वेलुपिल्लई प्रभाकरण

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वेलुपिल्लई प्रभाकरण (२६ नवंबर, १९५४-१८ मई, २००९) लिट्टे के नेता था। १९७५ के आसपास लिट्टे के गठन के बाद से वो दुनिया के सबसे ताकतवर गुरिल्ला लड़ाकाओं के प्रमुख के रूप में जाना जाता था। १८ मई २००९ को श्रीलंका की सेना ने उन्हें मारने का दावा किया है।[1]

जीवनी[संपादित करें]

प्रभाकरण का जन्म २६ नवम्बर १९५४ को श्रीलंका के जाफना द्वीप के समुद्रतटीय नगर वेलवेत्तिथुरई में हुआ था। वह अपने माता-पिता की चौथी और सबसे छोटी संतान था। प्रभाकरण पढ़ाई में औसत दर्जे का था। बचपन में उसका स्वभाव शर्मीला और किताबों से चिपके रहने वाले बच्चे के रूप में था। श्रीलंका में पृथक ईलम की मांग को लेकर पिछले तीन दशक तक निर्मम आंदोलन चलाने वाला वेलुपिल्लई प्रभाकरण एक पक्का लड़ाका था, लेकिन उसके विरोधी उसे एक ऐसे महत्वाकांक्षी के रूप में देखते थे जिसने असंतुष्टों को कभी सहन नहीं किया। 'थंबी' (छोटा भाई) के रूप में कुख्यात प्रभाकरण एक सरकारी अधिकारी की चौथी संतान था, जिसने बचपन में ही स्कूल छोड़ दिया था।

नेपालियन व सिकंदर से प्रभावित[संपादित करें]

प्रभाकरण, नेपोलियनसिंकदर महान से बहुत प्रभावित था और उसने उनकी कई किताबों को पढ़ा था। एक साक्षात्कार में प्रभाकरण ने इसका खुलासा किया था। इनके अलावा प्रभाकरण सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह से भी बहुत प्रभावित था। ये दोनों भारतीय नेता ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हिंसक संघर्ष में विश्वास रखते थे।

भेदभाव से आहत था[संपादित करें]

राजनीति, रोजगार और शिक्षा में तमिलों के साथ भेद-भाव से आहत प्रभाकरण ने राजनीतिक बैठकों में भाग लेना शुरू किया और मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण प्राप्त किया।। श्री लंका में तमिल हिन्दू जो कि अल्पसंख्यकः है और ईसाई बहुसंख्यक रहते हैं। आज तक श्री लंका में तमिल हिन्दुओ को वोट डालने तक का अधिकार नहीं मिला हुआ है। यहाँ तक कि श्री लंका के सविधान में साफ़ तौर पर लिखा है कि तमिल हिन्दू दूसरे दर्जे के नागरिक है। अगर हैम तमिल हिन्दुओ पर किये गाय अत्याचारो को बताने लग जाये तो इसी वक्त हमारा पेज बंद जायेगा। आप कल्पना कीजिये कितना भयानक रूप से तमिलो का कत्लेआम किया गया होगा।

इसी अत्याचार के विरोध में वलिपिलाई प्रभाकरन ने लिट्टे {लिबरसन टाइगर ऑफ़ तमिल इल्म } का निर्माण किया। हिन्दू तमिलो के सामने सिर्फ दो ही रास्ते बच गय थे, एक ईसाइयो के अत्याचारो का शिकार बनकर बुजदिल कि मौत मरो और दुसरा रास्ता स्वाभिमान के खातिर लड़ते हुए मौत को गले लगा लो। हिन्दू तमिलो ने दूसरा रास्ता चुना और प्रभाकरन का साथ देते हुए श्री लंका के साथ युद्ध छेड़ दिया। शुरुवाती दशको में लिट्टे को जबरदस्त कामयाबी मिली और आंशिक रूप से श्री लंका हार तक मान ली थी।

तभी हमारे भुत पूर्व प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी जी हस्तक्षेप करते है और श्री लंका कि सेना को मदद करते है जी हां अपने ठीक सुना, भारत ईसाइयो कि मदद करता है और प्रभाकरन के खिलाफ युद्ध छेड़ देता है। जिसके जवाब में प्रभाकरन, राजीव गंधी कि हत्या करवा देते हैं।

अगर उस वक्त प्रभाकरन का थोडा भी साथ दिया गया होता तो आज हिन्दू तमिलो का एक अलग देश होता और श्री लंका से जी हजुरी नहीं करनी पड़ती। क्यूंकि तब तमिलो का देश हमारे साथ खड़ा होता।

आज भी श्री लंका में तमिल हिन्दुओ कि स्थिति दयनीय है।

प्रभाकरण का उदय[संपादित करें]

