वेसर शैली

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वेसर शैली भारतीय हिन्दू स्थापत्य कला की तीन में से एक शैली है। नागर और द्रविड़ शैली के मिश्रित रूप को वेसर या बेसर शैली की संज्ञा दी गई है। यह विन्यास में द्रविड़ शैली का तथा रूप में नागर जैसा होता है।[1] इस शैली के मंदिर विन्ध्य पर्वतमाला से कृष्णा नदी के बीच निर्मित हैं।

मध्य भारत तथा कर्णाटक के की मन्दिरों में प्रायः उत्तरी तथा द्रविड दोनों ही शैलियों का सम्मिलित स्वरूप मिलता है। कर्णाटक के चालुक्य मन्दिर वेसर शैली के माने जा सकते हैं। चालुक्यों ने मिश्रित वेसर शैली को प्रोत्साहन दिया था। इन मन्दिरों का रूप कुछ विशिष्ट ही होता है।[2]

विमान शिखर छोटा, फ़ैले कलश, मूर्तियों का आधिक्य, अलंकरण परम्परा का बाहुल्य ही इनकी विशेषता है। अधिकांशतः दक्खिन में मिलने वाले इन मन्दिरों के शिल्प को उन्नति के शिखर पर पहुंचाने का प्रयास चालुक्यों और होयसालों ने सर्वाधिक किया है। [3]

अन्य शैलियां[संपादित करें]

अन्य शैलियाँ हैं:

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. मंदिरों का सामान्य इतिहास व विवरण। देवस्थान विभाग देवस्थान राजस्थान (२६ अप्रैल २०१८)।
  2. खजुराहो की स्थापत्य कला एवं मन्दिर स्थापत्य। द्वितीय अध्याय। शोधगंगा
  3. शर्मा, डा०श्याम; प्राचीन भारतीय कला, वास्तु कला एवं मूर्ति कला। रिसर्च पब्लिकेशंस, जयपुर। एन. डी॥ पृ११४-११५

इन्हें भी देखें[संपादित करें]