"भक्ति": अवतरणों में अंतर

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जीव का शरीर एक वस्त्र माना जाता है। जब कोई साधक मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो सन्त तथा भक्तजन कहा करते हैं कि अमुक सन्त या साधु चोला छोड़ गया। गीता अध्याय 2 श्लोक 22 में कहा है कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रा ग्रहण करता है। वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर अन्य नए शरीरों को प्राप्त होती है। (गीता अध्याय 2 श्लोक 22) इसलिए प्रत्येक प्राणी अपने-अपने शरीर अर्थात् पोषाक पहने हुए है। जैसे कोई गधे, कुत्ते, सूअर, अन्य पशु-पक्षियों व कीटों रूपी वस्त्रा धारण किए है, मनुष्य का शरीर भी एक पोषाक है। जो बच्चे विद्यालय में प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं, उनके 6 लिए एक विशेष प्रकार की पोषाक (क्तमेे) अनिवार्य होती है। इसी प्रकार पृथ्वी पर जितने भी स्त्राी-पुरूष हैं, ये सबके सब अन्य प्राणियों से भिन्न पोषाक अर्थात् शरीर धारण किए हैं, सर्व मानव को ऐसे जानें जैसे विद्यार्थी होते हैं। उनकी पोषाक विशेष होती है। विद्यार्थियों से माता-पिता कोई विशेष कार्य नहीं लेते। उनको सुविधाऐं भी परिवार के अन्य सदस्यों से भिन्न देते हैं। यदि वे विद्यार्थी अपना उद्देश्य त्यागकर अन्य बच्चों की तरह ही खेलकूद में लगे रहें जो बच्चे विद्यालय में नहीं जाते (उनकी पोषाक भी भिन्न होती है) तो वे विद्यार्थी अपने विद्याकाल को समाप्त करके बहुत पश्चाताप् करेंगे, बहुत कष्ट उठाऐंगे। जैसे सन्तानोत्पत्ति, सन्तान का पालन पोषण सर्व प्राणी करते हैं। यदि मनुष्य भी यही कार्य करके अपना जीवन अन्त कर जाता है तो उसमें और अन्य पशु-पक्षियों में कोई अन्तर नही रहा। उसको मानव शरीर प्राप्त हुआ था भक्ति करने के लिए, वह भक्ति न करके फिर पशु व अन्य प्राणी के शरीर को प्राप्त करके बहुत कष्ट उठाएगा।
 
== भक्ति किस प्रभु की करनी चाहिए ==
भक्ति क्षेत्र की चरम साधना सख्यभाव में समवसित होती है। जीव ईश्वर का शाश्वत सखा है। प्रकृति रूपी वृक्ष पर दोनों बैठे हैं। जीव इस वृक्ष के फल चखने लगता है और परिणामत: ईश्वर के सखाभाव से पृथक् हो जाता है। जब साधना, करता हुआ भक्ति के द्वारा वह प्रभु की ओर उन्मुख होता है तो दास्य, वात्सल्य, दाम्पत्य आदि सीढ़ियों को पार करके पुनः सखाभाव को प्राप्त कर लेता है।<ref>Allport, Gordon W.; Swami Akhilananda (1999). "Its meaning for the West". Hindu Psychology. Routledge. p. 180.</ref> इस भाव में न दास का दूरत्व है, न पुत्र का संकोच है और न पत्नी का अधीन भाव है। ईश्वर का सखा जीव स्वाधीन है, मर्यादाओं से ऊपर है और उसका वरेण्य बंधु है। आचार्य वल्लभ ने प्रवाह, मर्यादा, शुद्ध अथवा पुष्ट नाम के जो चार भेद पुष्टिमार्गीय भक्तों के किए हैं, उनमें पुष्टि का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं : कृष्णधीनातु मर्यादा स्वाधीन पुष्टिरुच्यते। सख्य भाव की यह स्वाधीनता उसे भक्ति क्षेत्र में ऊर्ध्व स्थान पर स्थित कर देती है।
 
