शल्यतन्त्र

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शल्यतन्त्र, आयुर्वेद के आठ अंगों में से एक अंग है। सुश्रुत को शल्यक्रिया का जनक माना जाता है। वाग्भट द्वारा रचित अष्टाङ्गहृदयम् का २९वाँ अध्याय 'शस्त्रकर्म विधि' है।

महर्षि सुश्रुत प्रथम व्यक्ति है जिन्होंने शल्यतंत्र के वैचारिक आधारभूत सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया, जिसके आधार पर प्राचीन भारतवर्ष में शल्य कर्म किये जाते रहे। शल्य तंत्र के प्राचीनतम ग्रंथ सुश्रुतसंहिता में शल्यतन्त्र के अतिरिक्त अन्य विषय भी सम्मिलित हैं (कान, गले, और सिर के रोग, प्रसूतितन्त्र और चिकित्साविज्ञान विषयक आचार संहिता आदि )। महर्षि सुश्रुत ने सबसे पहले शवच्छेदन विधि का वर्णन किया था। महर्षि द्वारा प्रतिपादन 'नासासंधान विधि' वर्तमान में विकसित प्लास्टिक सर्जरी का मूल आधार बनी है, इसे सभी लोग निर्विवाद रूप ले स्वीकार करते हैं। आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी विषयक ग्रंथों में सुश्रुत की नासासंधान विधि का उल्लेख ‘इंडियन मेथड ऑफ राइनोप्लास्टी’ के रूप किया जाता है।

शल्यचिकित्सक के गुण[संपादित करें]

शस्त्रवैद्य गुण -
शौर्यमाशुक्रिया तीक्ष्णं शस्त्रमस्वेदवेपथू।
असम्मोहश्च वैद्यस्य शस्त्रकर्मणि शस्यते॥

शस्त्रवैद्य के लिए आवश्यक गुण ये हैं- शौर्य (साहस), आशुक्रिया (तीव्र गति से कार्य करना), तीक्ष्णशस्त्र (तेज धार वाले शस्त्रों से युक्त), अस्वेद (जो पसीना से रहित हो), वेपथू (जिसके हाथ काँपने न हों), असम्मोह (जो दर्द आदि देखकर सम्मोहित या विचलित न होता हो)।

शल्य उपकरण एवं उनकी विशेषताएँ[संपादित करें]

शल्य क्रिया में प्रयुक्त होने वाले विविध उपकरणों एवं उनकी विशेषताओं का वर्णन सुश्रुत संहिता में किया गया है, इसमें शल्य में प्रयुक्त उपकरणों को 'यन्त्र' और 'शस्त्र' नाम से वर्णित किया गया हैं। संहिता में लिखा है-

यन्त्रशतमेकोत्तरम्। – सूश्रुत संहिता, सूत्रस्थान 7.1।

(अर्थ : यन्त्र 101 होते हैं।)

तानि षट्प्रकाराणि, तद्यथा – स्वस्तियन्त्राणि, संदंशयन्त्राणि, तालयन्त्राणि, नाडीयन्त्राणि, शलाकायन्त्राणि, उपयन्त्राणि चेति॥5॥

इन यंत्रों के आकृतिभेद से 6 प्रकार के होते हैं। जैसे स्वस्ति यंत्र, सन्दंशयन्त्र, तालयन्त्र, नाडी़यन्त्र, शलाकायन्त्र और उपयन्त्र॥5॥

तत्र चतुर्विंशतिः स्वस्तिकयन्त्राणि, द्वे एव तालयन्त्रे, विंशतिर्नाड्यः अष्टाविंशतिः शलाकाः, पञ्चविंशतिरूपयन्त्राणि॥6॥

उनमें से स्वस्तिक यंत्र चौबीस प्रकार के, सन्दशयनत्र दो प्रकार के, तालयन्त्र भी दो ही प्रकार के, नाडीयन्त्र बीस प्रकार के, शलाकायन्त्र अट्ठाइस प्रकार के और उपयन्त्र पच्चीस प्रकार के होते हैं।

तानि प्रायशो लौहानि भवन्ति, तत्प्रतिरूपकाणि वा तदलाभे॥7॥

प्रायः करके ये यन्त्र लौह के बनाये जाते हैं किन्तु लौह के अभाव में उसके सदृश पदार्थों के भी बनाये जा सकते हैं॥7॥

तत्र, नानाप्रकाराणां व्यालानां मृगपक्षिणां मुखैर्मुखानि यन्त्राणां प्रायशः सदृशानि। तस्मात् तत्सारूप्यादागमादुपदेशादन्ययन्त्रदर्शनाद् युक्तितश्च कारयेत्॥8॥

यन्त्रों की बनावट के लिये कहा है कि अनेक प्रकार के हिंसक पशु, मृग और पक्षियों के मुख के समान इनका मुख बनाना चाहिये क्योंकि जानवरों के मुख प्रायः यन्त्रों के समान होते हैं। इसलिये उक्त प्रकार के पशु – पक्षियों के मुख – सादृश्यानुसार, वेदादि शास्त्रों के प्रामाणानुकूल, अनुभवी वैद्यों के कथनानुसार एवं पूर्वकाल में बने हुए यन्त्रों के समान और युक्तियुक्त यन्त्रों का निर्माण करना चाहिये॥8॥

