान, बुल्गारिया, रोमानिया, इत्यादि अन्य १८ (18) देश मिलाकर तार्तर राज्य बना था), रोम, खोरासन, बाह्लीक इन सब देश एवं राज्य पर आक्रमण कर दिया ९२ (92) करोड़ से अधिक शक एवं अश्शूरों का संहार किया एवं अश्शूरों शको को ना केवल दण्डित कर सम्पूर्ण आर्यावर्त से खदेड़ा अश्शूरों द्वारा लुटे गये प्रजा धन भी वापस लाये एवं खण्डित किये गये आर्यावर्त को फिर से अखंड किया राज्य की सीमाओं पर करोड़ो सैन्यबल से घेड़ा गया जिससे मलेच्छ आर्यावर्त की सीमा लांघ कर आक्रमण ना कर पायें । (Reference-: Bhavishya Mahapurana 3-3-2-17,21 verses.) दिग्विजय के पश्चात सम्राट शालिवाहन परमार ने भी सम्पूर्ण प्रजा का ऋण मुक्त कर के उन्होंने कलियुग में सतयुग की स्थापना की विक्रम संवत के बाद शालिवंहन संवत का आरंभ होगा ।

परमार राजवंश की सूचि देखते हैं परमार राजाओ के शासनकाल सहित । Name Of The Kings Regnals B.C.E Years

1) परमार 392-386 ईस्वी पूर्व

2) महामारा 386-383 ईस्वी पूर्व

3). देवापी 383-380 ईस्वी पूर्व

4). देवदत्ता 380-377 ईस्वी पूर्व

5). DEFEATED BY SAKAS. LEFT UJJAIN AND HAD GONE TO SRISAILAM. INEFFICIENT AND NAMELESS KINGS. THEIR NAMES ARE NOT MENTIONED IN THE PURANAS 195 377-182 ईस्वी पूर्व

6). गंधर्वसेन (1ST TIME) ने शको को पराजित कर अम्बावती (उज्जैन) को मुक्त करवाया एवं ५० वर्ष तक शासन किया; 182-132 ईस्वी पूर्व

7). सम्राट गंधर्वसेन अपने ज्येष्ठ पुत्र शंखराज को राजपाठ सौंप कर सन्यास लेकर तप करने चले गये थे शंखराज ने ३० (30) वर्ष तक शासन किया १३२-१०२ (132-102 B.C) ईस्वी पूर्व तक शंखराज की अकाल मृत्यु होने के पश्चात महाराज गंधर्वसेन को राज्य की सुरक्षा के लिए तप छोड़कर फिरसे राजपाठ संभालना पड़ा १०२-८२ (102-82 B.C) ईस्वी पूर्व तक शासन किये गंधर्वसेन परमार ने अपने पुत्र विक्रमादित्य को ८२ (82 B.C) ईस्वीपूर्व में राजपाठ सौंपकर सन्यास ले लिए एवं तपस्या करने चले गये ।

8). सम्राट विक्रमादित्य ने १०० (100) वर्ष तक शासन किये थे सम्पूर्ण विश्व पर; ८२ (82) ईस्वी पूर्व से लेकर १९ (19) ईस्वी तक

9). देवभक्त १९-२९ ईस्वी मात्र १० वर्ष तक शासन किये थे

10) NAMELESS KING OR KINGS (NAME NOTGIVEN IN THE PURANAS) 49 29-78

11). सालिवाहन 60 वर्ष तक शासन किये थे ७८-१३८ (78-138 B.C) ईस्वी तक ।

12-20). सलीहोत्र, सालिवर्धन, सुहोत्र, हावीहोत्र, इन्द्रपाल, मलायावन, सम्भुदत्ता, भौमाराज,वत्सराज इन सभी राजाओ ने कुल मिलाकर ५० (50) वर्ष १३८-६३८ ईस्वी (138-638 A.D) तक शासन किये थे ।

