"भक्ति": अवतरणों में अंतर

नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
980 बाइट्स हटाए गए ,  3 माह पहले
(अप्रमाणित जानकारी हटाई और सही यथार्थ जानकारी का विस्तार किया)
(→‎भक्ति करना क्यों जरूरी है?: जानकरी का विस्तार)
भक्ति क्यों करनी चाहिए इसके लिए हम सबसे पहले रुख करते हैं श्रीमद् भगवत गीता का रुख करते हैं। गीता अध्याय 18 श्लोक 65 गीता तथा अध्याय 9 श्लोक 33 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि हे अर्जुन! मुझ में मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो, मुझको प्रणाम कर, ऐसा करने से मुझे ही प्राप्त होगा। भक्ति करना इसलिए अनिवार्य क्योंकि प्रभु ने हमें पवित्र सद्ग्रन्थों में भक्ति करने का आदेश दिया है, क्योंकि बिना भक्ति के हमारा मोक्ष संभव नहीं है। गीता अध्याय 8 के दो श्लोकों (गीता अध्याय 8 श्लोक 5, 7) में तो गीता ज्ञान दाता ने अपनी भक्ति करने को कहा है तथा गीता अध्याय 8 के ही श्लोक 8, 9, 10 में गीता ज्ञान दाता ने अपने से श्रेष्ठ परमेश्वर की भक्ति करने को कहा है तथा उस परमेश्वर की भक्ति करने से उसी (परम्) श्रेष्ठ (दिव्यम्) अलौकिक (पुरूषम्) पुरूष को अर्थात् परमेश्वर को प्राप्त होगा। इसलिए भक्ति करना अनिवार्य है। जैसे रोग नाश के लिए औषधि का सेवन करना अनिवार्य है, ऐसे ही आत्म-कल्याण के लिए भक्ति करना अनिवार्य है।
 
== भक्ति से लाभ ==
[[ईसाई धर्म|ईसाई]] प्रभु में पितृभावना रखते हैं क्योंकि पाश्चात्य विचारकों के अनुसार जीव को सर्वप्रथम प्रभु के नियामक, शासक एवं दण्डदाता रूप का ही अनुभव होता है। ब्रह्माण्ड का वह नियामक है, जीवों का शासक तथा उनके शुभाशुभ कर्मो का फलदाता होने के कारण न्यायकारी दंडदाता भी है। यह स्वामित्व की भावना है जो पितृभावना से थोड़ा हटकर है। इस रूप में जीव परमात्मा की शक्ति से भयभीत एवं त्रस्त रहता है पर उसके महत्व एवं ऐश्वर्य से आकर्षित भी होता है। अपनी क्षुद्रता, विवशता एवं अल्पज्ञता की दुःखद स्थिति उसे सर्वज्ञ, सर्वसमर्थ एवं महान् प्रभु की ओर खींच ले जाती है। भक्ति में दास्यभाव का प्रारंभ स्वामी के सामीप्यलाभ का अमोघ साधन समझा जाता है। प्रभु की रुचि भक्त की रुचि बन जाती है। अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं का परित्याग होने लगता है। स्वामी की सेवा का सातत्य स्वामी और सेवक के बीच की दूरी को दूर करनेवाला है। इससे भक्त भगवान् के साथ आत्मीयता का अनुभव करने लगता है और उसके परिवार का एक अंग बन जाता है। प्रभु मेरे पिता हैं, मैं उनका पुत्र हूँ, यह भावना दास्यभावना से अधिक आकर्षणकारी तथा प्रभु के निकट लानेवाली है। उपासना शब्द का अर्थ ही भक्त को भगवान् के निकट ले जाना है।
पवित्र सद्ग्रन्थों में लिखा है कि प्राणी अपनी भक्ति तथा पुण्यों के बल से स्वर्ग-महास्वर्ग में जाता है, वहाँ इसे सर्व सुख प्राप्त होता है। जिसके समय भक्ति तथा पुण्य क्षीण (समाप्त) हो जाते हैं तो वह प्राणी पृथ्वी पर भिन्न-भिन्न प्राणियों के शरीरों में कष्ट उठाता है। वर्तमान में जितने भी प्राणी पृथ्वी पर हैं, इनको यहाँ कोई सुख नहीं है। अन्य प्राणी केवल अपना कर्म भोग ही भोगते हैं।  श्रीमद् भगवत गीता अध्याय 5 श्लोक 12 में कहा है कि युक्तः अर्थात् जो परमात्मा की भक्ति में लगा है, उसके कर्म फल छूट जाते हैं। उनको त्यागकर भक्त भगवान प्राप्ति वाली अर्थात् परमात्मा प्राप्त होने के पश्चात् जो शान्ति अर्थात् सुख होता है, उस शान्ति को प्राप्त होता है और अयुक्तः अर्थात् जो परमात्मा की भक्ति में नहीं लगा। वह सामान्य व्यक्ति, कर्मों के कारण संसार बन्धन में फँसा रहता है। उसको कर्मानुसार अन्य प्राणियों के शरीरों में कष्ट प्राप्त होता रहता है। जैसे ट्रक या कार, बस आदि गाड़ी के पहिए की ट्यूब की हवा निकल जाती है तो वह गाड़ी खड़ी रहती है। जब उसकी ट्यूब में हवा भर दी जाती है तो वह कई क्विंटल वजन को उठाकर ले जाती है। इसी प्रकार जीव की भक्ति तथा पुण्य समाप्त हो जाते हैं तो वह हवारहित ट्यूब के समान होता है। उसके लिए भक्ति रूपी हवा भर देने के पश्चात् वही आत्मा भक्ति की शक्ति से संसार सागर से तर जाती है। भक्ति करने से परमात्मा आप के साथ होते हैं तथा आप जी की पल पल रक्षा करते हैं तथा साधक को सर्व सुख भी मिलता है।
 