समाहितानि यन्त्राणि खरश्लक्ष्णमुखानि च। सुदृढानि सुरूपाणि सुग्रहाणि च कारयेत्॥9॥

यन्त्रों को समाहित आवश्यकतानुसार कोई खुरदरे और कोई मुलायम मुख वाले, अत्यन्त मजबूत, सुन्दर और जिन्हें ठीक तरह से हाथ में पकड़ सकें ऐसे बनावें॥9॥

इससे आगे विविध शल्यशस्त्रों का वर्णन करते हैं –

विंशतिः शस्त्राणि, तद्यथा –मण्डलाग्रकरपत्रवृद्धिपत्रनखशस्त्रमुद्रिकोत्पलपत्रकार्द्धधारसूचीकुशपत्राटीमुखशरारिमुखान्तर्मुखत्रिकूर्चककुठारिकाव्रीहिमुखारावेतसपत्रकबडिशदन्तशङ्क्वेषण्य इति॥3॥

शस्त्र बीस प्रकार के होते हैं। उनकी गणना इस प्रकार है-

1 मण्डलाग्र 2 करपत्र 3 वृद्धिपत्र 4 नखशस्त्र 5 मुद्रिका 6 उत्पलपत्र 7 अर्धधार 8 सूची 9 कुशपत्र 10 आटीमुख 11 शरारीमुख 12 अन्तर्मुख 13 त्रिकूर्चक 14 कुठारिका 15 व्रीहिमुख 16 आरा 17 वेतसपत्र 18 बडिश 19 दन्तशङ्कु 20 एषणी॥3॥[1]

अष्टविध शस्त्रकर्म[संपादित करें]

अष्टविध शस्त्रकर्म की अवधारणा आचार्य सुश्रुत का अद्वितीय योगदान है। इन आठ विशिष्ट सर्जिकल तकनीकों को 'मूल' सर्जिकल प्रक्रिया के रूप में माना जाता है, जो उन सभी रोगों के प्रबंधन में उपयोगी है जिनके लिए शल्यक्रिया आवश्यक है। ये आठ प्रक्रियाएँ हैं- छेदन (Excision), भेदन (Incision), लेखन (Scrapping), व्यधन (Puncturing), विस्रावण (Drainage), ऐषण (Probbing), आहरण (Extraction) और सिवन (Suturing)। [2][3]

सुश्रुतसंहिता में उन रोगों का वर्णन है जिनके समुचित प्रबन्धन के लिए शल्यक्रिया आवश्यक है। ये रोग हैं - सद्योव्रण (चोट लगने से बने घाव), विद्रधि (Abcess), रक्तातिप्रवृत्ति (Acute haemorrhage), छिद्रोदर (Intestinal perforation), बद्धोगुदोदर (Intestinal obstruction), मूत्रश्मारी (Urinary calculi) आदि।

संधानीय शल्य विज्ञान[संपादित करें]

आयुर्वेद में संधानीय शल्य विज्ञान का विकास चरम सीमा पर था। सुश्रुत संहिता में संधानक शल्यक्रिया के प्रधानतः दो पक्ष वर्णित हैं। प्रथम पक्ष को संधानकर्म एवं द्वितीय को वैकृतापट्टम की संज्ञा दी गई है।

१. संधान कर्म पुनर्निर्माण संबंधी शल्यक्रिया है और संधानक शलयविज्ञान का आधारस्तंभ भी। इसके अंतर्गत

(क) कर्णसंधान, (ख) नासासंधान तथा (ग) ओष्ठसंधान इत्यादि शल्यक्रियाओं का समावेश किया गया है।

२. वैकृतपट्टम में व्राणरोपण से प्राकृतिक लावण्य पर्यंत अनेक अवस्थाओं का समावेश किया गया है। वैकृतापट्टम क्रिया का मुख्य उद्देश्य व्राणवस्तु (व्राणचिह्नों) को यथासंभव प्राकृतिक अवस्था (आकार, रूप, प्रकृति) में लाना है जिनमें निम्नांकित आठ प्रधान कर्म संपादित किए जाते हैं :

(अ) उत्सादन कर्म- नीचे दबी हुई व्राणवस्तु को ऊपर उठाना।
(आ) अवसादनकर्म - ऊपर उठी हुई व्राणवस्तु को नीचे लाना।
(इ) मृदुकर्म - कठिन व्राणवस्तु को मृदु करना।
(ई) दारुणकर्म - मृदु व्राणवस्तु को वर्ण प्रदान करना।
(उ) कृष्णकर्म - वर्णरहित व्राणवस्तु को वर्ण प्रदान करना।
(ऊ) पांडुकर्म - अतिरंजित व्राणवस्तु को न्यूनवर्ण अथवा वर्णविहीन करना।
(ए) रोमसंजनन - व्राणवस्तु के ऊपर पुनः प्राकृतिक रोम उत्पन्न करना।
(ऐ) लोपाहरण - व्राणवस्तु के ऊपर उत्पन्न अत्यधिक बालों को नष्ट करना।

