शालभंजिका

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शालभंजिका स्त्री की मूर्ति जिसमें स्त्री का विशेष शैली में चित्रण हो, जैसे किसी वृक्ष के नीचे उसकी एक डाली को पकड़े स्त्री की मूर्ति। 'शालभंजिका' का शाब्दिक अर्थ है - 'शाल वृक्ष की डाली को तोड़ती हुई'।

इन्हें 'मदनिका' और 'शिलाबालिका' भी कहते हैं।

शालभंजिका पत्थरों से बनी एक महिला की दुर्लभ व विशिष्ट संरचना है, जो त्रिभंग मुद्रा में खड़ी है। ऐसा कहा जाता है कि ग्यारसपुर में पाई गई यह मूर्तियां 8वीं से 9वीं शताब्दी के बीच की है। इस उत्कृष्ट मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि यह जंगल की देवी की है। शालभंजिका शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है, जिसका अर्थ होता है ‘साल वृक्ष की टेहनी को तोड़ना।’ फिलहाल शालभंजिका को ग्वालियर के पुरातात्विक संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। इस मूर्ति की खूबसूरती बेजोड़ हैं। जंगल की देवी समझी जाने वाली यह महिला अपने शरीर को तीन तरह से मोड़कर दुर्लभ अवस्था में है। शरीर में इतने खिचाव के बावजूद भी उनके चेहरे पर सुंदर भाव दिखाई देते हैं। कुछ आलोचक कहते हैं कि शालभंजिका का बौद्ध धर्म से घनिष्ठ संबंध है। इस मत का आधार यह है कि रानी माया ने इस मुद्रा में गौतम बुद्ध को एक अशोक वृक्ष के नीचे जन्म दिया था। कुछ आलोचकों का यह भी कहना है कि शालभंजिका एक पुरानी देवी है, जिसका संबंध प्रजनन से है। शालभंजिका का छोटा रूप हिंडोला तोरण पर भी देखा जा सकता है।