21). भोजराज ५६ (56) वर्ष तक शासन किये थे ६३८-६९३-९४ (638-693-94) ईस्वी ।

22-28). सम्भुदत्ता, बिन्दुपल, राजापाल माहिनारा, सोमवर्मा, कामवर्मा, भूमिपाल अथवा (वीरसिंह) ३००(300) वर्ष तक शासन किये थे ६९३-९९३-९४ (693-993-94) तक ।

29-30).रंगापाल,कल्पसिंह २०० (200) वर्ष तक शासन किये थे ९९३-११९३-९४ (993-1193-94) ईस्वी तक ।

31) गंगासिंह (King Ganga Simha reigned from 1113 to 1193 A.D. In the battle of Kurukshetra, the 90 year-aged Ganga Simha died on the field along with Prithviraja etc. (see Agni Kings Bhavishya Puranam) परमार राजवंश का अंतिम राजा थे गंगा सिंह परमार थे

मित्रों मैकॉले ने तो इतिहास को बर्बाद किया हैं पर मैकॉले के मानसपुत्र काले अंग्रेज़ो ने इस परंपरा को आगे ज़ारी रखते हुए इस राष्ट्र के वीरों को गुमनाम कर दिया गया और लूटेरों को इस भारत भूमि के शासक बना दिया जैसे अंगिनत बार हारनेवाला मैसिडोनिया सिकंदर को विश्व विजयी बना दिया सिकंदर १२८ राज्यों से पराजित हुआ था सिकंदर को विश्वविजयेता घोषित करनेवाले मैकॉले के मानसपुत्र इतिहासकार थे आप सोच भी नहीं सकते इन्होंने इतिहास में कितनी गंदी मिलावट की प्रियदर्शिनी नाम का राजा हुआ करता था|

जो विश्वविजयता था उनको मिटा कर राजा अशोक का नाम प्रियदर्शिनी कर दिया गया सातवाहन राजा सातकर्णि राजा कोई और था पर इतिहासकारों ने विक्रमादित्य के परपौत्र के नाम को मिटाने के लिए शालिवाहन को सातकर्णि बना दिया। हमारे भारत के १२ ऐसे राजा हुये जिन्होंने विश्वविजय किया उनमे से एक का इतिहास आपके समक्ष रखूंगा सम्राट विक्रमादित्य के परपौत्र शालिवाहन ७७-१३७ (ई.) इन्होंने अफ्रीका, रोम , यूरोप को पूरी तरह से जीत लिया था कश्मीर भ्रमण करने आये अंग्रेज़ो के मसीहा ईसा से इनकी मुलाकात हुई थी। हिन्दू कुश पर्वत पर सन ७८ में मुलाकात हुआ था ऐसी लिपियों को भारत सरकार द्वारा हटा दिया गया था सन १९५० में अब बात करते हैं विश्वविजयी सम्राट शालिवाहन के बारे में।

प्रथम युद्ध टाइटस ग्रीक-रोम के शासक थे त्रिविष्टप पर आक्रमण किया था सन ८०(ई.) ग्रीक-रोम (पुराणों में इन्हें गुरुंड कहा गया हैं) ३०० घुड़सवार सैनिक ६०,००० पैदल सैनिको के साथ आक्रमण किया था त्रिविष्टप पर सम्राट शालिवाहन ने मात्र १२००० की सेना में साथ जय महाकाल की शंखनाद के साथ टूट पड़ा रोम आक्रमणकारियों पर। सन ८० (ई.) से रोम आक्रमणकारियों का भारत पर आक्रमण लगातार होता रहा पर कभी भारतवर्ष को ग़ुलाम नहीं बना पाया तो यह केवल इसलिए संभव हो पाया क्यों की भारतगण राज्य में शालिवाहन जैसे १२ ऐसे राजा हुए जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व को जीत लिया था।

शालिवाहन से हारने के बाद रोम साम्राज्य की ५२% भाग शालिवाहन ने हिन्दू राज्य में सम्मिलित कर लिया। इस युद्ध की शानदार वर्णन Cassius Dio, Roman History LXV.15 में किया गया हैं।