[[चित्र:Meerabai (crop).jpg|right|thumb|200px|[[मीराबाई]] (1498-1546) वैष्णव-भक्ति-आन्दोलन की महानतम कवयित्री हैं।]]
श्रीमद भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 24 में गीता ज्ञान दाता कह रहा है कि कर्तव्य और अकर्तव्यकी व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। अर्थात जिस प्रभु की जानकारी पवित्र गीता जी तथा चारों वेदों में हो वही प्रभु पुजनीय है। ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 86 मन्त्रा 26.27, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सुक्त 82 मन्त्रा 1.2, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 96 मन्त्रा 16 से 20, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 94 मन्त्रा 1, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 95 मन्त्रा 2, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 54 मन्त्र 3, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 20 मन्त्र 1 में प्रमाण है कि जो सर्व ब्रह्माण्डों का रचनहार, सर्व का पालनहार परमेश्वर है। वह सर्व भुवनों के ऊपर के लोक में बैठा है। (ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 54 मन्त्र 3) वह परमात्मा वहाँ से गति करके अर्थात् सशरीर चलकर यहाँ पृथ्वी पर आता है, भक्तों के संकटों का नाश करता है। उसका नाम कविर्देव अर्थात् कबीर परमेश्वर है। पवित्र अथर्ववेद काण्ड नं. 4 अनुवाक नं. 1 मंत्र 7 में भी प्रमाण है की परमेश्वर का नाम कविर्देव अर्थात् कबीर परमेश्वर है, जिसने सर्व रचना की है। जो परमेश्वर अचल अर्थात् वास्तव में अविनाशी है इसी प्रकार श्रीमद भगवत गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा 16-17 में कहा है कि यह संसार ऐसा है जैसे पीपल का वृक्ष है जो संत इस संसार रूपी पीपल के वृक्ष की जड़ों से लेकर तीनों गुणों रुपी शाखाओं तक सर्वांग भिन्न-भिन्न बता देता है वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है अर्थात वह तत्वदर्शी संत हैं।
 
तत्वदर्शी [[रामपाल (हरियाणा)|संत रामपाल]] जी महाराज ने संसार रूपी वृक्ष के सभी भागों का वर्णन करते हुए स्पष्ट किया है की 1.मूल (जड़) :- यह परम अक्षर ब्रह्म है जो सबका मालिक है सब की उत्पत्ति करता है सबका धारण पोषण करने वाला 2. अक्षर पुरुष:-यह संसार रूपी वृक्ष का तना जाने । यह 7 शंख ब्रह्मांडों का मालिक है नाशवान हैं 3 :- क्षर पुरुष यह गीता ज्ञान दाता है इसको क्षर ब्रह्म भी कहते हैं इसे संसार रूपी वृक्ष की डार जानो। यह केवल 21 ब्रह्मांड का मालिक है नाशवान है 4 :- तीनों देवता (रजोगुण ब्रह्मा सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) संसार रूपी वृक्ष की 3 शाखाएं :- यह एक ब्रह्मांड में बने तीन लोगों (पृथ्वी लोक ,पाताल लोक, तथा स्वर्ग लोक) में एक एक विभाग के मंत्री हैं, मालिक है। इसलिए सूक्ष्मवेद में कहा कि:- “भजन करो उस रब का, जो दाता है कुल सब का” अर्थात वास्तव में केवल पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब की ही भक्ति करनी चहिए।
 
 
भक्ति का तात्विक विवेचन वैष्णव आचार्यो द्वारा विशेष रूप से हुआ है। [[वैष्णव]] संप्रदाय भक्तिप्रधान संप्रदाय रहा है। [[श्रीमद्भागवत]] और [[श्रीमद्भगवद्गीता]] के अतिरिक्त वैष्णव भक्ति पर अनेक श्लोकबद्ध संहिताओं की रचना हुई। सूत्र शैली में उसपर [[नारदभक्तिसूत्र|नारद भक्तिसूत्र]] तथा शांडिल्य भक्तिसूत्र जैसे अनुपम ग्रंथ लिखे गए। <ref>Georg Feuerstein; Ken Wilber (2002). [https://books.google.com/?id=Yy5s2EHXFwAC&pg=PA55 The Yoga Tradition]{{Dead link|date=सितंबर 2021|bot=InternetArchiveBot}}. Motilal Banarsidass. p. 55. ISBN 978-81-208-1923-8.</ref>पराधीनता के समय में भी महात्मा [[रूप गोस्वामी]] ने भक्तिरसायन जैसे अमूल्य ग्रंथों का प्रणयन किया। भक्ति-तत्व-तंत्र को हृदयंगम करने के लिए इन ग्रंथों का अध्ययन अनिवार्यत: अपेक्षित है। आचार्य वल्लभ की [[भागवत]] पर सुबोधिनी टीका तथा [[नारायण भट्ट]] की भक्ति की परिभाषा इस प्रकार दी गई है :
 

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