"कृष्णप्रसाद भट्टराई" के अवतरणों में अंतर

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==राजनीतिक जीवन==
 
राणा प्रधानमन्त्री वीर समशेरके वक्रदृष्टिमे पडे हुये पं. विश्वनाथ भट्टराई (कृष्णप्रसाद भट्टराईके दादा) सपरिवार बनारस निर्वासनमे जानेके बाद ये वहिंसे बिहारके रामनगर राज्यके राजाके पुरोहित बन्ने पहुँचे। उनके बेटे संकटाप्रसाद भि तिनौ रामनगर रामराजाके पुरोहित थे। यिनके चारौ भाइ बेटे तो बनारसमे बैठके अध्ययन करते थे। वहींसे ये चारौ जन भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलनमे सक्रिय हुये थे। बडे भैयाओके प्रभावसे छोटे कृष्णप्रसाद राजनीतिमे और आगे पहुँचे।
भट्टराई सन १९४२ के अङ्ग्रेज भारत छोडो स्वतन्त्रता आन्दोलनमे सक्रिय सहभागी होकर पहलि बार अङ्ग्रेज सरकार द्धारा पकडे गए थे। सन् १९४५ मे बनारस हिन्दु युनिभर्सिटी स्थित नेपाल छात्र संघके उपाध्यक्षके रूपमे रहकर नेपाली विद्यार्थीओं बीच राजनीतिक चेतना जगानेके काममे भट्टराई सक्रिय रहे। उसके बाद नेपालका निरङ्कुशतन्त्र हटानेके लिए आन्दोलन करने के सम्बन्धमे छलफल होने लगा। [[बीपी कोइराला]] और अन्य केही तात्कालीन युवाओं पहिलेस् हि संगठनमे लगे हुये थे। नेपालके १०४ वर्ष लम्बा निरङ्कुश राणातन्त्र समाप्त करके संवैधानिक राजतन्त्रात्मक प्रजातन्त्र स्थापना करने के उद्देश्यसे पहलि बार वि.सं. २००३ मा बनारसमे अखिल भारतीय नेपाली राष्ट्रिय काङ्ग्रेस नामक संस्था गठन हुवा। देवीप्रसाद सापकोटाके सभापतित्वमे बना उक्त संस्थाके महामन्त्री रहे भट्टराईने वि.सं. २००३ माघमे कलकत्तामे स्थापित नेपाली राष्ट्रिय कांग्रेसमे संगठन मन्त्रीका पद सम्हाला था।
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