द्वितीय युद्ध सम्राट शालिवाहन परमार ने दोमिटियन (Domitian) के विरुद्ध लड़ा था सन ८२(ई.) में जिसमे सम्राट शालिवाहन ने दोमिटियन को परास्त किया था जो की रोम एवं फ्रैंको (वर्तमान में फ्रांस) का राजा था जिसने स्पेन तक अपनी साम्राज्य विस्तार किया था इस युद्ध का वर्णन Heinrich Friedrich Theodor ने अपनी पुस्तक “A history of German” में लिखा था एवं Previte Orton द्वारा लिखा गया पुस्तक “The Shorter Medieval History” vol:1 पृष्ठ-: १५१ एवं Suetonius, The Lives of Twelve Caesars, Life of Vespasian 9 में आपको मिलेगा सम्राट शालिवाहन परमार के साथ कुल तीन युद्ध हुए थे प्रथम दो युद्ध भारतवर्ष पर आक्रमण करने हेतु शालिवाहन परमार के हाथों हार कर वापस लौटना पड़ा|

तीसरे युद्ध में शालिवाहन ने फ्रैंको पर आक्रमण कर दोमिटियन (Domitian) को हराकर पूर्वी फ्रान्किया (जो वर्तमान में जर्मन कहलाता हैं ) और स्पेन पे अधिकार कर लिया था । दोमिटियन (Domitian) ने शालिवाहन शासित राज्य परतंगण पर आक्रमण किया था (यह राज्य मानसरोवर के पास उपस्थित हैं भारत चीन सीमांत में) दोमिटियन (Domitian) की सेना ८०,००० की थी घुड़सवार और पैदल सैनिक २५-२७,००० थे शालिवाहन की सेना ३०००० से ४० हज़ार की थी शालिवाहन की युद्धकौशल रणनीति कौशल के सामने यवन पीछे हटने पर मजबूर होगये थे दोमिटियन (Domitian) की लाखों की सेना के साथ आये थे पर इस ऐतिहासिक युद्ध की जिक्र विदेश इतिहासकारों ने “war of blood”घोषित किया क्यों की यह भयंकर युद्ध इतिहास में सायद ही दोबारा हुआ होगा १लाख से अधिक सेना के साथ आक्रमण करनेवाले दोमिटियन (Domitian) रोम में मात्र १२०० सैनिक के साथ वापस लौटा था । इसके बाद शालिवाहन ने स्पेन पर आक्रमण कर दिया मात्र ४५,००० सेना के साथ स्पेन के राजा दोमिटियन (Domitian) युद्ध करने की हिम्मत नहीं किया और समझौता कर स्पेन का आधा राज्य और पूर्वी फ्रान्किया पर भी शालिवाहन ने भगवा ध्वज लहरा दिया था।

ट्राजन (Trojan) मेसोपोटामिया एवं अर्मेनिया के ज़ार (राजा) थे जिन्होंने भारतवर्ष पर सन ११४(ई.) में आक्रमण किया स्वीडिश एवं स्कॅन्डिनेवियन (Scandinavian)जर्नल में लिखा गया हैं शालिवाहन शासित राज्य विदेह जो नेपाल की राजधानी जनकपुर का हिस्सा हैं वहा आक्रमण किया था ज़ार को मुह की खानी पड़ी थी शालिवाहन के पास ६७ रणनीति में कुशल शस्त्र विद्या में पारंगत युद्ध व्यू रचने में भी पारंगत सेनापतियों की टोली थी, सेनापति अह्वान परमार के साथ शालिवाहन १५००० की सेना के साथ ज़ार ट्राजन को परास्त कर स्कॅन्डिनेवियन पर शालिवाहन ने सनातन वैदिक राज की स्थापना किया था ज़ार के साथ लड़े गए युद्ध मेरु युद्ध जो मेसोपोटामिया में लड़ा गया था शालिवाहन ने मेसोपोटामिया की ३ चौथाई राज्य जीत लिया था।