साठ उपक्रम[संपादित करें]

सुश्रुतसंहिता में ६० उपक्रम वर्णित हैं जिन्हें षष्टि उपक्रम (साठ उपक्रम) कहा गया है। ( सुश्रुतसंहिता / चिकित्सास्थानम् / द्विव्रणीयचिकित्सितम् ८) । इसमें आठ 'शस्त्रकर्म' भी सम्मिलित हैं (छेदन, भेदन, लेखन, एषण, आहरण, व्यधन, विस्रवाण, सीवन)।[4]

  1. अपतर्पण (fasting or low diet),
  2. आलेप (plastering),
  3. परिषेक (irrigating or spraying),
  4. अभ्यङ्ग (anointing),
  5. स्वेद (fomentations, etc.),
  6. विम्लापन (resolution by massage or rubbing),
  7. उपनाह Upanaha (poultice),
  8. पाचन (inducing suppuration),
  9. विस्रावण (evacuating or draining),
  10. स्नेह (internal use of medicated oils, ghrita, etc.),
  11. वमन (emetics),
  12. विरेचन (purgatives),
  13. छेदन (excision),
  14. भेदन (opening—e.g., of an abscess),
  15. दारण (bursting by medicinal applications),
  16. लेखन (scraping),
  17. ऐषण (probing),
  18. आहरण (extraction),
  19. व्यधन (puncturing—opening a vein),
  20. विस्रावण (inducing discharge),
  21. सीवन (suturing),
  22. सन्धान (helping re-union or adhesion),
  23. पीडन (pressing),
  24. शोणितास्थापन (arrest of bleeding),
  25. निर्वापण (cooling application),
  26. उत्कारिका (massive poultices),
  27. कषाय (washing with decoctions),
  28. वर्ति (lint or plug),
  29. कल्क (paste),
  30. सर्पि या घृत (application of medicated clarified butter),
  31. तैल (application of medicated oil),
  32. रसक्रिया (application of drug-extracts),
  33. अवचूर्णन (dusting with medicinal powders),
  34. व्रणधूपन (fumigation of an ulcer),
  35. उत्सादन (raising of the margins or bed of an ulcer),
  36. अवसादन (destruction of exuberant granulation),
  37. मृदुकर्म (softening),
  38. दारुणकर्म (hardening of soft parts),
  39. क्षारकर्म (application of caustics),
  40. अग्निकर्म (cauterization),
  41. कृष्णकर्म (blackening),
  42. पाण्डुकर्म (making yellow-coloured cicatrices),
  43. प्रतिसारण (rubbing with medicinal powders),
  44. रोमसञ्जनन (growing of hairs),
  45. लोमापहरण (epilation),
  46. बस्तिकर्म (application of enemas),
  47. उत्तरबस्तिकर्म (urethral and vaginal injections),
  48. बन्ध (bandaging),
  49. पत्रदना (application of certain leaves—vide Infra),
  50. कृमिघ्न (Vermifugal measures),
  51. बृंहण (application of restorative tonics),
  52. विषघ्न (disinfectant or anti-poisonous applications),
  53. शिरोविरेचन (errhines),
  54. नस्य (snuff),
  55. कवलधारण (holding in the mouth of certain drug-masses for diseases of the oral cavity or gargling),
  56. धूम (smoking or vapouring),
  57. मधुसर्पिः (honey and clarified butter),
  58. यन्त्र (mechanical contrivances, e g., pulleys, etc.),
  59. आहार (diet)
  60. रक्षाविधान (protection from the influence of malicious spirits).

क्षारसूत्र[संपादित करें]

क्षारसूत्र, आयुर्वेदिक शल्यचिकित्सा है जिसके द्वारा भगन्दर और बवासीर की चिकित्सा की जाती है। सूत्र का अर्थ है 'धागा'। एक घागे पर अनेक रसायनों (क्षार) का लेप करने के बाद उसकी सहायता से भगन्दर को काटकर हटाया जाता है। इस विधि में औषधीय तत्वों से भावित सूत्र के बांधने एवं पिरोने से अर्श कटकर गिर जाते है एवं भगन्दर के धाव बिना अतिरिक्त मर्हम पट्टी के स्वतः भर जाते है तथा दुबारा उसी स्थान पर पुनः उत्पन्न नही होते । इन रोगों मे यह विधि 99 प्रतिशत सफल शल्य चिकित्सा है। यह काफी सस्ती, प्रचलित एवं सफल पद्धति है।

यद्धपि उक्त विधि, शास्त्रों में सूत्र रूप से वर्णित थी किन्तु उसे विकसित कर व्यावहारिक स्वरूप में स्थापित करने का श्रेय बनारस हिन्दू विश्‍वविद्यालय को है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]