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शालिकनाथ

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शालिकनाथ पूर्व मीमांसा के विचारक दार्शनिक थे। उनका कार्यकाल लगभग ७०० ई है। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि वे कुमारिल भट्ट और प्रभाकर के पहले हुए या बाद में। शालिकनाथ प्रभाकर मिश्र के शिष्य थे। न्यायाचार्य उदयन 'स्तुति कुसुमाञ्जलि' में 'गौड मीमांसक' शब्दों से आपका निर्वेश करते हैं। ये गौड़ देश के निवासी थे। प्रभाकर मत के समर्थन का मुख्य यश आपको है।

श्री शालिकनाथ ने तीन पंचिकाओं की रचना की है-

  • (१) दीपशिखापञ्चिका (लघ्वी टीका की व्याख्या),
  • (२) ऋजुविमलापञ्चिका (बृहती टीका की व्याख्या),
  • (३) प्रकरणपञ्चिका (मौलिक प्रकरण ग्रंथ ) ।

विवरण पर 'दीप शिखा', निबन्धन पर 'ऋजु विमला', दोनों टीकाएँ आपने लिखीं। यदि आपके ये टीका ग्रंथ न होते तो प्रभाकर सिद्धांतों का समझना सरल न होता। पहली पञ्चिका उपलब्ध नहीं। दूसरी मद्रास विश्वविद्यालय से कई भागों में प्रकाशित है। 'प्रकरणपञ्चिका' आपका स्वतंत्र तीसरा ग्रंथ है। बड़ी-बड़ी युक्तियों में इसमें प्रभाकर मत का समर्थन किया गया है। इसका द्वितीय संस्करण 'हिदू विश्वविद्यलाय' काशी से प्रकाशित है। शाबर भाष्य प्रथमाध्याय प्रथम पाद (तर्क पाद) का भाष्य परिशिष्ठ नामक टीकाग्रंथ आपकी चौथी कृति है। यह भी मद्रास से प्रकाशित है। जिन युक्तियों द्वारा मण्डन मिश्र ने प्रभाकर सिद्धांतों का खंडन किया, कर्कश शब्दों में उन युक्तियों का खंडन कर आपने प्रभाकर सिद्धांतों का समर्थन किया है। आपका समय 690-760 ई0 के आसपास माना जा सकता है।

सन्दर्भ

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इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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