श्रीलंका के पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक छोटे से कस्बे में थंबी का उदय हुआ और तमिलों के लिए अलग 'गृहभूमि' की मांग को पूरा करने के लिए उसने १९७२ में कुछ युवकों के एक समूह के साथ 'तमिल न्यू टाइगर' की शुरुआत की। उसने इस समूह का नेतृत्व किया। १९७५ में इस समूह का नाम बदल कर लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम [लिट्टे] रख दिया गया। यह गुट बदनाम वेल्लिकाडे कारागार नरसंहार के बाद और आक्रामक हो गया। इस नरसंहार में अलगाववादी नेता कुट्टमनि और जगन को सेना ने मार दिया था।

आत्मघाती दस्ता[संपादित करें]

प्रभाकरण के नेतृत्व में विश्व पहले आत्मघाती दस्ते से परिचित हुआ, जिसका शिकार भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी हुए।

प्रभाकरण की पहचान[संपादित करें]

निर्भीक छापामार[संपादित करें]

प्रभाकरण की पहचान एक निर्भीक छापामार लड़ाके के रूप में थी। हमेशा असलहों व वर्दी से लैस रहने वाला प्रभाकरण शीघ्र ही तमिल विद्रोहियों का प्रेरणास्रोत बन कर उभरा।

वांछित अपराधी[संपादित करें]

समर्थकों के लिए स्वतंत्रता सेनानी तथा अन्य लोगों के लिए दुर्दात लड़ाके के रूप में कुख्यात प्रभाकरण आतंकवाद, हत्या और संगठित अपराध के लिए १९९० से इंटरपोल और अन्य संगठनों को वांछित था।

युद्धक्षेत्र पसंद[संपादित करें]

प्रभाकरण स्वयं वार्ता की मेज पर बात करने की बजाए युद्धक्षेत्र में होना पसंद करता था, इसीलिए जब नार्वे की मध्यस्थता में वर्ष २००२ में संघर्ष विराम हुआ तो इसका उपयोग प्रभाकरण ने लिट्टे को संगठित करने के लिए किया। परंतु संघर्ष विराम टिकाऊ साबित नहीं हुआ और वर्ष २००३ से वर्ष २००८ के बीच प्रभाकरण को कई झटके लगे। वर्ष २००४ में कभी प्रभाकरण का दाहिना हाथ माने जाने वाले कर्नल करुणा उससे अलग हो गया। दो वर्ष बाद एलटीटीई की राजनीतिक शाखा के प्रमुख एंटन बालासिंघम की लंदन में मृत्यु हो गई। बालासिंघम कैंसर से पीड़ित था। नवंबर २००७ में सेना की बमबारी में वरिष्ठ तमिल विद्रोही नेता एसपी तमिलचेल्वम मारा गया।

तमिलों के बीच स्वतंत्रता सेनानी, सिंहलों में क्रूर हत्यारा[संपादित करें]

बहुसंख्यक सिंहली शासन के विरुद्ध लड़ाई लड़े रहे प्रभाकरण को तमिल, स्वतंत्रता सेनानी मानते थे, वहीं दूसरी ओर श्रीलंकाई सरकार और सेना उसे एक क्रूर हत्यारा मानती थी, जिसके लिए मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं था। वर्ष १९७५ में उन पर जाफना के मेयर की हत्या का आरोप लगा। तमिल विद्रोहियों की ओर से ये पहली बड़ी कार्रवाई थी।

श्रीलंकाई गृहयुद्ध[संपादित करें]

तमिल ईलम के संघर्ष में अनेक सिंहली और तमिल नेताओं समेत ७० हजार से अधिक लोगों ने प्राण गँवाए गई। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी इसी आतंकवाद की भेंट चढ़ गए। प्रभाकरण सिंहली नेताओं राष्ट्रपति प्रेमदास, दामिनी दिशानायके [यूएनपी के राष्ट्रपति पद उम्मीदवार] और रंजन विजयरत्ने तथा उदारवादी तमिल नेताओं अप्पापिल्लई, अमिरतालिंगम, योगेश्वरन और उनकी पत्नी तथा विदेश मंत्री लक्षमण कादिरगामर की हत्या का उत्तरदायी था। उसने अपने लड़कों को भी नहीं छोड़ा। इसमें पीएलओटीई नेता उमा महेश्वरन, टीईएलओ के सिरी सबरतिनम, ईपीआरएलएफ के पद्मनाभ और चेन्नई के उसके १४ सहयोगियों के अतिरिक्त लिट्टे का असंतुष्ट नेता मथैया भी शामिल है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "तमिल विद्रोही नेता प्रभाकरण मारे गए". अभिगमन तिथि 18 मई, 2009. |accessdate= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)