"मनस्ताप" के अवतरणों में अंतर

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तीसरे प्रकार के मनोविक्षिप्त उल्लास-विषाद-मनोविक्षिप्ति हैं। वे बारी-बारी से उल्लास और विषाद की मनोदशा में रहते हैं। उल्लास की अवस्था में वे अत्यधिक चंचल हो उठते हैं, इधर उधर खूब दौड़ते हैं, अनेक लोगों से बात करते हैं, विभिन्न कामों में हाथ डालते हैं, और खूब हँसते रहते हैं। इसके प्रतिकूल आचरण विषाद की अवस्था में होता है। इन विक्षिप्तों की मनोदशा इतनी असाधारण नहीं होती कि उनकी चिकित्सा ही न हो सके। मानसिक रोगों में मनोदशाओं का बदलते रहना, चाहे मनोदशा कितनी ही असाधारण क्यों न हो, रोगी के लिये कल्याणसूचक है।
 
===[[स्किज़ोफ्रीनिया]]===
उपर्युक्त तीन प्रकार की मनोदशाओं से भिन्न जटिल मनोविक्षिप्ति है, जिसे [[स्किज़ोफ्रीनिया]] (Schizophrenia) कहा जाता है। इस मनोदशा में मनुष्य को अपने व्यक्तित्व का कुछ ज्ञान ही नहीं रह जाता। उसके जीवन में न तो उल्लास का प्रश्न रहता है, न विषाद का। अतएव इस मनोदशा को दूसरा बचपन कहा जा सकता है। इस मनोदशा में आने पर रोगी में अपने आपको सँभालने की कोई शक्ति नहीं रहती। वह मलमूत्र के नित्य कार्य भी नहीं कर पाता। बिछावन पर ही वह मलमूत्र कर देता है। उसके हँसने और रोने में कोई विचार ही नहीं रहता। वह किस समय क्या कर डालेगा, इसके विषय में कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। दो चार मिनट तर्कयुक्त बातें करते हुए वह कोई ऐसी बात कह सकता है जो बिल्कुल अनर्गल हो। वह हँसते हँसते अपने सामने खड़े बालक का गला घोट सकता है।
 
==मनोविक्षिप्ति का उपचार==
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