वात्सल्यभाव का क्षेत्र व्यापक है। यह मानवक्षेत्र का अतिक्रांत करके पशु एवं पक्षियों के क्षेत्र में भी व्याप्त है। पितृभावना से भी बढ़कर मातृभावना है। पुत्र पिता की ओर आकर्षित होता है, पर साथ ही डरता भी है। मातृभावना में वह डर दूर हो जाता है। माता प्रेम की मूर्ति है, ममत्व की प्रतिमा है। पुत्र उसके समीप निःशंक भाव से चला जाता है। यह भावना वात्सल्यभाव को जन्म देती है। रामानुजीय वैष्णव सम्प्रदाय में केवल वात्सल्य और कर्ममिश्रित वात्सल्य को लेकर, जो मार्जारकिशोर तथा कपिकिशोर न्याय द्वारा समझाए जाते हैं, दो दल हो गए थे (टैकले और बडकालै)- एक केवल प्रपत्ति को ही सब कुछ समझते थे, दूसरे प्रपत्ति के साथ कर्म को भी आवश्यक मानते थे।
 
स्वामी तथा पिता दोनों को हम श्रद्धा की दृष्टि से अधिक देखते हैं। मातृभावना में प्रेम बढ़ जाता है, पर दाम्पत्य भावना में श्रद्धा का स्थान ही प्रेम ले लेता है। प्रेम दूरी नहीं नैकट्य चाहता है और दाम्पत्यभावना में यह उसे प्राप्त हो जाता है। शृंगार, मधुर अथवा उज्जवल रस भक्ति के क्षेत्र में इसी कारण अधिक अपनाया भी गया है। वेदकाल के ऋषियों से लेकर मध्यकालीन भक्त संतों की हृदयभूमि को पवित्र करता हुआ यह अद्यावधि अपनी व्यापकता एवं प्रभविष्णुता को प्रकट कर रहा है।

नेविगेशन मेन्यू