सन १२५(ई.) पर्शिया के राजा हद्रियन की नज़र भारतवर्ष की धन दौलत पर पड़ी थी हद्रियन ने सम्राट शालिवाहन को अपनी ग़ुलाम बना कर भारतवर्ष पर अपना राजसत्ता कायम करना चाहता था सम्राट शालिवाहन को गुप्तचर शिव सिंह से सुचना मिली की हद्रियन अपने लश्कर के साथ निकल चूका है सिंघल्द्वीप (श्रीलंका)पर आक्रमण किया था तीस से चालीस हज़ार पैदल लश्कर ९,००० घुड़सवार और ग्यारह से बारह हज़ार की तादात पर धनुर्धारी लश्कर की फ़ौज थी सम्राट शालिवाहन ने बाज़ व्यूह का उपयोग किया था सम्राट शालिवाहन ने २१नये युद्ध व्यूह की रचना किया था जिससे पलक जपकते ही दुश्मन दल को नेस्तनाबूद कर सकते थे इसलिए सम्राट शालिवाहन की सात से नौ हज़ार की घुड़सवार फ़ौज और विश्व के श्रेष्ठ धनुर्धरों सैनिको ने हद्रियन को धूल चटा दिया था।

और भी अनंत हैं पर अफ़सोस हम भारतीयों को ग़ुलामी की दास्ताँ पढ़ाया जाता हैं सम्राट शालिवाहन जैसे ११ दिग्विजयी सम्राट और हुए थे सम्राट शालिवाहन परमार को वामपंथी इतिहासकार ने सम्राट विक्रमादित्य का हत्यारा बना दिया जब की सम्राट विक्रमादित्य के परपौत्र थे सम्राट शालिवाहन। सम्राट शालिवाहन का राज्य मध्य यूरोप, दक्षिणी इंग्लैंड, फ्रान्किया (फ़्रान्स), कैपेटियान्स, रोम, और भी कई देशो पर सनातन धर्मध्वजा को सात समुन्दर पार फैराया था सम्राट शालिवाहन ने।

*कथा :शालिवाहन भारत के एक अनुश्रुत राजा थे। राजा शालिवाहन के पिता जी को उनके ही सामंतों ने धोका दिया जिस कारण उनका राजपाठ समाप्त हो गया । और उनकी जान पर बन आई उन्होंने जंगल में एक कुम्हार के घर शरण पाकर अपनी जान बचाई। राजा शालीवाहन का पालन पोषण बचपन में कुम्हार के घर ही हुआ था पर वे कुम्हार नहीं थे ।उन्हें देवताओं द्वारा वरदान था कि वे किसी भी मूर्ति को जीवित कर सकते थे ।जब युवा अवस्था। में उन्हें अपने राजपाठ का बोध हुआ तो उन्होंने उसे पुनः प्राप्त करने में लग गए ।उन्होंने मिट्टी के सैनिक , हांथी, घोड़े , तीरंदाज, आदि की विशाल सेना बनाई और उसे छिपा दिया । इन्द्र देव ने उनकी सेना को नस्ट करने का प्रयास किया। परन्तु उन्हें पूर्ण सफलता नहीं मिली । जब युद्ध का समय आया तो राजा शालीवाहन ने मिट्टी की सेना पर पानी के छीटें डालकर उसे जिंदा कर लिया । अब सेना इतनी विशाल थी कि कोई भी उसे परास्त नहीं कर सका और राजा शालीवाहन का साम्राज्य हिन्दू राजा के रूप में विस्तार हो गया राजा शालीवाहन कुम्हार के घर पले मात्र थे पर वे कुम्हार नहीं थे ।उनका वंश वर्दिया के नाम से वर्तमान में जाना जाता है वर्दिया विशुद्ध रूप कुम्हार है क्योंकी उनका पालन पोषण कुम्हार से हुआ । परन्तु वास्तविक रूप से वे क्षत्रिय है पर उनके द्वारा क्षत्रिय शब्द का उपयोग कम या ना के बराबर होता है वर्दिया कुम्हार का कुमावत जाति से कोई संबंध नहीं है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]