विशेष न्यायालय विधेयक (मप्र)

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विशेष न्यायालय विधेयक (मप्र)
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'विशेष न्यायालय विधेयक' एक नया हथियार काली कमाई के खीलाफ।

विशेष न्यायालय विधेयक मध्य प्रदेश विधान सभा में अभी हाल में ही (अप्रैल २०११) पारित विधेयक है। इसमें भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं और सरकारी मुलाजिमों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई के लिए विशेष अदालतें गठित करने का प्रावधान है। इसमें काली कमाई से जुटाई संपत्ति राजसात करने और सजा का भी प्रावधान है। इसके दायरे में पंच, पार्षद से लेकर मुख्यमंत्री और भृत्य से लेकर मुख्य सचिव तक सभी लोकसेवक आएंगे। विशेष अदालतों के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकेगी।

लोक सेवकों के विरूद्ध भ्रष्ट आचरण के मामलों में पहले से कानून उपलब्ध हैं। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता के तहत कार्यवाही की जाती है। यह अनुभव किया गया है कि इन कानूनों के माध्यम से प्रकरणों के निराकरण में काफी समय लग जाता है। विलंब के कारण प्रकरण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और इसका लाभ भ्रष्ट लोकसेवक को मिलता है।

नए कानून में क्या?[संपादित करें]

छह माह में निपटारा

विशेष न्यायालयों में जिला एवं सत्र न्यायाधीश और अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश स्तर के जज, उच्च न्यायालय की सहमति से नामांकित किए जाएंगे।

विशेष न्यायालय एक वर्ष के भीतर मामले को निपटाने का प्रयास करेगा। जबकि संपत्ति राजसात करने से जुड़े मामले छह माह में निपटाए जाएंगे।

विशेष न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील उच्च न्यायालय में की जा सकती है। अपील का निराकरण छह माह के भीतर किया जाएगा।

अगर किसी लोकसेवक के बारे में यह स्पष्ट हो जाएगा कि उसने भ्रष्ट तौर तरीकों से संपत्ति अर्जित की है तब विशेष न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर उसकी संपत्ति राजसात करने की कार्रवाई की जाएगी। इस संबंध में सरकार की ओर से ही कोर्ट में पब्लिक प्रोसिक्यूटर अधिकृत किया जाएगा।

राजनीतिक दुरुपयोग की सम्भावना

विधि विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून में ऐसी कई खामियां हैं जो इसके प्रभावी क्रियान्वयन में अड़चन बन सकती हैं। विशेष अदालतों के लिए जज आदि की व्यवस्था अलग से नहीं की गई है। न्यायाधीशों पर वैसे भी काम का बोझ बहुत है। इस स्थिति में मौजूदा डीजे एवं एडीजे कितनी सक्रियता से काम कर सकेंगे इस पर सवाल उठना लाजिमी है। भ्रष्ट लोकसेवकों और व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश सरकार करेगी ऐसे में इसके राजनीतिक दुरुपयोग की आशंका को भी बल मिलता है। स्पेशल कोर्ट के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है। यानी ऐसे प्रकरणों में शीघ्र फैसला होने की बात तो कही जा रही है लेकिन इसकी संभावना नहीं है। क्योंकि हाईकोर्ट में प्रकरण लंबा भी खिंच सकता है। ऐसा लगता है कि यह विधेयक काफी जल्दबाजी में लाया गया है। बेहतर होता कि यह कानून बनाने के पहले वरिष्ठ न्यायविदों और कानून के जानकारों से पर्याप्त विचार विमर्श किया जाता। हालांकि इसकी गुंजाइश आगे इस कानून में संशोधन करने के लिए बची हुई है।

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